क्या वेदान्त से ग्राहक का मन पढ़ने में मदद मिलेगी? || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी कानपुर सत्र (2020)

आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) सौरभ झांगिड़ हैं, कह रहे हैं कि “सर (महोदय), मुझे अपनी नौकरी में काफ़ी कोशिशों के बाद भी तरक्की नहीं मिल पा रही है। मैं सेल्स-विभाग में हूँ, और मेरे सीनियर्स का कहना है कि मैं क्लाइंट्स का मन नहीं पढ़ पाता हूँ इसलिए सेल्स में विफल रहता हूँ। पिछले कई महीनों से यूट्यूब पर दूसरों के मन को पढ़ने के तरीकों पर वीडियोज़ देख रहा हूँ, कोई सटीक तरीका मिला नहीं। आप बताइए कि क्या वेदांत में दूसरों के मन को पढ़ने की विधि मौजूद है?”
सौरभ, वेदांत के माध्यम से दूसरों का मन पढ़ना चाहते हो। वेदांत सबसे पहले तुमको बताता है कि “जिन्हें तुम दूसरा कह रहे हो, उनमें और तुममें बहुत कम अंतर है।“ और यही मूल भ्रम है, यही मूल अहंकार है, कि तुम सोचते हो कि तुम दूसरों से अलग हो। ‘मैं’ कहने का अधिकार हमें तभी मिल जाता है न, जब हम कहते हैं कि “वो दूसरा है जो एक अलग इकाई है, और मैं हूँ जो उस दूसरे से, तीसरे से, चौथे-पाँचवें से मैं एक अलग इकाई हूँ।“
अपने-आप को किसी और से अलग कहने के लिए तुम्हें ये मानना पड़ेगा कि उसमें और तुममें कुछ मूलभूत भेद है, है न? ठीक है? इसी मूलभूत भेद के आधार पर ‘मैं' की भावना तैयार रहती है। वेदांत बताता है कि “सबसे पहले तो तुममें और दूसरों में जो भेद दिखाई पड़ते हैं वो बड़े सतही हैं, तुम और दूसरे उतने अलग-अलग हो ही नहीं जितना ऊपर-ऊपर से लगता है।“ ऊपर-ऊपर से तो ये लगता है कि — “ये मेरा शरीर है, वो दूसरे का शरीर है, तो हम दोनों अलग हो गए।“
“ये मेरा घर है, वो दूसरे का घर है, दोनों घर अलग-अलग हैं, तो हम दोनों अलग-अलग हो गए।“ “ये मेरा परिवार है, वो उसका परिवार है, दोनों के परिवार अलग-अलग हैं, तो हम दोनों अलग हो गए।“ “ये मेरा अतीत, इतिहास है, वो उसका अतीत है, हम दोनों के अतीत अलग-अलग हैं, तो हम दोनों अलग हो गए।“



