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क्या ‘आकर्षण का सिद्धांत’ सच है? || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता आचार्य जी क्या लॉ ऑफ अट्रैक्शन (आकर्षण का सिद्धांत) होता है?

आचार्य प्रशांत: आकर्षण का सिद्धांत होता है पर बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात है अगर आप उसमें भरोसा करने लगें।

प्र: बुक (क़िताब) में तो लिखा है।

आचार्य: अरे बुक हटाइए बुक तो बहुत हैं। जितने आदमी नहीं हैं उससे ज़्यादा क़िताबें हैं। तो हर क़िताब पढ़ने लायक़ थोड़ी हो जाती है। बात इसकी नहीं है कि सच है कि नहीं, बात इसकी है उपयोगी है कि नहीं।

एक शराबी को आप बता दीजिए आकर्षण का सिद्धांत, कि जो तुम्हें चाहिए तुम दिन भर वही सोचो तो मिल जाएगा। तो दिन भर क्या सोचेगा? शराब। और सब शराबी ही हैं। तो आकर्षण का सिद्धांत हम सबको बता रहा है कि जितने तुम्हारे विकार हैं और जितनी तुम्हारी कामनाएँ हैं उन्हीं के बारे में सोचते रहो, वहीं मिल जाएँगी।

तो जिसको आप आकर्षण का सिद्धांत कहते हैं वो बड़ी ख़तरनाक मान्यता है, बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण सिद्धांत है। कामी आदमी दिन भर फिर किसका विचार करेगा? काम का, वासना का, देह का, स्त्री का, पुरुष का वो विचार कर रहा है और उसने लॉ औफ अट्रैक्शन क़िताब पढ़ ली है। वो कह रहा है जो ही चाहूँगा, वही मिलेगा। और उसको मिल भी जाएगा। अब दिन भर अगर तुम देह का ही विचार कर रहे हो तो अपनेआप तुम्हारे कर्म, तुम्हारी गति ऐसी हो जाएगी कि कहीं-न-कहीं देह में जाकर पड़ जाओगे।

तुम दिन भर अगर जिस भी वस्तु का विचार कर रहे हो, नदी का, नाले का, पक्षी का, पहाड़ का, जो भी। अब हम ऐसे तो लोग हैं नहीं कि जो दिन भर परमात्मा का विचार करें और परमात्मा का तो विचार हो भी नहीं सकता। विचार तो हम अपनी लिप्साओं का, इच्छाओं का ही करेंगे। और हमारी इच्छाएँ सब बड़ी गड़बड़ हैं।

प्र२: तो इच्छाओं से परे कैसे जाएँ?

आचार्य: ये देखिए कि इच्छाओं से क्या मिल रहा है और ये देखिए कि इच्छाएँ सर्वप्रथम उठ कहाँ से रही हैं। जहाँ से उठ रही हैं, वही मिल रहा है। अपूर्णता से इच्छा उठती है और प्रतिफल में और अपूर्णता मिल जाती है।

पूर्णता से इच्छा उठे तो ऐसी इच्छा बहुत शुभ है। मैं पूर्ण हूँ, मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। और जो चाहिए वो न मिले, तो भी मैं पूर्ण हूँ। ऐसी चाहत है मेरी कि वो न भी पूरी हो तो भी मैं पूरा हूँ। तो ऐसी चाहत शुभ है। फिर ऐसी इच्छा पर आप अपना जीवन बलिदान कर सकती हैं। ऐसी इच्छा को आप जीवन का उद्देश्य बना सकती हैं।

प्र३: अपूर्णता से इच्छा उठती है और अपूर्णता दे जाती है। और जो पहले वाली बात जो सीखी है उसमें ये है कि आप जितना किसी चीज़ को जानते हो उतना ही ये पता चलता है कि मुझे तो कितना कम पता है। और जो नहीं जानता, वो ये कहता है मुझे पता है, मैं सब जानता हूँ। और जो जितना खोजी होता है और प्रयास करता है, साधना करता है, तपस्या करता है वो ये पाता है और ज़्यादा कि मुझे तो कितना कम पता है, अभी बहुत कुछ जानना शेष है। तो ये क्या इसी अपूर्णता की कैटेगरी (वर्ग) में आते हैं?

आचार्य: जानना और चाहना अलग-अलग बातें हैं न। जो आदमी अपूर्णता से संचालित है वो जान थोड़ी कुछ रहा है! वो तो अपूर्णता से कामना उठी और उसी कामना के पीछे अंधे तरीक़े से चल दिया। उसने जाना थोड़े ही है!

हमें क्या ये पता होता है कि हमें किसी चीज़ की इच्छा क्यों हो रही है? आपको यह तो पता होता है कि आपको किस चीज़ की इच्छा है पर क्या आपको ये भी पता है कि वो इच्छा क्यों उठी? यह तो पता होता है कि आप किस चीज़ का विचार कर रहे हैं, पर क्या कभी ये पता चलता है कि वो विचार आया ही क्यों? विचार तो बस आ जाता है न। थॉट्स (विचार) का यही है, वो आपकी नहीं सुनते, मायावी हैं। वो अपना तैरते-तैरते आ जाएँगे और एक बार वो आ गए तो फिर आपको लगता है ये तो मेरे विचार हैं। आपके थोड़े ही हैं। अगर आपके होते तो आपका अपने विचारों पर बस भी होता।

विचारों का, थॉट्स का एक छोटा सा प्रयोग दिखाता हूँ, पहले बहुत किया करता था। ठीक है? अगले दो मिनट तक कोई भी बंदरों के बारे में नहीं सोचेगा। कोई बिलकुल भी विचार नहीं करेगा बंदरों के बारे में, न काले मुँह वाले बंदर के बारे में, न लाल मुँह वाले बंदर के बारे में, न बंदर की लंबी पूँछ के बारे में, न बच्चे को चिपकाए ले जा रही बंदरिया के बारे में, न बंदरों के झुंड के बारे में। और ये तो विचार करना नहीं है कि बंदर बैठा है और दाँत दिखा रहा है। बिलकुल विचार मत करिएगा। लंगूर का तो एकदम नहीं, बड़ा बंदर होता है वो, काला-काला बड़ा लंगूर और सड़क पर ही बैठा हुआ है वो। कोई विचार नहीं करेगा।

दिख गया? क्या?

श्रोता जो-जो आप बोल रहे हैं, ठीक वही-वही दिख रहा है।

आचार्य इसलिए थाट्स ज़हरीले हैं क्योंकि जो आदमी थाट्स के चक्कर में पड़ा वो दूसरे का ग़ुलाम हो गया। पिछले एक मिनट से आप मेरे ग़ुलाम थे, मैं जो बोलता जा रहा था आप वो सोचते जा रहे थे। और आप चाह रहे थे कि न सोचूँ, आप चाह रहे थे कि थॉट्स न आएँ और मैंने पकड़ लिया और थॉट्स आप में घुसेड़ दिए।

और सोचिए रिमोट कंट्रोल आपने यहीं लगा रखा है, रिसीवर। और मैं यहाँ से रिमोट दबाता जा रहा हूँ।

प्र४: पूर्णता के भाव से क्या तात्पर्य है?

आचार्य पहले आप ग़ौर करिए कि ये क्या था। पूर्णता का भाव हटाइए, मैं आपको पूर्णता का भाव भी सोचवा दूँगा, उससे क्या हो जाएगा!

बहुत आते हैं मेडिटेशन (ध्यान) ऐसे ही कराते हैं। वो कहते हैं कि कल्पना करो कि तुम पूर्ण हो और जितने बैठे होते हैं सब कल्पना करने लग जाते हैं कि हम पूर्ण हैं। ये सब विचारों का मायाजाल है, इसमें नहीं उलझते।

प्र५: नकारात्मक विचार ही पहले क्यों आते हैं?

आचार्य पॉजिटिव (सकारात्मक) भी आ जाएँगे। अरे, अभी आपको करवा देते हैं। अभी बोलिए आपको मिस यूनिवर्स बना दूँ, तीस सेकंड लगेगा। बंदरों में तो एक मिनट लगा था।

प्र५: किसी चीज़ के बारे में सोचते हैं तो पॉजिटिव (सकारात्मक) विचार नहीं आता।

आचार्य पॉजिटिव कैसे नहीं आता? सारे विज्ञापन आपमें पॉजिटिव थॉट भी ला देते हैं। ये जो सो कॉल्ड पॉजिटिविटी (तथाकथित सकारात्मकता) है यह बहुत बड़ा ज़हर है। पॉजिटिविटी के नाम पर आपको कहीं भी नचाया जा सकता है — पॉजिटिव थॉट, पॉजिटिव थॉट। थॉट ही गड़बड़ है, पॉजिटिव, निगेटिव तो बाद की बात है।

प्र५: पर जब विचार आएँ तो क्या करना है?

आचार्य: अब बंदर है, क्या करना है उसके साथ? खेलना है, पेड़ पर चढ़ना है? वो तो कुछ भी करेगा, पेड़ पर भी चढ़ेगा, बंदरिया को दौड़ाएगा, खी-खी करेगा, नोचने आएगा। आपको क्या करना है? देखना है। वो आ गया, आया गया है तो क्या करें! अब आ तो गया ही। अब उससे लड़ने तो फ़ायदा नहीं! वो तो आ गया और चढ़ बैठा। अब क्या कर लोगे? यही कर लो कि कम-से-कम बंदर जैसा आचरण करना न शुरू कर दो। थॉट बंदर है और बंदर के साथ तुम भी बंदर बन गए। तो बंदर को अपना काम करने दो, तुम चुपचाप बैठे रहो।

प्र५: नकारात्मक विचारों को हावी होने से कैसे रोकें?

आचार्य ये जान करके कि निगेटिव पॉजिटिव सब एक सा है। कुछ नहीं है। इन चक्करों में मत पड़िएगा। आप कहती तो हैं कि मेरे वीडियोज सुने हैं, सौ बार उन वीडियोज में समझाया है कि इससे ज़्यादा व्यर्थ बात कुछ नहीं है— पॉजिटिविटी (सकारात्मक) और निगेटिविटी (नकारात्मक)। कुछ नहीं है इससे ज़्यादा फ़ालतू की बात। अहंकार को जो पसंद आता है उसको वो कह देता है?

श्रोता: पॉजिटिव।

आचार्य: और जो बुरा लगता है उसको कह देता है?

श्रोता: नेगेटिव।

आचार्य: इनको अपने घर आठ बजे पहुँचना है। और यहाँ सब कुछ दो बजे ही ख़त्म हो जाए तो इनके लिए क्या हो गया?

श्रोता: पॉजिटिव।

आचार्य: और वो चाहते हैं कि यहाँ बैठ करके मुझे दस बजे तक सुनें। और मैं दो बजे ख़त्म कर दूँ तो क्या हो गया?

श्रोता: नेगेटिव।

आचार्य: तो जो तुम चाहते हो उसके अनुसार कुछ पॉजिटिव बोल देते हो, कुछ निगेटिव बोल देते हो। समझ में आ रही है बात? कोई किसान है, अभी वो चाह रहा है कि ज़रा बारिश हो जाए। और बारिश हो गई तो वो बोलेगा पॉजिटिव हुआ। और हम क्या बोलेंगे? निगेटिव हुआ।

वो तो जैसे तुम्हारी नीयत है, जैसी तुम्हारी संरचना है, जैसे तुम्हारे इरादे हैं उस हिसाब से पॉजिटिव, निगेटिव बोल देते हो। न कुछ पॉजिटिव है न कुछ निगेटिव है।

और पॉजिटिव निगेटिव से ज़्यादा ख़तरनाक है क्योंकि निगेटिव को तो तुम फिर भी ज़रा दूर रखते हो ये बोल के कि ये तो निगेटिव है। पॉजिटिव को तो तुरंत अपने ऊपर चढ़ा लेते हो। पॉजिटिव ज़्यादा ख़तरनाक है, उससे बचना।

जो पॉजिटिव एनर्जी (सकारात्मक ऊर्जा) है, पॉजिटिव थॉट (सकारात्मक विचार) है, पॉजिटिव एटिट्यूड (सकारात्मक नज़रिया) है इन सबसे बहुत बचना। जहाँ कहीं भी ये पॉजिटिविटी लिखा देखो, पढ़ो या सुनो, तुरंत भाग लेना। कहना ये ख़तरनाक है मामला।

श्रोता: और वास्तव में जो विचार आज सकारात्मक प्रतीत होता है, वही विचार कल नकारात्मक प्रतीत होने लगता है।

आचार्य: बहुत बढ़िया। बॉल आयी, बल्लेबाज ने बिलकुल दबा के मार दिया। आपने कहा, बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया, पॉजिटिव, पॉजिटिव। और गेंद ऊपर गयी, कैमरा थोड़ा घूमता है तो दिखाई देता है कि उसके नीचे खड़ा है खिलाड़ी कैच करने के लिए। आप तुरंत बोलते हो अरे बाप रे! ये तो निगेटिव हो गया।

आधे सेकेंड पहले क्या था? बड़ी ज़ोर से बल्लेबाज ने मारा था, उछाल दी थी गेंद, तो क्या था? पॉजिटिव। फिर कैमरा घूमता है और दिखाई देता है कि वहाँ बाउंडरी पर खड़ा है फील्डर गेंद को लपकने को तैयार। तो फिर सिर पकड़ लेते हो कि निगेटिव हो गया ये तो।

और वो भी निर्भर इस पर करता है कि तुम कौनसी टीम के समर्थक हो। एक टीम के लिए जो चीज़ पॉजिटिव है, दूसरे के लिए निश्चित रूप से वो चीज़ निगेटिव है। तुम टीम बदल दो पॉजिटिव, नेगेटिव सब बदल जाएगा।

आचार्य: आप कोई वीडियो नहीं देखती हैं मेरा।

श्रोता: ऐसा नहीं है देखती हूँ लेकिन वो बातें दिमाग़ में नहीं रहती।

आचार्य: तो अपने दिमाग़ में जब आप इतना बैठी हुई हैं तो मैं कैसे आऊँ। "ता में दो न समाय।" दो न समाय! "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाय।"

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाय। प्रेम गली अति साकरी, ता में दो न समाय।।

~ कबीर साहब

अपने दिमाग में अगर आप ही बैठी रहेंगी तो कोई और कैसे आएगा!

प्र७: आचार्य जी, हमारी यह मान्यता है कि "जो होता है अच्छे के लिए ही होता है।" क्या यह मान्यता हमें वर्तमान में उचित कर्म करने से नहीं रोकती?

आचार्य अच्छे के लिए जो होगा अच्छा होगा। अच्छे के लिए बुरा भी होगा तो अच्छा होगा। बुरे के लिए जो होगा बुरा होगा। बुरे के लिए अच्छा भी होगा तो बुरा होगा।

इस पर कुछ निर्भर ही नहीं करता कि क्या हो रहा है; सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि आप कैसे हो। आप अच्छे हो तो आप के लिए सब अच्छा-ही-अच्छा है। और आप बुरे हो तो आपके लिए सब बुरा-ही-बुरा है।

तो ये मत कहिए कि जो हुआ वो अच्छा था कि बुरा था। आप अच्छे हो तो अच्छा है, आप बुरे हो तो बुरा है। आप कैसे हो? अच्छों के साथ बुरा होता देखा नहीं गया। और बुरों को कोशिश करके भी अच्छा दिया नहीं जा सकता।

अच्छा कौन? जहाँ समझ और समर्पण है। बस ये दो— समझ और समर्पण। समझ माने ज्ञान, समर्पण माने भक्ति। ज्ञान और भक्ति इन दो के अलावा कोई तीसरी चीज़ होती ही नहीं। जहाँ समझ और समर्पण हैं वहाँ अच्छाई है और जहाँ बेहोशी है और अकड़ हैं वहाँ बुराई है।

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