प्रश्नकर्ता आचार्य जी क्या लॉ ऑफ अट्रैक्शन (आकर्षण का सिद्धांत) होता है?
आचार्य प्रशांत: आकर्षण का सिद्धांत होता है पर बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात है अगर आप उसमें भरोसा करने लगें।
प्र: बुक (क़िताब) में तो लिखा है।
आचार्य: अरे बुक हटाइए बुक तो बहुत हैं। जितने आदमी नहीं हैं उससे ज़्यादा क़िताबें हैं। तो हर क़िताब पढ़ने लायक़ थोड़ी हो जाती है। बात इसकी नहीं है कि सच है कि नहीं, बात इसकी है उपयोगी है कि नहीं।
एक शराबी को आप बता दीजिए आकर्षण का सिद्धांत, कि जो तुम्हें चाहिए तुम दिन भर वही सोचो तो मिल जाएगा। तो दिन भर क्या सोचेगा? शराब। और सब शराबी ही हैं। तो आकर्षण का सिद्धांत हम सबको बता रहा है कि जितने तुम्हारे विकार हैं और जितनी तुम्हारी कामनाएँ हैं उन्हीं के बारे में सोचते रहो, वहीं मिल जाएँगी।
तो जिसको आप आकर्षण का सिद्धांत कहते हैं वो बड़ी ख़तरनाक मान्यता है, बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण सिद्धांत है। कामी आदमी दिन भर फिर किसका विचार करेगा? काम का, वासना का, देह का, स्त्री का, पुरुष का वो विचार कर रहा है और उसने लॉ औफ अट्रैक्शन क़िताब पढ़ ली है। वो कह रहा है जो ही चाहूँगा, वही मिलेगा। और उसको मिल भी जाएगा। अब दिन भर अगर तुम देह का ही विचार कर रहे हो तो अपनेआप तुम्हारे कर्म, तुम्हारी गति ऐसी हो जाएगी कि कहीं-न-कहीं देह में जाकर पड़ जाओगे।




