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क्या साक्षी होने का अर्थ है विचारों को देखना? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: मैं मेरे मन को स्पष्टता से देखने लगा हूँ कि जो पहले विचार मुझे चलाते थे अब मैं देख सकता हूँ साफ़ तौर पर कि कौन से विचार मुझे भटकाने वाले हैं, अब मैं उनके प्रभाव में नहीं जाता हूँ। और जब मैं उनको देखता हूँ तो एक फीलिंग अच्छी महसूस होती है आनन्द की फ़ीलिंग भी अन्दर महसूस होती है कि वो भाग रहा है विषयों की तरफ़, तो क्या यह स्थिति योग्य है? क्या मैं सही मार्ग पर हूँ?

आचार्य प्रशांत: आप जिसको देख रहे हैं आपका देखना उससे कुछ विशेष भिन्न नहीं है, कोई आयामगत परिवर्तन नहीं हुआ है। एक मानसिक गतिविधि है जो विचार के रूप में प्रकट हो रही है और मन की दूसरी गति है जो कह रही है मैं देख रही हूँ। ये सब मन के ही खेल हैं, इसमें कुछ विशेष रखा नहीं, कोई विशेष लाभ नहीं। और फिर आप तो कह रहे हैं कि विचारों को देखने से आनन्द वगैरह उठता है, यह आनन्द कौन भोग रहा है? वही न जो विचारक भी है।

यह सारा खेल भीतर-ही-भीतर चल रहा है, एक ही तल पर चल रहा है। खुद ही सोचा फिर खुद को ही बता दिया कि मैंने अपनी सोच को देखा और फिर इसी बात पर खुश भी हो लिए। और यह सब कुछ आप क्यों कर रहे हैं? क्योंकि कुछ लोगों ने कुछ किताबों में बता दिया है कि ऐसा करो तो ऐसा होता है। किसी ने कह दिया विचार के साक्षी बनो तो आपको लगा यह बढ़िया बात है। दो-दो धारणाएँ आ गई हैं आपके भीतर यह बात सुनकर, पहली कि विचार का साक्षी बना जा सकता है और दूसरी विचार का साक्षी बनने में लाभ है।

आत्मा मात्र साक्षी होती है। साक्षित्व का अर्थ विचार को देखना नहीं होता है, साक्षित्व का अर्थ होता है विचार से कोई मतलब न रखना। विचार अपना काम करे, आप अपना काम करें।

अगर आप विचार के दृष्टा बने बैठे हैं तब तो आपने विचार से सम्बन्ध बना लिया न। ज़रा मुझे बताइएगा ईमानदारी से, आपने ज़िंदगी में कोई चीज़ देखी है निरपेक्ष, निष्पक्ष रहकर? या जब भी कुछ देखा है तो उससे रिश्ता जोड़ा है? बोलो?

तो यह कौन सा साक्षी है जो विचार को देखता है और विचार से रिश्ता भी जोड़ लेता है? आप जब जो कुछ देखते हैं, जब कभी देखते हैं, तो उससे रिश्ता जोड़ लेते हैं कि नहीं? उससे कुछ-न-कुछ आपका नाता बन जाता है। दृष्टिगत वस्तु, दृष्टिगत विषय के प्रति आप पूर्णतया उदासीन, अनासक्त कब रह पाते हैं? कभी होता है ऐसा? जिस चीज़ से कोई लेना-देना न हो उसको भी देख लो तो वो मन का हिस्सा बन जाती है, हिस्सा बनी माने नाता जुड़ गया। ऐसा है या नहीं है?

आप ट्रेन में बैठे हुए हैं, सफ़र कर रहे हैं। खिड़की से बाहर देख रहे हैं, खेत दिखाई दे रहे हैं, बच्चे दिखाई दे रहे हैं, जानवर दिखाई दे रहे हैं, खम्भे दिखाई दे रहे हैं और जो कुछ दिखाई दे रहा है वो आपके मन का एक हिस्सा घेरता जा रहा है, है न। जो कुछ दिखाई दे रहा है उससे सम्बन्धित भी कुछ विचार आ रहा है, कोई याद आ रही है। आप विमान में बैठे हैं, बाहर देख रहे हैं बादलों की आकृतियाँ दिखाई दे रही हैं और अचानक आपको लगा कोई आकृति बिलकुल गोभी के फूल जैसी है तो सम्बन्ध आपने जोड़ लिया कि नहीं जोड़ लिया? हम जो कुछ भी देखते हैं उससे नाता जोड़ लेते हैं न।

अब आजकल बड़ा प्रचलन है, बड़ा फैशन है कहने का कि मैं तो विचार को देख रहा हूँ। जब जो कुछ देखा उससे नाता ही जोड़ लिया तो विचार को देखा तो उससे भी नाता ज़रूर जोड़ा होगा। यह कौन सा साक्षी है जो नाता जोड़ने में लगा रहता है भाई? देखना माने सम्बन्धित होना, यह बात अच्छे से समझ लीजिए। देखा नहीं कि सम्बन्धित हुए।

हम तो ऐसे लोग हैं कि जब तक कोई मतलब नहीं होता, देखते भी नहीं है।

अच्छा यहाँ इतने लोग आप बैठे हुए हैं इधर को ही क्यों देख रहे हैं? मेरी तरफ़ ही क्यों देख रहे हैं? आप तो कहीं भी देख सकते हैं। हम यूँ ही कुछ भी नहीं देखते, हम जब भी कुछ भी देखते हैं उससे कोई अर्थ होता है, कोई मतलब होता है, कोई नाता होता है तभी देखते है न। तो देखना माने सम्बन्धित होना, देखना माने सम्बन्धित होना। ये आँखें किसी भी दिशा में देख सकती हैं न, इधर को ही क्यों देख रही हैं? आप अपने घर में भी रहते हैं तो क्या हर तरफ़ देखते रहते हैं? क्या किसी भी दिशा में यूँ ही निष्प्रयोजन देखते रहते हैं? आप उधर को ही देखते हैं न जिधर देखने से आपका कुछ अर्थ होता हो, कोई लाभ होता हो, कोई प्रयोजन, कोई मकसद हो। तभी देखते हैं न। तो देखना माने? देखना माने? विचार को देखना माने? विचार से सम्बन्धित होना।

तो विचार को देखना कोई अवलोकन हुआ? कोई साक्षित्व हुआ? विचार को देखना -माने विचार के साथ जुड़ जाना। अपने मन से यह भूल बिलकुल निकाल दीजिए कि आप विचार को देख सकते हैं। जो विचार को देख रहा है वो विचार के साथ जुड़ गया है। फँसा, फँसा बुरी तरह फँसा। यह धारणा ही मन से निकाल दीजिए कि विचार को देख रहे हैं इत्यादि। कि विचारों के बादल आ रहे हैं, उमड़-घुमड़ रहे हैं, तुम उन्हें देखो। वो बादल आएँगे, चले जाएँगे, तुम देखते रहो, हो ही नहीं सकता। आप तो जब बादलों को भी देखते हैं, तो क्या उनके साथ रिश्ता नहीं बना लेते? बोलिए? आप शिविर स्थल की तरफ़ आ रहे हैं। आपको दिखाई दिया बादल गहरा रहे हैं और काले होते जा रहे हैं, घने होते जा रहे हैं, तुरन्त आप उससे एक रिश्ता जोड़ेंगे, ‘अगर बारिश ज़्यादा तेज़ हो गयी तो मैं आज रात घर कैसे लौटूँगा?’ रिश्ता जुड़ गया कि नहीं जुड़ गया?

और आपसे कहा जा रहा है कि विचार बादल की तरह आएँगे, बादल की तरह चले जाएँगे, आप देखते रहो। आपको पलट कर जवाब देना चाहिए कि महाराज हम तो कभी बादलों को भी अनासक्त होकर नहीं देख पाए। जब हम आसमान के बादलों को भी कभी अनासक्त होकर नहीं देख पाए, असम्बन्धित रहकर, असंपृक्त रहकर नहीं देख पाए तो विचार रूपी बादलों से बिना नाता जोड़े हम उन्हें कैसे देख लेंगे? हमारी तो फ़ितरत ही यही रही है कि जो देखा उसी से जुड़े। कुछ-न-कुछ लेना-देना निकाल ही लिया। जो देखा, उसी से जुड़े।

विचारों का साक्षी होना सम्भव नहीं। साक्षी का यह काम ही नहीं कि वो कुछ देखे-ताके, यह बड़ी भूल है।

आप साक्षित्व को समझे ही नहीं हैं अगर आप सोच रहे हैं साक्षी का काम है देखना। साक्षी का काम है न देखना, साक्षी का काम है जो चल रहा हो चले, न हमें देखना है, न सुनना है। क्योंकि हमने तो देखा नहीं कि हम कर्ता बन गए, हम भोक्ता बन गए। हमारी ऐसी ही हालत है न? और आत्मा क्या है? न कर्ता, न भोक्ता और आत्मा एकमात्र साक्षी है अर्थात साक्षी न कर्ता है न भोक्ता है। और जो देख रहा है वो कर भी रहा है, भोग भी रहा है। इसका मतलब साक्षी देखेगा भी नहीं, न देखेगा,न सुनेगा। साक्षी वो जिसे कुछ लेना-ही-देना नहीं, वो साक्षी मात्र है।

वो सहभागी नहीं है, वो प्रतिभागी नहीं है, वो किसी भी गतिविधि में सम्मिलित, शरीक नहीं है। उसे किसी भी गतिविधि का संज्ञान ही नहीं लेना, वो स्वयं में ही आनन्दित है, वो मात्र अपने में ही मस्त है सो साक्षी। क्या चल रहा है तुम्हारे इस भौतिक जगत में इससे जिसको कोई लेन-देन नहीं उसका नाम है साक्षी। साक्षी करेगा क्या देख-देख कर? उसका तो न लेना, न देना, मगन रहना। वो करेगा क्या देख कर? तुम देखते भी हो तो क्या देखते हो? तुम्हारे विचार सब संसार के ही तो प्रति होते हैं, तुम्हारे सब विचारों में संसार ही तो भरा होता है। साक्षी को संसार से क्या लेना-देना? तो फिर साक्षी विचारों को भी क्यों देखेगा जब विचारों में संसार ही भरा हुआ है?

यह ग़लतफ़हमी मन से बिलकुल निकाल दो कि साक्षित्व का अर्थ है विचारों को देखना, इसको देखना, उसको देखना। बेकार की बात बिलकुल। साक्षित्व का अर्थ है जो कुछ भी तुम्हारी आँखें देख रही हों तुम उससे अनछुए रह जाओ, आँखें देख रही हैं तुम नहीं देख रहे, यह साक्षित्व।

कान सुन रहे हैं तुम नहीं सुन रहे, यह साक्षित्व। मन सोच रहा है तुम नहीं सोच रहे, यह साक्षित्व। शरीर अपनी गतिविधियाँ कर रहा है प्राकृतिक तुम नहीं कर रहे, यह साक्षित्व। कुछ भी करने का नाम साक्षित्व नहीं है, यहाँ तक कि देखने का भी नाम साक्षित्व नहीं है क्योंकि हम तो जब देखते हैं तो देखना एक कृत्य बन जाता है, हम देखने के कृत्य के कर्ता बन जाते हैं, साक्षी कर्ता नहीं होता। बात समझ में आ रही है?

विटनेसिंग को, साक्षित्व को, दृष्टा को लेकर के बड़ी भ्रान्तियाँ व्याप्त हैं और बहुत लोग इसी भ्रम में घूम रहे हैं कि वो साक्षी हो गए। लोग साधना कर रहे हैं, कह रहें हैं, ‘मैं साक्षी भाव की साधना कर रहा हूँ।’ साक्षित्व कोई भाव होता है क्या? साक्षित्व का अर्थ होता है सब भावों के प्रति उदासीन निरपेक्षता। जब सब भावों के प्रति उदासीनता को साक्षित्व कहते हैं तो साक्षित्व स्वयं कोई भाव कैसे हो गया? समझ में आ रही है बात? बन्द करो यह सब विचारों को देखने वगैरह का खेल, विचार चलते रहेंगे, तुम अपना काम करो। और एक जादू होता है जब तुम अपना काम करने लगते हो तो विचार उधर बदल जाते हैं।

हमारे विचार विकृत ही इसीलिए हैं क्योंकि हम अपने विचारों के साथ बड़ा घपला करते हैं, लिप्त हो जाते हैं विचारों में। विचारों के साथ नाता जोड़ लेते हैं और विचारों के साथ नाता जोड़ने का एक तरीक़ा यह भी है कि हम विचारों को देखें। तुम देखो भी मत विचारों को, तुम अपना काम करो न। तुम पाओगे तुम अपना काम कर रहे हो, विचारों की दिशा-दशा सब बदल गयी। बहुत से विचार जो पहले आ रहे थे अब आएँगे ही नहीं। लेकिन वो आ रहे थे तुम्हें इसका भी पता नहीं चलना चाहिए, नहीं आ रहे तुम्हें इसका भी पता नहीं चलना चाहिए। दूसरों को पता लगे तो लगे, तुम्हे पता नहीं चलना चाहिए। तुम तो मस्त हो, मगन हो, बिलकुल ही व्यस्त हो, कहाँ? अपना काम करने में।

तुम अपना काम करो न, विचारों को अपना काम करने दो। फिर कोई और आकर के तुम से बताएगा कि देखो अब लगता है तुम पहले की तरह नहीं सोचते। तुम कहोगे, ‘सोच? हाँ वो उधर कोने में चल रही है, हमने बहुत दिनों से उसकी ओर देखा नहीं। क्या बदल गई है वो?’ वो दूसरा व्यक्ति कहेगा, ‘हाँ, तुम्हारी सोच बदल गयी है।’ तुम कहोगे, ‘अब मेरी नहीं है न इसलिए बदल गई होगी। जब तक मेरी थी, मेरे ही जैसी थी। अब मैं अपना काम करता हूँ, सोच अपना काम करती है। ध्यान कौन दे?’ फिज़ूल चीजों पर ध्यान कौन दे? चल रहा होगा कुछ कचरा दिमाग में, कौन जाए उसका दृष्टा बनने?

मैं तुमको कहूँ, सामने जो कचरे का डब्बा है जा कर उसके दृष्टा बनो और बिलकुल ग़ौर से उसको देखो उसमें क्या आ रहा है, क्या जा रहा है, उमड़ता-घुमड़ता उसमें से कौन सा रसायन उठ रहा है? उसमें से भी बादल उठते हैं, भभूके उठते हैं बिलकुल। मैं तुमसे कहूँ जाओ और उसके दृष्टा बनो। पागल हो जाओगे। विचार हमारे कचड़े के डब्बे जैसे ही तो हैं, क्या करोगे उनका दृष्टा बन कर? अपना काम करो।

जो विचारों के साथ लिप्त हुआ, झंझट में फँसा। और लिप्त होने की एक ख़ुफ़िया तकनीक होती है विचारों को देखना कि हम तो साहब कुर्सी पर बैठ जाते हैं और आते-जाते विचारों का अवलोकन करते हैं। झूठ, एक गंदा तरीक़ा है यह विचारों में लिप्तता का। तुम्हारे और कोई काम नहीं, यही कर रहे हो? आते-जाते को निहार रहे हो, बड़े मुक्त हो तुम! जीवन बन्धनों में है, पूरी हस्ती गुलामी में है और साहब काम क्या कर रहे हैं? आते-जाते को निहार रहे हैं। हम तो दृष्टा हैं। क्यों भाई, क्यों हो दृष्टा? काम करो। क्या काम है? कुल्हाडी उठाओ, अपनी जंजीरें काटो, यह काम है तुम्हारा, समय मत खराब करो।

आत्मा सर्वज्ञ होती है, क्यों? इसलिए नहीं कि उसे तुम्हारी सब छोटी-छोटी बातों का पता है, इसलिए क्योंकि उसे तुम्हारी छोटी-छोटी बातों में कोई रुचि ही नहीं, इसलिए सर्वज्ञ है वो।

यह न समझना कि आत्मा इसलिए सर्वज्ञ है कि तुम जहाँ चाबी रखकर भूल आए हो आत्मा को पता है, कि तुम्हारा ज्ञान छोटा है, आत्मा का ज्ञान बड़ा है। आत्मा की कितनी भी उपासना कर लो, आत्मा नहीं बता पाएगी कि तुम कार की चाभी कहाँ छोड़ आए हो। सर्वज्ञ होने का अर्थ है छोटे ज्ञान, क्षुद्र ज्ञान में कोई रुचि ही न रखना। विचारों में क्या बैठा होता है? छोटा ज्ञान, क्षुद्र ज्ञान। उसमें कोई रुचि न रखना ही आत्मा की सर्वज्ञता है।

जिसकी अब छोटे में रुचि नहीं रह गई वो महाज्ञानी हो गया। जिसने छोटे का ही बहुत सारा ज्ञान इकट्ठा कर लिया वह महा अज्ञानी हो गया, कि हर छोटी-छोटी बात पता है। लोग मिलेंगे ऐसे वो क्षुद्र कोटि के ज्ञान के पिटारे होते हैं बिलकुल, उन्हें बिलकुल पता होगा कि मौहल्ले में किसके घर में कौन सा अचार डला है। ऐसा-ऐसा ख़ुफ़िया ज्ञान होगा उनके पास जो और किसी के पास हो ही न। बत्तीस नम्बर वाले शर्मा जी की लड़की ने चौंतीस नम्बर वाले वर्मा जी के लड़के को आँख मारी, यह ज्ञान उनके पास भरपूर होगा। यह ज्ञान न रॉ के पास हो, न आईएसआई के पास हो, न सीआईए के पास हो, इनके पास होगा। जिसके पास इस शुद्र कोटे का ज्ञान भरपूर हो उसी को कहा गया है अज्ञानी और ज्ञानी कौन? जिसको क्षुद्र ज्ञान से कोई मतलब नहीं वो महाज्ञानी, वही सर्वज्ञ।

आत्मा वैसी ही है, वो किसी से कोई मतलब नहीं रखती। इसी मतलब न रखने को कहते हैं साक्षित्व। तुम्हारे मन में टुच्ची बातें जितनी ज़्यादा हैं उतने ज़्यादा तुम आत्मा से और साक्षी से दूर हो। तुम्हें छोटी-छोटी बातों का जितना ज्ञान है, जितनी ख़बर, जितना पता है, उतना ज़्यादा तुम्हारे मन में कचरा भरा हुआ है।

घटिया बात पता ही नहीं होनी चाहिए, घटिया बात से लड़ना नहीं है। अन्तर समझिएगा। घटिया बात से लड़ना नहीं है, घटिया बात आपको पता ही नहीं होना चाहिए। आपको उस तल पर रहना चाहिए जहाँ मक्खी, मच्छर पहुँचते ही न हों। अब आप गटर में निवास करें और कहें कि मैं अध्यात्म की विधि लेकर आया हूँ सफ़ाई की, ये ख़ास किस्म के स्प्रे हैं मक्खी स्प्रे, मच्छर स्प्रे और बिलकुल गहन आध्यात्मिक विधियाँ है, एक से ध्यान लगेगा, एक से योग लगेगा और सब मक्खी-मच्छर दूर रहेंगे तो यह मूर्खता है। अध्यात्म का मतलब यह नहीं है कि गटर में ही निवास करो और विधियाँ लगा-लगा कर के मन के मच्छरों को दूर रखो। अध्यात्म का मतलब है उस तल पर निवास करो जहाँ मक्खी-मच्छर पहुँच ही नहीं सकते, यही साक्षित्व है।

हम वहाँ हैं जहाँ छोटी चीजें आती ही नहीं, हमें उनका ज्ञान ही नहीं, हमें पता ही नहीं। बहुत सारे विचार जो तुम्हें सताते रहते हैं हमारे लिए वो विचार है ही नहीं। ऐसा नहीं कि हमने उनको जीत लिया है, ऐसा नहीं कि हमने उनको दबा लिया है, ऐसा नहीं कि हम उनके दृष्टा हो गए हैं, वो विचार हमारे लिए है ही नहीं। यह अध्यात्म का पुरस्कार है, यही फल है। बहुत सारी चिन्ताएँ जो दूसरो को आती हैं ऐसा नहीं कि तुम उन चिन्ताओं को जीत लोगे, वो चिन्ताएँ तुम्हे आएँगी ही नहीं। लोग परेशान हो रहे हैं बिलकुल, एकदम बावले हुए जा रहे हैं इसका क्या होगा, उसका क्या होगा? तुम बैठे हो। बोलेंगे, ‘क्या तूने हल कर ली है समस्या?’ और तुम कह रहे हैं, ‘यह समस्या हमें आयी ही नहीं। हल करने की ज़रूरत तो तब पड़ेगी न जब पहले यह समस्या प्रतीत होगी, हमें आयी ही नहीं’।

जिसको समस्याएँ आएँ ही न सो साक्षी हुआ। और समस्याएँ न आएँ इसका क्या अर्थ है? इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे जीवन में समस्याएँ नहीं हैं, इसका अर्थ है समस्याएँ जिसके लिए हैं उसके लिए हैं, तुम कहीं और हो। तुम अपने काम, तुम अपने मिशन में लगे हुए हो, तुम्हारे लिए नहीं है समस्या।

और जब तुम पाते हो कि समस्याओं से तुमने नाता तोड लिया तो साथ-ही-साथ तुम पाते हो कि विचारों का स्वरूप, आकार-प्रकार सब बदल गया है। लेकिन मैंने कहा इसकी भी ख़बर तुम्हें आसानी से लगती नहीं। इसकी भी ख़बर तुम्हें तब लगती है जब स्थितियाँ तुम्हें बताती हैं या दूसरे आकर बताते हैं। इसका पता भी तुम्हें अप्रत्यक्ष रूप से लगता है जैसे कोई अपने काम में इतना व्यस्त हो, इतना व्यस्त हो, सर झुकाये काम करे जा रहा है, करे जा रहा है कि उसको पता ही न लगे कि कब रात बीती और सूरज उग गया है। फिर थोड़ी देर में वो पाएगा कि अरे! गर्मी बढ़ गई है, कुछ और हो गया है, रौशनी बढ़ गई है, तो उसको ज़रा चौंक कर के पता लगेगा, अच्छा, अच्छा, अच्छा, कुछ बदलाव आ गए हैं बाहर। पर उसे उन बदलावों से कोई लेना देना नहीं था, वो अपने काम में लगा था, पीछे बदलाव चल रहे थे।

यही लाभ होता है साक्षी को, वो अपने काम में लगा होता है और उसकी पीठ पीछे बहुत सारे बदलाव आ जाते हैं, वो सुन्दर बदलाव होते हैं। याद रखो, साक्षी का मकसद नहीं है उन बदलावों को लाना। साक्षी का मकसद तो है अपने साक्षित्व में ही विराजे रहना। साक्षित्व का मकसद तो है अपने में ही रहना, सत्य के साथ ही जुड़े रहना, शान्ति में ही स्थापित रहना, वही उसका मिशन है, वही उसका काम है। वो अपने काम में लगा हुआ है। पर चूंकि वो अपने काम में लगा हुआ है इसीलिए वह पाता है कि उसकी शारीरिक हस्ती अब निर्मल और स्वच्छ होती जा रही है, मन शुद्धि होती जा रही है, चित्त शुद्धि होती जा रही है, भूत शुद्धि होती जा रही है। भई मन खराब ही कैसे हुआ था? अशुद्ध ही कैसे हुआ था? अहम् जा कर के मन से लिपट गया था इसलिए मन अशुद्ध हुआ था। अहम् दूर हो जाए, अहम् वहाँ चला जाए जहाँ उसे होना चाहिए, आत्मा के पास चला जाए, मन अपनेआप स्वच्छ हो जाता है।

तो मन की स्वच्छता कभी भी साधना का उद्देश्य नहीं हो सकती, वो एक सह उत्पाद होती है, बाय प्रोडक्ट। तुम सही ज़िंन्दगी जी रहे हो, मन पीछे-पीछे अपनेआप शुद्ध होता जाएगा। तुम अपना काम कर रहे हो मन की सफ़ाई अपनेआप हो जाएगी बाय प्रोडक्ट की तरह। हाँ, तुम लग गए मन को ही साफ़ करने में, शरीर को ही साफ़ करने में तो तुम दोनों ओर से मारे जाओगे। जहाँ तुम्हें होना चाहिए तुम वहाँ होगे नहीं, तुम लगे हुए हो मन को रगड़ने में और मन को इतना रगड़ा फिर भी मन पाओगे कि साफ़ हुआ नहीं, दोनों ओर से मारे गए।

कुछ ऐसा समझ लो कि तुम्हें एक पत्थर है जो बड़े पहाड़ पर ले जाना है, पहाड़ पर अपना मन्दिर खड़ा कर रहे हो तुम। तो तुम्हारी सारी चेतना, तुम्हारा सारा श्रम, सारा ध्यान किस चीज़ में केंद्रित हो जायेगा? पत्थर को पहाड़ के ऊपर ले जाने में, शरीर पर तो तुम ध्यान ही नहीं दे रहे हो न। शरीर पर तुम इतना ही ध्यान दे रहे हो कि उसे भोजन-पानी देते चलो ताकि वो पत्थर को उठाकर पहाड़ पर ले जा सके। पर एक दिन कोई दूसरा आएगा और तुमसे कहेगा, ‘कितने सुन्दर हो गए हैं तुम्हारे बाज़ू और क्या तुम्हारा सुडौल वज्र जैसा फौलाद का ज़िस्म निकल आया है।’ तुम कहोगे, ‘अच्छा ऐसा हो गया क्या? ऐसा मैंने चाहा तो नहीं था।’ चाहा नहीं था हो गया, जीवन में सुन्दरता ऐसे ही आती है। वास्तविक सुन्दरता तुम्हारे चाहने से नहीं आएगी वो एक सह उत्पाद की तरह आएगी, तुमने चाहा नहीं, वो आ गयी।

तुम तो जड़ों पर पानी दे रहे थे, फूल अपनेआप खिल गया। तुम्हें फूल नहीं चाहिए था, तुम्हें मूल से ही प्रेम था, फूल अपनेआप खिल गया। प्रयोजन तो तुम्हारा था कि तुम्हारा मन्दिर बने, तुम्हें यह ख़याल ही नहीं था कि तुम्हारा शरीर भी बने पर मन्दिर बनाने की प्रक्रिया में तुमने पाया कि शरीर भी बन गया। जीवन ऐसे ही जिया जा सकता है, यही जीवन जीने का तरीक़ा है। तुम मन्दिर बनाओ, शरीर अपनेआप बन जाएगा। बात समझ में आ रही है? और जो मन्दिर नहीं बना रहे, शरीर पर ध्यान दे रहे हैं, वो मन्दिर से भी जाएँगे और शरीर से भी चूकेंगे, यह उनकी सज़ा है।

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