प्रश्न: महर्षि रमण से किसी से प्रश्न किया कि क्या कर्म का फल मिलना आवश्यक है? तो उन्होंने जवाब दिया कि नहीं। फिर भक्त ने पूछा क्यों? तो उन्होंने कहा की एक स्थिति ऐसी आती है जब आदमी का अहंकार ही समर्पित हो जाता है और वो आत्म ही हो जाता है, और तब अच्छे या बुरे फल से मुक्ति मिल जाती है। इसका शंकर भी वर्णनं करते हैं कि ऐसी एक स्थिति आ जाती है, जब अच्छे या बुरे किसी भी कर्म का फल नहीं मिलता।
वक्ता: फल मिलने के लिए कोई होना चाहिए जिसे फल मिले। जब रमण कहते हैं कि बोध से तीनों प्रकार के कर्मों का विगलन हो जाता है, तो यही कहते हैं कि जिसको सजा मिल सकती थी, वही नहीं रहा। जिसको फल मिलता, वही नहीं रहा। आप ने पूछा था की लोग अपने कर्मफल भुगत रहे हैं। हमने क्या कहा था कि कौन भुगत रहा है कर्मफल? वो जो उन कर्मों को अपना समझता है, वही उन कर्मों का फिर फल भी भुगतेगा। जो उस कर्म के साथ बंधा हुआ है ही नहीं, वो उसके फल से साथ कैसे बंध जायेगा?
ठीक है कल कुछ हुआ था, जो कल समय में था, मुझे उससे कोई आसक्ति है नहीं, तो उसके किये हुए से मुझे कहाँ से आसक्ति हो जाएगी?
इस बात को समझो:- कर्मफल मिलता नहीं है, ग्रहण किया जाता है।
ग्राहता समाप्त हो गयी, कर्मफल समाप्त हो जाएगा। कर्मफल कभी मिलता नहीं है, वो माँगा जाता है। ‘मैं हूँ’, इस फल का वारिस, मुझे दो ये फल।
श्रोता: ग्रहण में ऐसा लगता है कि दूसरा कोई दे रहा है।




