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क्या ध्यान में रहकर समस्याओं का समाधान हो सकता है?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
22 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार ऐसा होता है कि उलझन आती है तो हम उसे ऑब्ज़र्व (ध्यान से देखना) करते हैं, उसपर सोचते हैं कि क्या उसका सल्यूशन (समाधान) हो सकता है। उस समय लगता है हाँ समझ गया मैं प्रॉब्लम क्या है। उस समय के लिए लगता है समझ गया हूँ, फिर कई बार वही प्रॉब्लम आता है और हम फिर फँस जाते हैं। या तो प्रॉब्लम को हमने समझा ही नहीं था। या तो समझने का तरीका ही गलत था। टेम्पररी सल्यूशन (अस्थाई समाधान) मिल जाता है पर फिर प्रॉब्लम आती है तो फिर फँस जाते हैं।

आचार्य प्रशांत: ये जो छत है आश्रम की, जब बारिश होती है तो इसपर कहीं-कहीं पर पानी जमता है। उस पानी के कारण सीलन आ जाती है। जब जम ही जाता है पानी तो एक तरीका तो ये होता है कि जहाँ-जहाँ जमा है वहाँ से पानी को निकाल दो। निकाल दिया जाता है, भली बात। दो दिन बाद फिर बारिश होती है और...

प्र: फिर पानी।

आचार्य: फिर निकाल दो। जितनी बार बारिश होगी उतनी बार जमेगा। समस्या ढाँचागत है, स्ट्रक्चरल है, और तुम उसका तात्कालिक इलाज करना चाहते हो। सस्ता इलाज, वो होगा नहीं।

तुम सोचते हो, "अभी किसी तरीके से, कुछ युक्ति करके, जुगाड़ करके, निपट लूँ।" तुम ये नहीं समझ पा रहे हो कि तुम्हारे साथ जो भी समस्या आ रही है, वो इसलिए आ रही है क्योंकि तुम, तुम हो। जब तक तुम वो रोटी खा रहे हो जो तुम खाते हो, जब तक तुम वो कपड़ा पहन रहे हो जो तुम पहनते हो, जब तक तुम वो संगीत सुन रहे हो जो तुम सुनते हो, जब तक तुम उस हवा में साँस ले रहे हो जिस हवा में तुम हो, जब तक तुम वही दीवारें और वही चेहरे देख रहे हो जो तुम दिन रात देखते हो, जब तक तुम वही दिनचर्या पकड़े हुए हो जो तुमने पकड़ी है। तब तक ज़ाहिर सी बात है कि तुम्हें समस्याएँ भी वही मिलेंगी जो रोज़ मिलती हैं।

लेकिन उम्मीद हमारी ये रहती है कि जीवन हमारा वैसा ही चले जैसा चल रहा है। लेकिन उस जीवन से संलग्न जो समस्याएँ हैं वो मिलनी बंद हो जाएँ। ऐसा कैसे होगा भाई ?

प्र: आचार्य जी, कई बार ऑब्ज़र्व करने की कोशिश करता हूँ, तो कई बार ऐसा होता है कि इस स्टेट (स्थिति) में बहुत कम समय के लिए होता हूँ। उस स्टेट में आ पाता हूँ जहाँ पर जितने भी मैंने अपने ऊपर लेबल्स लगा रखे हैं वो हटा के मैं जो हूँ वास्तविक, उस में मैं रह पाऊँ। वो बहुत कम समय के लिए होता है, पर वो परसिस्ट (कायम रहना) नहीं कर पाता, वो चीज़ कंटीन्यू (जारी) नहीं रह पाती।

आचार्य: ऐसा कुछ होता नहीं जो तुम कह रहे हो। कम समय, ज़्यादा समय वो होता ही नहीं।

प्र: जब फ़ोकस करने की कोशिश करता हूँ, सवाल करने की कोशिश करता हूँ...

आचार्य: वो तुमने पढ़ लिया है, किसी फ़ोकस , किसी सवाल से वो होता ही नहीं जो तुम कह रहे हो। वैसी कोई चीज़ होती ही नहीं है।

प्र: काफ़ी अच्छा फ़ील (महसूस) होता है, उस समय पर।

आचार्य: अच्छा फ़ील होता है पर ये वो नहीं है जो तुम सोच रहे हो कि है।

प्र१: ऐसा मेरे साथ है कि मैंने काफ़ी कुछ पढ़ लिया है, ओशो की भी किताबें पढ़ ली हैं, पर एक्सपीरिएंशियल बेसिस (अनुभवात्मक आधार) पर जान नहीं पाया हूँ।

आचार्य: वो होता है, आप परी कथा पढ़ कर सोओ तो रात में परियों के सपने आते हैं। पढ़ने से ये होता है कि जो आपने पढ़ा है आपको लगता है कि वही आपके साथ हो रहा है।

प्र१: ऐसा लगता है की समझ लिया है पर असल में समझा नहीं है ।

आचार्य: वो कुछ नहीं है, बेकार की बात है। कुछ नहीं होता है, सुदूर के, पार के, कोई अनुभव नहीं होते। कोई मुक्त स्थिति नहीं होती जिसमें आप आत्मा बन कर उड़ने लग जाएँ, दो क्षण, चार क्षण के लिए। ये सब मन की कलाबाज़ियाँ हैं।

प्र१: इन सब चीज़ों पर तो हँसी आती है।

आचार्य: हर चीज़ पर हँस लिया करो, हँसी जब आए तो उसे थमने मत दो, हर चीज़ पर हँस लो।

अभी हम यहाँ आ रहे थे, तो एक कहानी सुन रहे थे, ओशो सुना रहे थे। तो तीन संत हुए चीन में। उनका एक ही काम था कि उनसे जितनी गंभीरता से सवाल पूछा जाए, वो उतनी ही ज़ोर से हँसने लग जाते थे। जितना गंभीर आदमी देखते थे उनको उतनी ही ज़ोर से हँसी छूटती थी, वो और कुछ करते ही नहीं थे।

एक-आध दो चीज़ों पर मत हँसो, हर चीज़ पर हँसो, क्योंकि हर चीज़ कुछ और नहीं है मन की कलाबाज़ी है। मन कलाबाज़ियाँ खा रहा है और तुमको एहसास ये दिला रहा है कि ये मन के पार की कोई बात है, कि परमात्मा मिल गया, कि ध्यान मिल गया, कि समाधि लग गई, दो चार क्षण की सटोरी आ गई। कुछ नहीं है। रात में आम का पन्ना खा लिया था, सोने से पहले, और कुछ नहीं है। मीठा खा कर सोओ और मुँह न धोओ तो मुँह पर चींटी घूमती है, तुम्हें ऐसा लग सकता है कोई फ़रिश्ता उँगलियाँ फिरा रहा है। मुँह धो कर सोया करो, छोटी सी बात है।

क्या अटेंशन ? किसको अटेंशन कह रहे हो?

प्र२: जैसे मुझे ये बहुत मायने रखता है कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं।

आचार्य: ये तो टेंशन है, अटेंशन क्या है? (सभाजन हँसते हैं)

प्र२: ये टेंशन क्यों आता है उसके प्रति *अटेंशन*।

आचार्य: किसी चीज़ के प्रति अगर अटेंटिव हो तो फिर तो ये रोज़मर्रा का सब्जेक्ट-ऑब्जेक्ट इंटरएक्शन (विषय-वास्तु बातचीत) है न? उधर बैठा है विषय जिसके प्रति तुम लगे हुए हो विषयेता बन कर, इसमें अटेंशन कहाँ है?

अटेंशन का मतलब होता है कुछ नहीं करना और जो कुछ भी हो रहा है उसमें सच्चे बने रहना। अटेंशन का ये नहीं मतलब होता है कि, "ध्यान लगा रहा हूँ, कि ज़ोर लगा रहा हूँ।" वो तो दिन रात लगाते ही हो।

अटेंशन का मतलब है कि अगर बोल रहा हूँ तो इमानदारी से बोलूँ,यही है *अटेंशन*।

अटेंड शब्द समझते हो? अटेंड माने क्या होता है? अटेंड का मतलब होता है खिदमत करना। अटेंडेंट माने क्या होता है? खिदमतगार, सेवक, जो हर समय मौजूद रहे आपकी चाकरी के लिए। उसी से अटेंडेंस शब्द आया है, "जी मैं मौजूद (एक हाथ ऊपर उठाते हुए), *अटेंडेंस*।"

तो अटेंशन क्या हुआ? "मैं सदा सच का खिदमतगार हूँ। मैं सच्चाई का सेवक हूँ, मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ उसमें इमानदार बना रहूँगा झूठ नहीं बोलूँगा।" किसके प्रति इमानदार? जो हो रहा है उसके प्रति इमानदारी। और किसके प्रति इमानदार होगे? सुन रहा हूँ तो इमानदारी से सुनूँ, जो हो रहा है उसके प्रति झूठ न बोलूँ। ये न हो जाए कहीं कि किसी की बात सुन रहे हो, आ तो रहा है गुस्सा, लेकिन खूब पढ़े बैठे हो कि मुस्कान बड़ी बात है, तो मुस्का रहे हो। ये लैक ऑफ़ अटेंशन (अटेंशन की कमी) है, ये बताता है कि तुम सत्य के अनुचर नहीं हुए तुम समाज के अनुचर हो गए। समाज ने तुम्हें क्या सिखाया था कि कोई भी स्थिति हो तुम चेहरे पर चिपकाए रहना मुस्कान, तो तुम समाज की बात मान रहे हो, सच्चाई की बात नहीं मान रहे।

अटेंशन का मतलब ये थोड़े ही है कि किसी चीज़ पर जा कर आँखें गड़ा दीं, कि दिमाग गड़ा दिया।

प्र२: आचार्य जी मेरा माइंड (मन) लोगों की बात सुन कर...

आचार्य: तुम कह रहे हो 'मेरा' माइंड , तुम माइंड से हट कर कुछ और हो क्या? तुम कौन हो? 'मेरा' माइंड माने कौन?

प्र२: भाषा की बात है।

आचार्य: भाषा नहीं। "मैं माइंड ", मैं बोलूँगा, "मैं माइंड "।

प्र२: मतलब मैं ही कैसे रिएक्ट (प्रतिकार) करता हूँ, उसके प्रति, उसको ही देखना, उसको ही जाँचना।

आचार्य: वो तो हो गया, अब क्या करोगे? स्मृति को जाँचोगे? विडियो देखोगे अपना पुराना? पोस्टमॉर्टेम करोगे?

प्र२: आइडिया (विचार) तो यही था।

आचार्य: करते रहो, लाशों के साथ जियोगे। अटेंशन का मतलब ये नहीं है कि, बार-बार सोचूँ कि मैंने किसी स्थिति में क्या किया और मुझे क्या करना चाहिए था। अटेंशन का मतलब होता है आगे पीछे का ख़याल करने की ज़रुरत नहीं, अभी सुन रहा हूँ तो सुन रहा हूँ। ये नहीं करूँगा कि वक्ता की ओर तो मुँह करके बैठा हूँ और वास्तव में वक्ता की ओर पीठ है, ये अटेंशन है। खेल रहा हूँ तो खेल रहा हूँ, ये अटेंशन है। चोट लगी और दर्द हो रहा है तो कहूँगा कि दर्द हो रहा है, ये अटेंशन है। कहीं से डर उठ गया तो मानूँगा कि डर उठ रहा है, ये अटेंशन है।

तथ्य को बिना बाधा के स्वीकारना यही ध्यान है। ध्यान माने क्या? ध्यान माने कि कौन है जो तुम्हारे मन में सर्वोपरी है, किसका ध्यान रख रहे हो? किसका ख़याल प्रमुख है? तो उत्तर आता है; सच्चाई का, और किसी का नहीं। डरे हुए नहीं हैं किसी को बहुत तवज्जोह नहीं दे दी है। तो फिर जो है सामने सो है, घास को घास कहेंगे भूसा नहीं कहेंगे। यही ध्यान है।

अब ये जो बात है ध्यान की, ये बड़ी अनाकर्षक लगती है न। "अच्छा! ध्यान इतना ही है? तो फिर वो सब क्या होता है जिसमें यहाँ (सर से ऊपर की ओर हाथ ले जाते हुए ) से कोई धारा प्रवाहित होती है, और ब्रह्मरंध्र खुल जाता है, और इत्यादि इत्यादि।"

प्र२: नींद अच्छे से नहीं आती।

आचार्य: जागरण का बहुत शौक है न तभी तो नींद नहीं आती है।

प्र१: सर ऐसा लगता है कि वो बिगिनर्स (आरम्भकर्ता) को शायद अट्रैक्ट (खींचने) करने के लिए बोला जाता हो, ऐसा कुछ हो सकता है, आपके लाइफ (जीवन) में कुछ ट्रांसफॉर्म (बदलाव) हो सकता है।

आचर्य: देखो जगत बहुत बड़ा रहा है, हज़ार लोग रहे हैं जिन्होंने बोला है। और लाखों लोगों से बोला है और सुनने वालों की अलग-अलग स्थितियाँ रही हैं। तो किसी से कभी किसी भाषा में बोला गया, किसी को कभी कोई प्रतीक दिया गया, किसी को कभी कोई कहानी दी गई, किसी को कोई। सन्दर्भ की बात है, परिपेक्ष की बात है, जो सन्दर्भ तुम्हारे सन्दर्भों से मेल न खाए, उस सन्दर्भ की बात पर विशेष ध्यान मत देना। वो तुमपर लागू ही नहीं होती, एप्लीकेबल ही नहीं है, तुम क्यों सुन रहे हो? समझ रहे हो न?

रेगिस्तान के लोगों को समझाया जाएगा यदि कि परमात्मा क्या है, तो बार-बार पानी की उपमा दी जाएगी। तिब्बत के लोगों को समझाया जाएगा कि परमात्मा क्या है, तो कहा जाएगा जिसमे माँ के स्पर्श की ऊष्मा हो। गर्मी की उपमा दी जाएगी।

और उत्तर भारत जहाँ लू चलती है, वहाँ के लोगों को समझाया जाएगा परमात्मा क्या है, तो कहा जाएगा, 'जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाए तरुवर की छाया '। अब तुम कहो कि. "नहीं बताईए गरम है कि ठंडा है?" उधर बोले; ठंडा है, इधर बोले; गरम है। उधर बोले पानी है और इरान में बोले आग है, वो अग्नि के उपासक होते हैं। ये बात नहीं समझ में आती।

भाई सुनाने वाले अलग-अलग थे तो जो तरीका उनके लिए उचित था उस तरीके से उन्हें समझाया गया। तुम अपने तरीके की फ़िक्र करो। "मैं कौन हूँ? मेरा मन कैसा है? और इस मन को बात कैसे समझ में आएगी?"

प्र२: एक किताब है 'द ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ अ योगी'।

आचार्य: मैं जानता नहीं हूँ।

प्र२: उसमें परमहंस योगानंद ने बताया था उनके कॉस्मिक कॉन्शियसनेस (लौकिक चेतना) के जो अनुभव हुआ करते थे...

आचार्य: मैंने नहीं पढ़ी है, तुमने क्यों पढ़ी?

प्र२: एक दोस्त ने रेफ़र (सुझाई) करी थी।

आचार्य: ऐसा दोस्त क्यों रखा?

(सभाजन हँसते हैं)

प्र२: कॉलेज का दोस्त है।

आचार्य: ऐसे कॉलेज क्यों गए?

प्र२: कोहली रेफ़र करी है।

आचार्य: अब क्या क्या करते हैं?

प्र२: उसमें युक्तेश्वरगिरी उनके गुरु थे उन्होंने कुछ मतलब बहुत दिनों तक उन्होंने मेडिटेशन प्रैक्टिसेस (ध्यान की विधियाँ) किए तो उनको, क्रिया योग कहते हैं...

आचार्य: क्यों (तंग आवाज़ में बोलते हुए)?

प्र१: कहीं-न-कहीं क्यूरिऑसिटी (जिज्ञासा) थी कुछ जानने की, तभी तो आपके बुक्स भी इन्होंने पढ़े होंगे और आपके पास आए।

आचार्य: ज़िन्दगी काफ़ी नहीं है क्या? आँखें कुछ अपनी नहीं हैं क्या? इतने क्यों दबे सहमे बैठे हो कि घास को घास और पत्ते को पत्ता न कह सको। कोई तुम्हें बताता है कि, "मैं आज दिल्ली में था और अगले क्षण मैं अपनी योग माया से लंदन पहुँच गया", और तुम तब भी पढ़े ही जाते हो।

प्र२: मतलब मैं ये पॉसिबिलिटी (संभावना) रखता हूँ कि ये हो सकता, नकार नहीं रहा।

आचार्य: क्या है तुम्हारा एजुकेशनल बैकग्राउण्ड (शैक्षिक पृष्ठभूमि)?

प्र२: बी-टेक किया है।

आचर्य: बी-टेक किए हो, कैन मास ट्रैवल फ़ास्टर दैन द वेलॉसिटी ऑफ़ लाइट (क्या पदार्थ कभी प्रकाश की गति से तेज़ चल सकता है)?

प्र२: नहीं अभी तक तो जो थियोरेटिकल फ़िज़िक्स (सैद्धांतिक भौतिकी) है उसके हिसाब से नहीं है।

आचार्य: थियोरेटिकल फ़िज़िक्स के ही हिसाब से नहीं, इस पृथ्वी के हिसाब से भी नहीं। तुम्हारे शरीर के हिसाब से भी नहीं।

प्र२: मास (पदार्थ) एनर्जी (ऊर्जा) में कन्वर्ट (बदलाव होना) होता है वो भी तो नहीं पता था।

आचार्य: मास एनर्जी में कन्वर्ट होता है ये तो पता ही है न, और हिरोशिमा में क्या हुआ था?

प्र२: नहीं ये तो अभी पता है, एक टाइम (समय) पर तो नहीं पता था।

आचार्य: पता भले न हो पर ये तो पता है न...

प्र२: थियोरेटिकली तो स्पेस (अंतरिक्ष) भी बेंड (मुड़ना) हो सकता है न।

आचार्य: ये तो पता है न कि कुछ चीज़ें हैं जो नहीं बदल सकतीं? मास (पदार्थ) तो नहीं जाएगा, कुछ और जाता होगा तो जाएगा। और स्पेस बेंड होता होगा पर दिल्ली से लंदन तक का जो स्पेस है वो तो नहीं बेंड होने वाला। इसमें तो वो बात लागू नहीं होगी।

प्र२: नहीं वो तो मैं बोल भी नहीं रहा।

आचर्य: वो तुम बोल नहीं रहे पर जो किताब तुम पढ़ रहे हो, वो वैसे दृष्टांतों से भरी हुई है और तुम फिर भी पढ़ते जा रहे हो।

प्र२: फ़ैसिनेट (रिझाना) करता है।

आचार्य: फ़ैसिनेट इसलिए करता है क्योंकि बच्चे हो, उसे परीकथा में आनंद आ रहा है।

प्र२: वो ऑटोबिओग्राफ़ी बोला है न कि...

आचार्य: तुम भी कुछ लिख दो उससे भी ज़्यादा...

प्र२: और ऐसे भी लोग हैं जिनको हम लुकउपटू (आदर्श मानना) करते हैं जो लोग इस बुक को पढ़ते हैं।

आचार्य: क्यों लुकउपटू करते हो?

प्र२: क्यों लुकउपटू करते हैं, जैसे कि स्टीव जॉब्स हों...

आचार्य: कोई तीर तुक्का है? देख रहे हो कि मन कितना विभाजित है? एक तरफ़ किसी योगी को आदर्श बना रहा है एक तरफ़ स्टीव जॉब्स को बना रहा है। कहीं कोई लय है? कहीं कोई समरसता, एकरूपता है? कुछ जान भी रहे हो कि किसकी तरफ़ जाना है? जिसने भी अपना बिगुल बजा दिया उसी के पीछे चल दिए। अपना कुछ है? आत्मा कुछ है?

स्टीव जॉब्स ने ' ऑटोबिओग्राफ़ी ऑफ़ अ योगी ' पढ़ी तो तुम पढ़ रहे हो।

प्र२: पढ़ने में क्या है?

आचार्य: पढ़ने में ये है कि एक ही जन्म है जिसमें सीमित समय है, और अगर ये पढ़ रहे हो तो बहुत कुछ जो पढ़ने लायक है वो नहीं पढ़ोगे। बहुत कुछ जो जीने लायक है उसे नहीं जियोगे। और ये पढ़ने के बाद तो एकदम इस हालत में नहीं रह जाओगे कि इस सीमित जीवन को जी पाओ। ये है पढ़ने में बुराई।

तुम अमर तो नहीं हो न, आत्मा अमर होगी तुम अमर नहीं हो।

प्र२: ये भी तो नहीं पता है कि आत्मा है या नहीं।

आचार्य: तुम मरोगे ये तो पता है? तो मरने से पहले जो जीवन है वो बर्बाद क्यों करना है? हटाओ क्या नहीं पता है, जो पता है उसकी बात करो। एक ज़िन्दगी है, वृथा गँवानी है? और जीवन व्यर्थ जा रहा है या नहीं, उसका तो एक ही प्रमाण होता है, मौज में हो या नहीं। जो कुछ भी कर रहे हो उसके बाद, मन साफ़ हुआ है, हल्का हुआ है, दुनिया बिलकुल साफ़ समझ आती है। या मन और उलझ गया है।

प्र२: मन तो उलझा हुआ है।

आचार्य: मन यदि उलझा हुआ है तो ज़ाहिर सी बात है कि जो कुछ करते आए हो वो स्वभाव विरुद्ध है, नहीं करना था। क्योंकि मन भी कोई आनंद थोड़े ही पाता है उलझने में। मन ने कब चाहा उलझना, मन को अच्छा लगता होता उलझना तो उलझने में आनंदित रहता। उलझा मन तो दुखी रहता है।

हम सब ऐसे हैं कि जैसे, अभी कह रहा था कि हाथी की पूँछ को रस्सी से बाँध दिया गया हो, किसी खूँटे से। अब इतना बड़ा हाथी है कि बंध नहीं सकता तो उसकी पूँछ बाँध दी गई है।

वो हो रहा है हमारे साथ जो होना ही नहीं चाहिए। हम बड़े दमित, दलित लोग हैं। सब-के-सब, ये पूरी मानवता का दुर्भाग्य है। हम वैसा जी रहे हैं जैसे जीने का कोई अर्थ नहीं। लाख हमारे मालिक हैं, कोई भी आकर के कुछ भी बता जाता है, हम उसका परीक्षण भी नहीं करते, हम उसे जीवन की कसौटी पर भी नहीं कसते। कोई भी आका बन जाता है। मीडिया उसका नाम ले ले, घर, परिवार, समाज, कॉलेज में उसके चर्चे होते हों, तो हो गया बड़ा आदमी। अब बताईए क्या करना है?

विराट कोहली आपको आध्यात्म सिखा रहे हैं। तत्क्षण बोले, नहीं स्टीव जॉब्स ने ही नहीं विराट कोहली ने भी पढ़ी है *ऑटोबिओग्राफ़ी ऑफ़ अ योगी*। विराट कोहली से फिर ये भी पूछ आइए कि जो शारीरिक बीमारियाँ हैं उनका क्या इलाज होगा। घोड़े से उड़ना सीख लीजिए, मछली से रसायन शास्त्र सीख लीजिए।

प्र२: संत जो होते हैं, जो सच को इतना बड़ा एक वर्च्यू (गुण) मानते हैं अपने जीवन का, अपने लाइफ का इतना बड़ा झूठ कैसे बोल सकते हैं?

आचार्य: तुम्हें कैसे पता वो संत हैं ही? संत कहने से संत हो गए या संत का जीवन प्रमाण है संतत्व का? एक ही प्रमाण होता है गुरुता का, संतत्व का, कि उसके होने से आनंद, और शांति, और सरलता, और मुक्ति फैली कि नहीं फैली। जिसके होने भर से शान्ति छा जाए और बंधन में पड़ा मन मुक्ति अनुभव करने लगे, वो संत है। और जिसके होने से मन में और गाँठे पड़ जाएँ, वो कहाँ का संत है?

आप कबीर के सामने बैठते हो आपका बोझ हट जाता है, वो संत हैं, आप अष्टावक्र के सामने बैठते हो आपकी उलझनें मिट जाती हैं, वो संत हैं। जो गाँठों पर और गाँठ लगा दे वो कहाँ का संत है भाई?

प्र: सर ये भी हो सकता है हम उस लेवल (स्तर) के न हों।

आचार्य: तुम जिस भी लेवल के हो संत का काम है तुम्हारी गाँठें सुलझाना। जो सब कबीर को सुनते हैं वो कबीर के स्तर के होते हैं क्या? आप सब यहाँ बैठे हैं आप सब एक ही स्तर के हैं क्या? जिस भी स्तर की आप बात कर रहे हैं, क्या सब एक ही स्तर के हैं?

प्र: सर एक बार सुना था कि कबीर को अगर सुनना है तो उनके तल पर आना पड़ेगा।

आचार्य: तो फिर तो कोई न सुन पाएगा।

प्रश्नकर्ता: यहीं कन्फ्यूशन (उलझन) है सर।

आचार्य: कबीर के तल का अर्थ होता है तुम पूरी इमानदारी से सुन लो, तुम्हारी इमानदारी ही तुम्हारा केंद्रीय तल है। और किस तल की बात कर रहे हो? ज्ञान , बौद्धिकता, इन तलों का कोई महत्व नहीं है जब तुम संत के सामने बैठे हो।

वो आत्मा से बोलता है तुम आत्मा से सुन लो, इतना ही काफ़ी है इसी को इमानदारी कहते हैं। तो ये तल इत्यादि की बात नहीं है।

प्र२: लेकिन अगर कोई बोलता है कि वहाँ पर कुछ है, तो मैं वहाँ पर जाऊँ नहीं तो पता कैसे चलेगा कि कुछ है या नहीं?

आचार्य: चले जाओ देख लो किसने रोका है, चले जाओ देख लो। करा है ऐसा?

प्र: हाँ।

आचार्य: अब मैं पूछता हूँ। कोई बोलता है वहाँ कुछ है और तुम यहाँ बैठे-बैठे ही कह रहे हो वहाँ कुछ है...

प्र२: मैंने नहीं बोला, मैंने बोला मैंने नकारा नहीं है, इट इस स्टिल अ पॉसिबिलिटी (ये अभी भी एक संभावना है)।

आचार्य: तुम्हारे दिमाग में उसने क्या डाल दिया?

प्र: फ़ॉल्स होप (झूठी आशा) भी हो सकता है।

आचर्य: कुछ तो डाल दिया, पहले कैसे थे?

प्र२: लेकिन वो सच भी तो हो सकता है न सर।

आचर्य: अभी कुछ नहीं पता तुम्हें कि क्या है क्या नहीं है। संत तुम्हें तुक्का मारने के लिए खाली नहीं छोड़ता है। कि है कि नहीं है और ये सब। मैं जो पूँछ रहा हूँ वो बताना। ये बात पढ़ने से पहले कैसे थे? कि वहाँ कुछ है।

प्र२: पता नहीं था।

आचर्य: खाली थे ज़रा। और ये बात सुनने के बाद क्या होने लग गया?

प्र: कलाबाज़ियाँ बढ़ गईं।

आचर्य: कलाबाज़ियाँ बढ़ गईं (सर की ओर उंगली घूमते हुए), संत का ये नहीं काम होता कि दिमाग में और उपद्रव चालू कर दे। जो बिंदु दिखाया जाता है न कि वहाँ कुछ है, वो बिंदु होता है विचारों के विग्लन का। वो बिंदु वो नहीं होता कि जहाँ पर विचार और उपद्रव शुरू कर दे।

जो तुम्हारे मन में और उपद्रव शुरू करा दे, हर उस चीज़ से बचना। परमात्मा कोई चीज़ थोड़े ही है, जिसके बारे में तुम सोच लोगे, कि पहुँच जाओगे, कि पकड़ लोगे।

बेचैनी का, उलझन का, अस्पष्टता का, अपना एक स्वाद होता है, उसमें बड़ी सुविधा होती है। जानते हैं क्या सुविधा होती है? आप हाथ खड़े करके कह सकते हैं, "अभी तो मैं उलझा हुआ हूँ, अभी मैं कुछ कर नहीं पाऊँगा। द मैटर इस स्टिल बीइंग प्रोसेस्ड (मामला अभी भी प्रक्रिया में है), तो मुझे अभी कुछ करने की ज़रुरत नहीं है।"

मेरा काम है अगले दो दिनों में उन सारे बहानों को हटा देना, जो आपको कर्म में उतरने से रोकते हैं, जीवन में उतरने से रोकते हैं। आपको बड़ा आनंद आता है इसमें, कि अभी तो स्टेलमेट चल रहा है, "देखिए साहब अभी मुकदमा गरम है, हम नहीं जानते बाजी किधर को पलटेगी।" ये हटाओ तुम, सच्चाई कोई मुकदमे बाज़ी का नाम है? वो तो साफ़ होती है, ये रही। उसमें ये थोड़े ही न होता है वहाँ कुछ हो भी सकता है, या नहीं भी हो सकता है। "अभी तो हम विचार कर रहे हैं!"

ये सब तीर तुक्केबाजी हटानी होगी। यही है जिसके कारण जीवन अधूरा, फीका, चेहरा निस्तेज रहता है। जब तक ज़िन्दगी में कुछ ऐसा नहीं है जिसको ले करके शत-प्रतिशत से भी ज़्यादा पक्के हो, तब तक ज़िन्दगी जीने लायक नहीं है। अगर हर चीज़ को ले करके तुम्हारे पास सिर्फ़ विरक्तियाँ और शंकाएँ हैं, तो तुम बड़े आधे-अधूरे रहोगे, न इधर के रहोगे, न उधर के रहोगे, न किधर के रहोगे। और जो किधर का भी नहीं होता वो सबका होता है, क्या? ग़ुलाम।

जिसका अपना कोई मालिक नहीं होता (ह्रदय की ओर इशारा करते हुए ) यहाँ पर, वो पूरे ज़माने का ग़ुलाम होता है। उसे कोई कुछ भी पढ़ा सकता है। हम वो सब हटाते चलेंगे धीरे-धीरे, जो हमें उलझनों का बहाना देता है। वो सब कुछ जो हमें सक्रिय, गहरे, ऊर्जात्मक कर्म से बचाता है हमें उसको हटाना है। उसको हटाने में हम खुद ही बाधा बनेंगे। बड़ा डर लगेगा क्योंकि सुविधाएँ जाएँगी।

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