सामने मंदिर हो, बगल में गंगा बह रही हो, लेकिन कुत्ता तो हड्डी ही चबाएगा, और वह भी सूखी।
अगर सुधरने की, बदलने की नियत ही ना हो तो कोई भी आपकी क्या मदद कर लेगा! गंगा के बगल में और मंदिर के सामने, आप हड्डी चबाते ही नज़र आओगे।
सामने मंदिर हो, बगल में गंगा बह रही हो, लेकिन कुत्ता तो हड्डी ही चबाएगा, और वह भी सूखी।
अगर सुधरने की, बदलने की नियत ही ना हो तो कोई भी आपकी क्या मदद कर लेगा! गंगा के बगल में और मंदिर के सामने, आप हड्डी चबाते ही नज़र आओगे।
कोई रिश्ता गड़बड़ है, यह जानने के लिए बस यह देख लो कि क्या उसमें मुखौटे पहनने पड़ते हैं। और यदि मुखौटे उतारने पर रिश्ता टूटने लगे, तो समझ लीजिए वह रिश्ता वास्तविक नहीं था। उसने आपसे रिश्ता बनाया, उसने आपकी छवि से रिश्ता बनाया है। और आपकी छवि आप हैं नहीं, तो माने, उसका आपसे कोई रिश्ता है नहीं। फिर तो डर में ही जीना पड़ेगा, क्योंकि छवियाँ काल्पनिक होती हैं। जैसे ही यथार्थ आकर एक धक्का मारेगा, सारी छवियाँ टूट जाएँगी। इससे बेहतर यही है कि बेबाकी से सच में जिएं ।

आदमी कहता है, “मैं ठीक हूँ। बस हालात कुछ ऐसे बने कि मैं फिसल गया।” ग्लानि सिद्ध करती है कि तुम आदमी बढ़िया हो; बस संयोग से असफल रह गए। तुम्हारी ग्लानि ये थोड़ी है कि तुम आदमी ही गड़बड़ हो। तुम्हारा केंद्र ही गड़बड़ है। तुम्हारी ग्लानि तो धोखे से मिस्टेक वाली होती है। वास्तविक ग्लानि तो अग्नि होती है। तुम बचोगे ही नहीं जैसे हो, अगर ग्लानि हो जाए तो।

प्रश्नकर्ता: मेरे अतीत में मुझ पर हुए दुष्कर्म मुझे चैन से जीने नहीं दे रहे हैं। मानो मैं अपने बचपन में ही जिए जा रही हूँ। वही खयाल, वही सपने। मुझे उस भयानक अतीत से पूरी तरह बाहर आना है। कैसे होगा?
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो समझना होगा कि…