कुछ नाम: जिन्होंने प्रेम का आखिरी मूल्य चुकाया (आप नहीं जानते इन्हें?) || आचार्य प्रशांत (2023)

आचार्य प्रशांत: अधार्मिक चित्त दुनिया की ओर देखता है मुँह खोलकर और धार्मिक चित्त दुनिया की ओर देखता है आँखें खोलकर। बहुत बड़ा अन्तर है। अधार्मिक चित्त दुनिया की ओर हाथ बढ़ाता है लपक लेने को और धार्मिक चित्त अगर हाथ बढ़ाता है तो उठ जाने को, 'मेरा हाथ थाम लो मुझे ऊपर उठा दो।’
जीना तो इसी दुनिया में है और ये कोई मज़बूरी की बात नहीं है, ये अवसर और उत्सव की बात है। जीवन उत्सव है, बिलकुल है, पर सिर्फ़ धार्मिक मन के लिए। जीवन धार्मिक है तो प्रतिदिन उत्सव है, सतत् उत्सव है।
जीवन धार्मिक नहीं है तो कुछ नहीं है, मारपीट, लूट-खसोट, इसको नोच लिया, इससे ये किया। और तुम उसको नोच रहे हो, तुम्हें छोड़ देगा वो? तुम एक को नोच रहे हो, दूसरा तुम्हें नोच रहा है, यही करवाओ। यही भोगने को पैदा हुए हो।
और जैसे-जैसे ऊपर उठते जाते हो, पाते हो कि और न जाने कितने हैं जो तुम्हारे इन्तज़ार में हैं। फिर भीतर अनुग्रह आता है, मेरा हाथ उसने न थामा होता तो मैं और नहीं उठ पाता। अब मैं कैसे कुछ चुकाऊँ क्योंकि उसको तो मुझसे कुछ चाहिए नहीं। उसको मैं क्या दूँगा (ऊपर की तरफ़ इशारा करके), वो तो वहाँ बैठा है, उसको मैं क्या दूँगा। और मैं देना भी चाहूँ तो मुस्कुराकर बोलेगा, ‘तुम ऊपर उठ गये, मेरे लिए इतना काफ़ी है।‘ मैं कैसे चुकाऊँ। तो भीतर अनुग्रह उठता है और वो अनुग्रह अभिव्यक्त कैसे होता है फिर? कि ये जितने नीचे हैं, इनको ऊपर उठाऊँगा।
समझ में आ रही है बात?
जो ऊपर है उसके प्रति प्रेम, जो नीचे है उसके लिए करुणा। और कोई ऐसा मिल गया जिसके आगे अपनी सब शक्तियाँ विफल हैं, उसका कुछ कर ही नहीं पा रहे, तो हाथ जोड़कर बस उपेक्षा। वहाँ भी पहले कोशिश पूरी कर लेनी है, पूरी कोशिश, कि जितना हममें दम था, हमने पूरा लगा लिया। अभी भी यही चाहते हैं और आगे भी यही चाहते रहेंगे कि तुम उठो। लेकिन अभी हमारी विवशता है, हम सफल नहीं हो पा रहे तुम्हारे साथ। तो अभी तो जो हमारा सीमित बल है, उसे हमें कहीं और ही लगा लेने दो। हम किसी और की सहायता कर लें, वो बेहतर है।









