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कुछ बातें मज़ाक की नहीं होतीं || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: जब तुम कह रहे थे 'जय गंगा मैया की', कितने लोग वास्तव में गंगा मैया के प्रति नतमस्तक थे? कितने लोग वास्तव में भक्तिभाव से बोल रहे थे ये? भक्ति का मतलब समझते हो? ‘भगवान में ही मिल जाऍं।‘ 'जय गंगा मैया की' बोलने का अर्थ हुआ कि गंगा मैया में ही मिल जाऍं।

नारे लगाने में मज़ा आ रहा था न? नारेबाज़ी अच्छी लगती है, है न? उसमें हृदय था? भक्ति में तो भक्त पूर्णतया नमित हो जाता है। भक्त और भगवान का रिश्ता समझते हो क्या होता है?

बहुत सम्भावना नहीं है‌, लेकिन हो सकता है तुम्हें उदाहरण देखने को मिल जाऍं। बनारस चले जाना और वहाँ भोर में घाट पर लोगों को आते हुए देखना, और गंगा के प्रति उनका रुख देखना, गंगा से उनका रिश्ता देखना, गंगा के प्रति उनकी भावना देखना। वहाँ भी अब ज़्यादातर नकली ही लोग आते हैं पर हो सकता है कि तुमको, अगर तुम सौभाग्यशाली हो, तो पता चल जाए कि 'जय गंगा मैया की' बोलने का वास्तविक अर्थ क्या होता है। किसी को माँ बोलने का वास्तविक अर्थ क्या होता है। ये नारेबाज़ी और हुल्लड़बाज़ी का रिश्ता थोड़े ही होता है।

यही सब चीज़ें होती हैं अपने बारे में जानने की। और अहंकार चूँकि डरा हुआ होता है इसीलिए भीड़ में वो ज़्यादा बौराता है, क्योंकि भीड़ में उसे दूसरों का समर्थन मिल जाता है। ये सारे काम तुम अकेले में नहीं करोगे। यहाँ से मुश्किल से आठ-सौ मीटर, यहीं धार‌ किनारे चले जाओ तो आगे गंगा जी — कल हम गये थे — और अगर तुम वहाँ पर अकेले पहुँचे हो तो नहीं नारा लगाओगे 'जय गंगा मैया की', क्योंकि ये सारे काम सिर्फ़ कब होते हैं? भीड़ में।

कल से तुम पुनः भीड़ में वापस जा रहे हो, सतर्क रहना। तुम फिर वो सबकुछ करोगे जो परमतत्व की गरिमा और मर्यादा के प्रतिकूल है। तुमने यहाँ पर किसी को आदर देना सीखा है, तुम कल फिर से उसका अनादर और उपहास शुरू कर दोगे। ये राफ्टिंग वाले सब जो गंगा-गंगा बोल के नारे लगाते हैं, ये वास्तव में खिल्ली उड़ा रहे हैं, ये मखौल है। तुम्हें क्या लगता है, वो भक्तिरस से भरे हुए हैं? बचना!

यहाँ तो फिर भी उनकी भीड़ थी जो एक सुलझे हुए वातावरण से निकलकर तुम्हारे पास आये। यहाँ तो उन्हीं की भीड़ थी जो इसी शिविर में रह रहे थे और फिर तुम्हारे साथ थे। कल से तुम ऐसों की भीड़ में वापस जा रहे हो जिन्हें न उन ग्रन्थों का कुछ पता है जिनसे तुम पिछले चार दिन में मिले, न उस मौन का कुछ पता है जिसका तुमने अनुभव किया है, न उस सत्य का कुछ पता है, न उस एकान्त का कुछ पता है जिससे तुम उठकर आ रहे हो; वो तुम पर टूट पड़ेंगे।

वो कीचड़ में लथपथ हैं और वो तुमसे गले मिलेंगे। तुम जा रहे हो भले ही गंगा में नहाकर के पर कीचड़ में लथपथ जब कोई तुमसे गले मिलता है तो तुम्हारा क्या होगा? बोलो क्या होगा? तुम उतने ही गन्दे हो जाने वाले हो। बहुत सावधान रहना, तुम्हारी परीक्षा कल सुबह से शुरू होगी। कल सुबह से भी नहीं, अभी तीन घंटे बाद से जब बस में बैठोगे।

बहुत आसान है बह जाना, बहक जाना। मन, जिसको परमात्मा में आधार नहीं मिला है, वो हवा में बहते टूटे हुए पत्ते की तरह है। कोई भी झोंका उसे किधर भी ले जा सकता है। हममें से ज़्यादातर लोग ऐसे ही हैं जैसे पात शाख से टूटा हुआ। हम जड़ से जमे हुए वृक्ष थोड़े ही हैं, हम डाल से टूटे हुए पत्ते हैं। इधर को हवा चली इधर को चल दिये, उधर को हवा चली उधर को चल दिये।

मैंने कोशिश की है तुम्हें जड़ें देने की पर तुम नन्हें पौधे हो, तुम्हारी जड़ें अभी गहरी नहीं और मज़बूत नहीं। हवा ज़ोर की चलेगी, तुम्हें उड़ा ले जाएगी। बहुत सावधान रहना! तुम अभी बहुत नाज़ुक और नन्हे हो, अपना ख़याल रखो।

मैं हर महीने दो बार शिविरों में आता हूँ, कभी पन्द्रह कभी पच्चीस लोग होते हैं, लेकिन वास्तव में लाभ चन्द लोगों को ही हो पाता है। जैसे कोई माली बहुत सारे पौधे रोपे लेकिन उनमें से बचें बस मुट्ठीभर। मैं तो पौधे रोपता ही जाता हूँ, कुछ ही बचते हैं। तुम बचोगे या नहीं, ये तुम पर निर्भर करता है।

एक बात साफ़-साफ़ समझ लो — परम तत्व के साथ, परम तत्व को दर्शाने वाले शब्दों के साथ, सन्तों के नामों के साथ, सन्तों की जीवनी के साथ, गुरुओं की वाणी के साथ, ग्रन्थों के साथ, कभी मज़ाक मत करना। भूले से भी उनकी मर्यादा का खंडन मत करना, उन पर लांछन मत लगाना। और जिस माहौल में जिस बैठक में साधु की निन्दा हो रही हो, गुरु की निन्दा हो रही हो, ग्रन्थ की निन्दा हो रही हो, वहाँ से तुरन्त उठकर चल देना, भले ही कितना नुक़सान होता हो।

बात समझ में आ रही है?

कुछ बातें हल्के में नहीं ली जातीं। हर बात मज़ाक की नहीं होती। कुछ बातों को बहुत गम्भीरता से लेना, बिलकुल बर्दाश्त मत करना। कूल होने की कोई ज़रूरत नहीं है कि रामायण की चौपाई का कोई उपहास कर रहा है और तुम कह रहे हो 'चलो, बस मस्त रहो।‘ ‘क्या फ़र्क पड़ता है यार! सुन लो।‌‘ ‘चलो, लिबरल और टॉलरेंट बनो।'

कि कबीर के भजन की कोई पैरोडी बना रहा है और तुमने उसका साथ दे दिया, बिलकुल भी नहीं। ईश्वर की आरती हो, चाहे क़ुरान की आयतें हों, वो हँसी उड़ाने के लिए नहीं हैं।

देश का भी राष्ट्रगान होता है, जन-गण-मन होता है, तो इतनी तमीज़ तो जानते हो न कि जब बजता है तो खड़े हो जाते हो, मिनटभर को स्थिर हो जाते हो। तो कबीर की वाणी, उपनिषदों के श्लोक, गुरुओं की सीख, राष्ट्रगान से भी बहुत ऊपर की चीज़ हैं। वो जब कानों में पड़ें तो वहीं ठिठक जाना और पूरी तरह नतमस्तक हो जाना। राष्ट्रगान यदि आसमान है तो उपनिषद् सातवाँ आसमान है।

आधुनिकता के नाम पर बेवकूफ़ी की हरकतें मत करने लग जाना कि आदिग्रन्थ रखा है, कि गीता रखी है और तुम उसके ऊपर रख के चाय पी रहे हो। और उसके बाद तर्क लगा रहे हो कि देखिए साहब हमें तो पढ़ने से मतलब है। पढ़ लिया है, अब हम उसके ऊपर अगर चाय का कप रख रहे हैं तो क्या बिगड़ गया? बहुत कुछ बिगड़ गया। तुम्हारी भावना बदल गयी है। अब तुम्हें कुछ लाभ नहीं होगा ग्रन्थ से। गुरुद्वारों में देखा है ग्रन्थ के साथ क्या व्यवहार करते हैं? उतना आदर देना चाहिए। उससे ज़रा भी तुमने कम आदर दिया तो तुम्हें लाभ नहीं होगा, यही तुम्हारी सज़ा है।

समझ में आ रही है बात?

ये चीज़ ऐसी है कि सिर्फ़ तब मिलती है जब जी-जान से चाहो। जो जी-जान से नहीं चाहता, उसे नहीं मिलेगी। अधमने को नहीं मिलती, गुनगुने को नहीं मिलती। तपते हुए, भभकते हुए, खौलते हुए को मिलती है।

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