बहुत सारा उपभोग (consumption) इसलिए हो रहा है, क्योंकि हमें यह नहीं पता कि हमें ज़िंदगी में करना क्या है, हम कौन हैं और ज़िंदगी का उद्देश्य क्या है। भीतर लगातार एक बेचैनी बनी रहती है। हम उपभोग के द्वारा उस बेचैनी को मिटाने की कोशिश करते हैं। इस उपभोग की प्रवृत्ति के कारण उत्सर्जन (emission) तेजी से बढ़ता है। और यह उपभोग की प्रवृत्ति तो किसी आध्यात्मिक माध्यम से ही कम की जा सकती है। इसलिए जलवायु संकट (Climate Crisis) का केवल आध्यात्मिक समाधान हो सकता है।
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प्रश्नकर्ता: आज हमारे सामने वो हैं जिनके बारे में आप बहुत कुछ जानते हैं। आचार्य प्रशांत जी—फिलॉसफर, ऑथर और गुरु। बहुत सारी बुक्स लिखी हैं और क्लाइमेट चेंज पर बहुत सारी बात की है। सर, इतनी सारी उपाधियां आपकी जो हैं अगर मैं आपसे पूछना चाहूं, इनमें से आप सबसे ज़्यादा क्या हैं? तो वो क्या होगा?
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो सबका आभार, मुझे आमंत्रित करने के लिए। और मैं आशा करता हूं कि यह जो बातचीत होगी यह सभी के लिए बोध का और आनंद का थोड़ा स्रोत बनेगी, कम से कम एक घंटे के लिए।
तो आपने पूछा कि ये जितनी अलग-अलग पहचाने हैं, उन सब में मैं सबसे ज़्यादा क्या हूं या मुझे सबसे ज़्यादा पसंद क्या है? मैं एक शिक्षक हूं। मैं एक शिक्षक हूं। मैं समझता हूं कि हर इंसान के भीतर जो चेतना है वो बेहतर होना चाहती है। हर इंसान ऊपर उठना चाहता है। बाहरी ऊपर उठने के तरीके तो हमको सबको पता ही होते हैं। और सब कोशिश कर रहे होते हैं ज़िंदगी में आगे कैसे बढ़े, आगे कैसे बढ़े और आप बाहर भी जो उठना चाहते हैं वो इसीलिए क्योंकि भीतर से आपको बेहतर बनना है। भीतर एक बेचैनी रहती है। कुछ रहता है जो कहता है कि मुझे बेहतर बनना है। बेहतर होना है। तो वो काम कराना मेरा काम है। और वही मेरी पहचान है।




