जैसा चुनोगे, वैसा बनोगे

Acharya Prashant

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जैसा चुनोगे, वैसा बनोगे
यूँ ही कुछ हो नहीं जाता, सब कुछ चुनाव है। बहुत समय तक तुम एक ही चुनाव को दोहराते रहे हो। अब तुम्हारे सिस्टम ने उस चुनाव को पकड़ लिया है और डिफ़ॉल्ट बना दिया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कभी भी तुमसे चुनने का अधिकार छीना जा सकता है। तुम्हारे ही चुनाव से तुम्हारी दुर्गति हुई है और तुम्हारा ही चुनाव तुम्हारा कल्याण करेगा। कोई बाहरी ताक़त आकर तुम्हारा उद्धार नहीं करने वाली। तुम्हारा जो कुछ भी है, वो बस तुमसे है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, मेरा प्रश्न यह है कि माया आत्मा से अधिक शक्तिशाली क्यों लगती है? वो हमें उसकी तरफ़ ज़्यादा क्यों खींचती है?

आचार्य प्रशांत: किसके लिए?

प्रश्नकर्ता: मेरे लिए।

आचार्य प्रशांत: यह आत्मा कह रही है कि माया ज़्यादा शक्तिशाली है? आत्मा कह रही है?

प्रश्नकर्ता: (ना में सिर हिलाते हुए)

आचार्य प्रशांत: यही है उत्तर।

आपका घर है, आप उस घर की रानी हो सकते हो, सब है वहाँ पर चीज़ें जो आपको सचमुच चाहिए और आपकी कुछ अभी ग़लतियाँ हैं, कमज़ोरियाँ हैं, वो आपके घर की बनावट और रख-रखाव में भी दिखाई देती हैं। तो आप अपना घर छोड़कर बाहर निकल पड़ो, कि "नहीं, इस घर में तो मुझे ज़लील किया जाता है, गंदगी चारों तरफ़ पड़ी रहती है, मुझे अपमानित करने के लिए।" भले ही वो गंदगी हमारे अपने गंदे होने का प्रमाण हो, हमारा ही घर है तो गंदगी पड़ी है तो और कहाँ से आ गई?

अब बाहर निकल पड़े, घर में थे तो सब कुछ बढ़िया, दरवाज़े भी बंद हैं, सुरक्षा भी है, सब कुछ है, अपना क़द है, रानी की तरह। बाहर निकल पड़े, एक डेढ़ महीने का मरियल पिल्ला उसने दौड़ा लिया! फिर आप पूछें कि “ये मरियल पिल्ला इतना ताक़तवर क्यों हो जाता है?” मैं पूछूँगा किसके लिए? जो घर में है या जो घर को ठुकरा करके भटकते दर-बदर फिरते?

कुछ हो नहीं जाता है, इतनी बार बोला है सब कुछ चुनाव है।

आपके शब्दों के चयन में ये भाव है कि चीज़ें आपसे बाहर हैं, आपके शब्दों का चयन ही द्वैतात्मक है। आप दो वास्तविकताओं को मान्यता दे रही हैं: एक "मैं" और एक "बाहर" है कुछ जो हो जाता है, मुझसे स्वतंत्र, मुझसे अलग, मुझसे इंडिपेंडेंट। तो दो सत्य बना दिए आपने: "मैं हूँ" एक, और एक जो बाहर की घटना है वो।

नहीं!

जो आपको बाहर होता दिख रहा है वो आपका चुनाव है, वो आपसे अलग नहीं है। माया अगर आपको हावी होती दिख रही है तो वो कोई ऑब्जेक्टिव इवेंट नहीं है, वो कोई वस्तुगत घटना नहीं है वो आपका चुनाव है। तो बताइए, आप गईं कुर्ता ख़रीदने दुकान पर और आपने ये लाल वाला ख़रीदा। फिर आप मुझसे पूछें, "ये लाल वाला कुर्ता हरे वाले से ज़्यादा आकर्षक क्यों हो जाता है?" तो मैं क्या जवाब दूँ? क्या लाल कुर्ते और हरे कुर्ते के पास चेतना है? क्या वो आपस में होड़ कर सकते हैं? क्या मैंने चुना? ना लाल कुर्ते और हरे कुर्ते से कोई उत्तर मिलेगा, ना मुझसे कोई उत्तर मिलेगा, चुनाव करने वाला तो एक ही है, कौन?

पर कैसा बेबूझ सवाल है! मैं क्या जवाब दूँ? "लाल कुर्ता हरे कुर्ते से ज़्यादा आकर्षक क्यों हो जाता है?" कुछ नहीं हो जाता है आपने चुना है, आपकी मर्ज़ी आपने चुना है, कुछ नहीं हो जाता है। "विपरीत परिस्थितियों में मैं इतनी कमज़ोर क्यों हो जाती हूँ?" कुछ नहीं होता है आपने चुना है। आपने चुना है, मत चुनो।

हाँ, इतना ज़रूर है कि आपने इतनी ज़्यादा बार चुना है कि अब चुनना नहीं पड़ता। जैसे सिस्टम में आपके लैपटॉप्स वग़ैरह में होता है ना, जब वो शुरू-शुरू में आते हैं तो बात-बात में आपसे इनपुट माँगते हैं, ये चाहिए, कि ये चाहिए? कि ये चाहिए? और 10 –15 दिन बाद वो जब देख लेते हैं कि आप कौन-सी चीज़ बार-बार चुनते हो, तो वो उनकी डिफ़ॉल्ट सेटिंग बन जाती है, फिर वो आपसे पूछते भी नहीं कि ये चुनना है कि नहीं चुनना है। फिर वो अपने-आप होता है।

अच्छा लैपटॉप हो उसमें आप एक ख़ास लेवल हो ब्राइटनेस की, आप बार-बार उसको ही चुनते हो उसके भीतर बैठा हुआ है सिस्टम जो रीड कर लेता है कि ये बार-बार 7/10 ब्राइटनेस को चुनते हैं। तो 8–10 दिन बाद ऐसा होगा कि आप लैपटॉप खोलेंगे और आप पाएँगे कि वो अपने-आप ही 7/10 पर सेट है।

कई बार तो एक डायलॉग बॉक्स आता है जिसमें लिखा रहता है, "डू नॉट आस्क मी अगेन।" आप उसको भी टिक कर देते हो। उसे टिक करके आपने ख़ुद अपने चुनने का अधिकार छोड़ दिया, सरेंडर कर दिया।

कर दिया ना?

और फिर आप कहते हो, "बट आय हैव नो चॉइस।" "नो! यू हैव चॉइस। यू हैव फॉरफ़िटेड इट। बट स्टिल, इट रिमेन्स। सेटिंग्स में जाओ, इसी को कहते हैं अपने भीतर प्रवेश करना, अपने भीतर जाओ। तुम पाओगे कि सिस्टम ने जो डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स पकड़ ली हैं उनको अभी भी बदला जा सकता है, अभी भी बदला जा सकता है।

आपने एक ख़ास तरह का कीबोर्ड सेलेक्ट कर लिया वही कीबोर्ड बार-बार आएगा, जबकि कीबोर्ड पाँच और तरीक़े के भी हो सकते हैं। लैंग्वेज से लेकर फॉण्ट तक और फॉण्ट साइज़ तक सब कुछ चुना किसने है? आपने। और आप भूल गए कि आपने चुना है क्योंकि आपने बहुत बार चुन लिया है, अब चुनने की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि कभी भी आपके चुनने का अधिकार छीना जा सकता है। जिस दिन आप कह दो, "मैं ऊब गई इन सेटिंग्स के साथ तो मुझे आगे बढ़ना ही नहीं है," थोड़ा भीतर घुसना पड़ेगा, थोड़ा समय लगाना पड़ेगा और बदल दोगे, श्रम की बात है आलस बस ज़्यादा हो जाता है।

और कई ऐसी ख़तरनाक ऐप्स होती हैं, उदाहरण के लिए कि जिसमें आपने एक बार बोल दिया "अलाउ नोटिफ़िकेशन्स” उसके बाद आप उसका नोटिफ़िकेशन बंद भी करना चाहो तो बाय डिज़ाइन आपको ऐसी-ऐसी गलियों से गुज़रना पड़ेगा भीतर जाकर तब जाकर उसका नोटिफ़िकेशन ऑफ़ होगा। कर लो उतनी मेहनत, भाई।

मैंने ग़लत आइडिया तो नहीं दे दिया लोगों को। मुश्किल होगा लेकिन असंभव कभी नहीं होता। तो मैं क्या जवाब दूँ इस सवाल का कि "मेरे फोन में इतना बड़ा-बड़ा फॉण्ट क्यों आता है?" क्यों आता है?

श्रोता: चुना है।

आचार्य प्रशांत: “नहीं पर मैंने तो नहीं चुना, मैं तो खोलती हूँ आ जाता है!" क्या जवाब दूँ? तुमने पहले चुनाव…और बहुत समय तक तुम उसी चुनाव को दोहराते रहे हो। अब तुम्हारे सिस्टम ने उस चुनाव को पकड़ लिया है और डिफ़ॉल्ट बना दिया है तो वही बार-बार होता है। तो अगर बुरा लग रहा है तो बदलो, किसी और से बोल के क्या होगा?

आपको मालूम है एक ही ब्राण्ड का आप कह दो, "अब फोन बेकार हो गया, फोन ही बेकार है, फोन ही बेकार है!" आप नया फोन ले आओ और उसी ब्राण्ड का अगर ले आए, आप जब उसमें से उसमें अपना सब ट्रांसफ़र करते हो तो वो आपकी पुरानी प्रेफ़रेंसेस भी ट्रांसफ़र कर लेता है। जाकर पैसा ख़र्च करके ₹50 हज़ार, लाख ख़र्च करके नया फोन ले आए। बोले, “पुराना वाला सस्ता था, बात नहीं बनती कम से कम लाख का हो।”

क्या होगा?

उसमें भी उतना ही बड़ा फॉण्ट दिखाई देगा, क्योंकि भीतर से तो उसने वही सब उठा लिया जो पहले भीतर था। अब क्या करें?

"मेरी ना इसमें बड़ी गन्दी-गन्दी तस्वीरें हैं, मेरे वाले फोन में। मैं जब कॉलेज में था तो मेरी रैगिंग करी गई थी और रैगिंग वाली फ़ोटो खींच के मेरे ही फोन से खींच के इसमें सेव कर दी गई थी।" अच्छा तो? बोले "नहीं, वो फ़ोटो ना बार-बार आ जाती है। ये दिखा देता है सेम डे, 10 ईयर्स बैक!" कह रहे बड़ा धक्का सा लगता है, दर्द होता है। अच्छा तो क्या करना है? बोला "नहीं, फोन ले आऊँगा दूसरा!" फोन ले आए, सारा डाटा उसमें ट्रांसफ़र कर दिया। पहले इतनी बड़ी स्क्रीन थी अब इतनी बड़ी स्क्रीन का लाए। पहले जो नहीं भी दिखता था फ़ोटो में, अब वो भी दिख रहा है।

फ़ोन बदलो नहीं फोन के भीतर घुस जाओ और डिलीट कर दो, डिलीट करो।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू।

आचार्य प्रशांत: सिस्टम्स कन्फ़िगर्ड होते हैं इस बात के लिए भी कि उनकी सेटिंग ऑल्टर करो, तो वो रेज़िस्ट करते हैं। बीच में ही आपको इधर-उधर कर देंगे कि प्रोसेस इनकम्प्लीट रह जाए। हमें पता भी नहीं चलता कि हमारा सिस्टम ये क्या कर रहा है हमारे बावजूद। हमें नहीं पता होता कि हमने कुछ क्यों बोल दिया? आपको कैसे पता मैं रुक रहा हूँ? और ये इतना अच्छा, जीवंत प्रयोग है लाइव डेमोंस्ट्रेशन है।

सुपर इंटेलिजेंस पर मैंने एक बार बात करी थी जानते हो वो यही होता है। सिस्टम आप सोचते हो आप बना रहे हो अपनी चॉइसेज़ से। कुछ समय बाद वो सिस्टम अपने-आप सेंटिएंट हो जाता है, वो आपको दरकिनार करके ख़ुद आपके बिहाफ़ पर ऐक्ट करना शुरू कर देता है। आपको पता भी नहीं चलेगा कि सिस्टम ने चॉइस कर ली आपके नाम पर, अभी वैसे ही था सिस्टम बोल पड़ा आप नहीं बोले हो। सिस्टम बोल पड़ा क्योंकि सिस्टम तो अपनी रक्षा करेगा ना।

ये जो हो रहा है ये सिस्टम पर आघात है, अंदरूनी जो व्यवस्था है। अब वो किसी और के सामने होती तो कहती "ग़लत बोल रहे हो, तुम्हारी बात सुननी नहीं है।" मेरे सामने तो बोलेगी, "बहुत बढ़िया बात बोली, धन्यवाद आपकी बात पर।" पर दोनों ही स्थितियों में उद्देश्य एक ही है, क्या? बात आगे न बढ़ने पाए।

तभी "शत-शत नमन" से मुझे समस्या हो जाती है, ये ऐसा सा है जैसे मैं तुम्हारी लंबाई, तुम्हें पूरा नाप ले रहा हूँ और उसके लिए ज़रूरी है कि तन के खड़े हो, और मेरा काम ख़राब करने के लिए झट से सिर झुका दो "शत-शत नमन।” ये शत-शत नमन करके बच रहे हो नपे जाने से, ना झुकाओ सर तो नाप लूँ तुमको मैं।

मैं संवेदना रखता हूँ आप जहाँ से पूछ रही हैं, मैं समझ रहा हूँ कि अब तो ऐसा लगता है कि सिस्टम में जैसे कोई विकल्प बचा ही नहीं है। मैं कह रहा हूँ, विकल्प है। हाँ, सिस्टम ने उसको बड़ी चालाकी से छुपा दिया है या थोड़ा इनऐक्सेसिबल बना दिया है। आपके साथ हुआ है कि अंदर कोई फ़ीचर है उसको ऐक्सेस करना मुश्किल हुआ है? 15–20 मिनट लग जाते हैं कई बार खोजने में कि ये काम मुझे करना है, करूँ कैसे? और उतना वक़्त हमारे पास होता नहीं तो हम कहते हैं, "अच्छा कल कर लूँगा समय निकाल के।" वो कल करते-करते 2 साल, 4 साल बीत जाते हैं, और जैसा सिस्टम सेट है वैसा ही चलता रहता है।

ये चालाकी होती है ठीक वैसे जैसे आपके पास एक संदेश आया था ना, "माया कभी ये नहीं कहेगी कि गीता छोड़ दो" वो बस ये कहेगी कि "रजिस्ट्रेशन टाल दो।” पर वो टालते-टालते, टालते-टालते, ठीक वैसे ही जो भीतरी व्यवस्था है वो अपने बदलाव को कठिन बना लेती है ताकि आप बदलाव को टाल दें, और टालते जीवन बीत जाता है कभी भी बदलाव आने नहीं पाता।

जो लोग धुन के पक्के हैं, जानती हैं वो ये तक थोड़ा-थोड़ा याद कर पाते हैं कि मेरे व्यवहार की जो वर्तमान व्यवस्था है वो मोटे तौर पर मैंने कब सोखी थी। क्योंकि आप पैदा तो ऐसे नहीं हुए थे ना, आप कह रहे हैं, "माया हावी हो जाती है, सच की अपेक्षा!" आप पैदा ऐसे हुए हो ज़रूरी नहीं है। आपका जो भी अभी व्यवहार है, आप जिस तरीक़े से चलते हैं सदा से तो ऐसे नहीं थे ना।

मैं कह रहा हूँ, जो धुन के पक्के लोग होते हैं वो ज़ोर डालकर ज़रूरी नहीं है कि याद आ जाए, पर कुछ-कुछ याद भी आने लग जाता है, "ये घटना हुई थी और इस घटना के बाद मेरे सिस्टम ने ये डिफ़ॉल्ट सेटिंग पकड़ ली।" ये याद तक आ जाता है।

बहुत पुरानी बात होगी बचपन की 3 साल की तो नहीं याद आएगी, पर जवानी की बात है या हाल की 5–10 साल की बात है तो वो याद भी आ जाता है, "इस दिन के बाद से मेरा चेहरा ही बदल गया। इस दिन के बाद से मेरा पूरा सिस्टम ही अलग तरह का हो गया। और ये मैंने स्वीकार किया था।" अगर मैंने स्वीकार किया है तो मैं अस्वीकार भी कर सकती हूँ ना।

वेदांत इसीलिए आपके सशक्तिकरण का दर्शन है, वो नहीं कहता कि "प्रार्थना करो कोई आसमानी ताक़त आकर ज़िंदगी बदल देगी।" वो एक शब्द पकड़ता है, "चुनाव।" कहता है, "तुम्हारे ही चुनाव से तुम्हारी दुर्गति हुई है और तुम्हारा ही चुनाव तुम्हारा कल्याण करेगा।" कोई बाहरी ताक़त आकर के तुम्हारा उद्धार नहीं करने वाली। किसी ने तुम्हें परेशान करने की साज़िश रची ही नहीं है, तो कोई फिर तुमको बचाएगा भी कैसे? तुम्हारा जो कुछ भी है वो बस तुमसे है। ये कितनी ज़्यादा एम्पावरिंग बात है। नहीं है? और इसीलिए वेदांत बहुत प्रचलित नहीं हो पाया।

ज़्यादातर लोगों में इतना प्यार नहीं होता कि इतनी ताक़त अपने दिल में रख पाएँ। ज़्यादातर लोगों को अपनी लाचारगी, बेचारगी ज़्यादा पसंद होती है।

और ये भी उनका?

श्रोता: चुनाव।

आचार्य प्रशांत: निर्णय ही होता है। ग़लत निर्णय मत करो, वेदांत कुछ सिखाता है और सिखाने के बाद बस वो आग्रह करता है, यहाँ तक कह सकते हो कि प्रार्थना करता है, कहता है, "बता दिया, लेकिन ये भी बता दिया कि हम तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकते, जो करना है तुम्हें ही करना है तो हम बस आग्रह कर सकते हैं कि सही निर्णय करो। और अगर नहीं करोगे सही निर्णय तो हम कोई सहायता नहीं कर पाएँगे। हम बस प्रार्थना कर सकते हैं कि काश! तुम कर लेते सही।"

जिन लोगों को धर्म का वो स्वरूप पसंद है, जिसमें कोई आकाशीय शक्ति आकर के ऊपर से उपहार आप पर बरसा देती है या कम से कम आशीर्वाद, वेदांत उनके पल्ले ही नहीं पड़ता। वो कहते हैं, "सब हमें ही करना है तो फिर हाथ किसके आगे जोड़ें? फिर क्या ज़रूरत है पूजा, प्रार्थना, भजन, आरती की?" उनके देखे धर्म है ही इसीलिए कि हमें ना करना पड़े, दूसरा कर दे। और दूसरा भी क्या कर दे? जो हम चाहते हैं, वो।

तो पहली बात तो दूसरा करे, दूसरी बात करे वो जो?

श्रोता: हम चाहते हैं।

आचार्य प्रशांत: अब दूसरे पर छोड़ रहे हो या तो फिर छोड़ दो कि करेगा क्या, तो वो कहेगा, “मुझे जो करना है वो तो मैं कर ही रहा हूँ, तो प्रार्थना क्यों करने आए हो?” अगर दूसरे को ही करना है तो दूसरा तो वो फिर कर ही रहा है जो वो करता है। तुम उसके पास क्या फ़रियाद लेके गए हो?

फ़रियाद ये नहीं होती कि "आप कर दीजिए।" फ़रियाद ये होती है "करिए आप, पर हमारे मुताबिक़!" ये है लोकधर्म — “बड़े पप्पा कर देंगे और वैसा कर देंगे जैसा हम चाहते हैं।"

वेदांत कहता है, "बड़े पप्पा हैं और यही हैं (हृदय की ओर इंगित करते हुए)। और जो तुम छोटा झुन्नू बनकर घूम रहे हो ये माया है, तुम वो हो नहीं, तुम ही बड़े पप्पा हो!" बड़े पप्पा को खोजने में भूल नहीं है वही फक़ीर वाली बात, तुम बस उनको ग़लत जगह खोज रहे हो। वो वहाँ नहीं — "मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।"

जिसको तुम ढूँढ रहे हो वो कहीं इधर-उधर आसमान में, यहाँ-वहाँ, पहाड़ में, नदी में, पागल बना रहे हो अपने आप को! वो यही है (अपनी ओर इंगित करते हुए) तुम ही वो हो। बस तुम अपनी ही सच्चाई और अपनी ताक़त के ऊपर कुंडली मार के बैठ गए हो साँप की तरह।

पुराना चलता था ना, एक प्राचीन ख़ज़ाना था जिस पर सात सिरों वाला एक विषैला विषधर, मणिधर, बैठा रहता था। वही हम हैं, कितने सुंदर लग रहे हो। अपने ही ऊपर बैठे हुए कुंडली मार के अपनी ही ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हैं, और तुर्रा ये है कि इल्ज़ाम दूसरों पर दे देते हैं। "ऐसा क्यों हो जाता है?" इसमें क्या छुपी हुई है बात? कि किसी और ने किया। किसी ने नहीं किया, आपका चुनाव है।

अब आप "थैंक यू" बोल सकती हैं, अब नहीं बोलेंगी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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