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जानकर यदि भूल गये तो कभी जाना ही नहीं || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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सौ बरसा भक्ति करे , एक दिन पूजे आन

सौ अपराधी आत्मा , पड़े चौरासी खान ।।

~संत कबीर

वक्ता : सौ साल की भक्ति के बाद अगर एक दिन फिसल गए, तो उस एक दिन के फिसलने से ये तय है कि वो सौ साल में जो कर रहे थे, वो झूठा था। उस झूठ की वजह से ही ये दिन आया है कि आज तुम फिसल गए। आज फिसले हो, उसका कारण है पिछले सौ साल का झूठ। पर सौ साल झूठा जीवन जी कर के भी यदि एक दिन आँख खुल गई, तो उस आँख खुलने का कारण नहीं है, पिछले सौ साल का झूठ। यदि अंत में फिसलन है तो कार्य- कारण का सम्बन्ध स्थापित होगा क्योंकि वहाँ जो कुछ हो रहा है, वो अभी मन के दायरे में हो रहा है। वो अभी यांत्रिक है, मैकेनिकल है। उसके कारण — खोज लेना, खूब खोज लेना — जब भी कभी फिसलोगे, उसके पीछे कारण होंगे। कोई प्रभाव होगा, कोई स्थिति होगी । लेकिन जब भी कभी उठोगे, उसके पीछे कोई कारण नहीं होगा । वो कार्य- कारण से मुक्त बात होगी।

सौ साल भक्ति कर के यदि कोई फिसलता है, तो पक्का कि भक्ति झूठी थी, इसी कारण फिसले। पर अगर कोई सौ साल नरक जैसा जीवन जी करके एक दिन अचानक जग जाता है, तो ये मत समझ लेना कि जग इसलिए गया क्योंकी वो नरक जैसा जीवन जीया।

‘फिसलने’ के कारण होते हैं, ‘उठना’ कृपा होती है । कारण और कृपा में भेद करना सीख लो । ‘नरक’ के कारण होते हैं, ‘स्वर्ग’ कृपा होती है ।

तो सौ साल भक्ति कर के, अगर फिसल गए हो, तो कार्य कारण का सम्बन्ध चलेगा। तुम्हारा फिसलना इस बात का सबूत है कि पिछले सौ साल भी झूठे थे। अब घूमोगे चौरासी लाख योनियों में इसलिए नहीं कि एक दिन फिसले; इसलिए क्योंकि सौ साल ही झूठे थे। इसलिए पूरे सौ साल की सज़ा मिलेगी । या यूँ कहो कि सज़ा मिल रही थी, ये अब पता चलेगा क्योंकि जो झूठ में हो घूम रहा है, सज़ा तो उसे लगातार मिल ही रही थी। हाँ, अब फिसले हो, तो तुम्हें पता चलेगा कि सज़ा मिल ही रही थी।पता चलने भर का अंतर है। सांस, सांस ही सज़ा थी; मन की हर गति में सज़ा थी। अब बस स्पष्ट हो जायेगा, कि सज़ा थी। सूक्ष्म रूप में नहीं पता लग रहा था, तो अब सज़ा स्थूल रूप में मिली है ।

जब भी कभी पाओ कि कुछ कष्ट मिला है, तो उसे अपने ऊपर ले लेना, और जब भी पाओ कि मुझे कष्ट से मुक्ति मिली है, उसको अपने ऊपर मत लेना। कष्ट मिला है, तो तुम्हें तुम्हारी वजह से मिला है और कष्ट से मुक्ति मिली है, तो ये कृपा है। उल्टा मत ले लेना कि कष्ट मिला है तो संसार ने दिया है और आनंद मैंने अर्जित किया है।

श्रोता : हम यही करते हैं कि दुःख दुनिया ने दिए हैं।

वक्ता : नहीं।

धार्मिक चित्त वो है, जो सदा स्रोत की तरफ देखे। आनंद मिलेगा तो तू देगा, कष्ट मिलेगा तो मेरी करतूत होगी। आनंद में हूँ – तेरी बख्शीश; कष्ट में हूँ – मेरा गुनाह, ये धार्मिक चित्त है ।

श्रोता : शिव योग कहता है, आप अपना भूत (पिछले कर्म) पूर्णतः साफ़ कर सकते हैं, क्या ऐसा कुछ होता है ?

वक्ता : बिलकुल हो सकता है? जिसके पुराने कर्म थे, अगर वह ही नहीं बचा, तो कर्म फल किसको मिलेगा ?

आप के नाम एक चिट्ठी आई है, अगर आपका नाम ही बदल गया है, तो वो चिट्ठी किस तक पहुंचेगी ?

आप ही नहीं बचे, तो फिर कर्म फल किसको मिलेगा ? ‘’मैं वो हूँ ही नहीं, जिसने कर्म किया था तो फिर कर्म फल किसको मिलेगा ?’’ जो अतीत को ढोता चलेगा, उसको अतीत के कर्म फल को भी भोगना पड़ेगा। कर्म कहाँ था ? अतीत में था। तो तुम अतीत को ढो रहे हो, तो अब अतीत का फल भी ढोओ। जो अतीत को नहीं ढो रहा, वो अतीत के कर्म फल से भी मुक्त हो गया।

अगर कुछ है पहले का, जो तुम्हें आज भी परेशान कर रहा है वो इसलिए क्योंकि तुम आज भी वही मन हो, जो कल थे। इसीलिए कल की तकलीफें आज भी परेशान करती हैं।

शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prasha nt फ्लिप्कार्ट * : https://goo.gl/fS0zHf *

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