जानते हो तुम सचमुच क्या चाहते हो? || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

आचार्य प्रशांत: सब नाम, सब उपाधियाँ, सब रूप सीमित होते हैं। जो कुछ भी सीमित है, वो एक मामले में धोखा है। किस मामले में? वो तुम्हारी गहनतम अभिलाषा पूरी नहीं कर पाएगा, पर वो तुम्हारे सामने खड़ा इसी तरह से हो जाता है जैसे वो बड़ा महत्त्वपूर्ण हो—और महत्व उसका दो कौड़ी का नहीं। नाम, रूप, रंग, आकार वाली सब चीज़ें संसार में मिलती है न, और संसार की ही चीज़ें एकदम उछल-उछल के ज़ोर से चिल्लाती हैं कि हम क़ीमती हैं, हम महत्त्वपूर्ण हैं, हमारी तरफ़ आओ, हमें पाओ, हमें गले लगाओ, हमारा पीछा करो, हमारी क़ीमत चुकाओ, हम तुमको अतीव सुख देंगे। संसार यही करता है न?
और अगर तुम दु:ख में हो तो संसार की ही यह सब नाम, रूप, गुणमूलक चीज़ें क्या बोलती हैं? आओ, हमारे पीछे आओ, हमारी क़ीमत चुकाओ, हमें महत्व दो, हम तुम्हें तुम्हारे दु:ख से मुक्ति दिलाएँगे। इसलिए ये सब धोखा हैं, इसलिए कहा जा रहा है कि जब तुम धोखा खाने की वृत्ति से रहित हो गए, दुनिया की नाम, रूप वाली चीज़ों से धोखा खाने की वृत्ति से जब तुम रहित हो गए, तब ब्रह्म है। समझ रहे हो बात को?
नाम, रूप, सब गुणों से आशय दुनिया के सब सीमित पदार्थो, व्यक्तियों, वस्तुओं, विचारों की तरफ़ है। ठीक है? तो ब्रह्म की कल्पना मत करने लग जाना कि ब्रह्म कोई ऐसी शय है, कोई ऐसी हस्ती ही है जो नाम नहीं रखती, जो रूप नहीं रखती, जो गुण नहीं रखती। लोगो ने ये ख़ूब करा है, “वो है, पर उसका कोई चेहरा नहीं है।”
नहीं साहब, आप बातचीत ज़्यादा मत करिए, आप इतना भी अगर बोल देंगे कि वो है, पर उसका कोई नाम नहीं है, तो आपने उसको नाम दे दिया। आप यह भी कह देंगे वो है, पर उसका कोई चेहरा नहीं है, तो आपने उसको चेहरा दे दिया। आप यह भी कह देंगे कि वो है, पर उसका कोई गुण नहीं है, वो निर्गुण है, तो भी आपने उसको गुण दे दिया। यह सब मत बोलिए। उसके बारे में कुछ भी मत बोलिए। न तो यह बोलिए कि वो अनाम है, न बोलिए अरूप है, न बोलिए निर्गुण है।
आप बस उन चीज़ों के बारे में बोलिए जो सनाम हैं, जो स्वरुप हैं, जो सगुण हैं। और वो सब चीज़ें आपको नचाए हुए हैं। उनकी बात आप करना नहीं चाहते, वो सबकुछ जो आपको नचाए हुए है ज़िन्दगी में, आपके लिए दु:ख का कारण है—उसका तो नाम है न, उसका रूप है, उसका रंग है, उसका गुण है, उसका आकार है। उनकी बात करो, ब्रह्म की बात मत करो।



