इंसान के भीतर जो यह भाव है कि मैं एक इंसान हूँ जो पैदा हुआ है भोगने के लिए, जो दुनिया से अलग अपने हित साध सकता है, दूसरों को बर्बाद कर के खुशी पा सकता है, जब तक इंसान के भीतर ये चीज रहेगी तब तक इसका मुकाबला करना बहुत मुश्किल है
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे अब हम बुक स्टाल्स ऑर्गेनाइज करते हैं अपनी, अपनी सिटीज में। अब आपने इतना बड़ा ये इशू जो बताया है लेकिन जब ग्राउंड पर काम करते हैं न, तो पता नहीं ये जो हमसे ऊपर की एक जनरेशन है या हमारी भी यह थोड़ी अनअवेअर है चीजों को लेकर। तो हम फ्यूचर जनरेशन की तरफ कैसे फोकस कर सकते है। क्योंकि ये जो जनरेशन है यह बदलने को तैयार ही नहीं है। बचेंगे ही नहीं। तो बदलेंगे कैसे तो फ्यूचर की तरफ। हम संस्था के बाहर है, तो संस्था के बाहर रह के अपना पूरा जोर कैसे लगा सकते हैं। आप हमसे क्या एक्सपेक्ट करते हैं कि आपने हमें ये बात बता दी, हम कैसे अपने आसपास इस बात को और जोर हुए रेट बढ़ा दे उसका बहुत ज़्यादा।
आचार्य प्रशांत: देखो, बात उम्र की भी इतनी नहीं होती है। वरना होने को ये भी हो सकता है कि कोई 70 साल का हो, यह मुद्दा बहुत सीधा है। इसमें कोई बड़ी जटिलता नहीं है कि किसी ने इंजीनियरिंग पढ़ी होगी या मैथस पढ़ी होगी या साइंस पढ़ी होगी या क्लाइमेट साइंस पढ़ा होगा तो यह समझेगा। इसमें ऐसा कुछ है नहीं।
बात नीयत की है और नीयत की खराबी मालूम है। क्या है मैं कुछ भी तब करूँ न जब मुझे उससे कुछ लाभ होता हो।
इसमें मुझे क्या मिलेगा। मैं 70 साल का हो गया हूँ, मुझे पता है 5 साल में मर जाऊँगा तो मैं अपना कंजम्शन कट करूं। तो किसके लिए मान लो। मैं कह रहा हूँ की मैं आने वाली पुश्तों के लिए रोक रहा हूँ न। तो मैं तो मर जाऊँगा, उनसे मुझे क्या मिलेगा। मैंने उन्हें कुछ दे दिया, बदले मुझे क्या मिला? बात बस ये हैं, इतनी सी बात है।




