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गृहस्थ जीवन का सही उपयोग || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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नियतस्य तु सन्न्यास: कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तित: ।।१८.७।।

~श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १८, श्लोक ७

भावार्थ: नियत कर्म का त्याग उचित नहीं है। मोह के कारण नियत कर्म का त्याग ही तामस कहा गया है।

प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श आचार्य जी, हम नियत कर्म की परिभाषा को कैसे समझें? और गृहस्थ जीवन के लिए त्याग का सही अर्थ क्या है? इसे समझाने की अनुकम्पा करें।

आचार्य: नियत कर्म है अपनी नियति को पाने के लिए किया गया कर्म। नियत कर्म है अपनी नियति को पाने के लिए किया गया कर्म। क्या है नियति आपकी? मुक्ति, आनंद, स्पष्टता, बोध, सरलता — ये नियति है। क्यों इसे नियति कह रहा हूँ? क्योंकि यही वो है जिसको पाये बिना आप छटपटाते रहते हैं। तो निश्चित रूप से यही नियति होगी न। क्योंकि इसी को पाये बिना तो बेचैनी है इतनी। इसी को पाने के लिए ही तो सारी कयावद है, उछलकूद है। यही नियति है।

जो कर्म आपको नियति की अर्थात् मुक्ति की ओर, सरलता की ओर, आनंद की ओर ले जाए, वो नियत कर्म है। और तामसिकता क्या है? वो सबकुछ जो आपको आपकी नियति से वंचित रखकर किसी और जगह पर स्थापित रखे कहलाती है तामसिकता।

वहाँ है नियति (उल्टे हाथ का इशारा करते हुए), वहाँ पहुँचना है, उसकी ओर बढ़े तो ये कहलाएगा नियत कर्म। और गलत जगह बैठे हैं और वहीं तम्बू गाड़ दिया और कह दिया, ‘ये तो मेरी गृहस्थी है’, यही कहलाएगी तामसिकता।

तामसिकता का मतलब है — पहली बात तो तुम गलत जगह बैठ गये हो और दूसरी बात, अब वहाँ से हिलने को भी राज़ी नहीं हो; और कह रहे हो, ‘यही तो तम्बू है मेरा, यही मेरा संसार है। ये तामसिकता है।

समझ आ रही है बात?

एक भूल होती है, जहाँ तुम्हें होना नहीं चाहिए, वहाँ पाये जाना और उससे कई गुणा बड़ी भूल होती है गलत जगह होना और गलत जगह पर ही डेरा डाल देना। अब पूछ रही हैं, ‘गृहस्थ जीवन के लिए त्याग का सही अर्थ क्या है? समझाने की अनुकम्पा करें।’

अगर गृहस्थ होने से आपका आशय ये है कि आप कुछ लोगों से सम्बंधित हैं, पति से, बच्चों से, कुछ रिश्तेदारों से तो गृहस्थ जीवन अध्यात्म में, सत्य में, मुक्ति में, क़तई बाधा नहीं है। अगर गृहस्थी का आपके लिए इतना ही मतलब है कि आपके जीवन में आपके कुछ लोगों से सम्बन्ध हैं, तो फिर गृहस्थी बिल्कुल बाधा नहीं है मुक्ति में। पर अगर गृहस्थी का आपके लिए ये अर्थ है कि आपने कुछ कर्तव्य, कुछ ज़िम्मेदारियाँ अपने लिए बाँध लिए हैं और उनको आप जीवन का केंद्र समझती हैं, तो फिर गृहस्थी में रहते हुए अध्यात्म की कोई संभावना नहीं है।

समझ रहे हो बात को?

बात गृहस्थी की नहीं है, बात ये है कि आपने उस गृहस्थी को अपने लिए बना क्या लिया है। हर घर में चूल्हा होता है चौका होता है, हर घर में। कोई अकेला भी रहता हो, अपनेआप को गृहस्थ न बोले, तो भी उसके घर में रसोई तो होगी न। होगी न? तो रसोई का होना कोई बाधा तो नहीं बन गयी मुक्ति में। या ये बाधा हो गयी? कि इनके घर में रसोई है, अब इनके लिए कोई अध्यात्म नहीं, कोई मुक्ति नहीं!

‘पता है क्या, इनके घर में रसोई है भाई!’ क्या फ़र्क पड़ता है रसोई है, कि मेहमानों का कमरा है, गराज है, कि शयनकक्ष है, नहाने का कमरा है। हर घर में होंगे, कहाँ नहीं होंगे! नहीं होंगे? लेकिन अगर आपने ये कह दिया कि मेरा चौका ही मेरा मंदिर है, तो जय राम जी की! अब तो आप पक्की गृहस्थन हैं, अब मिल चुकी मुक्ति! घर में चौका है, इससे कोई दिक्कत नहीं हो गयी। लेकिन अगर आपने उस चौके को मंदिर बना दिया अपना, कि मैं तो देखिए गृहस्थ महिला हूँ न, तो मेरी तो पूजा-आराधना-भजन-कीर्तन, सब क्या हैं? ये जो स्टोव की आग है, यही मेरे लिए यज्ञ की अग्नि है और ये जो कर्छुल का कढ़ाई से सम्बन्ध होता है, खनक उठती है, यही मेरे कीर्तन के वाद्ययंत्र हैं। तो फिर तो हो गया।

बच्चे हैं आपके, कोई बाधा नहीं हो गयी। अध्यात्म नहीं कहता कि बड़ा गुनाह कर दिया अगर आपके पास बच्चे हैं। लेकिन अगर आपने ये रवैया रख लिया कि ये जो मेरे चुन्नू-मुन्नू हैं न, यही तो राम-लखन हैं, यही तो कृष्ण-बलराम हैं, तो फिर तो अगले किसी जन्म में मिलेंगे माई! इस जन्म का तो निपट गया!

गृहस्थ महिला हैं आप, कोई बात नहीं हो गयी अगर आप अपनेआप को शादीशुदा कहती हैं। अध्यात्म कहाँ कहता है कि कोई विवाह न करे! करो विवाह, शौक से करो, लेकिन अगर आपने ये कहना शुरू कर दिया कि ये जो मेरे पतिदेव हैं, यही तो परमात्मा हैं, पति ही परमेश्वर होता है। तो फिर परमेश्वर को भूल जाइए। पतिदेव मिल गये न।

गृहस्थी में इसलिए अड़चन आती है अध्यात्म के प्रति, अन्यथा गृहस्थी अध्यात्म की राह में बिलकुल भी बाधा नहीं है। आप गार्हस्थ जीवन में भी पूरे तरीक़े से आध्यात्मिक हो सकते हैं, बेशक़ हो सकते हैं। कब नहीं हो सकते, मैंने बता दिए तीन उदहारण — अगर आपका चौका ही आपका मंदिर बन गया, अगर चुन्नू-मुन्नू ही राम-लखन बन गये और अगर पतिदेव ही परमेश्वर बन गये। तब तो भूल जाइए अध्यात्म को, तब नहीं हो सकता।

अंतर स्पष्ट है सबको?

गृहस्थी में होना एक अवसर भी हो सकता है। आप कुछ लोगों से बड़े निकट तौर पर सम्बंधित हैं — ये आपको एक मौक़ा भी तो देता है न, कि भई, इन लोगों से जुड़े हुए तो हैं ही, बँधे हुए तो हैं ही, तो हम अगर अपनी नियति की ओर बढ़ेंगे तो इनको भी साथ लेकर बढ़ सकते हैं। गृहस्थी बोझ या बंधन ही नहीं है, गृहस्थी अपने साथ-साथ पाँच और लोगों का कल्याण कर देने का अवसर भी तो है। पर मैंने आमतौर पर गृहस्थों को इस भाषा में बात करते सुना ही नहीं। वो आते ही हैं ऐसे कहते हुए, ‘हम क्या करें? हम तो गृहस्थ हैं।’

तो? तो? तुम मेरे पास ठप्पा लगवाने आये हो इस बात पर कि अब तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता?

तो ठीक है, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता, जाओ। कोई ज़बरदस्ती थोड़ी ही है कि मुक्ति भईया कंपल्सरी (अनिवार्य) है, ऐसा कुछ नहीं है। तुम्हें यही बहाना मारना है कि मेरा अब कुछ नहीं हो सकता क्योंकि मैं तो गृहस्थ हूँ, तो ये बहाना ही मुबारक हो आपको।

अन्यथा ध्यान देकर देखिए, गृहस्थी अवसर क्यों नहीं हो सकती? कि मैं तो बढ़ूँगी ही सच्चाई की ओर, घर में दो बच्चें हैं, उनको साथ लेकर बढ़ूँगी। मुझे तो समझदारी भरा जीवन जीना ही है, विवाह हो चुका है, तो पतिदेव को भी थोड़ी समझ-बूझ दिलाऊँगी। मौक़ा भी तो है न किसी को सद्गति दिलाने का, सही राह पर लाने का। तो इसको आप मौक़े की तरह क्यों नहीं देखते?

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