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घरवालों को कहाँ तक समझाएँ || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम प्रियांक है। एक्चुली (वास्तव में) ढाई-तीन साल से मैं मेरे घर से, मतलब परिवार से दूर रहता हूँ। रीज़न (कारण) ये है कि बचपन से, मतलब जब छोटा था, जब से मैंने समझा, चीज़ों को देखना चालू हुआ, यही देख रहा हूँ कि घर पर झगड़ा वग़ैरह होता ही रहता है। तो जैसे-जैसे दसवीं-ग्यारहवीं में आया तो थोड़ा गुस्सा आने लगा, तो फिर उस समय ऐसा हुआ कि एक दिन जैसे मेरे डैड (पिताजी) एक बैट उठाये मेरे को मारने के लिए, तो मैंने बैट उठाया, मारा नहीं, मतलब उठा लिया खाली। तो फिर उस समय ऐसा लगा कि अब कुछ बचा ही नहीं है, मतलब चीज़ें बहुत बाहर जा रही हैं।

ट्वेल्थ (बारहवीं) पास किया तो चीज़ें ख़राब ही हो रही थीं। फिर मेरा ऐसा हुआ कि मैं भी अपना अलग ही लाइन (मार्ग) से भटक गया। सिगरेट-शराब तो कभी छुआ नहीं मैंने क्योंकि वो ही कारण था घर पर क्लेश का। तो उसके बाद, लेकिन तीन साल का ग्रेजुएशन (स्नातक) छः साल में किया मैंने, फेल होते-होते, मम्मी की वजह से। नहीं तो शायद पढ़ाई भी छोड़ देता। और जैसे ही थोड़े-बहुत पैसे आये मेरे पास, मैं घर से निकल गया। मैं पहले दुबई चला गया। वहाँ पर तीन-चार महीने रहा। वहाँ पर मेरे को कुछ समझ नहीं आया तो फिर मैं वापस बॉम्बे आया, वापस घर पर आया मैं।

तो अभी मैंने मुंबई में ही दस-बारह किलोमीटर दूर दूसरी जगह पर घर ले लिया, जहाँ पर मैं अकेला रहता हूँ। मेरी मम्मी बीच में आती है, बहन भी आती रहती है। मैं बोला, ये मेरे को साथ में नहीं रहने का है, मेरे को नहीं जमता है। वो सफोकेशन (घुटन) होता है बहुत। वो ही चीज़ कितने समय तक, कब तक देखूँ?

अभी मैं छब्बीस साल का हो गया हूँ। मम्मी थोड़ा पूजा-पाठ करती हैं, बोलती हैं कि तू कौन सा अध्यात्म पढ़ रहा है कि जिसमें कि तेरे को भागने को, भागना सीख गया है तू। सिचुएशन (परिस्थिति) से भाग रहा है। और बहुत से जो मेरे घर वाले, उनके रिलेटिव (सम्बन्धी) भी एक से बढ़कर एक ही हैं। तो उनको तो झेलो और साथ में उनके रिलेटिव को भी झेलो, तो बहुत सारी चीज़ें एकसाथ आ जाती हैं। तो मैं बोला हर जगह पर तो वही है न। तो मम्मी बोल रही हैं कि लेकिन तू दुनिया में कहीं भी जाएगा, तो वहाँ पर तेरे को ऐसी चीज़ें मिलेंगी न, तो तू कितने जगह से भागेगा? मतलब मम्मी तो वो भी बोली कि अर्जुन महाभारत से भाग थोड़े ही गये थे, वो तो लड़ाई कर रहे थे। तो मैं बोला कि मेरे पास इसका कोई ये नहीं है। मतलब मम्मी मेरे को बोल रही हैं बेसिकली कि तू भगौड़ा है। अब ये सिचुएशन में माँ-बाप के साथ कब रहना चाहिए, कब नहीं रहना चाहिए? मेरे को लगता है मेरी मम्मी के लिए मैं शायद सेल्फिश (स्वार्थी) हो रहा हूँ। अभी उनका भी एज (उम्र) हो रहा है, जब मुझे उनके साथ रहना चाहिए तो मैं उनके साथ हूँ नहीं। लेकिन मैं दूर से बोलता हूँ कि आपको जो भी चाहिए, मैं दूँगा न। मतलब मैं जितना भी फाइनेंशियल हेल्प (आर्थिक मदद)) कर सकता हूँ, करूँगा। तो मम्मी बोल रही हैं कि मेरे को तेरा पैसा नहीं चाहिए। तू तेरा पैसा रख, पैसे से प्यार नहीं होता है। अब मम्मी को मैं क्या बताऊँ कुछ, और मैं ख़ुद क्या समझूँ कि मेरे को कब साथ रहना चाहिए, कब छोड़ना चाहिए, तो यही पूछना था।

आचार्य प्रशांत: देखो, पहली कोशिश तो यही होनी चाहिए कि जहाँ पर हो, वहाँ पर ही स्थितियाँ सुधार सको। पलायन कभी भी पहला विकल्प नहीं हो सकता। आप जहाँ हैं, यथाशक्ति वहीं पर बदलाव लाने की चेष्टा करें, लोगों को समझाने-बुझाने की चेष्टा करें। कोशिश करते ही जाएँ जबतक या तो बदलाव न आ जाए। आपको दिखे कि बदलाव आने लग गया है, आपकी चेष्टा सफ़ल हो रही है, ठीक है फिर तो आप चेष्टा करते ही जाएँ। या फिर एक ऐसा बिंदु आ जाए जहाँ आपको दिखने लगे कि आपके समझाने से दूसरे तो सुधर नहीं रहे, हाँ दूसरों के साथ रहने से आप ज़रूर बिगड़ रहे हो। वो बिंदु होता है जहाँ यह निर्णय कर लेना चाहिए कि अब यहाँ से हटना बेहतर है।

मैं पहले एक स्तर पर था। मुझे ऐसा लगता था कि दूसरे लोग उससे नीचे के स्तर पर हैं। मैं प्रेमवश, करुणावश उनको उठाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन दूसरों का हठ कुछ ऐसा है कि वो तो उठे नहीं और मुझे ऐसा अनुभव होने लग गया है कि वो अपनी जगह पर हैं, मैं अपनी जगह से नीचे गिर रहा हूँ। वो तो अपनी जगह पर अडिग हैं, मैं अपनी ऊँचाई से नीचे गिर रहा हूँ। इस बिंदु पर आकर यह निर्णय कर लेना चाहिए कि अब मैं हट रहा हूँ।

लेकिन हटना कभी अंतिम नहीं होना चाहिए। आप गिरने लग गए, इससे आपकी बलहीनता सिद्ध होती है। जहाँ को भी आप जा रहे हैं बाहर, वहाँ जाकर बल और एकत्रित करिए, वापस आइए। आप अंदर थे, आप बहुत मदद नहीं कर पाये लोगों की। आप बाहर जाइए और बाहर किसी की मदद करिए। मदद करने की उस पूरी प्रक्रिया में आपका अपना निखार आएगा। फिर आप पाएँगे, कुछ महीनों के बाद, कुछ सालों के बाद कि शायद अब पुनः प्रयास किया जा सकता है। फिर से कोशिश करिए। फिर अगर निराशा लगती है, फिर दिखता है कि ये तो सुधर नहीं रहे, इनके साथ मैं ज़रूर बिगड़ा जा रहा हूँ, फिर बाहर जाइए, फिर किसी और के साथ कोशिश करिए। क्योंकि दुनिया में एक ही पात्र तो नहीं हैं न आपके प्रेम का। घरवालों पर ही लगातार ऊर्जा क्यों लगानी है?

घरवालों का अधिकार निसंदेह पहला हो सकता है पर आख़िरी तो नहीं। आप किसी के लिए कुछ अच्छा करना चाहते हैं, आपकी अच्छाई पर निसंदेह आपके स्वजनों का, निकट सम्बन्धियों का पहला अधिकार है, मान लिया, बिलकुल।

पहली कोशिश अपने घर वालों के साथ, अपने निकटस्थ लोगों के साथ करिए। लेकिन यदि उनके साथ प्रयास सफ़ल नहीं होता तो फिर और भी तो बहुत लोग हैं न जो आपकी बाट जोह रहे हैं। आप उनपर अपनी कृपा के फूल क्यों नहीं बरसा रहे हैं भाई? आप दूसरों को समझाने के लिए इतने आतुर हो, आप दूसरों की बेहतरी के इतने आग्रही हो तो अपने पड़ोसी को बेहतर क्यों नहीं बनाते? दुनिया में और इतने लोग हैं, उनकी मदद क्यों नहीं करते?

घर में अगर बात न बने तो अपने प्रयासों को वहाँ रोक मत दो; और बहुत लोग सुपात्र हैं, अधिकारी हैं, उनके साथ कोशिश करो। उनके साथ कोशिश करोगे, तुम्हारा अपना तेज बढ़ेगा। फिर वापस लौट कर के घर में पुनः प्रयास कर सकते हो।

निष्कर्ष? घर वालों का पहला अधिकार है आपके प्रेम और प्रयासों पर, पर उनका आख़िरी अधिकार नहीं है। आप समझा रहे हो तब भी नहीं समझ रहे बल्कि आपको ही परेशान करे ही जा रहे हैं, करे ही जा रहे हैं तो आप कहीं और प्रयास करिए। ठीक है?

रही भगौड़े होने की बात तो ये किसी विधान में नहीं लिखा है कि जहाँ तुम्हारी चेतना का पतन होता हो वहाँ से मत भागो; ज़रूर भागो। माया से एस्केप (पलायन) करके अगर ट्रुथ (सत्य) की तरफ़ जा रहे हो तो शुभ है ऐसा एस्कैपिज्म (पलयनवाद)।

कहीं गड्ढे में गिर गए हो तो क्या करोगे, पड़े रहोगे? कि अगर यहाँ से अगर हटा तो भगौड़ा कहलाऊँगा, ये कोई बात है? भूलो नहीं कि धर्म का अर्थ ही है कि चेतना को बढ़ने की, उदात्त होने की अनुकूल स्थितियाँ देना। चेतना को अगर तुम अनुकूल स्थिति दे रहे हो तो ये भगोड़ापन नहीं है। भगोड़ापन तब होता है जब वहाँ से हट जाओ जहाँ चेतना उठती। सही जगह से हटने को भगोड़ापन कहते हैं। ग़लत जगह से हटने को विवेक कहते हैं। यदि हर जगह पड़े रहना ही धर्म होता तो विवेक शब्द का फिर अर्थ क्या है, बताओ मुझे।

विवेक का तो अर्थ ही होता है — भेद करना; कहाँ सार, कहाँ असार; क्या करना है, क्या नहीं करना है; कहाँ रहना है, कहाँ नहीं रहना है। यही विवेक है। ठीक है? तो ये जो तर्क बार-बार दिया जाता है कि 'अरे! यही तो तुम्हारी कर्मभूमि है, यहाँ पड़े रहो,' इस तर्क में कोई विशेष वज़न नहीं। सुबह आप लोग वहाँ तट पर थे, बालू पर थे, अभी यहाँ पर क्यों हैं, बोलिए! इस समय पर आप बीच (तट) पर क्यों नहीं हैं? और बीच अगर उलाहना दे कि भगौड़े निकले तुम, तो? बोलो!

आप वहाँ पर हैं जहाँ आपकी चेतना की उन्नति है; ये भगौड़ापन नहीं हो गया। बच्चे को स्कूल क्यों भेजते हो? वो तो भगौड़ा निकला, घर से स्कूल भाग गया। वो वहाँ पर जा रहा है जहाँ शुभ है जाना, ये भगौड़ापन नहीं कहलाता। बच्चे को हॉस्टल क्यों भेज देते हो? चार-चार, छः-छः साल, दस-दस साल हॉस्टल में रहते हैं कई बार, वे तो भगौड़े हो गए न? क्यों, भगौड़े क्यों नहीं हैं? क्योंकि वहाँ रहना शुभ है। जिधर शुभता है, उधर को जाओ, इसे भगौड़ापन नहीं कहते।

बहुत बड़े भगौड़े थे सांसारिक अर्थों में महावीर और बुद्ध, पर मानवता का बड़ा कल्याण किया उन्होंने। उन्होंने वो दिशा ली जिधर शुभ था, जिधर चेतना का आरोह और उत्कर्ष था। आपको ग़लत पट्टी पढ़ा दी गई है रिस्पांसिबिलिटीज (ज़िम्मेदारी) और कर्तव्य की। आपका पहला कर्तव्य है आपकी पहली पहचान से सम्बद्ध; क्या है आपकी मूल पहचान? एक प्यासी चेतना हो आप। तो क्या है आपका पहला कर्तव्य? चेतना को तृप्ति देना। बाक़ी जो भी कोई आपको कर्तव्य और रिस्पांसिबिलिटी का पाठ पढ़ाये वो स्वयं को ही नहीं जानता, आपको क्या जनवाएगा?

आध्यात्मिक आदमी लड़ाका होता है। वो डट कर युद्ध करता है। पर वो सही जगह पर सही युद्ध का चयन करके युद्ध करता है। वो व्यर्थ युद्धों में नहीं फँसता। वो ये नहीं करेगा कि वहाँ बाहर गया है पकौड़े खाने के लिए, और पकौड़े वाला उसके दो रुपए नहीं लौटाया तो बोले पाञ्चजन्य ने कहा है "शंखनाद करो।" मैं आध्यात्मिक आदमी हूँ। अंगद की तरह पाँव जमाऊँगा, सूरमा हूँ मैं, यलगार! व्यर्थ युद्धों में नहीं पड़ता आध्यात्मिक आदमी और सही मुद्दों से पीछे नहीं हटता।

और ये दोनों चीज़ें एक साथ हैं। व्यर्थ मुद्दों में अगर आप समय और शक्ति गँवाओगे, तो सही युद्ध कैसे कर पाओगे? तो दोनों बातें हैं और दोनों बातें विरोधाभासी लगेंगी लेकिन दोनों को साथ लेकर चलना है। जो आपके आसपास के लोग हों, सच्चा, पूरा ईमानदार प्रयास करना है उनको समझाने का और साथ लेकर चलने का। लेकिन यदि ऐसा बिंदु आ जाए कि दिखे कि वो तो नहीं बढ़ रहे हैं आगे, मुझे भी आगे नहीं बढ़ने दे रहे, तब नमस्कार। नमस्कार भी अंतिम नहीं है।

आओ, लौट कर आओ, अपनी ताक़त बढ़ा कर लौट कर आओ। बार-बार लौट कर आओ। पर लौट कर तो तब आओगे न जब पहले ख़ुद को बचाओगे।

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