धर्म होता है ख़ुद को समझने के लिए, ताकि आपकी चेतना उड़ान ले सके। समझ में आ रही है बात? और यही दो कोटियों के लोग होते हैं दुनिया में; एक, वो जो अपने पुराने ढर्रों पर चल रहे हैं इन्हें आप बोल सकते हैं अधार्मिक लोग। वह पुराने ढर्रे दो तरीक़ों के हो सकते हैं — ये बात बहुत रोचक लगेगी बहुत लोगों को। जो पुराने शारीरिक ढर्रे पर चल रहा है, वो तो अधार्मिक है ही। लेकिन जो पुराने सामाजिक ढर्रे पर भी चल रहा है, वो भी अधार्मिक है। धर्म किसी ढर्रे का नाम नहीं होता, धर्म जानने का नाम होता है।
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प्रश्नकर्ता: हेलो सर, मेरा नाम शाहनवाज है। मैं रामजस कॉलेज का स्टूडेंट हूँ। मेरा सवाल था कि डॉ. अंबेडकर जी ने सोशल इनजस्टिस के ख़िलाफ़ कॉन्स्टिट्यूशनल मैटर्स का सहारा लिया, ना कि किसी रिवॉल्यूशनरी मूवमेंट का। मगर क्या उनका ये विश्वास कि लीगल रिफॉर्म से जो इंडिया में डीप-रूटेड सोशल इनजस्टिस है, वो दूर किया जा सकता है — क्या ये सही था और क्या यही काफ़ी था?
आचार्य प्रशांत: सही था, निश्चित रूप से सही था। दो हमको बड़े नाम मिलते हैं पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में, फर्स्ट हाफ़ में, जिन्होंने जो भारत में दलित वर्ग था उसके उत्थान की बात करी और काम करा — डॉ. अंबेडकर, महात्मा गांधी।
और गांधी जी कहा करते थे कि जो पुरानी ही वर्ण व्यवस्था है, उसी का सुधार करके और नैतिक और आध्यात्मिक तरीक़े से जो कुरीतियाँ आ गई हैं समाज के भीतर, उनको हटा सकते हैं। तो उन्होंने कहा "हरिजन।" उन्होंने कहा कि ये जो अस्पृश्यता है, अनटचेबिलिटी है, ये हिन्दू धर्म के ऊपर कलंक की तरह है। इसको मिटाना चाहिए। पर उनका जो तरीक़ा था वो ये था कि नैतिक, धार्मिक,




