गाँधी बनाम अम्बेडकर: सुधार बनाम विद्रोह

Acharya Prashant

35 min
301 reads
गाँधी बनाम अम्बेडकर: सुधार बनाम विद्रोह
धर्म होता है ख़ुद को समझने के लिए, ताकि आपकी चेतना उड़ान ले सके। समझ में आ रही है बात? और यही दो कोटियों के लोग होते हैं दुनिया में; एक, वो जो अपने पुराने ढर्रों पर चल रहे हैं इन्हें आप बोल सकते हैं अधार्मिक लोग। वह पुराने ढर्रे दो तरीक़ों के हो सकते हैं — ये बात बहुत रोचक लगेगी बहुत लोगों को। जो पुराने शारीरिक ढर्रे पर चल रहा है, वो तो अधार्मिक है ही। लेकिन जो पुराने सामाजिक ढर्रे पर भी चल रहा है, वो भी अधार्मिक है। धर्म किसी ढर्रे का नाम नहीं होता, धर्म जानने का नाम होता है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: हेलो सर, मेरा नाम शाहनवाज है। मैं रामजस कॉलेज का स्टूडेंट हूँ। मेरा सवाल था कि डॉ. अंबेडकर जी ने सोशल इनजस्टिस के ख़िलाफ़ कॉन्स्टिट्यूशनल मैटर्स का सहारा लिया, ना कि किसी रिवॉल्यूशनरी मूवमेंट का। मगर क्या उनका ये विश्वास कि लीगल रिफॉर्म से जो इंडिया में डीप-रूटेड सोशल इनजस्टिस है, वो दूर किया जा सकता है — क्या ये सही था और क्या यही काफ़ी था?

आचार्य प्रशांत: सही था, निश्चित रूप से सही था। दो हमको बड़े नाम मिलते हैं पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में, फर्स्ट हाफ़ में, जिन्होंने जो भारत में दलित वर्ग था उसके उत्थान की बात करी और काम करा — डॉ. अंबेडकर, महात्मा गांधी।

और गांधी जी कहा करते थे कि जो पुरानी ही वर्ण व्यवस्था है, उसी का सुधार करके और नैतिक और आध्यात्मिक तरीक़े से जो कुरीतियाँ आ गई हैं समाज के भीतर, उनको हटा सकते हैं। तो उन्होंने कहा "हरिजन।" उन्होंने कहा कि ये जो अस्पृश्यता है, अनटचेबिलिटी है, ये हिन्दू धर्म के ऊपर कलंक की तरह है। इसको मिटाना चाहिए। पर उनका जो तरीक़ा था वो ये था कि नैतिक, धार्मिक, पेटरनलिस्टिक।

डॉ. अंबेडकर ने कहा कि ऐसे नहीं होगा, इतना आसान नहीं है। वो स्वयं जानते थे, उन्होंने स्वयं भुगता भी था। उनकी बात ज़्यादा व्यवहारिक थी। उन्होंने कहा, "इंस्टीट्यूशनल सेफगार्ड्स चाहिए होंगे।" और इंस्टीट्यूशनल सेफगार्ड्स में आ गए लीगल मेजर्स, कॉन्स्टिट्यूशनल मेजर्स — ये चीज़ें। तो डॉ. अंबेडकर का तरीक़ा, गांधी जी के तरीक़े की तुलना में पहले ही ज़्यादा रिवॉल्यूशनरी था। और इस हद तक रिवॉल्यूशनरी था कि जब पाया उन्होंने कि जो हिन्दू धर्म है, उसमें सुधार होता दिखाई दे नहीं रहा है, तो फिर उन्होंने कह दिया कि इसको त्याग ही दो। अगर ये सुधर नहीं सकते — सुधारने की कोशिश उन्होंने बहुत करी, बोले अगर सुधर नहीं सकते तो फिर अपना यहाँ पर शोषण कराने से कोई लाभ नहीं है।

अब इस बात के लिए उस समय के जो और लोग थे, जो जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे थे, इसके लिए वो तैयार नहीं होते। गांधी जी कभी सहमत नहीं थे, तो डॉ. अंबेडकर का तरीक़ा रिवॉल्यूशनरी तो था ही अपने आप में। और उन्होंने जिन कॉन्स्टिट्यूशनल और लीगल सेफगार्ड्स की बात करी। उसके अच्छे परिणाम, उसके फल-फूल आज भारत की एक बहुत बड़ी आबादी तक पहुँच भी रहे हैं, हम जानते हैं।

तो आपने पूछा कि क्या सही था? अगर डॉ. अंबेडकर के तरीक़े सही नहीं होते, तो शायद आज हम लोग यहाँ बैठकर बात नहीं कर रहे होते। यहाँ पर हम लोग बैठे हुए हैं, हम में से ज़्यादातर कोई बहुत प्रिविलेज्ड बैकग्राउंड से तो आते नहीं हैं। आज से पचास साल पहले की जो स्थिति थी, ठीक है? और विशेषकर जो लड़कियाँ, महिलाएँ यहाँ बैठी हुई हैं — जो स्थिति थी — उसमें ये कल्पना करना भी मुश्किल हो जाता कि ऐसे कोई बातचीत हो पा रही है। तो उनका तरीक़ा सही तो निश्चित रूप से था। हमें आर्थिक प्रगति देखने को मिल रही है, हमें बौद्धिक प्रगति देखने को मिल रही है, हमें गरिमा और आत्मविश्वास में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।

आप किसी भी सूचकांक पर, जो ह्यूमन डेवलपमेंट के इंडिकेटर्स होते हैं, देख लें तो आप यही पाओगे कि जिन वर्गों के लिए डॉ. अंबेडकर ने संघर्ष करा, वो आज आज़ादी की तुलना में बहुत बेहतर हालत में हैं। तो सही तो था ही तरीक़ा, ठीक है? अब प्रश्न ये आता है कि क्या पर्याप्त था? और उसके लिए हमें ये पूछना पड़ेगा कि क्या भारत से जातिगत भेदभाव मिट गया? क्योंकि ये सब जो चला करता था — छाया नहीं पड़नी चाहिए, साथ में खा-पी नहीं सकते हैं, छुआछूत — इसका विरोध तो इतने लोगों ने करा है कि ये बात गलत है…ये बात गलत है।

डॉ. अंबेडकर उनमें अग्रणी हैं, और उनके साथ और भी बहुत बड़े-बड़े नाम हैं। असल में कोई भी आदमी जो बिल्कुल ही दिमाग से सिरफिरा न हो गया हो, वो समर्थन तो कर नहीं सकता है जातिगत कुरीतियों का। तो विरोध तो सभी ने करा, और करेंगे भी। और ऐसा भी नहीं कि सब जो विरोध कर रहे थे, वो कोई नाटक कर रहे थे या बस ऊपर-ऊपर की बात कर रहे थे। ज़्यादातर लोगों का जो चल रहा था और अभी भी चल रहा है कुछ हद तक, वो दिल से बुरा लगा। तो विरोध तो सबने करा, लेकिन विरोध के बाद भी आज हम पहुँचे कहाँ तक हैं — इस प्रश्न का उत्तर बताइएगा।

कि जो सिर्फ़ लीगल इंस्टीट्यूशनल, कॉन्स्टिट्यूशनल तरीक़े होते हैं, वो पर्याप्त (सफ़िशिएंट) होते हैं कि नहीं होते हैं? ये तो पक्का है कि वो ज़रूरी होते हैं, लेकिन "नेसेसरी" होना और "सफ़िशिएंट" होना — ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। ये पक्का है कि जितने आपको विधि से, कानून से सेफगार्ड्स मिले, मदद मिली, सहायता, प्रोत्साहन मिला — उसके बिना तो काम चलना ही नहीं था, ये तो पक्का है। लेकिन हम ये पूछना चाहते हैं कि आज जैसा काम चल रहा है, हम क्या उतने भर से संतुष्ट हैं? क्या भारत से जाति के आधार पर भेदभाव, या लिंग के आधार पर — क्या वो मिट पाया है? कितने साल हो गए आज़ादी के?

श्रोता: 75

आचार्य प्रशांत: और जाति के ख़िलाफ़ चेतना उठनी शुरू हुई थी, उस घटना के कितने साल बीत चुके हैं? जब पहली बार देश में किसी को, बहुत छोटे से एक वर्ग को, कुछ चंद गिने-चुने लोगों को ये बात समझ में आनी शुरू हुई थी कि भाई, ये सब चला आ रहा है अतीत से लेकिन ये ठीक नहीं है। ठीक तो छोड़ दो, इनमें गहरा अत्याचार है — उस बात को कितने साल बीत चुके हैं?

श्रोता: 100-200 साल।

आचार्य प्रशांत: 150 साल, कम से कम 150 साल। आप 200 साल ज़्यादा सही बोल रहे हो, 200 — सही बोला। जब आप बात करोगे महात्मा फुले की, तो आपको... लेकिन आज भी एक विचित्र किस्म की स्थिति आप भारत में पाते हो कि नहीं पाते हो? तो मानें कि जो कुछ हुआ है, वो पर्याप्त नहीं है। हम उन महापुरुषों को नमन करते हैं जिन्होंने भारत से इस चीज़ को हटाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया, और वो पूरी एक श्रृंखला रही है, ठीक है? हम उनके प्रयासों का पूरा सम्मान करते हैं, और उनके प्रयासों के फलस्वरूप ही हम कह रहे हैं कि आज हम लोग ऐसे बैठकर के बात कर पा रहे हैं। लेकिन हमें ये भी देखना होगा कि ये जो कीचड़ है, ये धुला नहीं है अभी। क्यों नहीं धुला है?

गांधी जी उसको धोना चाहते थे नैतिकता से। वो कहते थे — तुम्हारे मन में अपने पिछड़े हुए भाई-बहनों के लिए करुणा होनी चाहिए तो सत्य, अहिंसा, प्रेम — इनकी बात करा करते थे। क्या उससे बात बन पाई? नहीं बन पाई, उतना पर्याप्त नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ? क्योंकि आपने तो कह दिया कि सत्य ये है कि इंसान और इंसान बराबर होता है। सत्य ये है कि एक ही ईश्वर ने सबको बनाया है, तो सब उसी के बच्चे हैं, तो "हरिजन" हैं इस अर्थ में। आपने कह तो दिया और ऊपर-ऊपर से हो सकता है कि मैं मान भी लूँ। पर भीतर मेरे कुछ और ही पुरानी मान्यताएँ बैठी हैं, जो बहुत गहरी जड़ लिए हुए हैं।

तो मैं आपकी बात मानूँगा अभी, मेरे सामने महात्मा गांधी खड़े हुए हैं, कुछ बात बोल रहे हैं — उनके व्यक्तित्व का इतना प्रभाव होगा और उनकी बात जो है, नैतिक वजन इतना रखती है कि मैं मान लूँगा। ऊपर-ऊपर से मान लूँगा, लेकिन भीतरी सफ़ाई तो मेरी नहीं हो पाई ना। तो ये यहाँ-वहाँ पर बाधा आ गई।

डॉ. अंबेडकर ने ज़्यादा गहराई से भारतीय समाज को समझा था। जिनको "अनटचेबल" कहा जाता था, वहीं से आते थे, उन्हीं के बीच में उठे-बैठे थे, खाते-पीते थे और उन्हीं की सेवा को अपना जीवन समर्पित करा था। तो ज़्यादा बारीकी से, ज़्यादा सूक्ष्मता से समझते थे कि बात क्या है। और जैसे किसी भी व्यक्ति को, जिसके दिल में दर्द लगता है, वो चाहेगा ना कि जल्दी से जल्दी उपचार हो जाए। तो उन्होंने कहा कि जल्दी से जल्दी उपचार हो। और उसका तरीक़ा ये है कि पहले उन्होंने बात करी सेपरेट इलेक्टोरेट्स की। फिर उन्होंने कहा कि नहीं, हिंदुओं से अलग ही गिनो। अंग्रेज़ों के सामने भी जाकर ये बात करी, आज़ादी से पहले भी।

फिर उन्होंने तमाम तरीक़े के आरक्षण की बात करी। फिर उन्होंने संगठित होने पर और शिक्षा पर बहुत ज़ोर दिया, ये सब उन्होंने करा। और फिर अंत में, मृत्यु से बस दो माह पहले उन्होंने कहा — धर्मांतरण। वो ये सब कर रहे थे, ये क्यों कर रहे हैं? क्योंकि आसपास जो देख रहे हैं, उनको बुरा लग रहा है। तो कह रहे हैं कि जल्दी से स्थिति बदलनी चाहिए, जल्दी से हालत बदलनी चाहिए, लेकिन जल्दी से हालत बदल तो नहीं पाई। बदली है, पर उतनी नहीं बदली है जितना हम चाहें। ठीक है ना?

वास्तव में, हालत अगर पूरी तरह बदल गई होती तो हमें आज ऐसे बात करने की ज़रूरत भी ना होती — सोचिएगा, है ना? अगर हालत सचमुच बदल गए होते पूरे तरीक़े से, तो सब भेदभाव मिट गए होते। ना कोई इस जाति, इस वर्ण का होता, ना उसका होता, ना उसका होता। तो हम सब मौज कर रहे होते, और इस बैठक की भी कोई ज़रूरत होती नहीं। है ना? पर वो नहीं मिटा। क्यों नहीं मिटा? क्योंकि गांधी जी कहते थे कि नैतिकता के बल से मिटाएँगे। डॉ. अंबेडकर ने कहा — कानून के बल से मिटाएँगे।

अब कानून के बल से आप उतनी बातें तो मान लोगे, जितना कानून आपके लिए आवश्यक या अनिवार्य करता है। समझे? कानून आपके लिए अनिवार्य कर देता है — उदाहरण के लिए कि दलित वर्ग से मैं सरकारी नौकरी में हूँ। दलित वर्ग से अगर कोई मेरा बॉस बन गया, तो मुझे उसके आदेश मानने पड़ेंगे। मानने पड़ेंगे ना? और नहीं मानूँगा तो मेरी नौकरी जाएगी। तो उतना तो मैं करूँगा, क्योंकि कानूनी बात है भाई। ठीक है?

कानून ने कह दिया कि इतनी पोजीशन्स हैं, इतनी सीटें खाली हैं — इतनी सीटें खाली हैं तो इसमें हक़ बनता है इतने लोगों का। यहाँ पर आरक्षण दे दो। ऐसे-ऐसे तो आरक्षण दे दिया जाएगा कानूनी तरीक़े से, ये सब हो जाएगा। और उससे तरक्की भी आएगी, उससे आत्म-सम्मान भी बढ़ेगा बहुत कुछ होगा। लेकिन एक चीज़ फँसी रह जाएगी और लगभग वही चीज़ जो गांधी जी के तरीक़ों में फँसी रह जाती है। कौन सी चीज़ फँसी रह जाएगी?

श्रोता: मन।

आचार्य प्रशांत: प्रेम तो नहीं आ जाएगा ना। असमानता का, भेदभाव का, ऊँच-नीच का जो कांटा यहाँ (मन) घुसा हुआ है, जो विषवृक्ष है, जिसने यहाँ पर जड़ें डाल रखी हैं — वो जड़ें तो नहीं उखड़ गई ना? तो वो जड़ें अभी भी मौजूद हैं। बात आ रही है समझ में? और वो जड़ें तभी हटेंगी जब हमें समझ में ही आ जाए — बिल्कुल गहराई से हम जान लें कि ये जो पूरी बात ही है, पूरा कांसेप्ट ही है कि कोई ऊपर हो सकता है, कोई नीचे हो सकता है, किसी के कर्तव्य, उसका पूरा जीवन उसके जन्म से ही निर्धारित किए जा सकते हैं — ये बात ही मूर्खता की है। और जब हम में सच्चाई के लिए इतना आदर भी आ जाए कि मैं कहूँ कि — "मुझे अगर एक घर में पैदा होने के कारण कुछ प्रिविलेज़ेस मिल रही हैं, तो मुझे नहीं लेनी। ये बात मेरी गरिमा के ख़िलाफ़ है।"

और इसी तरीक़े से, दूसरा अगर एक दूसरे घर में, दूसरी बस्ती में, दूसरे मोहल्ले में, दूसरी जाति में पैदा हुआ है और इस कारण उसको कुछ विरोध, कुछ बाधाएँ, कुछ दुस्वारियाँ झेलनी पड़ रही हैं — तो मैं ये भी नहीं होने दूँगा। ये बात भी मेरी गरिमा के ख़िलाफ़ है। जब हम ऐसे हो जाएँगे, तब हम कह सकते हैं कि स्थिति पर्याप्त रूप से बदल गई। बात समझ रहे हो? जिस दिन जातिगत आइडेंटिफिकेशन ही बंद कर दे इंसान — आप उस दिन कहोगे ना कि स्थिति बदल गई। एकदम ही बदल गई।**

अन्यथा अभी हालत ये है कि वो जो डिवीज़ंस हैं, भेद हैं — वो तो बने हुए हैं। हम कह रहे हैं कि एक वर्ग ये है (उदाहरण के लिए एक पानी का ग्लास) और एक वर्ग ये है (उदाहरण के लिए दूसरा पानी का ग्लास) — हैव्स एंड हैव नॉट्स। हम कह रहे हैं कि पहले ऐसा था। माने ऐसा था — माने क्या? एक बहुत ऊपर है और एक बहुत नीचे है, और अब हम क्या कर रहे हैं?

श्रोता: ईक्वल।

आचार्य प्रशांत: अब हम ये करने की कोशिश कर रहे हैं। पर ये तो नहीं हो पा रहा ना। बात समझ में आ रही है? है तो अभी भी दोनों अलग-अलग ही ना। और जहाँ ये अलगाव होता है, ये डुअलिटी होती है, ये डिसोनेंस होता है — वहाँ फिर कनफ्लिक्ट भी होती ही है। बात आ रही है समझ में? वहाँ कनफ्लिक्ट भी होती है। इन दोनों को अगर हमने वास्तव में एक देखा होता, तो ये दो अलग-अलग कैसे रह जाते? ये (पानी का ग्लास) शरीर है और ये (दूसरा पानी का ग्लास) शरीर के भीतर की सामग्री है। तुम बताओ, कोई फ़र्क़ दिख रहा है? कोई फ़र्क़ है?

उसी मिट्टी से हर कोई यहाँ उठा है — जिस मिट्टी से तुम उठे हो, मैं उठा हूँ। और उसी मिट्टी में वापस भी चले जाना है, तो फ़र्क़ क्या है इन दोनों में? लेकिन हमने फ़र्क़ खड़ा कर रखा है। और जब तक इंसान के मन से वो फ़र्क़ हम हटा नहीं देते — तब तक बात पर्याप्त रूप से बनी नहीं है।

डॉ. अंबेडकर ने कहा — "साहब, ये इंसान का दिल बदलने का वक़्त हमारे पास नहीं है। यहाँ तो लोग हैं जो भूखों मर रहे हैं, यहाँ लोग हैं जिन्हें शिक्षा नहीं मिल रही है, जिनके पास ज़मीन नहीं है, जिनको दुकान तक खोलने का हक़ नहीं है, जिन्हें कोई नौकरी नहीं मिल सकती, जो फौज में भी जाने से वंचित कर दिए गए हैं।" फिर जब प्रथम विश्व युद्ध हो गया, उसके बाद अंग्रेजों ने दोबारा कहा कि — "हाँ ठीक है, महार वग़ैरह लोग फौज में आ सकते हैं।"

बोले — अभी ये वक़्त नहीं है कि हम धीरे-धीरे करके लोगों का दिल बदलने का काम करें। और उनकी बात बिल्कुल ठीक थी। हम कह रहे हैं, ठीक थी। ठीक ना होती तो हमने जो असमानताओं को कम होते देखा है, वो हमने नहीं कम होते नहीं देखा होता। लेकिन अब वक़्त आ गया है कि एक कदम और लिया जाए और वो कदम ये है कि — जो जड़ ही थी, जहाँ से ये सब प्रपंच, ये अन्याय शुरू हुआ, हम उसको ही क्यों ना मिटा दें?

ये सब कहाँ से शुरू होता है? ये सब शुरू होता है धर्म के नाम पर। इसका जस्टिफिकेशन यही तो दिया जाता है ना कि — "साहब, ये सब कुछ तो शास्त्रों में लिखा हुआ है। "क्यों ना हम सीधे वहीं पर हमला बोलें, जहाँ हमें कहा जाता है कि — "ये सब लिखा हुआ है।" क्यों ना हम वहाँ जाकर के पूछें — "बताओ अच्छा, कहाँ लिखा हुआ है? और जहाँ लिखा हुआ है, वो जगह फिर शास्त्र कहलाने के लायक भी है क्या?" और शास्त्र की परिभाषा क्या होती है? हम क्यों ना ये पूछें? क्योंकि अगर इस भेदभाव की शुरुआत वहाँ है, तो अंत भी फिर वहीं करना पड़ेगा ना।

देखिए, एक बात समझिए — डॉ. अंबेडकर ने भी ये नहीं कहा था कि "हिंदू धर्म छोड़ कर के एथीस्ट हो जाओ, एग्नॉस्टिक हो जाओ, नास्तिक हो जाओ।" उनके साफ़ वक्तव्य हैं — जहाँ वो मनुष्य के लिए धर्म की अपरिहार्यता पर ज़ोर देते हैं। कहते हैं, "धर्म तो चाहिए।" और धर्मों में जो धर्म उनको समता-मूलक लगा, बहुत उन्होंने प्रयोग किए, बहुत खोजा, बहुत देखा। जो धर्म उनको समता-मूलक दिखाई दिया — बौद्ध धर्म, उन्होंने उसको चुना। पर उन्होंने ये भी साफ़ कहा कि "धर्म तो चाहिए होगा।" ठीक है? तो जब धर्म चाहिए ही है, तो हम जाकर के धर्म से सवाल-जवाब क्यों नहीं करते हैं? धर्म को छोड़ तो सकते नहीं — चाहिए है, तो धर्म के साथ बंधे हुए, फंसे हुए तो हैं ही हम।

मैं कहा करता हूँ, "मैन इज़ अ रिलीजियस ऐनिमल।" मनुष्य अकेला प्राणी है जिसे धर्म चाहिए क्योंकि वो अकेला है जिसके सामने प्रश्न उठता है कि — "मैं हूँ कौन?" और "मैं जियूँ कैसे?"

और इसी सवाल को संबोधित करने को धर्म कहते हैं, तो धर्म तो चाहिए। लेकिन धर्म के ही नाम पर शोषण हुआ है, तो क्यों ना हम जाकर के धर्मग्रंथों से ही बात करें और देखें कि "बताओ कहाँ पर ये भेदभाव है? इसकी जड़ कहाँ पर है?" और हम पूछें कि "जिन धर्मग्रंथों में शोषण की बात है, हम उनको धर्मग्रंथ फिर कह भी कैसे सकते हैं?" और क्या धर्म इस शोषण की व्यवस्था के अतिरिक्त और कुछ नहीं है?

जब हम कहते हैं कि — हिंदू धर्म में जातिगत भेदभाव बड़ा ज़बरदस्त रहा है। जितना पूरे इतिहास में, पूरी दुनिया में कहीं भी देखने को नहीं मिला। ठीक है? जब हम ऐसा कहते हैं, तो हमें आज ये सवाल भी पूछना चाहिए कि "क्या हिंदू धर्म शोषण की इस व्यवस्था के अलावा कुछ नहीं है?" और जो शोषण की व्यवस्था है, क्या ये धार्मिक कहलाने योग्य भी है? कहीं ऐसा तो नहीं कि मामला कुछ और हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि धर्म चीज़ ही कुछ और हो? और जिनके न्यस्त स्वार्थ थे, उन्होंने धर्म के नाम पर हमें कुछ और परोस दिया हो? बात समझ में आ रही है?

मान्यताओं को तो धर्म नहीं कह सकते ना। हम कोई चीज़ मानते चले आ रहे हैं, वो धर्म नहीं हो जाती। कुछ लोगों ने अपनी बात कह दी, उसको भी हम धर्म नहीं कह सकते जो कि किसी समय पर कही गई थी। धर्म का मतलब होता है — मनुष्य के भीतर जो सनातन बेचैनी है, द इटरनल रेस्टलेसनेस उसको संबोधित करने वाला एक टाइमलेस सोल्यूशन।

हमारे भीतर जो बेचैनी है, वो भी हज़ारों साल पुरानी है और आगे भी रहेगी। और इंसान का बच्चा पैदा ही ऐसे होता है। जानवरों के बच्चे वैसा नहीं पैदा होते। और इंसान का बच्चा चाहे भारत में हो, अफ्रीका में हो, अमेरिका में हो — कहीं भी — वो पैदा ऐसे ही होता है। बेचैन। देखा है, ऐसे हाथ-पाँव फेंकता रहता है। फिर हमें उसे इतनी सारी शिक्षा देनी पड़ती है। जानवरों के बच्चों को कोई शिक्षा नहीं देनी पड़ती।

मनुष्य के बच्चे के भीतर जिज्ञासा है, कौतूहल है। उसे समझना है — ये सब चल क्या रहा है? ये ब्रह्मांड है, इसमें मेरा स्थान क्या है? मैं आ कहाँ से गया? मैं हूँ कौन? मैं जियूँ कैसे? कौन सा कर्म मेरे लिए ठीक है? ज़िन्दगी को किधर लेकर के जाऊँ? इन सब बातों का जो जवाब दे, उसको धर्म बोलते हैं। जहाँ मान्यताएँ परोसी जा रही हों, बिलीफ़्स परोसे जा रहे हों, कुछ भी और करा जा रहा हो — ज़िन्दगी के मूलभूत प्रश्नों के उत्तर देने के अलावा जहाँ कोई भी और बात करी जा रही हो — क्या हम उसको धर्म बोल भी सकते हैं?

तो धर्म के नाम पर जो प्रपंच चल रहा है, जब आप उसको पूरे तरीक़े से सचमुच अस्वीकार कर दोगे, तब समझिए कि आपने जातिगत भेदभाव को भी अस्वीकार किया। क्योंकि ये भेदभाव यूँही नहीं आ गया है। यूँही आ गया होता तो कब का मिट गया होता।

ये बना इसलिए हुआ है। ये आज के युग में भी, भले ही सूक्ष्म तरीक़े से बचा, इसलिए हुआ है क्योंकि इसको धर्म का नाम मिला हुआ है, वरना ये बचा नहीं रह सकता था। ये इतनी अतार्किक, इलॉजिकल बात है, इतनी अजीब बात है, कि ये चीज़ अपने आप कब की मिट गई होती, इतिहास की ख़ाक बन गई होती पर ये बची हुई है। ये किसका नाम लेकर बची हुई है? धर्म के नाम लेकर बची हुई है। तो हम सीधे धर्म से बात करें न, वो बातचीत हो नहीं पाई।

असल में डॉ. अंबेडकर ने बातचीत करने की कोशिश करी थी। पर उनकी वो कोशिश असफल कर दी गई। जब उनकी वो कोशिश असफल कर दी गई, तो उन्होंने कहा द हिंदू रिलिजन इज़ इनकैपेबल ऑफ स्ट्रक्चरल रिफॉर्म। बोले — ये सुधरने वाले लोग नहीं हैं। उन्होंने कहा, ये जो जातिगत भेदभाव है ये तो हिंदू धर्म के बिल्कुल केंद्र में बैठ गया है। तो रिफॉर्म की गुंजाइश है नहीं। लेकिन अगर रिफॉर्म की गुंजाइश नहीं है, तो आज हम फँस गए फिर।

हमने हर तरीक़े से समानता ला भी दी — आर्थिक समानता ले आ दी, क़ानूनी समानता ले आ दी । लेकिन उसके बाद भी ये भेद तो बचा ही रह गया न। "तुम अलग, हम अलग, तुम्हारा घर अलग, हमारा घर अलग।" और कई बार तो "तुम्हारे मोहल्ले अलग, हमारा मोहल्ला अलग।" तुम्हारी पॉलिटिकल पार्टी भी अलग, वो भी अलग। तुम्हारे सरोकार भी अलग, हमारे सरोकार भी अलग। तुम्हारी राजनीति, सब कुछ हमारा अलग। ये तो भेदभाव बचा ही रह गया।

ये भी बिल्कुल हो सकता है कि कल को जो ऑपर्च्युनिटी में इनइक्वैलिटी है — पूरी मिट जाए। जो इनकम में इनइक्वैलिटी है — पूरी मिट जाए। जो ओनरशिप और वेल्थ। में इनइक्वैलिटी है — वो भी पूरी मिट जाए। ये सब हो सकता है, पूरी तरीक़े से मिट जाए। हो सकता है पॉलिटिकल रिप्रेज़ेंटेशन में भी जो इनइक्वैलिटी है — वो पूरी तरह मिट जाए। कल ये बिल्कुल हो सकता है। लेकिन उसके बाद भी ये (दोनों पानी के ग्लास की तरफ़ इंगित करते हुए) तो बचा ही रह जाएगा। अब क्या करोगे?

क्या ये स्थिति — मैं आपसे पूछ रहा हूँ — आपको पसंद है? दिल ही दिल में परायापन, पसंद है क्या? किसी को भी पसंद है? ये स्थिति किसी को भी चाहिए क्या? और अगर ये स्थिति नहीं चाहिए — तो हमें वहीं जाकर इस स्थिति को चुनौती देनी पड़ेगी जहाँ से ये स्थिति शुरू हुई थी। बात आ रही है समझ में? नहीं तो बाक़ी सब कुछ कर लो, तो भी एक बंटवारा तो बना ही रह जाएगा। और जहाँ वो बंटवारा है, वहाँ दोनों पक्षों के लिए दुख है, एक संघर्ष की स्थिति रहती है।

देखिए, धर्म की जो परिभाषा ही है न उसमें बड़ी गड़बड़ हो गई है। हमें धर्म का मतलब बता दिया गया है — कैसे खाना है, कैसे पीना है, पूजा-हवन कैसे करने हैं, मंदिर कैसे बनाने हैं, किसके साथ शादी-ब्याह करना है, नहीं करना है, सोना कैसे है, महिलाओं के कर्तव्य क्या होते हैं, पुरुष का क्या कर्तव्य है, चार वर्ण हैं — उनके क्या कर्तव्य हैं, और जो चारों वर्णों से बाहर हैं उनका क्या हिसाब है? ये सब हमने बना दिया है कि ये सब धर्म है। धर्म ये नहीं होता। धर्म एक पूरे तरीक़े से निजी चीज़ होता है। थोड़ी बात अभी थोड़ी देर पहले हमने करी थी कि —

इंसान का बच्चा पैदा ही होता है एक बेचैनी के साथ, उस बेचैनी को संबोधित करने का नाम धर्म है। और धर्म में अगर इसके अलावा कोई बात हो रही हो, तो बकवास है।

धर्म अगर आपको ये बता रहा है कि आप कपड़े कौन से पहनोगे, आप सीधे हाथ से खाओगे, उल्टे हाथ से खाओगे — तो वो धर्म नहीं है, वो रिचुअल्स का बंडल है। वो बिलीफ़ का एक सिस्टम है और रिचुअल्स और बिलीफ़्स के साथ बात ये है कि ये तो हर शताब्दी में बदलते रहते हैं। शताब्दी ज़्यादा लंबा समय है, अब तो हर 10 साल में बदलते हैं, साहब। फैशन की तरह।

इसी तरीक़े से धर्म को संस्कृति — यानी कल्चर — के साथ भी मिलाकर नहीं देखा जाना चाहिए। वो भी तो लगातार बदलता ही रहता है। हमारे माँ-बाप के समय में जो कल्चर चल रहा था, आज चल रहा है क्या? तो वो भी तो बदल ही गया। धर्म की पहचान होती है कि वो एक ऐसी चीज़ को एड्रेस करता है जो इटरनल है और इटरनल से मेरा आशय गॉड वग़ैरह नहीं है। इटरनल से मेरा आशय — इंसान।

इंसान के लिए ये धर्म है न। डायनासोर के लिए तो धर्म होता नहीं। या कभी सुना है कि केंचुए का ये धर्म है, छिपकली का ये धर्म है, हाथी का ये धर्म है? ऐसा तो कुछ होता नहीं। धर्म की सारी बात किसके लिए है? इंसान के लिए है। क्योंकि हमारी बनावट में, हमारी बनावट में कुछ ऐसा है जो पूर्णता माँगता है। वो पूर्णता पैसे से नहीं मिल पाती, ज्ञान से नहीं मिल पाती, कंज़म्प्शन से नहीं मिल पाती। कोई आपको आदर-सम्मान दे, उससे भी नहीं मिल पाती। कुछ और है जो हमें चाहिए। वो और क्या है जो हमें चाहिए? हमारी जो सबसे मौलिक खोज है, वो चीज़ क्या है — इस सवाल का जवाब देने का नाम धर्म होता है।

इंसान को इंसान से बाँटने का नाम धर्म होता ही नहीं। तो अगर हम इसी बात को संबोधित करें और समाज में धर्म की जो परिभाषा ही है, उसको बदल दें — तभी जाकर के वो काम हो पाएगा जिस काम की शुरुआत आज से दो शताब्दियों पहले हुई थी, पर वो काम पड़ा अभी तक अधूरा है। देखो, और वो काम नहीं करोगे तो नतीजा क्या निकलेगा?

वो काम नहीं करोगे तो नतीजा ये निकलेगा कि मुसलमानों में भी जातियाँ हैं, सिखों में भी जातियाँ हैं, और बौद्धों में भी भेदभाव है। इंसान फिर धर्म के नाम पर अपने संकीर्ण स्वार्थों को फैला देता है। और जो संकीर्ण स्वार्थ होते हैं, वे थोड़े सम्माननीय हो जाएँ, तो उनको ये भी नहीं कहता कि “ये तो मेरे स्वार्थ हैं” — वो कहता है, “मेरा स्वार्थ नहीं है, ये तो धर्म है।” आ रही है बात समझ में?

रीलिजन को डिक्लटर करना पड़ेगा। जितना वहाँ पर कूड़ा-कचरा पड़ा हुआ है, जितनी वहाँ इररिलेवेंट चीज़ें पड़ी हुई हैं, उन्हें हटाना होगा। और केवल वही चीज़ें बचानी होंगी जो इंसान के लिए बहुत ज़रूरी हैं। और जो इंसान के लिए ज़रूरी हैं, आज उसको बचाना किसी भी और युग की अपेक्षा ज़्यादा ज़रूरी है। क्योंकि आपके सामने आज जो सबसे बड़ी समस्याएँ खड़ी हैं, उनका कोई टेक्नोलॉजिकल या इकोनॉमिक सोल्यूशन नहीं है।

जैसे कि क्लाइमेट चेंज — उसका सिर्फ़ एक स्पिरिचुअल सोल्यूशन हो सकता है। लेकिन धर्म का जो स्पिरिचुअल सेंटर होता है, वो भी बेचारा दबा पड़ा है बाकी कचरे के नीचे। तो बाकी सब कचरा हटाओ, तो धर्म का केंद्र थोड़ा उभरकर सामने आए, प्रकट हो। और वो जो धर्म का केंद्र है, वो बड़ी कीमती चीज़ है। उसके बिना आज की जो समस्याएँ हैं, आप उनका सामना नहीं कर सकते।

वह तो है ही कि उसके बिना जो हमारी दिली बेचैनी है, वे भी नहीं हटेगी। लेकिन उसके बिना बाहर की भी जो समस्याएँ हैं, वो भी नहीं हल होने वाली। दो तरफ़ नुकसान हो रहा है — धर्म के नाम पर जितने ये प्रपंच और रस्मो-रिवाज़ और प्रथा और परंपरा और नालायकियाँ चल रही हैं, उससे दो तरफ़ा नुकसान है। पहला, जो चल रहा है वो नुकसान दे रहा है। दूसरा, ये सब जो कचरा है, इसने अपने नीचे हीरे को बिल्कुल दबा दिया है, छुपा दिया है।

तो हम उस हीरे से भी वंचित रह जा रहे हैं, ये दो तरफ़ा नुकसान है। तो सफ़ाई करनी पड़ेगी और तब जाकर के हम कह पाएँगे कि वो जो पूरा काम था जो शुरू हुआ था, वो अब अपने समापन को पा रहा है, अपने निष्कर्ष को पा रहा है, नहीं तो अभी काम अधूरा है। काम काफ़ी आगे तक बढ़ा है, यात्रा दूर तक आई है, पर अभी अधूरी है।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू।

प्रश्नकर्ता: सर, धर्म हमें चाहिए क्योंकि सफ़रिंग हो रही है। तो हमारे अंदर ऐसा और क्या दूसरी चीज़ है, जिसकी वजह से सफ़रिंग के बावजूद हम किसी और चीज़ को धर्म की तरह एक्सेप्ट कर ले रहे हैं? मतलब — चल तो तभी रहा है, क्योंकि हम एक्सेप्ट कर रहे हैं।

आचार्य प्रशांत: हाँ, तो जानने वालों ने कहा है कि आपके भीतर दो बैठे हुए हैं। एक, जो बहुत-बहुत लंबे समय से पहले… वो एक तालाब में था — छोटा-सा। फिर और बड़ा हुआ तो जंगल में गया। फिर वो और जंगलों की यात्रा करता रहा, घूमता रहा, पूरी दुनिया में फैल गया। एक वो है — वो बडा पुराना जानवर है, वो करोड़ों नहीं, अरबों साल पुराना जानवर है। चार बिलियन साल हो गए ना, जब पृथ्वी पर जीवन की पहली, बिल्कुल छोटी-सी शुरुआत हुई थी — तो उतना पुराना जानवर है। और एक आप हो — चैतन्य मनुष्य। जो अभी ताज़ा-ताज़ा उस जंगल से बाहर निकल के आए हो, सिर्फ़ दस हज़ार साल पहले।

हमारे भीतर दोनों बैठे हुए हैं: वो जानवर जो हमारे शरीर में बैठा हुआ है, और वो चेतना जो नवजात है, नई-नई है। और इन दोनों के बीच क्या चलती रहती है? रस्साकशी चलती रहती है। ये आपने अपने रोज़मर्रा के जीवन में भी अनुभव किया है कि नहीं किया है? आपको अच्छे से पता होता है — चेतना के तौर पर, कॉन्शसनेस के तौर पर — कि आपको पढ़ाई करनी है, आपको पढ़ाई करनी है। और ये जानवर क्या बोलता है? क्योंकि इसने पिछले कई अरब सालों से सिर्फ़ क्या किया था? खाया था। आज भी जंगल में क्या होता है? खाओ, सोओ, और अपनी प्रजाति आगे बढ़ाओ।

इसके अलावा वे कुछ करता है? खाना, सोना, सेक्स — बस, कुछ नहीं। अनुभव किया है आपने? आप कोई बहुत ऊँचा काम करना चाहते हैं। कोई पेपर लिख रहे हैं, आपको सबमिट करना है। आपने तय किया है कि सुबह जॉगिंग करने जाएँगे — कुछ छोटी-सी बात है। सुबह आपकी ट्रेन या फ़्लाइट हो सकती है और वो जानवर क्या बोल रहा है?

श्रोता: सोने दो।

आचार्य प्रशांत: इतना ही नहीं, आपने अलार्म भी लगा दिया — कि जानवर का कान एकदम गुर्रर्रर्र, तो अलार्म (बंद करना जैसे इशारा)। तो हमारे भीतर दोनों बैठे हुए हैं, आध्यात्मिक तौर पर इन्हें कह देते हैं — आदत और प्रेम। जिसे मैंने अभी कहा ना — जानवर और चेतना — उसको कह देते हैं आदत और प्रेम। तो इंसान का जीवन इन दोनों के बीच का संघर्ष है। एक आपकी आदिम आदत है — प्रिमिटिव, एंशिएंट हैबिट। द ऐशिएंट हैबिट इज़ टू जस्ट ईट, स्लिप, रिप्रोड्यूस, एंड फ़रदर योर जिन्स।

और प्रेम किससे है? प्रेम है सच्चाई के प्रति, उड़ान के प्रति “मैं कुछ बेहतर हो पाऊँ।” जानवर तो नहीं बेहतर होना चाहता। जानवर तो मिट्टी पर सो जाता है। अब गर्मी बहुत आ गई है, तो देखिएगा जानवर क्या करते हैं — कुत्ते, खरगोश ये सब क्या करेंगे? बल्कि अब तो इन्हें गर्मी बहुत लगेगी, तो जहाँ कीचड़ होगा, वहाँ पानी के मारे थोड़ी ठंडक होती है — वहीं जाकर कीचड़ में लोटेंगे। यह जानवर का काम है। लेकिन हमारे भीतर कोई दूसरा भी बैठा है, जिसको कीचड़ पसंद नहीं है — वो कहता है, “मुझे आसमान चाहिए।” “ आसमान चाहिए।”

लेकिन जीतता 99% मामलों में कौन है? अपने अनुभव से बताइए —

श्रोता: जानवर

आचार्य प्रशांत: जानवर ही जीतता है। तो धर्म इसलिए होता है, ताकि हम उस जानवर को समझ सकें। मारना-वारना नहीं है उसको, दबाना भी नहीं है उसको, समझना है। धर्म होता है ख़ुद को समझने के लिए, ताकि आपकी चेतना उड़ान ले सके। समझ में आ रही है बात? और यही दो कोटियों के लोग होते हैं दुनिया में — एक, वो जो अपने पुराने ढर्रों पर चल रहे हैं इन्हें आप बोल सकते हैं अधार्मिक लोग।

वह पुराने ढर्रे दो तरीक़ों के हो सकते हैं — ये बात बहुत रोचक लगेगी बहुत लोगों को। जो पुराने शारीरिक ढर्रे पर चल रहा है, वो तो अधार्मिक है ही। लेकिन जो पुराने सामाजिक ढर्रे पर भी चल रहा है, वो भी अधार्मिक है।

धर्म किसी ढर्रे का नाम नहीं होता, धर्म जानने का नाम होता है। धर्म इन्क्वायरी का नाम होता है। धर्म जिज्ञासा का नाम होता है, धर्म सवाल पूछने का नाम होता है।

डॉ. अंबेडकर इस अर्थ में बहुत-बहुत गहरे धार्मिक व्यक्ति थे। उन्होंने जो सवाल पूछे, वो कौन पूछ रहा था? उन्होंने जो शोध किया — रिडल्स इन हिन्दूइज़्म — वो कौन कर रहा था? तो बहुत लोग बोलेंगे कि, “साहब, उन्होंने धर्म छोड़ दिया, धर्म तोड़ दिया।” लेकिन जो समझदार हैं, वो कहेंगे — वो बहुत गहरे धार्मिक आदमी थे।

गाँधी जी को हम महात्मा बोलते हैं। लेकिन गाँधी जी नैतिक ज़्यादा थे, मोरल ज़्यादा थे। गाँधी जी ने पोज़िशन ये ली थी कि “वर्ण व्यवस्था तो ठीक है, चलने दो। उसको साफ़ कर दो, रिफ़ाइन कर दो, सुधार कर दो उसका।” डॉ. अंबेडकर ने पूछा — “चले ही क्यों?” जो सवाल पूछे — वो धार्मिक आदमी है। जो पुरानी परिपाटी को ढोता चला आ रहा है — वो तो अधार्मिक है। वो तो अधार्मिक है। बात समझ में आ रही है?

“कुछ भी सिर्फ़ इसलिए ठीक है कि पहले से चल रहा है” — जिसने ऐसा कह दिया, उसे तुरंत बोलो: “वो अधार्मिक है।” भले ही उसने धार्मिकता के कितने भी प्रतीक पहन रखे हों, कुछ भी उसने लगा रखा हो — उसने कहा , “मैंने फलाने तरीक़े का कपड़ा पहन रखा है, माला पहन रखी है, तिलक लगा रखा है...” कुछ भी वो बोले कि, “मैं तो बहुत धार्मिक आदमी हूँ,” और दुनिया के किसी भी हिस्से से आ रहा हो।

लेकिन अगर वो कह रहा है कि “मुझे पुरानी ही बात पकड़ कर रखनी है,” तो ये धार्मिकता नहीं होती। ये तो पशु भी कर लेता है। 5000 साल पहले जो हाथी था और आज जो हाथी है, उनमें कुछ अंतर आया क्या? तो आज का हाथी क्या कर रहा है? बिल्कुल वही, जो 5000 साल पहले का हाथी कर रहा था। तो इसलिए हम कहते हैं कि धर्म नहीं है उसके पास। वे पशु है। आप भी अगर वैसे ही जी रहे हो — जैसे 5000 साल पहले का पूरा खेल था, तो फिर आप धार्मिक नहीं हो, आप पशु हो।

धार्मिक चित्त की निशानी होती है सबसे पहले — जिज्ञासा। उसे मानना है ही नहीं, वो अड़ जाएगा। वो कहेगा — नहीं! नहीं! नहीं! मानने का काम तो मशीन भी कर लेगी। प्रोग्रामिंग तो किसी कंप्यूटर की भी हो जाती है। दूसरों के हिसाब से तो ये पंखा भी चल रहा है। ये पंखा अपने हिसाब से चल रहा है क्या? ये पंखा हमारे हिसाब से चल रहा है। इसका डिज़ाइन किसने किया? हमने। इसको रंग किसने दिया? हमने। बेचता कौन है? हमने। ख़रीदा किसने? हमने। स्विच ऑन किसने किया? स्विच ऑफ़ भी कौन करेगा? एक दिन उसको उतार कर कबाड़ में भी कौन डालेगा? हम कर देंगे।

इसकी अपनी कोई ज़िन्दगी है क्या? जो ऐसे जिए — वो धार्मिक आदमी कैसे हो सकता है? धार्मिक आदमी वो जो कहे “मेरी ज़िन्दगी मेरी होनी चाहिए।” मेरे पास सवाल है, मैं पूछना चाहता हूँ। और इसी धर्म की ओर हमें बढ़ना है। ये धर्म मौजूद है। पर हमने कहा, हीरा किसके नीचे दबा हुआ है?

श्रोता: कचरे।

आचार्य प्रशांत: इतने कचरे के नीचे दबा हुआ है कि दिखाई नहीं देता। हीरे छोटे-छोटे होते हैं, और कचरा कितना हो सकता है? अरे बाबा रे! और वो कचरा उन्होंने नहीं दिया है, जिनसे कभी भी धर्म का उद्गम हुआ — सोर्स है। वो कचरा मालूम है कौन देता है? जिनके हाथों में धर्म पड़ जाता है। ये ओरिजिनल लोग नहीं थे, ये क्रिएटिव लोग नहीं थे। इन्हें दूसरे की चीज़ मिल गई और वो चीज़ इतनी ज़बरदस्त थी कि: पहली बात तो वो इनकी समझ से बाहर की थी। दूसरी बात: अगर समझ भी जाएँ, तो इनकी हिम्मत से बाहर की थी कि उसको जिए।

तो इन्होंने क्या करा? इन्होंने उस चीज़ को डायल्यूट कर दिया, करप्ट कर दिया — कुछ और ही बना दिया। अपनी कहानियाँ जोड़ दीं, अपनी प्रथाएँ, परंपराएँ जोड़ दीं और कह दिया — “ये धर्म है।” और इस पूरे चक्कर में जो असली चीज़ थी, वो गुमनाम हो गई। उसे कोई पूछने वाला नहीं।

ये जो गंदगी है ना — इसे चुनौती देनी पड़ेगी। आप अपने भीतर अंधविश्वास रखे रहो, आपको सवाल पूछने में आज भी अगर हिचक होती हो, डर लगता हो, और आप भी यही कह रहे हो कि: "अब हम पैदा हुए हैं, तो लाइफ़ तो ऐसे ही जीनी है ना — इतने साल ऐसे करना है, फिर ऐसे कर लेना है। फिर ये वाली जॉब करनी है, और क्यों करनी है? क्योंकि बगल वाले भैया ने बता दी!"

और उसके बाद इतने साल में अब तो शादी करनी है, फिर ऐसे करना है, फिर हैप्पी सेटल्ड लाइफ़ होनी चाहिए…,आप ये सब बातें कर रहे हो तो आप भी वही कर रहे हो जो इतने सालों तक — शोषण, शोषक और शोषित — ये खेल चलता रहा। क्योंकि वो खेल भी क्या बोलकर चल रहा था? “हमेशा से यही तो होता आया है।”

और आप भी आज अगर बोल रहे हो कि मुझे वही करना है जो सब अगल-बगल वाले करते हैं — बस वे खेल थोड़ा बदल गया है। तब ये था कि दूसरे को दबा दो, उसके ऊपर चढ़ बैठो, उससे ज़बरदस्ती मज़दूरी कराओ, उससे मैला ढुलवाओ। तब ये था — “उसे पढ़ने मत दो।”

आज वो खेल ये हो सकता है कि — “सब जो आसपास दूसरी चीज़ें कर रहे हैं, मुझे वो करनी हैं।” तो आप आज भी खेल तो पुराना ही चला रहे हो। पुराने और आज के खेल में समानता ये है कि ना पुराने आदमी ने कभी पूछा था कि: “पर ये सब क्यों? किसके लिए? कौन है जो मेरा भाग्यविधाता है? किसने मेरे लिए नियम बना दिए? मेरी ज़िन्दगी है, मैं आज़ाद सवाल तो पूछ सकता हूँ कम से कम! जवाब मिले ना मिले...”

ना उस आदमी ने पूछे थे, आज से 500 साल पहले वाले 2000 साल पहले वाला, ना आज आप पूछ रहे हो। तो फिर बदला क्या? हाँ, बाहर-बाहर से चीज़ें बदल जाएँगी — आर्थिक प्रगति हो जाएगी, नौकरियाँ वग़ैरह दिखाई देंगी कि मिल रही हैं, लोगों के पास गाड़ी आ गई, पैसा आ गया, अंग्रेज़ी बोलना शुरू कर दी, कोई बाहर जाकर एजुकेशन ले रहा है, ये सब आपको दिखाई देगा। ये हो रहा है। पर भीतर ही भीतर बात पुरानी ही रह जाएगी।

एक ज़िन्दगी होती है और उसको अतीत के बहुत सारे वजन के तले जियोगे, तो बस घुटे-घुटे ही मर जाओगे।

अतीत के दो तरह के वज़नों की बात की है हमने:

  1. सबसे बड़ा और पहला वज़न कौन सा है? — ये पाशविक, शारीरिक। और
  2. दूसरा — सामाजिक। ठीक है?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories