वो जो भीतर बैठ के ये भी कह रहा है कि "मैं बर्बाद हो गया," वो बस यही कह रहा है कि जो ऑब्जेक्ट मुझे अच्छा लगता था, मुझे वो नहीं मिला। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसके पास अब कोई ऑब्जेक्ट नहीं है। इसका मतलब ये है कि वो अभी भी कोई और ऑब्जेक्ट पकड़ कर बैठा ही हुआ है। तो सारे दुख की वजह ये नहीं होती कि ऑब्जेक्ट नहीं है। उसकी वजह होती है कि ईगो अभी भी है, डिज़ायर अभी भी है। और "मुझसे कुछ नहीं होगा" ये आईडिया अभी भी है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: जो काम हमारे लिए ज़रूरी होता है, हम उसमें डल हो जाते हैं, लेज़ी हो जाते हैं। मेरे साथ हर बार ऐसा होता है कि मैं उस काम को लेकर बहुत सारे एक्सक्यूज़ देने लगती हूँ। मतलब अहम् को पता होता है कि तुम गलत, मतलब कहीं न कहीं मैं झोल कर रही हूँ। पर फिर मैं कुछ एक्सक्यूज़ दे के अपने आपको समझा भी लेती हूँ, “नहीं, मैं न, अपने लिए नहीं कर रही हूँ। मैं किसी और के लिए कर रही हूँ।” मतलब, वो हर बार ऐसा होता है। ऐसा होता है कि नहीं, मैं देख रही हूँ ख़ुद को, बट फिर से वही गलती करती हूँ और फिर धोखा खाती हूँ ख़ुद से भी।
आचार्य प्रशांत: हर बार होता है न? कई बार होता है।
प्रश्नकर्ता: येस सर।
आचार्य प्रशांत: तो हर बार कुछ नया तो नहीं होता। जैसे पिछली बार कुछ सही था, उसको न करने के लिए कुछ बहाने बनाए। अगली बार फिर कुछ सही था, उसको न करने के लिए कुछ बहाने बनाए। और पिछली बार जो हुआ था, वो याद तो होगा। तभी आप कह रहे हैं कि हर बार होता है, याद तो होगा न।




