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दो सूत्र -अपने प्रति ईमानदारी, अपने प्रति हल्कापन || आचार्य प्रशांत (2016)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: क्या चर्चा कर रहे थे आप लोग आरम्भ में?

प्रश्नकर्ता: मज़बूती और कमज़ोरी – ये द्वैत के दो सिरे हैं और किसी भी एक सिरे पर बैठ कर इन दोनों को समझा नहीं जा सकता है। सर ने ये बात बताई थी, यहाँ से शुरुआत होती है।

फिर मोहित जी (एक श्रोता) अपने जीवन के बारे में कुछ बता रहे थे कि कैसे मज़बूती और कमज़ोरी द्वैत के दो सिरे हैं, उसी तरह से चलते रहना और फिर फिसल जाना और ये जो पूरा इसका चक्रवात है, यह भी द्वैत का ही एक अंग है, तो इससे कैसे बाहर निकला जा सकता है। तो मोहित जी बता रहे थे कि जो इसमें है वो इससे कभी भी बाहर नहीं निकल सकता, अगर मैंने ठीक समझा था।

आचार्य: कहते हैं कि सांड लाल रंग के पीछे भागता है, उत्तेजित हो जाता है। कहानी ही है क्योंकि वस्तुतः वो रंग देख ही नहीं सकता पर कहानी पर ही चलते हैं। तुमने लाल रंग की कमीज़ पहन रखी है और वो उत्तेजित हो रहा है, क्रोध से उफना रहा है। लम्बा-चौड़ा, दौड़ पड़ता है और तुमे जानते हो कि तुम्हारी कमीज़ के लाल रंग के पीछे है, तुम क्या करोगे?

प्र१: कमीज़ उतार देंगे।

आचार्य: कमीज़ उतार दोगे न? यही संसार का और तुम्हारा रिश्ता है। देखो कि संसार किसके पीछे है? देखो कि दुःख किसे है? देखो कि डर किसे है? जिसे है, उसे रहेगा। जब तक लाल रंग है, तब तक सांड रहेगा और वो उसका पीछा करता ही रहेगा। हाँ, तुम्हारे हाथ में ये है कि तुम इस पूरे चक्र से बाहर निकल जाओ। वो खेल चलता रहेगा। अब तुम दूर खड़े हो गए हो, कमीज़ उतार दी तुमने और सांड उस कमीज़ को फाड़ रहा है, उसके चीथड़े कर रहा है, नोंच रहा है। वहाँ जो चलना है चल रहा है, बस तुम उससे?

प्र१: अलग हो गए।

आचार्य: दूर हो गए, बाहर हो गए। वहाँ जो चलना है, वो चलता रहेगा; उसको रोकने की कोशिश मत करना। अगर तुमने ये कोशिश की कि लाल कमीज़ पहने-पहने सांड को रोक लोगे, तो भूल जाओ, नहीं। यह संसार है, यह तुम हो, वहाँ जो चलना है वो चलेगा, तुम उससे अलग हो जाओ, तो ही बच सकते हो। सांड मृत्यु है और कमीज़ शरीर है। मृत्यु शरीर की ओर आकर्षित होगी ही, तुम कुछ नहीं कर पाओगे। भाग नहीं पाओगे, लड़ नहीं पाओगे। तुम इतना ही कर सकते हो कि तुम ज़रा शरीर से अलग हो जाओ।

वहाँ समाज है, उपयोगिता है। समाज पीछा करता है तुम्हारी उपयोगिता का, और वहाँ वो खेल चलेगा ही।

जब तक उपयोगी हो, समाज तुम्हारे पीछे लगा ही रहेगा।

तुम इतना ही कर सकते हो कि ज़रा अनुपयोगी हो जाओ। दे दो उन्हें जो कुछ चाहिए और तुम कोने में खड़े हो जाओ। "अब मैं तुम्हारे किसी काम का नहीं रहा", अब नहीं करेंगे तुम्हारा पीछा। फिर कह रहाँ हूँ दूसरी विधि मत लगा लेना; यह व्यर्थ का युद्ध होगा। इस युद्ध में मत पड़ जाना कि कमीज़ भी पहने रहनी है, कमीज़ भी बचानी है, और सांड से भी बचना है।

सांड एक नहीं है, ‘साधू ये सांडों का गाँव’। यहाँ हर गली सांड हैं और कमीज़ तुम्हारे पास बस एक रंग की है। गली बदलोगे तो नया सांड मिलेगा, कमीज़ बदलोगे तो नई कमीज़, वो भी लाल। जब तक तुम्हारे पास कमीज़ है, तब तक गली में सांड है। गलियाँ है संकरी। सोचो तुम, सांड और गलियाँ है संकरी। एक ही उपाय है, उसी उपाय को निर्लिप्तता कहते हैं, उसी उपाय को साक्षित्व कहते हैं।

प्र२: आपने जैसे बोला कि दूर हो जाओ, अब जैसे किसी को किसी आदत की लत पड़ी है और वो लत देख ली। अब लत तो छूटेगी इससे कि वो उसका भोग ना करे। जैसे वो सिगरेट पी रहा है।

आचार्य: ग़लत, तुम कमीज़ पहने-पहने सांड से दूर नहीं हो सकते। हमारी कोशिश यही रहती है, इस बात को समझना, तुम्हें थोड़ा चौकाने वाली लग सकती है। हम कहते हैं, "मुझे कोई बुरी लत है, मुझे कोई गन्दी आदत है", तो हम क्या कहते हैं? हम कहते हैं, "हमें यह आदत छुड़ानी है।" आदत जिसे है उसे लग गई, तुम ये कर सकते हो कि जिसे आदत लगी है, उससे तुम अपनेआप को छुड़ा लो।

समझना, तीन चीज़े हैं: सांड, कमीज़ और तुम; आदत, मन और तुम। तुम कोशिश यह करते हो कि सांड और कमीज़ के रिश्ते को बाधित कर दो, तुम कहते हो, ‘सांड आए, पर कमीज़ पर धावा ना बोले’ तुम यह चाहते हो। तुम चाहते हो तुम्हारा और कमीज़ का रिश्ता बना रहे। तुम कमीज़ बचाना चाहते हो न, तो तुम चाहते हो तुम्हारा और कमीज़ का रिश्ता कायम रहे। "मैं कमीज़ पहने रहूँ लेकिन सांड कमीज़ के पीछे ना आए" तो तुम कौनसा रिश्ता तोड़ना चाहते हो?

प्र२: सांड का और कमीज़ का।

आचार्य: तुम कौनसा रिश्ता कायम रखना चाहते हो?

प्र२: अपना और कमीज़ का।

आचार्य: अपना और कमीज़ का। तो ये ग़लत है, यह कभी सफल नहीं हो पाएगा। सांड और कमीज़ एक हैं, वो द्वैत के दो सिरे हैं, उनमें पारस्परिक आकर्षण होगा, वो कभी अलग नहीं हो सकते। तुम अलग हो सकते हो।

तुम्हारा स्वभाव है अनछुआ रहना, तुम्हारा स्वभाव है – अद्वैत।

सांड और कमीज़ एक हैं और वो द्वैत हैं, ठीक इसी तरह से शरीर, मन, आदतें एक हैं। आदत माने ढर्रा, क्या ढर्रों के बिना मन है? तो जहाँ ढर्रा है, वहाँ मन होगा-ही-होगा, जहाँ मन है, वहाँ ढर्रा होगा-ही-होगा। मन का तो अर्थ ही है आदत, पर तुम्हारी कोशिश क्या रहती है? तुम कहते हो, "जैसे मैं सांड से कमीज़ बचाना चाहता था, वैसे ही मैं ढर्रों से मन बचाना चाहता हूँ। मैं आदतें छोड़ना चाहता हूँ।" ये हो नहीं सकता, आदत छूटेगी नहीं। और जो छूट सकता है वो तुम छोड़ोगे नहीं क्योंकि उसमें तुम्हारा अहंकार आड़े आ जाता है।

मन छूट सकता है, मन से ढर्रे नहीं छूट सकते। उसके बाद मन को छोड़ो, उसके बाद बोलो, 'जा जितने ढर्रो में जीना है, जी'।

प्र२: मन को छोड़ना माने क्या?

आचार्य: मन को छोड़ना माने यही तुम्हें अब ढर्रों से कोई परेशानी ही नहीं, तुम्हें ढर्रों से अब कोई लेना ही देना नहीं। कमीज़ कब छूटती है? जब कमीज़ के प्रति अनासक्त हो जाते हो। ‘हमें कुछ लेना ही देना नहीं इस कमीज़ से।’ मन कब छूटेगा? ‘हमें कुछ लेना ही देना नहीं। तुझे तकलीफ हो, तू जान। तुझे ख़ुशी हो, तू जान।’ अब सांड कमीज़ पहन ले और उस पर इत्तर मारे तो बहुत अच्छा, और सांड कमीज़ को फाड़ डाले तो भी बहुत अच्छा। अब ये कमीज़ का व्यक्तिगत मामला है। अब ये कमीज़ की निजी चिंता है, हम ये सब में नहीं पड़ते, हमने त्याग दी, हम नग्न हो गए। अब आदत मन का जो करे उसे करने दो, हमने त्याग दिया। चल रही है आदत, चलने दो।

प्र२: शायद सोच रहा हूँ इसके बारे में तो समझ में नहीं आ रहा है, ये नहीं आ रहा है समझ, ये अलग होना माने क्या?

आचार्य: ये समझने की बात ही नहीं है, यह समझने के लिए तुम्हें मन से समझना पड़ेगा।

प्र२: हाँ।

आचार्य: और हम क्या कह रहे हैं?

प्र२: मन को त्याग दो।

आचार्य: जिसे त्यागना है, उसी को पकड़ कर समझ रहे हो तो कैसे समझ में आएगा? जिसे त्यागना है उसी को पकड़ कर समझ रहे हो तो क्या त्यागा जाएगा? तुम्हारे पास जीने का माध्यम ही एक है, मन।

मन के अतिरिक्क्त कभी जीना सीखा नहीं, और जब तक मन से संग्लग्न रहोगे, तब तक मन की हर बीमारी, तब तक मन की हर लघुता, तुम्हारी बीमारी और तुम्हारा छोटापन बन जाएगी। यह गलत संगत का नतीजा है।

ग़लत चीज़ के साथ जी रहे हो। मन के साथ जो जियेगा, वो मन जैसा ही हो जाएगा। जो लाल कमीज़ में है, वो कैसा दिखेगा?

प्र२: लाल।

आचार्य: जो लाल कमीज़ में है, वो कमीज़ पर पड़ती चोट कहाँ लेगा और सांड ने सींघ किसमें घुसेड़ा?

प्र२: कमीज़ में।

आचार्य: कमीज़ में और लगा किसको?

प्र२: पहनने वाले को।

आचार्य: तुमको। आदत किसको लगी है?

प्र२: मन को।

आचार्य: मन को, और परेशान कौन हो रहा है? तुम। अरे! क्यों परेशान हो रहे हो? उसे कमीज़ चाहिए न, तो दे दो उसको। सांड कहेगा, “कमीज़ के पीछे तूने अपना पेट रखा क्यों? हमने तो कमीज़ में मारी थी सींघ, हमने कहा था पेट ले आ बीच में? व्यर्थ तू हर जगह अपनी छाती घुसेड़ता है।” क्यों तुम वहाँ घुसे हुए हो, जहाँ तुम्हारी कोई जगह नहीं?

कोई आदतों से जीत नहीं सकता क्योंकि आदतों से जीतने तुम जो लेकर के निकले हो, वो स्वयं एक आदत है। ये ऐसी सी बात है कि सामने कोई ज़बरदस्त चुम्बक हो, एक राज्य ने एक जादुई चुम्बक पर आक्रमण किया; भीमकाय चुम्बक, दैत्याकार चुम्बक। राजा निकल पड़ा कि, "आज मारूँगा इस चुम्बक को!" और कैसे निकला? लोहे की तलवार लेकर, क्या होगा?

प्र२: हार जाएगा।

आचार्य: ऐसे तुम आदतों से लड़ने निकलते हो। जो लेकर के तुम लड़ने निकले हो, वो स्वयं आदत का शिकार है। ठीक वैसे, जैसे लोहा चुम्बक का शिकार होकर रहेगा। तुम जिससे लड़ने निकले हो, तुम उसी के गुर्गों पर आश्रित हो उससे लड़ने के लिए। आदत से आदत को काटोगे क्या?

आदत को तुम वास्तव में जानते नहीं। दूर रहकर ही ये खेल देखा जा सकता है कि, "वो देखो सांड क्या कर रहा है कमीज़ के साथ।" अभी प्रश्न पूछता हूँ बताना, जब आदत के शिकार होते हो, तो कभी देखा है खुद को ऐसे जैसे सांड और कमीज़ को देखा जाता है? कि, "वो देखो आदत आई और वो रहा मेरा मन और आदत ने मन के चीथड़े कर दिए।" कभी देखा है ऐसे? देखो ऐसे उसके बाद जितने चीथड़े होने हैं, होने दो। क्या पता न हों, क्या पता हों भी पर तुम निर्लिप्त रहो।

"ये आई आदत, ये आई आदत, आई और मारा मन को, फिर गया। ये गई दाईं बाजू, अब लगा जेब का नंबर, फटा कॉलर।" देखो न ऐसे कभी और देखो ये अपने साथ होते हुए, और यही रोज़ होता है तुम्हारे साथ। आते हैं बाहरी प्रभाव और फाड़ के रख देते हैं तुमको कमीज़ की तरह। ये होते देखो तो। जब हो रहा होता है, तब तुम्हें होश कहाँ होता है, तुम तो कमीज़ के अन्दर होते हो और जो कमीज़ के अन्दर है, वो कमीज़ का हश्र कभी जान नहीं पाएगा, क्यों? क्योंकि कमीज़ का हश्र उसका हश्र बन चुका है। जिसकी छाती में सींघ घुसा हुआ हो, वो कमीज़ को क्या देखेगा, वो तो यही कहेगा, "कमीज़ नहीं फटी।"

बाहर से जो आ रहा है वो प्रभाव है, आदत है, ढर्रा है। सुख-दुःख और कुछ नहीं है, आदतों के नाम हैं। प्रयोग करके देख लो। अपनेआप को ये प्रशिक्षण देकर देख लो कि रोज़ शाम के सात बजे सुखी हो जाना है। हो जाओगे, अकारण, बस ढर्रा है, ढर्रों का कोई कारण थोड़ी होता है। रोज़ अपने-आप को ये प्रशिक्षण दे लो कि कौवे की आवाज़ सुनते ही दुःखी हो जाना है, हो जाओगे।

मन और शरीर तो प्रशिक्षण पर चलते हैं। हाँ, प्रशिक्षण ऐसे गहरे हो जाते हैं कि लगते ही नहीं कि कभी प्रशिक्षित हुए थे, फिर लगता है कि जैसे ये तो स्वभाव है। तुम्हारी गहरी-से-गहरी वृत्ति भी मात्र प्रशिक्षण है जो तुम्हें समय ने दिया है, बड़े लम्बे समय ने, और कुछ नहीं है। उसके पीछे कोई वैध मूल कारण नहीं है। माया अनादि होती है, उसका कारण नहीं खोज पाओगे।

दो सूत्र हैं; अपने प्रति ईमानदारी, अपने प्रति हल्कापन। तो जब आदत तुम पर छाए, अब वो आदत तुम्हारे व्याकरण में भले ही कितनी भी घटिया आदत क्यों न हो, पहले सूत्र की माँग है कि तुम उसे स्वीकारो कि बड़ी घटिया चीज़ है, जो मन पर छा गई। भूलना नहीं घटिया सिर्फ़ तुम्हारी परिभाषा में है।

अस्तित्व में कुछ अटीया-घटिया, ऊँचा-नीचा कुछ होता नहीं।

तो पहली बात ये कि स्वीकारा, ये ईमानदारी है; और दूसरा सूत्र है हल्केपन का, हास्य का, कि यदि ये स्वीकारा कि कोई घटिया चीज़ छा गई है मन पर, तो इस स्वीकार के कारण बोझिल नहीं हो गए, इस स्वीकार के कारण दुखी नहीं हो गए। स्वीकारा भी और हँस भी लिए। मान भी लिया कि बड़ा घटिया काम है, और मान कर भी अपनी नज़रों में गिर नहीं गए। जिसने ये दोनों चीज़ें एक साथ सीख ली, उसने साक्षित्व सीख लिया – यही है साक्षित्व।

साक्षित्व मतलब दूरी और आनंद। मन से दूरी, आत्मा का आनन्द।

दूरी है ईमानदारी, साफ़-साफ़ कहेंगे, ठीक-ठीक कहेंगे, मोहित होकर नहीं, जुड़ कर नहीं, आसक्ति में नहीं। साफ़-साफ़ कहेंगे, ‘देखो अभी डर उठा था, देखो अभी लालच उठा था, देखो अभी वासना उठी थी, देखो अभी बेईमानी उठी थी’, ये दूरी है। ये मन से दूरी है, कि ठीक है, जो भी हो रहा था मन में हो रहा था, हमने कहा मन में हो रहा था और दूसरा, हम आत्मा में ही है। हमारे अन्दर कोई हीनता नहीं आ गई, जो हो रहा था मन में हो रहा था, हम मग्न हैं, हम आनंद में है। हम कहेंगे भी शुभांकर (एक श्रोता) बड़ा घटिया आदमी है पर हँस कर कहेंगे।

ये अपने ऊपर चुटकुला सुनाने जैसी बात हुई। दो बातें हैं इसमें, पहली तो ईमानदारी कि किसी और पर नहीं सुना रहे, अपना सुना रहे; और दूसरा, अपना जो सुना रहे हैं वो रो-रो कर नहीं सुना रहे हैं, हँस-हँस कर सुना रहें हैं। अपनी सब कलई खोल देंगे, सब स्वीकार कर लेंगे और वैसे नहीं स्वीकार करेंगे जैसा पादरी के सामने किया जाता है कि सर झुका देंगे, हीनता के भाव में, अपने को क्षुद्र और तुच्छ बोल कर। सब मानेंगे और मज़े में मानेंगे। अब सांड को कमीज़ फाड़ने दो।

ये लड़ाई आजतक कोई जीत नहीं पाया। इससे दूरी ही बनाई जा सकती है, इसे जीता नहीं जा सकता। ये वो लड़ाई है जो तब जीती जाती है जब तुम्हारा इस लड़ाई से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। ये वो लड़ाई है जो तब जीती जाती है जब तुम्हें इस लड़ाई में कोई रुचि नहीं रह जाती है। जिस दिन तक तुम्हें इस लड़ाई में रुचि है, तुम हारे ही हारे; तुम्हारी हार भी हार और तुम्हारी जीत भी हार। तुम जीते उस दिन, जिस दिन तुम कहो, "हमें लड़ने में कोई रुचि नहीं रही", अब तुम जीत गए। अब तुम जीत गए, अब तुम अलग हो गए। अब तुमने अपनी शुद्धता को पा लिया।

आदत से हारोगे तो हारे ही और जो दावा करें कि आदत से जीत गए, उनकी ज़्यादा बड़ी हार है।

जो आदत से हारे, वो तो हारे ही; जो आदत से जीत गए उनकी ज्यादा बड़ी हार है क्योंकि कौन जीत गया? अहंकार जीत गया।

वो जीत गया, हम वो जिन्होंने आदत को हरा दिया। अब ये नई आदत है, पुरानी आदत ने नई आदत को हरा दिया।

आदत से लड़ो नहीं, ‘ना लड़ना ही जीत है’।

प्र२: सर, जैसे आप कह रहें हैं कि अपने-आप से ही पराये हो जाएँगे एक दिन। क्या हो रहा है फर्क नहीं पड़ता तो इससे नुकसान भी तो होगा हमारा।

आचार्य: अपने से पराये नहीं हो गए। जब सांड कमीज़ फाड़ रहा हो, तो तुम्हारा क्या है तुम्हारा जिस्म या कमीज़? तुम किससे पराये हुए हो और किसके अपने हुए हो?

प्र२: ‘हमसे’ मेरा मतलब वही था जो अहंकार है।

आचार्य: हाँ, तो समझो न इस बात को, तुम्हें ये तो दिख रहा है कि किससे पराये हो गए हो, तुम्हें ये नहीं दिख रहा है कि क्या अपना था जिसे बचा लिया। तुम्हें ये नहीं दिख रहा है कि किसके निकट आ गए। यहाँ तो ये होता कि जो पराया है, पराया माने कमीज़, उसके साथ-साथ वो भी लहूलुहान हो जाता है, जो अपना है। उदहारण की बात कर रहा हूँ, मात्र उस उदहारण में तुम्हारा अपना क्या है?

प्र२: शरीर।

आचार्य: शरीर, तो पराये के साथ अपना भी मारा जाता। पराये को पराया घोषित करके तुमने उसे बचा लिया जो वास्तव में अपना है। जिन्हें शरीर से कोई वास्ता हो, वो आसानी से कमीज़ को दाव पर लगा देंगे। वो कहेंगे, "मूर्खता है कि शरीर पर घाव सहें।" अपना क्या है, पराया क्या है, समझो। तुमने परायों की रक्षा में अपने को कितना दुःख दिया है, ऐसे होते हुए कभी पाया है? कमीज़ बचाने के लिए शरीर को कितना कष्ट दिया है, कभी देखा है? फिर शरीर को बचाने के लिए मन को कितना कष्ट दिया है कभी देखा है? फिर मन बचाने के लिए आत्मा से कितनी दूर हो बैठे हो कभी देखा है? हमें पता कहाँ होता है अपना क्या और पराया क्या?

‘स्व’ का कितना ज्ञान होता है हमें? हम तो पता नहीं किसको अपना समझे बैठे हैं, और जो अपना है उसे भुलाये बैठे हैं। तुम देखो न क्या-क्या घूमता रहता है तुम्हारे मन में, जो घूमता रहता है उसे कभी कहते हो कि पराया है? उसको गंभीरता से लेते हो इसी कारण मन में घूम रहा है। तुम्हारे मन में जो भी कुछ है, चिंताएँ, सामग्री, उम्मीदें क्या वो तुम्हारे मन में हो सकती थी यदि वो तुम्हें पराई लगती?

प्र२: नहीं।

आचार्य: तो वो तुम्हारे मन में बैठी ही इसीलिए हैं क्योंकि वो तुम्हें अपनी लगती हैं, और जब वो तुम्हें अपनी लगती हैं तो कभी देखा है कि किससे दूर हो जाते हो? शांति से दूर हो जाते हो, स्वास्थ्य से, चैन से दूर हो जाते हो। परायों को अपना कर लिया और इस चक्कर में किससे दूर हो बैठे, ये जाना कहाँ तुमने?

प्र२: सर लेकिन वो चिंताएँ भी तो शरीर के लिए होती हैं, अगर उनको पराया कर देंगे तो शरीर को भी तो नुकसान पहुँच रहा है।

आचार्य: शरीर सिर्फ उदहारण है तुम्हारा।

प्र२: अगर आप देखें जब कभी चिंताएँ होती हैं, खाने की या कहीं जाने की अगर उनको पराया कर देंगे कि तुम्हें चिंता ही शांति से दूर लेकर के जा रही है, तो उस चिंता को पराया करने से आप शरीर को नज़रंदाज़ कर रहे हैं।

आचार्य: तुम बार-बार कह रहे हो कमीज़ पर दाग लग जाएगा अगर सांड ने मार दिया।

प्र२: हम कमीज़ हैं, शरीर नहीं।

आचार्य: तुम बार-बार ये कह रहे हो कि शरीर को कुछ दिक्कत हो जाएगी, मैं कह रहा हूँ शरीर कमीज़ है। जब तक तुम्हें कमीज़ से मोह है, तुम उसे उतारोगे ही नहीं। जब उतारोगे नहीं तो पिटते रहोगे और कुछ नहीं होगा। तुम ये नहीं देखते हो जो पिट रहा है और जिसके कारण तुम्हें दर्द हो रहा है, वो कमीज़ नहीं तुम हो। जब सांड तुम पर वार कर रहा होता है तो क्या घटना घट रही है? गौर करो! वो आ कर के मार किसको रहा है?

प्र२: कमीज़ को।

आचार्य: और दर्द कहाँ हो रहा है?

प्र२: शरीर में।

आचार्य: छाती में। पर क्योंकी तुमने कमीज़ से एका कर रखा है, तो तुम्हें क्या लग रहा है दर्द भी किसे हो रहा है? कमीज़ को ही क्योंकि, "मैं तो कमीज़ ही हूँ न।"

शरीर से तुमने एका कर रखा है इसीलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है कि शरीर को सुरक्षा की ज़रुरत है, ये ठीक ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि, "कमीज़ को बड़ा दर्द होगा न कमीज़ को कैसे छोड़ दूँ?" कमीज़ को कोई दर्द नहीं होता, कमीज़ के जो पीछे है उसे दर्द होता है।

ठीक उसी तरह से शरीर की कोई माँग नहीं होती, शरीर के पीछे जो मन है, उसकी माँग होती है, उसकी बात करो। तुम्हारा तर्क बिलकुल यही है कि कमीज़ को बहुत दर्द होगा अगर उसे उतार दी।

“और तुम्हें पता कैसे है कि कमीज़ को दर्द होगा?”

“मुझे पता है न कि कैसे दर्द होता है।”

“कैसे पता?”

“पिछली बार जब सांड ने मारा था कमीज़ को, तो बड़ा दर्द हुआ था, तो देखो कमीज़ को दर्द होता है न।”

यह तुम्हारा तर्क है, ये बड़ा ही मूर्खतापूर्ण तर्क है।

सो जाते हो, तो क्या शरीर माँग करता है कि भविष्य बनाओ या करियर बनाओ? ये सारी माँगें शरीर की हैं क्या जिनसे तुम उलझे हुए हो? शरीर तो अपनी गति पर चलता है, बहुत सीमित बातें करता है और बहुत सीमित उसकी माँगें हैं। पर तुम ये भेद ही भूल गए हो कि कमीज़ में और देह में अंतर है, देह में और मन में अंतर है। तुम्हारी तो हालत ये है कि तुम्हें उपचार भी करना होगा कि सांड आया और खूब तुमको धोभीपाट देकर गया है और जगह-जगह से खून बह रहा है और जगह-जगह दर्द हो रहा है और खून किस पर लग गया है?

प्र२: कमीज़ पर।

आचार्य: तो तुम जाओगे डॉक्टर के पास और कहोगे कि, "कमीज़ का उपचार करिएगा, देखिए यहाँ कितना खून है, कमीज़ का उपचार करिए।" और प्रमाण भी है न, कमीज़ फटी है और कमीज़ में ही लहू के दाग है, तो निश्चित रूप से दर्द भी किसे हो रहा है?

प्र२: कमीज़ को।

आचार्य: और वही तुम्हारा तर्क भी है कि शरीर की तो सुरक्षा करनी पड़ेगी न। दर्द शरीर को नहीं होता, दर्द शरीर के जो पीछे होता है, उसे होता है। कभी तुम्हारे पाँव ने कहा है क्या कि, "मुझे दर्द हो रहा है"? किसने कहा है हमेशा?

प्र२: मन।

प्र३: आपको एक आदत लगी हुई है और पता है कि उस आदत के बाद पूरा शरीर भन्ना जाता है। वो है आदत लेकिन आदत से कुछ होता नहीं। अब वो नहीं करते हैं, तो वहाँ से प्रतिरोध आता है कि गई न आदत और वो प्रतिरोध आएगा-ही-आएगा, निश्चित तौर पर आएगा-ही-आएगा।

पहले क्या होता था, जैसे कोई चीज़ का विरोध कर रहें हैं और कोई चीज़ देख लिया कि भाई, इसमें कुछ है नहीं लेकिन वो आदत लगी हुई है कि उसके पास जाना है, तो आपने बोला कि नहीं जा रहे। तो नहीं जा रहे हैं पर उसका जो प्रतिघात आएगा कि आप उसको रोक रहे हो, तो वो आएगा ही और आप बस उस बहाव को देख रहे हो कि ठीक है प्रतिघात आ रहा है, तो क्या ये भी सहयोग है?

आचार्य: जब सांड अमनदीप (एक श्रोता) की शर्ट ले रहा था, तो तुमने अपने इस कैमरा से उसका विडियो बना लिया और फिर उसको पूरी रिकॉर्डिंग दिखाई, पूरी फिल्म दिखाई कि, "देखो इस-इस तरह से हो रहा है।" उसको देखने से क्या उसका दर्द कम हो जाएगा?

प्र३: नहीं।

आचार्य: ये सारी बातें तुम्हारे किसी काम आएँगी? सिर्फ एक चीज़ है, जो तुम्हारे काम आ सकती है कि जब सांड आए तुम्हारे सामने, तब तुम्हें ये होश रहे कि अभी कमीज़ उतारनी है। बाद में तुम रिकॉर्डिंग देख कर बनते रहो बड़े ज्ञानी, उससे ना फटी शर्ट सिल जाएगी, ना देह का दर्द दूर हो जाएगा। स्मृति वाला ज्ञान कोई ज्ञान नहीं होता।

ज्ञान जब स्मृति से उठे तो निरर्थक है, और वही ज्ञान जब एक आत्मिक बोध से उठता है, तत्काल, तब सार्थक होता है।

दो तरह का ज्ञान होता है; स्मृतिबद्ध और बोधजनित। अभी जो तुम अपना ज्ञान सुना रहे हो ये स्मृति वाला है, कि जब वो होता है, तब ये होता है। तुम रोक-रोक कर के उस पिटाई की फिल्म का विश्लेषण करते रहो कि देखो, "इस क्षण में बायाँ सींघ घुसा बगल में", अब उससे क्या बगल का इलाज हो गया? जब घटना घट रही हो तब जागो, इतनी बातें मत करो। तब उतारो!

प्र३: रोक लो उसी वक्त।

आचार्य: हाँ, अन्यथा बाद में जब तुम सुना रहे हो, वो बस दूसरों के लिए मनोरंजन होगा।

प्र३: जो रोकना होता है कि उस क्षण में कुछ गलत हो रहा है, तो क्या वो उसी क्षण रोकना होता है?

आचार्य: ना, गलत नहीं। न गलत न सही, उचित, सम्यक। गलत या सही में विकल्प बच जाता है। सम्यक में निर्विकप्लता होती है, तब तुम्हें पता है कि, "मात्र यही विकल्प है इसके अलावा सही-गलत कुछ है ही नहीं, न ही कुछ और हो सकता है। यही है ही।"

सही-गलत निर्धारित करते समय ये हक तुम अपने पास रख लेते हो कि, "कुछ और भी कर सकता हूँ।" और जब कभी तुम सही-गलत का निर्धारण करोगे, तो उसमें समय लग जाएगा। आधा पल तो लगेगा? उसे बस वो आधा पल चाहिए। वो बड़ा चतुर, बड़ा तेज़ सांड है। तुमने उसे आधा पल दिया नहीं उसको, वो तुमको पकड़ लेगा। तुम्हें तुरंत उतारनी है।

सोच के लिए जो आधा पल लगता है, उस आधे पल की जगह नहीं है और सोचने में उतना समय लग जाएगा और उतनी देर में तुम्हारा काम-तमाम हो जाएगा। इसीलिए मन का इलाज सोच-सोच कर नहीं हो सकता क्योंकि सोचने में कोई त्वरित घटना, तत्काल घटना नहीं हो सकती।

प्र३: मतलब कमीज़ उतारते समय मैं देख रहा हूँ?

आचार्य: या सोच रहा हूँ, इतने में वो आ जाएगा, उतने में तुम्हारा पूरा कार्यक्रम समाप्त। सोच के नहीं, तत्काल; सही-गलत में सोचना पड़ेगा, कि दिखा नहीं कि उतरी।

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