दिखावे पर ही जिओगे भाई? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपको कोटि-कोटि नमन और बहुत सारा धन्यवाद कि हम लोगों को सही रास्ता दिखाने के लिए आप इतना संघर्ष कर रहे हैं।
आचार्य जी, हम हमेशा सबके सोशल स्टेटस के बारे में जानने को क्यों उत्सुक रहते हैं? यहाँ पर भी जब प्रतिभागियों से बात हुई मेरी तो पहला सवाल यही आया कि आप क्या करते हो। तो मतलब हम इस जगह पर भी अपने सोशल स्टेटस को लेकर चलते हैं। उस चीज़ पर थोड़ी स्पष्टता चाहिए थी।
और दूसरा, मैं जब आ रहा था तो जो भी मेरे दोस्त या मेरे जानने वाले ये जानते थे कि मैं आसाम से दिल्ली तक सफर करके सिर्फ़ शिविर के लिए जा रहा हूँ तो सब हैरान थे कि सिर्फ़ इस काम के लिए मैं इतनी दूर जा रहा हूँ। भारत में जिस चीज़ को प्राइमरी (प्राथमिक) होना चाहिए था, मतलब आध्यात्मिकता, उसे लोग हमेशा सेकेंडरी (द्वितीयक) समझते हैं आज भी। तो इसमें थोड़ा क्लैरिटी (स्पष्टता) चाहिए थी।
आचार्य प्रशांत: क्लैरिटी क्या दूँ, हम ऐसे ही लोग हैं। कहीं भी जाते हैं तो वहाँ यही देखते हैं कि उन्हीं चीज़ों की कितनी अधिकता है जो हमको साधारणतया प्रिय होती हैं। आप बड़ा मंदिर किसको बोलते हो? बड़ा मंदिर माने क्या?
प्र: बिल्डिंग (इमारत) बड़ी हो।
आचार्य: समझ गये न? वहाँ भी यही देख रहे होते हो बिल्डिंग कितनी बड़ी है। और?






