प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपको यूट्यूब पर लगभग तीन महीनों से सुन रहा हूँ। आप जिस गहराई से सत्संग करते हैं, उसको मेरा प्रणाम है। मैंने अपने जीवन में ये देखा है कि लगातार भय और व्याकुलता से घिरा रहता हूँ, जबकि आर्थिक और सामाजिक रूप से मैं बहुत अच्छी स्थिति में हूँ। मुझे भय इसी बात का रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि मैं एक आध्यात्मिक जीवन न जी पाऊँ या किसी ग़लत मार्ग पर चल पड़ूँ। मैंने भविष्य में अपने लिए बहुत रोमांचक और बहुत ही असाधारण योजनाएँ बना रखे हैं। मैं आज आपसे ये पूछना चाहता हूँ कि मैं पूर्णतः निडर होकर अपने इन योजनाओं को कैसे पूरा कर सकता हूँ।
आचार्य प्रशांत: और अगर वो योजनाएँ आयें ही डर से हों तो? डर से उठने वाली योजनाओं को निडरता-पूर्वक कैसे अमल में लाओगे? यही तो मूल गलती होती है न — कर्म को देखो, कर्म की बात करो, कर्म का विश्लेषण करो, कर्ता को छुपा जाओ; योजना की बात कर लो, योजनाकार को पर्दे में रखो।
बताइएगा साहब, ज़्यादातर आपकी योजनाएँ बनती ही क्यों हैं? 'मैंने योजना बनायी है कि अगले पन्द्रह साल में कम-से-कम पन्द्रह करोड़ तो जमा कर ही लूँगा।' — ये क्यों बनी है? क्योंकि आपके भीतर जगत के प्रति महान प्रेम है? हाँ? अब आप कह रहे हैं, 'मैंने डर के कारण ये जो योजना बनायी है, इस योजना पर निडरता-पूर्वक चलना चाहता हूँ।' ज़रूर! इसी को कहते हैं न, 'लो कल्लो बात।'
कभी गौर करा है, हमारे अधिकांश आयोजित काम होते ही क्यों हैं? क्यों होते हैं? 'आई एम प्लानिंग टु गेट मैरिड ऐट ट्वेंटी-एट।' (मैं अट्ठाईस की उम्र में शादी की सोच रहा हूँ) काहे भाई? समाधि लगेगी? लगेगी तो अभी काहे नहीं लगा लेते, अट्ठाईस तक काहे इंतज़ार करोगे? 'नो, बाय दैट टाइम आई विल हैव जॉब एंड फ्लैट एंड सिक्योरिटी' (नहीं, तब मेरे पास एक नौकरी, अपना मकान और सुरक्षा होगी)। अच्छा, तो जिसको लेकर आ रहे हो वो आएगी नहीं बिना फ्लैट और जॉब और सिक्योरिटी के। बड़े निडर हो! दिख नहीं रहा कि काँपे हुए हो कि अगर फ्लैट नहीं कमाया और सिक्योरिटी




