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डर हटाने के दो ही तरीक़े || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं प्रथम बार यहाँ पर आया हूँ। मेरा बुनियादी डर बचपन से यह है कि अगर मन के अनुरूप कुछ होता है तब तो ठीक है और मन के विरुद्ध कुछ होता है तो नाभि पर दबाव प्रतीत होता है, भयाक्रांत हो जाता हूँ और फिर विचार भी बहुत तेज़ी से भागते हैं। अगर मैं इसको रोकने की कोशिश करूँ तो और तेज़ी से होता है। अभी भी मेरी हालत ऐसी ही है। इसपर कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: जो कुछ शारीरिक तल पर होता है, वह तो मानसिक उथल-पुथल की शारीरिक अभिव्यक्ति मात्र है। ऐसा यहाँ कोई भी नहीं होगा जो जब डरता हो या क्रोधित होता हो या उत्तेजित होता हो तो उसके शरीर पर प्रभाव न पड़ता हो। क्या ऐसा यहाँ कोई भी है जिसकी मानसिक गतिविधि मात्र मानसिक होती हो? जब आप क्रोधित होते हैं तो आपको देखकर ही कोई बता सकता है न कि आप गुस्से में हैं? वह क्या देख रहा है, वह आपके विचार देख रहा है या आपका चेहरा देख रहा है? इसका मतलब विचारों का प्रभाव किस पर पड़ गया? चेहरे पर पड़ गया। मन का प्रभाव सीधे-सीधे पड़ गया शरीर पर।

दस उदाहरण आप स्वयं ही दे लेंगे न कि जैसे ही मन बदलता है, शरीर कैसे बदल जाता है। आँखें बदल जाती हैं या नहीं? प्रेम के क्षण में आँखें दूसरी होती हैं न? जब तुम्हारे भीतर करुणा होती है और दया होती है तो आँखें दूसरी होती हैं न? अभिनेता भी यह राज़ जानते हैं। तुम अभिनेताओं से कहो कि इस दृश्य में तुम्हें बहुत दयालु दिखायी देना है तो अभिनेता अभिनीत कर देगा न? क्योंकि उसको पता है कि दया के क्षण में चेहरा बदल जाता है। तो आमतौर पर जिस तरीक़े से बदलता है वह वैसा अभिनीत कर देगा। ठीक?

क्रोध में हाथ कँपने लगते हैं न? होता है या नहीं होता है? तनाव में कन्धों पर और पीठ पर दर्द आ जाता है न? भय में घुटने कँपते हैं न? कामवासना के क्षण में आँखें बदल जाती हैं न? यह सब होता है न? हैरान हो, परेशान हो, होंठ सूख जाते हैं न? तो शरीर में जो कुछ भी हो रहा है वह तो उसके पीछे के विचार के कारण हो रहा है। शरीर को हटा दें, विचार अगर संयमित हो गया तो शरीर पर जो भी प्रतिक्रियाएँ होती हैं, चाहे वह नाभि पर होती हों चाहे चेहरे पर होती हों, वह अपनेआप ठीक हो जाएँगी।

विचारों में क्या हो रहा है? विचारों में भय है। भय आपको तब तक रहेगा ही जब तक आत्मज्ञान नहीं होगा या फिर जब तक प्रेम नहीं होगा। भय से मुक्ति पाने की इसके अतिरिक्त कोई विधि न कभी थी और न आगे कभी होगी। ग़ौर से समझ लीजिए! या तो आत्मज्ञान या फिर प्रेम। दोनों की प्रक्रियाएँ थोड़ी अलग-अलग होती हैं, लेकिन आत्यंतिक तौर पर एक हैं।

आत्मज्ञान की क्या प्रक्रिया होती है? आत्मज्ञान की प्रक्रिया यह है कि मैं सोता था रात में चोरों के भय में, मुझे नींद नहीं आती थी। मैं परेशान रहता था क्योंकि मुझे लगता था कि मेरे पास काफ़ी कुछ है जो चोर चुरा सकते हैं। फिर एक दिन कोई आया फ़कीर मेरे घर और उसने मुझे बताया कि वह सबकुछ जो तुमने इकट्ठा कर रखा है वह दो कौड़ी का है। वह चोरी हो भी गया तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मैंने पूछा, ‘क्या सब कुछ दो कौड़ी का है?’ वह बोला, ‘हाँ, सबकुछ दो कौड़ी का है, और इतना ही नहीं, उसमें से काफ़ी कुछ उधार का है। तुम्हारे यहाँ रात में आने को जो बेक़रार हैं उनको चोर बोलना भी बन्द करो, उनमें से कई तो वह हैं जिनके तुम ऋणी हो। वह अपना माल वापस लेने आते हैं, तुम उन्हें चोर बोल रहे हो! तुम उनकी चीज़ें रखकर बैठे हो। तुम्हें लौटानी ही है एक दिन, तुम उन्हें पकड़े बैठे हो।’

मैंने कहा, ‘अच्छा! इसका मतलब क्या मेरे पास कुछ भी नहीं है?’ वह फ़कीर जहाँ खड़ा था उसने वहीं पर लात मारी। धरती थोड़ी सी फट गयी, नीचे से एक हीरा चमकने लगा। फक़ीर बोला, ‘ये है तुम्हारे पास।’ मैंने कहा, ‘ये है न, यह देखो यह चोरी हो गया तो?’ उसने कहा, ‘तुम ख़ुद ही आज़मा लो। चोर तो बाद में चुराएगा, तुम ज़रा ख़ुद ही इसको उखाड़कर दिखा दो।’ मैंने पूरी कोशिश कर ली, जान लगा ली, जितने प्रयोग कर सकता था और जितने उपकरण आज़मा सकता था सब करके देख लिये। वह हीरा टस-से-मस नहीं हो रहा। फ़कीर मुस्कुरा रहा है, उसने कहा, ‘अब आश्वस्ति है?’ मैंने कहा, ‘हाँ लगता तो नहीं कि इसे अब कोई चुरा सकता है।’ उसने कहा, ‘लगता नहीं, अभी थोड़ा संशय है क्या? तो और कोशिश कर लो।' मैंने कहा, 'नहीं! कोई संशय नहीं। मैंने जी-तोड़ यत्न करके देख लिया, जब मैं ही इसको नहीं उखाड़ सकता, मैं ही इसको नहीं ले जा सकता तो कोई और क्या ले जाएगा?' तो उसने कहा, 'ठीक।'

तो तुम्हें तीन-चार बातें समझ में आ गयी हैं। यह आत्मज्ञान समझा रहा हूँ। पहली बात तुम्हें यह समझ में आयी कि तुम्हारे पास जो कुछ है जिसकी रक्षा के लिए तुम इतने परेशान रहते हो, इतने व्यग्र रहते हो, वह दो कौड़ी का है। दूसरी बात तुम्हें यह समझ में आयी है कि दुनिया तुम्हारी दुश्मन नहीं है, बहुत कुछ जो तुमने इकट्ठा कर रखा है वह तुम्हारा है ही नहीं। पहली बात, दो कौड़ी का है और दूसरी बात, तुम्हारा है ही नहीं। वह किसी और का है, तुम अपना माने बैठे हो। जिसका है वह तो लेकर जाएगा ही न? और तीसरी बात, जो कुछ तुम्हारा है, वह बड़ा क़ीमती है और उसे कोई ले नहीं जा सकता।

जिस दिन से मुझे यह पता चला, मैं गधे-घोड़े सब बेचकर सोता हूँ, मेरे खर्राटों से मोहल्ला काँपता है। भय चला गया। जो दूसरे का है उसको तो वह ले ही जाएगा। जो कुछ मुझे स्थितियों से, समाज से, समय से मिला वह तो चला ही जाना है। यह जिस्म भी चला ही जाना है क्योंकि यह तो यूँही मिल गया था, संयोगवश। जो संयोगवश मिला है वह संयोग से चला भी जाएगा।

कबीर साहब के पास एक स्त्री आयी, वह रो रही थी। पूछे, 'क्या हुआ?' बोली, 'मेरा पति मर गया, टूट गयी मोरी जोड़ी!' कबीर साहब बोले, "जिन जोड़ी तिन तोड़ी", 'तू काहे को रो रही है? तूने जोड़ी थी क्या? संयोगवश जैसे जुड़ गयी थी, संयोगवश वैसे ही टूट भी गयी। तू काहे को दुखी हो रही है? छोटे-छोटे संयोग न हुए होते तेरी ज़िन्दगी में दो-चार, तो यह पुरुष तेरे जीवन में आता ही नहीं।'

कभी कोई तुम्हें बस में मिल गया, कभी कोई तुमसे राह में टकरा गया, कभी कोई तुम्हारे पड़ोस में रहता था, कभी किसी का रिश्ता कोई पंडित तुम्हारे घर ले आया। ऐसे तो जोड़ियाँ बनी हैं, इनको लेकर के रो क्या रहे हो? यह तो यूँही समय ने ताल्लुक़ात बना दिये थे, समय ही इनको तोड़ भी देगा। ठीक है, मस्त मगन सोओ।

‘कुछ तो क़ीमती होगा हमारे पास! ऐसे भिख़ारी हैं क्या हम, कि आप कह रहे हो कि तुम्हारा माल बेकार है और दूसरा अपमान यह करते हो कि एक तो बेकार माल, वह भी उधारी का!’ हीरे को याद रखो! वह हीरा ऐसा है कि उसे तुम भी अपनेआप से दूर नहीं कर सकते, तो चोर क्या करेगा। वह हीरा ऐसा है कि उसे तुम चाहो भी तो कोई और नहीं चुरा सकता। चोर तुम्हारे घर घुसे और तुम चोर से कहो, ‘मैं भी तुम्हारे साथ हूँ। आओ दोनों मिलकर के यहाँ चोरी करते हैं, दोनों मिलकर के इस हीरे को उखाड़ते हैं और तुम ले जाना।’ तो भी न तुम सफल होओगे, न चोर सफल होगा। जो तुम्हारा है वह तुमसे छिनने वाला नहीं। बाक़ी सब कचरा, तुम उसको लेकर क्यों हैरान हो? यह आत्मज्ञान है, 'मैं कौन हूँ', यह पता होना।

मैं वह हूँ ही नहीं जो मैं अपनेआप को मानता हूँ। मैंने अपने द्वारा संकलित छवियों को, वस्तुओं को, रिश्तों और नातों को और विचारों को और अवधारणाओं को ‘मैं’ का नाम दे दिया है। वह मैं हूँ नहीं, वह सब तो यूँही हैं जैसे पतझड़ के मौसम में उड़ते हुए पत्ते तुम्हारे आँगन में आकर गिर जाते हैं, उनसे क्या रिश्ता रखोगे भाई! वह आकर तुम्हारे आँगन में गिरे, सुन्दर बात! पर वह तुम्हारे आँगन के तो नहीं हो गये न?

जैसे सुबह उठते हो तो पाते हो कि तुम्हारे बाग में पत्तों पर कुछ ओस की बूँदें हैं, उनसे कितनी देर का रिश्ता रख लोगे? रात में आयी थीं, संयोगवश आयी थीं, उनको प्रणाम करो। मुस्कुरा दो उनको देखकर के, उनका स्वागत कर लो। थोड़ी ही देर में उनको चले ही जाना है। जैसे आयी थीं, वैसे जाएँगी। और अगली रात अगर विधि ने चाहा तो वह फिर लौटकर के आएँगी, तुम क्यों हैरान हो? बात समझ में आ रही है? यह देह भी वैसी ही है। स्वयं को जानो। तुम्हारे पास ऐसा कुछ नहीं जो तुम्हारा हो और जो तुम्हारा है, मज़ाल किसी की कि उसे छीन कर दिखा दे!

सूत्र यह समझ लेना कि जो छिनता हो वह तुम्हारा है ही नहीं। सूत्र यह समझ लेना कि जिसकी रक्षा के लिए तुम्हें व्यग्र होना पड़े वह रक्षा के क़ाबिल ही नहीं। जो बचाने के लिए तुम्हें रातों की नीन्द खोनी पड़े, वह इस क़ाबिल ही नहीं कि उसे बचाया जाए। और जो इस क़ाबिल है कि उसे बचाया जाए, उसे बचाने की कोई ज़रूरत नहीं, वह बचा ही हुआ है। भय गया, तुम भय मुक्त हुए। बात आ रही है समझ में?

प्रेम का रास्ता दूसरा है, उसकी तो सुन लो। (प्रश्नकर्ता से) चूक ही जाओगे, तुम्हारा सवाल ले लिया तो। और प्रेम का रास्ता ऐसा है कि जैसे कोई औरत निकली हो बाज़ार में कुछ सौदा बेचने के लिए। कुछ छोटे-मोटे कपड़े हैं, कुछ सामान है, कुछ फल, कुछ सब्ज़ियाँ। यह सब वह घूम-घूमकर के बेच रही है और कोई शरारती बच्चा आकर के उसके ठेले से एक टमाटर उठा ले तो चिल्लाती है और गाली देती है। उसे प्यास लगी है, उसके पास पानी नहीं है, पर अपना ठेला छोड़कर के नहीं जा सकती क्योंकि उसको पता है कि छोड़ा तो कुछ उठ सकता है, चोरी हो सकता है।

इस भय के मारे वह प्यासी घूम रही है। सोना तो बहुत दूर की बात रही, वह पानी नहीं पी सकती। वह कह रही है, 'ये इतनी क़ीमती चीज़ें हैं, इन्हें कोई ले गया तो क्या होगा!' और बात सही है, औरत ग़रीब है। उसके पास बस वही सब चीज़ें हैं जो उसने ठेले पर रखी हुई हैं। उसी से उसकी दाल-रोटी चलती है, उसी से साँझ को चूल्हा जलता है। और ज़माना ख़तरनाक है, लोग स्त्री को अकेला जान रहे हैं, मोलभाव कर रहे हैं, दबाव भी डाल रहे हैं।

और बन्दर तो बन्दर! बच्चों को तो डाँट दो, समझा दो, बुझा दो, बन्दर आकर के कूदकर फल उठा ले जाते हैं। लो अभी आया, एक अमरूद उठाकर लेकर चला गया, वह पीछे चिल्लाती रह गयी। कभी इधर देखती है, कभी उधर देखती है, साँस उसकी अटकी हुई है।

और तभी कोई आता है और उससे कहता है, ‘गाँव की सरहद पर तुम्हारे पति को देखा। दसों साल विदेश में रहकर वह लौट रहा है।’ और यह औरत अपनी सब सब्ज़ी-भाजी, सारा सौदा, सब माल छोड़-छाड़कर, फेंक-फाककर बावली होकर भागती है। सौदा तो उसने छोड़ ही दिया, उसके छोटे से थैले में कुछ सिक्के, कुछ छोटे-छोटे नोट हैं और वह ऐसा बेसुध भाग रही है कि सिक्के उछल-उछलकर गिरते जा रहे हैं, नोट हवा में उड़ते जा रहे हैं। लोग उससे कह रहे हैं, ‘अरे बाई! तेरा पैसा! देख पीछे छूटा।’ उसे सुनायी ही नहीं पड़ रहा।

कोई उससे कह रहा है, ‘अभी तुझसे थोड़ी देर पहले कहता था कि आलू ज़रा सस्ते लगा दे, तू मुझसे लड़ बैठी थी और तेरे वही आलू वहाँ गली में लुढ़क रहे हैं अब, तुझे कुछ ख़याल नहीं?’ वह उत्तर देने भर के लिए भी नहीं रुकती, वह भागी ही जा रही है। वह गली से निकलकर के अब सड़क पर आ गयी है, यातायात है, गाड़ियाँ हैं, हॉर्न पड़ रहे हैं। उसे सुनायी ही नहीं दे रहा, उसे कोई डर ही नहीं है। वह नंगे पाँव है, उसके खून बह रहा है, उसे फ़र्क नहीं पड़ रहा। इस वक़्त कोई उसे रोक कर दिखाये! न उसे रुपया खोने का डर है, न उसे किसी गाड़ी के नीचे आ जाने का डर है; चोट लगने का डर तो बहुत छोटी बात है। यह प्रेम है, प्रेम में डर विदा हो जाता है।

या तो यह जान लो कि तुम व्यर्थ ही चीज़ों को पकड़े बैठे हो। यह शुरुआत हुई बाहर से। बाहर-बाहर जो कुछ है, वह यूँही है, अनावश्यक है। हमने व्यर्थ ही उससे इतना गहरा नाता जोड़ लिया है, या तो यह कर लो। या फिर जो केन्द्रीय है, उससे प्रेम हो जाए तुम्हें। दोनों ही स्थितियों में भय बिलकुल हट जाएगा। न ज्ञानी में तुम भय पाओगे, न प्रेमी में तुम भय पाओगे। दोनों में ही भय नहीं मिलेगा। और अगर न ज्ञान हो, न प्रेम हो तो फिर तो कहना ही क्या! और इन दोनों को, मैंने कहा कि शुरुआत में ही मानना कि अलग-अलग रास्ते हैं, ज़रा सा आगे बढ़ोगे तो पाओगे कि एक ही रास्ता है। जहाँ प्रेम है वहाँ सत्य के प्रति अनुराग और व्यर्थ के प्रति वैराग्य आ ही जाता है।

'प्रेम' में सत्य के प्रति अनुराग पहले आता है, व्यर्थ के प्रति वैराग्य छाया की तरह आ जाता है और 'आत्मज्ञान' में व्यर्थता चीज़ों की पहले दिखायी देती है, हीरे का अनुसन्धान ज़रा बाद में होता है। पर दोनों में घटना एक ही घटती है, व्यर्थ छूटेगा, जो असली है वह मिलेगा।

कोई और तरीक़ा आज़माना चाहते हो अगर भय से हटने का, तो है नहीं। ख़ुद को जानो, जितना ख़ुद को जानते जाओगे उतना उसके (ऊपर की ओर इशारा करते हुए) इश्क़ में पड़ते जाओगे। जब मैं कह रहा हूँ ख़ुद को जानो तो मैं नहीं कह रहा हूँ आत्मा को जानो। मैं कह रहा हूँ, 'घर-द्वार, संसार को जानो, इस देह को जानो, विचार को जानो।' जितना तुम्हें अपनी हस्ती की निस्सारता का पता चलेगा उतना ही तुम उसके प्रति आकर्षित होते जाओगे जो समस्त सारयुक्त है। दोनों एक साथ चलेंगे। सत्य की ओर बढ़ोगे कैसे अपने झूठ से अवगत हुए बिना?

तुमने अगर अपनेआप को ही सच मान रखा है तो फिर तुम किस आध्यात्मिक सत्य की तलाश कर रहे हो? आध्यात्मिक सत्य की तो बात ही तब उठती है न जब पहले तुम्हें दिखायी दे कि तुम कितने झूठ हो। तुम झूठे नहीं हो, अन्तर समझना, मैं कह रहा हूँ, 'तुम झूठ हो।' झूठे नहीं, झूठ! तुम झूठ बोलते नहीं हो, तुम झूठ हो। हस्ती ही असत्य है, निस्सार है, अनित्य है। हमारा होना ही एक भ्रम है।

हम वह हैं जो प्रतिपल बदल रहा है, तो उसको क्या और कैसे कोई नाम दें? कैसे कह दें कि वह एक चीज़ है? वह बस नाम से एक चीज़ है, वह एक चीज़ है ही नहीं। पर हम उसे एक चीज़ समझते हैं इसीलिए उसके खोने के और मिटने के डर में जीते हैं। तुम जो चीज़ हो वह निरंतर परिवर्तनशील है, उसका कोई केन्द्र नहीं है। वह पूरी ही तरह बदल जाती है। तो उसके मिटने का तुम्हें डर क्या? और वह जो अपरिवर्तनीय है उसको तुम खो नहीं सकते, तो उसके मिटने का तुम्हें डर क्या?

लेकिन हम इतने ग़ौर से देखते नहीं न, क्योंकि चीज़ों का नाम एक है, स्थान एक है, रूप-रंग एक है तो हमें लगता है चीज़ भी एक ही है। ईमानदारी से बताना, आज अगर पचास साल के हो गये हो तो तुम्हारा नाम तो वही है न जो पाँच की अवस्था में था? है कि नहीं? पर पचास के जो तुम हो और नाम है तुम्हारा कुछ भी, मान लो राघवेन्द्र। पचास के राघवेन्द्र और पाँच के राघवेन्द्र में कुछ भी साझा है क्या? कुछ भी? मानसिक तौर पर तो छोड़ दो, शारीरिक तौर पर भी कुछ नहीं साझा है, शरीर की एक-एक कोशिका तक बदल चुकी है। पाँच साल के राघवेन्द्र की एक भी कोशिका नहीं बची है पचास साल के राघवेन्द्र में। लेकिन राघवेन्द्र का दावा वही है कि ‘मैं ही तो हूँ जो पाँच में था और मैं ही तो हूँ जो पचास में है।’ कैसे भाई, कैसे?

शरीर की कोशिकाएँ सारी बदल ही चुकी हैं, चलो एक काम और कर देते हैं। किसी तरीक़े से तुम्हारी स्मृति का लोप कर देते हैं। और वह बहुत आसान है, विज्ञान यह करना जानता है। विज्ञान तो छोड़ दो, किसी आम सड़क दुर्घटना में भी यह हो सकता है कि तुम्हारी याददास्त चली जाए। अब बताओ, पाँच साल के राघवेन्द्र और पचास साल के राघवेन्द्र में क्या साझा बचा? न शरीर एक है, न मन एक है लेकिन तुम अभी भी कहते रहोगे, 'ये व्यक्ति तो वही है।' क्या यह व्यक्ति वास्तव में वही है? कुछ भी नहीं है जो एक हो। लेकिन हमें भ्रम बना रहता है कि हम तो हैं। अपनी अनित्यता का दिखना ज़रूरी है। और बताने वालों ने कहा है कि जो अनित्य है वही असत्य है। नित्य समझते हो? जो निरन्तर हो, टूटे न, जिसकी श्रृंखला कभी अवरुद्ध न हो।

घर को भी कह देते हो एक है। पुरानी कोठी है तुम्हारी और कोठी का कुछ नाम दे लो तुम बढ़िया सा, ‘सत्य-सदन’। अब ज़रा बताना, पचास साल पहले की जो कोठी थी और पचास साल बाद की जो कोठी है, क्या उसमें कुछ भी साझा है? पर तुम कहते यही हो कि यह तो वही घर है, ‘सत्य-सदन’। यही कहते हो न?

हाँ, जब समय का अन्तराल बहुत बढ़ जाए, तब तुम्हें मानना ही पड़ता है कि कुछ शेष नहीं बचा। कुछ शेष नहीं बचा यह तुम तभी मानते हो जब कोठियों के अवशेष मात्र बचते हैं। पुराने दुर्गों और महलों को देखो, चले जाओ राजस्थान, तब तुम्हें यक़ीन हो जाएगा कि नहीं-नहीं, बस नाम वही है, और कुछ नहीं है। नाम हो सकता है कुछ भी, 'जयपुर का किला', 'जोधपुर का किला', फ़लाना दुर्ग, फ़लाना महल। पर क्या उनमें कुछ भी वैसा है जैसा दो-सौ साल पहले था, कुछ भी? बोलो! नाम लेकिन वही है। हम नाम पर चलते हैं, हम नाम के पुजारी हैं। चूँकि नाम नहीं बदल रहा तो हमें लगता है कि एक निरन्तरता बनी हुई है, नित्यता बनी हुई है। नित्यता नहीं है भाई! अपनी निस्सारता को देखो।

और देखने-सुनने के अगर इतने शौक़ीन नहीं हो तो दूसरा तरीक़ा और सरल है। दूसरा तरीक़ा यह है कि किसी ऐसे के पास जाकर बैठ जाओ जो बाँध ही ले तुमको। अगर बहुत अक़्ल नहीं दौड़ाना चाहते, अवलोकन के बहुत शौक़ीन नहीं हो, अगर कहते हो कि साहब हमारी नज़र बहुत तेज़ नहीं है, हमारे विवेक में बहुत तीव्रता, तीक्ष्णता नहीं है। या कहते हो कि साहब हम तो सीधे-सरल आदमी हैं, आपने क्या लम्बा तरीक़ा बता दिया कि सब चीज़ों की निस्सारता को देखो, हमें दिखायी ही नहीं पड़ती। तो मैंने कहा, दूसरा तरीक़ा यह है कि तलाश लो उसको जो सुन्दर हो और फिर उसके प्रति कोई विरोध मत रखो।

प्रेम का स्वागत करो, डूब जाओ उसमें। एक बार तुम प्रेम में डूबे नहीं कि अपनेआप उस सबसे बेगाने हो जाओगे जो निस्सार है। सच्चे प्रेमियों को फ़िक्र ही नहीं रह जाती खाने की, पीने की, रुपये की, पैसे की, कैसे दिख रहे हैं, कैसे नहीं दिख रहे हैं। आशिक़ों को तुम दूर से बता सकते हो उनकी ख़स्ता हालत देखकर। कहोगे, ‘और कुछ नहीं है, इसको हुआ है!’

ये जो आम मोहल्लेबाज़ी का इश्क़ होता है, इसमें भी हम दीवाने हो जाते हैं, तो सोचो जब परमात्मा से इश्क़ होगा तो उसमें कैसा दीवानापन छाएगा।

ये दूसरा तरीक़ा है। इसको बताने वालों ने कहा है कि यह ज़्यादा सरल तरीक़ा है। तुम्हें कुछ नहीं करना, तुम्हें बस चीज़ों को होने देना है। तुम्हें गिरफ़्तार हो जाना है। अब बताओ तुम्हें क्या करना है? जिसने गिरफ़्तार किया है, वह करे जो करे, तुम्हें क्या करना है! तुम्हारा काम तो यह है कि डालने वाला आया तुम पर बेड़ियाँ डालने और तुमने कोई प्रतिरोध नहीं किया। तुमने कहा, 'आ ले चल! तू सुन्दर है इतना, तू प्यारा है इतना, तुझे देखने भर से जी को ठंडक मिलती है। हम तेरा विरोध कैसे करें! ले चल, जहाँ ले जा रहा है ले चल।' चुन लो अपना रास्ता, पर कुछ तो चुनो।

प्र२: अगर मैं अपना अनुभव लूँ तो ज्ञान मार्ग से जीवन की निस्सारता दिखती है। दैनिक जीवन में भ्रम हैं, माया है। पता चलता है कि क्या यथार्थ है और क्या नहीं है। लेकिन उस वैराग्य के बाद भी जो आपने कहा था कि 'हीरा दिख जाए', या आपने बोला कि ठेले पर कृष्ण हैं, वह अनुभूति उस तरह से नहीं होती। एक परिकल्पना, एक अभिधारणा लगती है कि ठीक है, मेरे मन ने एक स्तर तक चीज़ों को देखा है। जो मुझे दुनिया में दिख रहा है अब मैं उसमें भेद कर पाता हूँ कि यह अनित्य है, इसको छोड़ा जा सकता है, यह ठीक है। पर क्या मैं एक शारीरिक मशीन से ज़्यादा हूँ? या भगवान भी क्या मेरी एक परिकल्पना है? उसके लिए प्रेम नहीं दिखता है, निगेशन (नकार) दिखता है चीज़ों का। तो क्या मिसिंग है?

आचार्य: कुछ मिसिंग नहीं है, निगेशन करते चलो। तुम्हारे हाथ में नेगेशन ही है। जिस चीज़ पर तुम्हारा हक़ चलता है वह चीज़ यही है कि तुम कह दो कि यह चीज़ निस्सार है। क्यों? क्योंकि तुम्हारा हक़ दुनियावी चीज़ पर ही तो चलेगा न? (चाय का कप उठाते हुए) यह चाहे सच्ची हो या झूठी हो, मैं इसी के बारे में तो कोई बात कर सकता हूँ न क्योंकि यह चीज़ मेरी पकड़ की है। यह चीज़ दुनिया की है तो मैं इसके बारे में कुछ कह भी सकता हूँ। यहाँ इतने लोग बैठे हैं, मैं इनको देखकर के कह सकता हूँ कौन सुन रहा है, कौन नहीं सुन रहा है। पर जो यहाँ हो ही न, उसके बारे में क्या यह कहा जा सकता है कि वह सुन रहा है या नहीं सुन रहा है? नहीं कहा जा सकता न?

ठीक इसी तरीक़े से सार या असार दुनिया की ही वस्तुओं को ठहराया जा सकता है न, क्योंकि वह दृष्टि के समक्ष होती हैं, क्योंकि वह अनुभव के लिए उपलब्ध होती हैं, क्योंकि वह प्रयोग के लिए उपलब्ध होती हैं। तभी तो उनके बारे में कह सकते हो। तो तुम यही करते चलो, तुम्हारा हक़ इतने पर ही है। नेति-नेति भी दुनिया की ही तो की जा सकती है न? तो दुनिया में जो कुछ सामने है तुम उसकी नेति-नेति करते चलो।

तुम पर कोई बाध्यता नहीं है कि तुम साथ-ही-साथ किसी अलौकिक ईश्वर की कल्पना भी गढ़ो, बल्कि अगर ऐसी कोई कल्पना तुम्हारे पास है तो तुम उस कल्पना की भी नेति-नेति कर दो। तुम कह दो, 'ये भी असार है क्योंकि आज रहती है, कल नहीं रहती है।' हिन्दू की कल्पना एक होती है, मुसलमान की कल्पना दूसरी होती है। तो इसमें भी क्या शाश्वतता है?

तुम बस काटते ही चलो, काटते ही चलो। काटने पर तुम्हारा हक़ है। हीरा तो भेंट में मिलता है, उसकी उम्मीद करने से कोई लाभ नहीं। तुम्हारा काम है कचरे की सफ़ाई करना। सफ़ाई करने पर तुम्हारा हक़ है, तुम सफ़ाई करते चलो। हीरा? उसकी कोई आस मत रखो, उसकी कोई छवि मत रखो, क्योंकि उसकी आस रखोगे, उसकी छवि रखोगे तो गच्चा खा जाओगे। असली हीरा बिलकुल तुम्हारी छवि से मेल नहीं खाने वाला। और तुमने छवि बना ली है, तुम कह रहे हो, 'हीरा तो जगमगाते लाल रंग का होता है!' और जो असली हीरा है, क्या पता वह बेरंगा हो! फिर वह तुम्हारे सामने आएगा, तुम उसको अस्वीकार कर दोगे। मारे गये न?

तुम उतना ही करो जितना तुम्हारे अधिकार में है। तुम्हारे अधिकार में है झूठ को झूठ देखना। झूठ को ख़ारिज करते चलो, सत्य की परवाह मत करो। सत्य कभी तुम्हारे सामने आया, अच्छी बात। नहीं आया, तो वह पीछे से तुम्हें बल दे रहा है। सत्य अगर तुम्हें बल नहीं दे रहा होता तो तुम झूठ को कैसे ख़ारिज कर पाते? क्या झूठ, झूठ को ख़ारिज कर सकता है? तो निश्चित रूप से अगर तुम नेति-नेति कर पाते हो तो इसका मतलब है कि कोई तो है न जो तुम्हें नेति-नेति करने का विवेक दे रहा है। कौन है इस विवेक के पीछे, उसी को सत्य कहते हैं। वह कभी साकार होकर तुम्हारे सामने आ जाए तो किस्मत तुम्हारी। साकार होकर नहीं भी सामने आता तो तुम यही जानो कि उसका अनुग्रह, उसकी कृपा तुम्हें उपलब्ध है। कैसे उपलब्ध है? तुम्हें संसार असार दिख रहा, यही बात बता रही है कि सत्य ने तुम्हें वरदान दिया है। सन्तुष्ट रहो इतने में ही।

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