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चुड़ैल मुर्गी चुराती पकड़ी गई || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

Author Acharya Prashant

Acharya Prashant

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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्यजी। शत्-शत् नमन। मेरा नाम जगदीश है। मैं उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद से आया हूँ। आचार्य जी, मेरा प्रश्न बली प्रथा से है संबंधित है। मैं जिस समाज में रहता हूँ, वहाँ सदियों से बली प्रथा होते आ रहा है और वहाँ पर एक गहरी श्रद्धा और आस्था उन लोगों ने बली प्रथा पर बना दिया है। तो आचार्य जी, जो पूजा करने का तरीका है, इसमें क्या होता है कि जो भी देवताओं का पूजा किया जाता है, वो एक स्त्री या पुरुष के रूप में आता है। मैंने बचपन से अपनी आँखों से होते हुए देखा है। प्रत्यक्ष अपनी आँखों से होते हुए देख रहा हूँ मैं।

तो आचार्य जी, मुझे यह चीज़ समझ में नहीं आती है। मैं लोगों को कहता हूँ कि ये चीज़ गलत है तो वो मुझे कहते हैं, “तू कौन होता है कि हमारे देवी या आस्था पर चोट करने वाला? तू बेकार आदमी है या तू पागल है।“ ऐसा मुझे पूरा समाज कहता है लेकिन जो भी मैं यह शक्ति अपनी आँखों से देखता हूँ तो मुझे भी लगता है, संशय रेहता है कि है क्या यह चीज़। इसमें मैं हमेशा दुविधा में रहता हूँ। कृपया इस पर मार्ग दर्शन दीजिए।

आचार्य प्रशांत: क्या मार्गदर्शन दूँ मैं? पुरुष या नारी के रूप में आता है, माने क्या आता है?

प्र१: पुरुष और नारी के शरीर में अजीब कंपन टाइप सा आता है और वो अपना पूरा-पूरा माहौल बदल देते हैं।

आचार्य: ठण्ड लग गई होगी। पहाड़ों का मामला है।

प्र१: नहीं जी! हमने देखा है बचपन से।

आचार्य: तो कांपते ही तो देखा है न?

प्र१: एक बार स्वयं मेरे साथ भी हुआ था अभी हाल ही में। कुछ दिन ही की घटना....।

आचार्य: अभी तो नहीं हो रहा है?

प्र१: अभी नही जी। केवल पहाड़ों में, जब मैं घर जाता हूँ तो। मैं भी नहीं मानता हूँ लेकिन यह प्रत्यक्ष होता हुआ दिखाई देता है।

आचार्य: क्या देखा है? कि कोई बोल रहा है कि मुझमें देवी-देवता है?

प्र१: नहीं वो नहीं। बिलकुल हमला जैसे। कोई चिल्ला-चिल्ला कर।

आचार्य: हमला तो कोई कुछ भी कर सकता है। उससे क्या हो गया? तुम्हारा पड़ोसी तुम पर हमला कर सकता है। उससे क्या हो गया?

प्र१: वो लोगो से माँग करते हैं कि तुम मुझे दो। तब लोग डर के मारे वहाँ बली दे देते हैं। यह चीज़ सदियों से चल रही है।

आचार्य: सदियों से भी पुरानी सदियों से ये चल रहा है। जानते हो पूरी भगवद्गीता गीता क्या है? वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध, कृष्ण की सीख।

न लड़ने के पक्ष में अर्जुन जो तर्क देते हैं, उनमें से एक तर्क यह भी है कि सब क्षत्रिय मर जाएँगे तो कर्मकांड कौन करेगा फिर? पित्रों का श्राद्ध तर्पण, ये सब कौन करेगा? ये जितनी कर्मकांड वाली बातें होती हैं वो सब कौन करेगा?

कितने ही श्लोक हैं जिसमें श्रीकृष्ण सीधे नाम लेकर के बोल रहे हैं कि तुम्हारी बुद्धि ही भ्रष्ट इसलिए हो गई है अर्जुन क्योंकि तुम ये वैदिक कर्मकांड में फँसे हुए हो।

तो ये पिछली कुछ सदियों की बात नहीं है, ये उस समय से चल रहा है। कि साधारण जनता को इन सब फिज़ूल बातों के अलावा कुछ समझ में ही नहीं आता था। अर्जुन तक इन्हीं बातों में फँसे हुए थे। गीता के अट्ठारह अध्याय लगे अर्जुन को इन बातों से बाहर निकालने में।

मज़ा आता है, मनोरंजन है, अच्छा खेल है। कोई काँप रहा है, कोई हमला कर रहा है। फिर बली दी जाती होगी तो फिर पकता भी होगा आगे?

प्र१: मैं समर्थन नहीं करता हूँ। मैं तो आपके अनुसार वीगन हो गया हूँ। जैसे आपने बताया था, मैं तो उनके खिलाफ़ हूँ। केवल मैं ही आवाज़ उठा रहा हूँ वहाँ पर अभी।

आचार्य: मैं क्या बोलूँ? कोई सामने बोलने लायक चीज़ हो तो उस पर बोलूँ भी। निरी मूर्खता पर मैं क्या टिप्पणी करूँ?

हाँ, मैं दाद जरूर दे सकता हूँ, ताली बजा सकता हूँ, माया का प्रशंसक बन सकता हूँ कि उसमें कितनी क्षमता है — एक साथ पूरी एक भीड़ को, बल्कि पूरे समाज को अपने लपेटे में ले लेने की कि सौ-पाँच सौ या हजार लोग खड़े हुए हैं और सब एक साथ बेवकूफ़ बने हुए हैं।

वाह री माया, महाठगिनी!

देखो, समझो बात क्या है, मूल बात क्या है। तुम बारह-चौदह साल के हो मान लो और कोई तुमसे कहता है कि ये सब होता है, देवी उतरती है इंसान में; फिर वो कांपने लगता है; फिर वो हमला करता है; फिर देवी बोलती है बली दो। और तुम को ये बात बताई जा रही है और कहा जा रहा है कि ये तुम भी मानो नहीं तुम्हारे लिए खतरा हो सकता है क्योंकि देवी में बहुत ताकत है।

तुम वो खतरा क्यों उठाओगे? तुम इन बातों से इनकार करने का खतरा, रिस्क क्यों उठाओगे, बताओ न? आसपास हज़ारों लोग हैं जो इन्हीं बातों को मान रहे हैं। तुम ये खतरा क्यों उठाओ कि मैं नहीं मानता। तुम कहते हो कि सब मान रहे है तो मैं भी मानता हूँ।

सिर्फ़ एक व्यक्ति है जो कहेगा, “नहीं, मैं नहीं मानता।“

कौन? जो सच्चाई से, मुक्ति से, पूरी तरीके से परिचित है; जो मुक्त है। किससे मुक्त है? भ्रम से मुक्त है। सिर्फ़ वही दृढ होकर के, ठसक के साथ कह सकता है कि मैं नहीं मानता। जिस व्यक्ति को अभी थोड़ा भी संशय है कि सच्चाई चीज़ क्या है, जिसको अभी पाँच प्रतिशत भी संदेह है, वो कहेगा, “रिस्क कौन ले, मान ही लो। पिचानवे प्रतिशत तो मुझे यही लग रहा है कि ये सब ढकोसला है पर अगर पाँच प्रतिशत भी इस बात में सच्चाई है तो मैं ही काहे को आगे बढ़कर के खतरा उठाऊँ? सब मान रहे हैं, मैं भी मान लेता हूँ। मेरी जान थोड़े ही जा रही है, बकरे की जा रही है। मान ही लेता हूँ।“

जब आपको सच्चाई पता नहीं होती तो उसका एक भयानक परिणाम यह होता है कि आप किसी भी झूठ से दृढ़तापूर्वक इनकार नहीं कर सकते, सोचकर देखिए। जब आप सच्चाई को लेकर के पक्के नहीं होते, तो कोई भी झूठ आपके सामने लाया जाए, आप उससे पूरी तरह असहमत नहीं हो पाएंगे।

आप क्या कहेंगे? यह भी ठीक है। बहुत लोग ऐसे होते हैं। उन्हें कुछ भी बताओ उनका जवाब ये आता है, “नहीं, वो बात भी ठीक है।“ आप उन्हें कोई बात बताइए, पूरा समझा दीजिए, तो कहेंगे, “नहीं, आपकी बात तो ठीक है, लेकिन वो बात भी ठीक है।“ ये वो व्यक्ति है जिसे सच्चाई समझ में ही नहीं आई। सत्य को इसीलिए ‘अद्वैत’ कहा गया है। वह दूसरा नहीं हो सकता; उसका कोई प्रतिपक्ष नहीं हो सकता; उसका कोई विपरीत नहीं हो सकता।

जब आप सत्य में नहीं होते तो कोई भी बात और उसकी विपरीत बात भी, दोनो ही बातें आपको लगभग ठीक लगती है। ये हो सकता है कि एक बात पिचानवे प्रतिशत ठीक लगे, दूसरी बात पाँच प्रतिशत। लेकिन आप ये नहीं कह पाएंगे — सौ और शून्य। एब्सोलयूटली सर्टेन नहीं हो पाएंगे।

सत्य अकेला होता है जो एबसोल्यूट होता है। उसके अलावा, बाकी सब तो तुलनात्मक होता है, *रिलेटिव*। और जहाँ नुकसान की बहुत आशंका हो, वहाँ व्यक्ति जोखिम नहीं उठाता। भले ही निन्यानबे प्रतिशत उसको निश्चय हो कि सामने झूठ है लेकिन फिर भी उसको झूठ बोलेगा नहीं। वो कहता है एक प्रतिशत का संदेह है और एक प्रतिशत का भी जोखिम, तो काय को उठाऊँ? अगर देवी वाकई होती और कुपित हो गई तो मेरी जान ही ले लेगी। यह एक प्रतिशत रिस्क भी बहुत बड़ा है। मैं नहीं उठाता, मैं नहीं उठाता।

अध्यात्म अकेली चीज़ है जो आपको शत-प्रतिशत निश्चय की ओर लाती है। और यही उसका फायदा है। वो आपको संदेह से मुक्त कर देती है। कृष्ण कहते हैं, निश्चयात्मिका बुद्धि। ऐसी बुद्धि जो अब कंपित नहीं है, जो निश्चित हो गई है और आत्मा में आसीत हो गई है; निश्चित होकर वहाँ बैठ गयी है, वहाँ हिलडुल नहीं रही है। इतना महत्व है — निश्चयात्मिका बुद्धि।

हमारी निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं है। हम निश्चित नहीं हैं ; हम डाउटफुल हैं । और चूँकि हम संदेह में पड़े हुए हैं, इसलिए किसी भी बात से हम पूरे तरीके से डटकर के इनकार नहीं कर पाते। नतीजा ये होता है कि फिर हमारे सामने किसी भी तरह की मूर्खतापूर्ण बात कहीं जाती है। हमको लगता है रिस्क कौन ले? क्या पता सही ही हो! नहीं, लग तो रहा है कि यह बात फ़िज़ूल है, लेकिन अगर एक प्रतिशत भी ये सही निकली, रिस्क कौन ले? चलो सबलोग जो कर रहे हैं, मैं भी वही कर लेता हूँ। ये है अंधविश्वास का मनोविज्ञान।

अंधविश्वास की काट, इसीलिए मैं बार-बार बोलता हूँ, साइंस नहीं है। स्पीरिचुएलिटी (आध्यात्मिकता) है, क्योंकि बड़े-बड़े साइंटिस्ट (वैज्ञानिक) भी अंधविश्वासी होते हैं। आध्यात्मिक आदमी होता है, बस जो अंधविश्वासी नहीं हो सकता।

प्र२: नमस्ते आचार्य जी। मेरा यह कहना है कि चाहे वो उनका बली का मैटर (विषय) हो, चाहे वो उनका, उससे पहले एक क्वेस्चन (प्रश्न) था। पर कुछ तो पावर्स, हम यहाँ पर एवरीडे उसमें देखते हैं जैसे जगन्नाथ मंदिर है; उसमें काफी चीज़ें हैं, जो कि हमने सुनी है। जैसे चाहे वो झंडा है। चाहे उनको खाना पकने का है। बहुत सारी चीज़ें हैं ऑल ओवर इंडिया में। क्योंकि ये एक तरह से शक्ति, पावर, जो लगता है कि चीज़ें तो हैं, कुछ शक्ति तो है।

आचार्य: आप यहाँ पर्यटन के लिए आए है या कुछ समय से मुझे सुना है आपने? आप यहाँ पर कैसे पधारे? आपने मुझे सुना है तो ये आप ये कैसी बातें कर रहे हैं? क्या हो गया?

प्र२: बहुत सारी चीज़ें हैं और बहुत सारी चीज़ें हैं।

आचार्य: ये बहुत सारी, बहुत सारी से क्या कर रहे हैं आप ये? मैं एक चीज़ जानता हूँ।

प्र२: जो ये प्रूव (सिद्ध) करती हैं कि शक्तियाँ हैं।

आचार्य: कहाँ है? कहाँ-कहाँ है? अरे रुकिए तो सही। शक्तियाँ कहाँ हैं?

प्र२: तो हम उनको क्या कहेंगे? ये क्या चीज़ है?

आचार्य: आपको कैसे पता वहाँ कुछ है भी?

प्र२: नहीं झंडा सब तो देखते हैं कि वो झंडा, हवा की डायरेक्शन में नहीं, उल्टी डायरेक्शन (दिशा) में चलता है।

आचार्य: इस दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं है जो विज्ञान के नियमों का उल्लंघन कर सके। और एक बात समझिएगा ध्यान से — विज्ञान बड़ी ईमानदार चीज़ होती है। दस करोड़ प्रयोग आप कर लो विज्ञान के किसी नियम को सिद्ध करने के लिए। और दसों करोड़ प्रयोग उस नियम को सही सिद्ध करते हो, कोई बात नहीं। अगर एक भी प्रयोग ऐसा उपलब्ध हो जाएँ जिससे विज्ञान का कोई नियम टूटता है तो वो नियम हमेशा के लिए टूटा मान लिया जाता है। अगर एक भी दृष्टांत, एक भी ऑब्जर्वेशन एक भी एविडेंस (प्रमाण) ऐसी ला दी जाएँ जहाँ विज्ञान का कोई नियम टूटता हो, तो फिर उस नियम को सदा के लिए खंडित मान लिया जाता है। विज्ञान इतना ईमानदार होता है।

अगर ऐसा हो सकता कि कोई ऐसा झंडा है जो फ्लूइड डायनेमिक्स के नियमों का उल्लंघन कर रहा है, तो फ्लूइड डायनामिक्स का पूरा क्षेत्र विज्ञान ने कब का त्याग दिया होता। हवा का चलना और झंडे को फ़हराना, ये फ्लूइड-सॉलिड इंटरेक्शन है फिजिक्स की भाषा में। अगर एक भी ऐसी एविडेंस आ जाएँ जहाँ फ्लूइड डायनेमिक्स के नियम टूट रहे हैं तो फिर उन नियमों को हमेशा के लिए त्याग दिया जाएगा। आप ऑब्जर्वेशन और प्रोपेगेंडा में अंतर नहीं समझ पाते।

मैं जब आई आई टी में था, सन् सतानवे वगैरह की बात है, तो बड़ी ज़ोर की ख़बर फ़ैली थी कि मूर्तियाँ दूध पी रही हैं। सतानवे-अट्ठानवे की बात होगी या छियान्वे की। वहीं आई आई टी के बगल में जी एस रॉय है। वहाँ पर भी एक छोटा सा मंदिर था। शायद सैकड़ों, शायद हज़ारों की भीड़ लगी हुई है और एक-एक व्यक्ति जो बाहर निकल रहा है, बोला ‘मैंने भी पिलाया। आज के दिन मूर्तियों ने दूध पीना शुरू कर दिया है। मैंने भी पिलाया, मैंने भी पिलाया।‘ कुछ भी नहीं था, वो कैपिलरी एक्शन था। हम देख रहे हैं, हमें दिखाई पड़ रहा है। लेकिन मानने वालों को मानना है तो मान रहे हैं।

अरे, तुम विज्ञान के नियम थोड़े ही तोड़ दोगे भाई? और विज्ञान ऐसा कहता भी नहीं कि उसके नियम तोड़े नहीं जा सकते। वो कहता लेकिन अगर एक भी तुम प्रमाण ले आओ कि नियम टूट रहा है तो हम कहेंगे कि टूट गया; अब हम अगले नियम की खोज करेंगे; अब हम आगे की बात करेंगे। यह हम कह देंगे कि ये जो हमारे नियम है वो बस इतने क्षेत्र में लागू होते हैं, इसके आगे नहीं लागू होते। उदाहरण के लिए जो न्यूटोनियन फिजिक्स है वो सब एटमिक डिस्टेंस पर लागू नहीं होती। तो जब आप बड़े इंटरेक्शन , बड़े डिस्टेंस की बात कर रहे होते — जैसे मैं बैठा हूँ, आप बैठे हैं, मैं आपको एक गेंद उछाल करके दूँ, गेंद आपके हाथ में कितनी देर में आएगी, ये बात न्यूटन्स लॉज से तुरंत अभी निकाली जा सकती है। लेकिन अगर मुझमें और आपमें उतनी ही दूरी हो जितनी की इलेक्ट्रॉन और प्रोटोन में होती है, तो न्यूटन्स लॉज नहीं लग सकते। यह बात विज्ञान तुरंत मान लेता है क्योंकि उसको तो जानना है कि चल क्या रहा है।

हमारी समस्या यह है कि हम न तो विज्ञान में शिक्षित हैं न अध्यात्म में दीक्षित हैं। हमें कुछ नहीं पता। न हमें साइंस पता है, न स्प्रिच्वलिटी पता है। हम बीच के बिच्छु है, त्रिशंकु की तरह लटके हुए हैं। हमें कोई कुछ भी बताता है हम मान लेते हैं — मूर्ति दूध पी रही है!

उसमें भी आगे और बताऊँ? मनोविज्ञान क्या है? हम क्यों जल्दी से मानने को उत्सुक रहते हैं, और भी बात है।

हम अपनी ज़िन्दगी से बहुत उकताएँ हुए हैं। जैसे हमारी ज़िन्दगी है न, तो कहीं-न-कहीं हम ये माँगते रहते हैं, चाहते रहते हैं कि ज़िन्दगी से आगे का कुछ हो, कुछ रोमांचक, कुछ उत्साहवर्धक, कुछ रसीला। यही वजह है कि हॉरर थ्रिल्लर्ज़ चलती हैं। यही वजह है कि आप जब कोई फ़िल्म देखने जाते हैं और उसमें आप पाते हो एक आदमी हाथ से बुलेट ऐसे-ऐसे घुमा रहा है तो आपको बिलकुल मज़ा आ जाता है क्योंकि आप अपने सादे और उबाऊ जीवन से तंग आ चुके हो। आपका जीवन ऐसा है जिसमें कि वो बुलट ऑटो-इग्नीशन भी नहीं लेती, किक मारने पर भी नहीं स्टार्ट होती है; किक मारो तो बैक मारती है; टांग तोड़ती है। और आपको पर्दे पर दिखाई दे रहा है, उसने ऐसे लेकर बुलेट घुमा दी, मज़ा आ गया। अब इस मज़े के लिए बहुत ज़रूरी है कि विज्ञान के सिद्धांतो को परे रख दिया जाए। है कि नहीं?

अगर आपको वो मज़ा लेना है तो बहुत ज़रूरी है कि आप भूल जाए कि विज्ञान के अनुसार यह नहीं कर सकते बुलेट के साथ। अगर उस क्षण में आपको विज्ञान याद रह गया तो आपके मज़े का क्या होगा?

प्रक्रिया समझिए। आप अपनी निजी ज़िन्दगी से बहुत उकताए हुए हैं। क्योंकि आप गलत जी रहे हैं। आपके जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं है जो जीवन को रस दे, आनंद दे, उत्साह दे, जो ज़िन्दगी को जीने लायक़ बनाए। कुछ भी नहीं है ऐसा ज़िन्दगी में, तो हमें क्या चाहिए? हमें थ्रिल, एडवेंचर रोमांच चाहिए। हमें यह चाहिए कि एक आदमी बुलेट को ऐसे घुमा रहा है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि साइंस को साइड में रख दिया जाए। ठीक वही रोमांच जो आपको इसमें मिलता है, वही रोमांच वो सब सुनने में मिलता है कि फ़लानी जगह पर वो एक बच्ची पैदा हुई है और पैदा होते ही उसने बता दिया कि बगल के गाँव में मेरा पुराना पति है। उसी ने हत्या करी थी मेरी।

‘हैं! ऐसा?’

एकदम सुखी हुई कुपोषित चूहे जैसी शक्ल थी; बैठे हुए थे और जैसे ही पता चला कि बगल के गाँव में एक बच्ची ने बता दिया कि मर्डर कर रहा था उसका पिछले जन्म में। एकदम बिजली सी (तन कर बैठते हुए) — हाँ, बताओ-बताओ और क्या हुआ?

क्या है? कुल बात इतनी है कि आनंद नहीं है, मनोरंजन चाहिए। तुम इस तरह की बातों का भी इस्तेमाल, मनोरंजन के लिए कर रहे है और कुछ नहीं है। नहीं तो बताओ न ये हॉरर फिल्म बनती ही क्यों और लोग उन्हें क्यों देखने जाते? आपको अच्छे से पता है वो क्या है और फिर भी आप बैठते हो और डरते भी हो। और पता है वो फ़िल्म है बस।

चलो डरे! लेकिन कुछ ज़िन्दगी तो आई। नहीं तो सूखी लकड़ी जैसा जीवन। आधा मैं मुर्दा, आधा श्रीमती जी मुर्दा, दो बच्चे घूम रहे हैं लाश जैसे; कुछ रोमांच तो हुआ। बूढ़े बरगद पर उल्टी चुड़ैल लटकी हुई है और गुरु जी बता रहे हैं कि किस तरीके से उसको मुक्ति देनी है; कुछ मज़ा तो आया। ये जो मजे की कमी है न जीवन में, वो आपको इन सब बातों पर विश्वास करने की ओर धकेलती है।

अध्यात्म कहता है कि बेटा, मज़े करने का असली तरीका सीखो। एक बार जीवन में असली मज़ा आ गया, आनंद आ गया तो फिर ढकोसलों का इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा मज़ें लेने के लिए। फिर ये नहीं करना पड़ेगा कि वीएफएक्स मज़े ले रहे हो — कि वो गया, उसने कार को लात मारी और कार उछल करके वाइट हाउस पर जाकर गिरी; उसको पता चला कि उस पर सरकार नज़र रख रही है सेटेलाइट से, तो उसने जेब से अमरूद निकाला और अमरूद फेंक कर मारा और सेटेलाइट नीचे आ गया। अब अमरूद से सेटेलाइट नीचे आ सकता है, इसके लिए आपको देखिए फिजिक्स को भुलाना पड़ेगा। फिजिक्स याद रह गई तो सेटेलाइट नीचे आएगा ही नहीं अमरूद से। तो विज्ञान, मनोरंजन का बहुत बड़ा दुश्मन है, सस्ते मनोरंजन का। अगर आपको इस तरह का सस्ता मनोरंजन चाहिए तो ज़रूरी है कि वैज्ञानिक सिद्धांतों को आप भुलाएँ।

मैं कह रहा हूँ, 'क्यों कर रहे हो सस्ता मनोरंजन, वो भी धर्म के नाम पर?' धर्म इतनी ऊँची बात है; धर्म से ऊँची कोई बात ही नहीं होती; धर्म को मनोरंजन क्यों बना रहे हो भाई? धर्म आनंद दे देगा। उसको मनोरंजन के लिए इस्तेमाल मत करो। लेकिन धर्म आनंद तब देगा जब धर्म अध्यात्म हो। धर्म यदि अध्यात्म है, जीवन खिला-खिला रहेगा। फिर आपको ये सब नहीं चाहिए होगा कि जो भी है — फलाने पर देवी उतर आई; चुडैल पकड़ी गई बकरी चुराते हुए; कल्लू की बीवी डायन है; कितना मज़ा आता है! कल्लू की बीवी डायन है; मज़े आ गए; आज पैसा वसूल।

प्र३: प्रणाम आचार्य जी। कोटी-कोटी नमन। मेरा नाम अशांत है। मैं आई आई टी, दिल्ली से एम.टेक कर रहा हूँ। मेरे एक मित्र हैं जो कि साइंटिस्ट (वैज्ञानिक) है, एक अच्छे रिसर्च इंस्टिट्यूट में। लेकिन वो भी सर अभी भी भूतप्रेत की बातों में विश्वास रखते हैं। और वो ये तर्क देते हैं कि लाइक जैसे रेडियो वेव्स होता है, वो हमको दिखता नहीं है, *बट स्टिल इट एक्सिज़्ट्स*। तो मेरे पास तर्क नहीं रह जाता तो मैं आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ।

आचार्य: अरे भाई, किसी चीज़ की सत्ता को, भौतिक सत्ता को सिद्ध करने के लिए विज्ञान में ऑप्टिकल मार्ग ही थोड़े ही है? कौन कह रहा है कि तुमको वो चीज़ दिखनी चाहिए तभी वो एक्सिज़्ट करती है *फिज़िकली*। लेकिन एग्जिस्टेंस तो उसका तब भी फिजिकल ही है न? उसका ओरिजिन भी फिजिकल है और उसका प्रूफ भी फिजिकल है। तो उसको दर्शाया जा सकता है। दर्शाया ही नहीं जा सकता, उसको अपने अनुसार फिर साधा भी जा सकता है।

ये बात कि करेंट दिखता नहीं है पर लगता बड़ी ज़ोर का है न। वैसी ही होती है चुड़ैल, दिखती नहीं है, लगती है। ये क्या है? भाई करेंट जो कह रहे हो, वो आ रहा है कोल फायर्ड पॉवर प्लांट से। करेंट नहीं दिखता, कोल तो दिखता है न? चुड़ैल कौन सी पॉवर प्लांट से आ रही है?

रेडियो वेव्स नहीं दिखाई पड़ती, रेडियो तो दिखाई पड़ता है? और रेडियो वेव्स को तुम शत-प्रतिशत एक्यूरेसी (सटीकता) के साथ मॉड्यूलेट (नियंत्रित) कर सकते हो। प्रेत को भी कर सकते हो। तो लोगों ने कहा कि हाँ कर सकते हैं सर। रेडियो बजता है, वैसे प्रेत चढ़ जाता है तो हम भी बजते हैं। अब हम रेडियो हो गए हैं। हममें प्रेत बोल रहा है, ए आई आर प्रेत रेडियो। अगले एक घंटे के लिए डीजे प्रेत आपके साथ है।

स्प्रिचुएलिटी की भी बाद में ज़रूरत है। हमारा जो देश है, ये साइंटिफिक्ली मैलनरिश्ड है। एक तो विज्ञान की शिक्षा दसवीं में रुकनी नहीं चाहिए। बारहवीं तक सबके लिए अनिवार्य होना चाहिए। बड़ी गड़बड़ बात हो जाती है। दसवीं तक आते-आते आपको कुछ शब्द तो पता चल ही जाते हैं, जैसे फोर्स एनर्जी पॉवर। ये टेक्निकल वर्ड्स हैं फिजिक्स में। लेकिन आप इनको पूरी तरह नहीं समझे होते हो क्योंकि दसवीं में आपकी शिक्षा रुक गई विज्ञान की। तो फिर आगे चल करके आप इनका बड़ा भद्दा इस्तेमाल शुरू कर देते हो। कहते हो मुझ पर एनर्जी उतरी है। एनर्जी उतरी है? इन्हें एनर्जी शब्द का अर्थ भी पता है? एनर्जी मेटा फिजिकल होती है क्या? इथरिल एनर्जी उतरी है। एनर्जी तो फिजिकल होती है। ये कौन सी एनर्जी है जो उतरती है? रीज़न — उसे एनर्जी शब्द कभी समझ में ही नहीं आया था। तो या तो विज्ञान की शिक्षा दे ही न दी जाए ताकि इस तरह के शब्द आपके शब्द कोष में पहुँचे ही नहीं या अगर दे रहे हो तो कम-से-कम बारहवीं तक पढ़ाओ। विज्ञान नहीं ठीक से पढ़ाओगे तो अंधविश्वास के लिए जबर्दस्त एक आधार बन जाता है, कुछ भी।

आप ये अंगूठी पहनिए, ये फ़लानी तरह की वेव्स को अपनेआप में बुला करके और वो फिर आपकी ब्लड स्ट्रीम में डाल देती है। अब अगर वेव थ्योरी पढ़ी हो तो हँस दोगे ज़ोर से कि कैसी बातें कर रहे है बाबा। इस अंगूठी से फ़लानी तरह की वेव्स अट्रैक्ट होती है और वो आपकी बॉडी में जाती है। नहीं पढ़ी है वेव थ्योरी तो कहोगे, “हाँ ठीक है होता होगा। क्या पता होता है।“

बोलो जैसे टी.वी. का एंटीना होता है न? वेव आ रही होती है, उनको पकड़ लेता है। और वैसे ही अंगूठी जो है, टीवी के एंटीना की तरह है, वेव को पकड़ लेगी। खुश हो गए, बहुत बढ़िया। और दसवीं तक भी जो पढ़ते हैं, वो कैसा है? जैसे हमारा यूपी बोर्ड हुआ करता था, कुछ साल पहले तक। नकल करके पास हो गए और कौन सी साइंस पढ़ी है? ये सीधे-सीधे अशिक्षित हैं, अनपढ़ हैं। अब इन्हें कोई कुछ भी बोल करके बेवकूफ़ बना देता है। एक-से-एक बातें चलती है और वो बताई इस तरह जाती है जैसे वैज्ञानिक हो। हमें शरीर के बारे में भी कुछ नहीं पता। ये तमाम जो अब घूम रहे हैं हेल्थ केयर एक्सपर्ट्स बनकर, ये ऐसी-ऐसी बेहूदी बातें करते हैं कि कोई उसका अंत नहीं है, क्योंकि शरीर भी नहीं पता कि भीतर से है कैसा।

लिखा हुआ था कि वो फ़लानी चीज़ को समूचा मत खाया करिए, उसके महीन महीन-महीन बीज होते हैं, उनको हटा दीजिए। काहे को? बोले किडनी में जाकर फँस जाते हैं। कैसे फँस जाते हैं? खाते हो तो किडनी से निकालता है तो फँस जाते हैं। किडनी से खाना निकालता है? बायलॉजी में नकल करी थी न? इसको पता ही नहीं है कि पूरी एलिमेंट्री कैनाल में किडनी कहीं आती ही नहीं है। किडनी से खून निकलता है; किडनी का आंत का हिस्सा थोड़े ही है कि उससे भोजन निकलेगा? और ये बाकायदा टीवी पर बता रहे हैं कि उस चीज़ के बीज जाकर के किडनी में फँस जाएँगे, किडनी खराब हो जाएगी। और लोग — क्या बात! बहुत बढ़िया। डायग्राम (फ़ोटो) दिखा दो इन्हें आठवीं क्लास की बायोलॉजी बुक का कि इसमें किडनी कहीं नहीं है।

असल में हुआ क्या है न! आवाज़ सबके पास आ गई है और पैसा सबके पास आ गया है। और स्पिरिचुअल क्या, साइंटिफिक ज्ञान भी लोगों के पास है नहीं। ये एक बड़ी डाइकॉटमी विडंबना खड़ी हो गई है। एक बेहद जाहिल आदमी होगा, एकदम अनपढ़, गँवार, उसके हाथ में आईफोन होगा, समस्या यह है।

आवाज़, पैसा और ताकत वहाँ भी पहुँच गए हैं जहाँ पहुँचना नहीं चाहिए था उनको। कोई पात्रता तो होनी चाहिए न हाथ में आईफोन लेने की? लेकिन अर्थव्यवस्था इस तरीके की है कि उल्टे-पुल्टे तरीकों से आप भीतरी तौर पर बिलकुल ख़ोख़ला होते हुए भी खूब सारा पैसा कमा सकते हो। बल्कि अगर आप ख़ोख़ोले हो तो कुछ मायनों में पैसा कमाने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है। अब ऐसे आदमी के हाथ में जब पैसा आता है तो उसका दुरुपयोग ही करेगा न?

भारत में गीता को सबसे ज़्यादा विकृत करने वाली जो संस्था है, उसके डोनर्स में दुनिया के सबसे अमीर लोगों के भी नाम हैं। दुनिया के सबसे अमीर लोग ऐसी संस्था को प्रोत्साहित कर रहे हैं, पैट्रनाइज कर रहे हैं जिसने गीता को भी बिगाड़ के रख दिया क्योंकि गलत हाथ में पैसा है। जब गलत हाथ में पैसा है तो एक गलत हाथ से फिर दूसरे गलत हाथ में जा रहा है।

देखिए, जब तक आप ये मानना नहीं छोड़ेंगे कि आपके जीवन को चलाने वाली कोई अदृश्य शक्ति है, तब तक आपका ये भूत-प्रेत, वगैरह में भी यकीन रहेगा। मेरे सामने यह तर्क आया था जब पहली बार, तो मैं चौंक पड़ा था। मैंने भूतों वगैरह को काल्पनिक ठहराने के लिए जितने तर्क दिए थे, लोगों ने कहा ये सारे तर्क तो भगवान पर भी लागू होते हैं। जिन-जिन बातों का उपयोग करके आप सिद्ध कर रहे हैं कि भूत-प्रेत नहीं हो सकते, या कोई परालौकिक शक्ति नहीं हो सकती, उन्हीं सब बातों को लेकर के तो ये भी सिद्ध हो जा रहा है कि भगवान भी नहीं हो सकते हैं।

हाँ, जब तक आप की जिज्ञासा का, प्रेम का, श्रद्धा का केंद्र, सत्य नहीं बनेगा, तब तक आपको अंधविश्वास में रहना पड़ेगा। आपको अपना जीवन किसी ईश्वर की तरफ़ नहीं ले जाना है, सत्य की ओर ले जाना है। इन दोनों में बहुत अंतर है, बहुत अंतर है।

धर्म, ईश्वर की बात करता है; अध्यात्म सत्य की, ब्रह्म की बात करता है। जब ईश्वर की बात आती है तो आप कहते हैं जो हमारा भौतिक जीवन है यह सत्य है और कोई ईश्वर बैठकर के इसका संचालन कर रहा है। अध्यात्म कहता है ये जो कुछ हैं, ये सत्य है कहाँ? इसका संचालन तो कोई तब करेगा न जब इसमें कोई सच्चाई होगी। धर्म कहता है; धर्म एक अर्थ में बहुत मटिरियलिस्टिक होता है; धर्म कहता है ये जो मटिरियल वर्ल्ड है, यह रियल है। तो मटिरियलिस्टिक होता है धर्म। और ऊपर एक भगवान बैठा है या गार्ड बैठा है, एक अल्लाह बैठा है, जो इस मटीरियल वर्ल्ड को चला रहा है। ये बड़ी मटिरियलिस्टिक अवधारणा हुई न? एकदम भौतिक हुई न?

अध्यात्म, विशेषतया वेदांत कहता है — ये जो कुछ भी है इसे वास्तविक मत मान लेना। ये तुम्हारी इंद्रियों का खेल है बस। इसमें कुछ नहीं रखा है। तुम अगर ईश्वर को भी सत्य मानते हो तो तुमने संसार को सत्य मान लिया क्योंकि तुम कहोगे ईश्वर है, ईश्वर ने संसार बनाया; ईश्वर सत्य, संसार भी सत्य होगा। संसार को सत्य मान लिया, बहुत फँसोगे, बुरी मौत मरोगे।

आपके समर्पण का, आपकी जिज्ञासा का, आपकी श्रद्धा का लक्ष्य सत्य होना चाहिए ईश्वर नहीं, भगवान नहीं; ब्रह्म; भगवान नहीं।

क्योंकि आपने ये तो मान ही लिया न कोई अदृश्य शक्ति बैठ करके हमें चला रही है — ‘हे भगवान, आज मदद कर दे’, जैसे कि कोई है। और अगर कोई है जो आपकी मदद कर सकता है तो फिर कोई ऐसा भी तो हो सकता है जो; अगर यह कोई अदृश्य हीरो हो सकता है भगवान के नाम का तो, एक अदृश्य विलेन भी तो हो सकता है शैतान के नाम का। तो इसलिए ये दोनों अवधारणाएँ साथ ही चलेंगी — भगवान है तो शैतान भी होगा। फिर इसीलिए भूत-प्रेत में लोगों का यकीन रहता है। लगभग ऐसी बात बन गई, अगर आप आस्तिक हो; और लोग आस्तिक का मतलब समझते हैं भगवान में विश्वास रखना; लगभग ऐसी धारणा बन गई है कि अगर आप आस्तिक हो तो आपका भूत-प्रेत में भी विश्वास होगा। क्योंकि आस्तिक माने भगवान में विश्वास हो। अगर भगवान है तो उसी नियम के अनुसार फिर भूत-प्रेत भी होने चाहिए — एक पॉजिटिव एनर्जी , एक *निगेटिव एनर्जी*।

तो जब तक आप इस धारणा से मुक्त नहीं होते कि दुनिया को संसार को चलाने वाली कोई शक्ति है, अदृश्य शक्ति, तब तक आप अंधविश्वास में फँसे ही रहोगे क्योंकि यही एक बड़ा अंधविश्वास है। कोई नहीं बैठा है जो आपकी मदद करेगा; कोई नहीं बैठा है जो आपके जीवन को संचालित कर रहा है; कोई नहीं है जो ऊपर से जोड़े बनाकर भेज रहा है; कोई नहीं है जो आपको आपके कर्मों का दंड देगा; कोई नहीं है जो लेखा-जोखा रख रहा है; कोई विशेष घड़ी, कोई निर्णय का पल नहीं आने वाला; चित्रगुप्त का बहीखाता कभी नहीं खुलने वाला; कयामत के जिस पल का इंतजार आप कर रहे हैं, जिससे आप डर रहे हैं, वैसा कुछ नहीं है।

सबकुछ अभी है। आप हैं और सबकुछ आपके हाथ में है। अच्छाई करनी है तो अपने लिए करिए। बुराई से बचना है तो इसलिए बचिए क्योंकि बुराई आपको ख़राब कर रही है, इसी पल। आगे कुछ नहीं होने वाला।

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