पता किसी को नहीं है, खर्च सबको करना है। ये सुपरस्टिशन है। बात सिर्फ़ भूत-प्रेत, डायन, चुड़ैल की नहीं है, दूल्हा-दुल्हन की भी है। या तो उनको ही बोल लो। पर जो कुछ भी तुम्हारी जिंदगी में चल रहा है और तुम्हें कुछ पता नहीं है कि मामला क्या है, वो सब अंधविश्वासी ही है, और बहुत दूर तक जाता है। सोचो सात साल का बच्चा रहा होगा और किसी अनपढ़ ने नहीं मारा, प्रिंसिपल (प्राचार्य) ने मारा है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी।आचार्य जी, हाल में हाथरस में एक दिल दहला देने वाली घटना हुई है। एक स्कूल के मालिक ने दूसरी कक्षा के छात्र की बलि दे दी। पुलिस का कहना है कि वो किसी तांत्रिक विधि का उपयोग करके स्कूल की आर्थिक स्थिति सुधारना चाह रही थी।इससे पहले भी उन्होंने नौ साल के बच्चे की बलि देनी चाही थी लेकिन तब वो असफल रहे थे।
आचार्य जी, इक्कीसवीं सदी के भारत में ऐसी खबरे हमें क्यों सुनने को मिल रही हैं? हमारे समाज से कहाँ चूक हो रही है?
आचार्य प्रशांत: देखो, इक्कीसवीं सदी हो या पचासवीं सदी हो, समय के साथ कोई ज़रूरी थोड़े ही है कि भीतर जो अहम् है, इगो है, वो अपनेआप बेहतर होता जाए, आगे बढ़ता जाए। जब आप समय की बात करते हैं तो समय के साथ इवोल्यूशन होता है। किसका? फ़िजिकल ऑब्जेक्ट्स (भौतिक वस्तुओं) का हो जाता है। समय के साथ जो कुछ भी फ़िजिकल है (भौतिक), वो बदल जाता है।
और जहाँ तक हमारी प्रजाति की बात है, तो समय के साथ हम इवॉल्व (विकसित) हुए हैं और जो आसपास की स्थितियाँ हैं, उनको झेलने के लिए शारीरिक रूप से हम बेहतर हो गए हैं। तो ये सोचना लेकिन कि शताब्दियाँ बीत रही हैं तो हम भीतर से भी बेहतर होते जा रहे हैं, ऐसा थोड़े ही है। समय बीतता जा रहा है, आप इक्कीसवीं शताब्दी में आ गए हो, आप बाहर से बेहतर हो गए हो, भीतर से तो आप आज भी वही हो। जो आदमी आदिमानव गुफा में रहता था और गुफा से भी पहले जंगल में रहता था। जो उसकी वृत्तियाँ थीं, वही आपकी भी हैं। तो इसीलिए ये कोई ऑटोमेटिक (स्वचालित) बात नहीं है कि समय बीतता जा रहा है इक्कीसवीं शताब्दी है, आधुनिकता आ गई है, तो अब तो अंधविश्वास चला ही गया होगा। बिलकुल भी नहीं। इक्कीसवीं शताब्दी में नहीं गया हैऔर इकतालीसवीं शताब्दी में भी नहीं जाएगा अपनेआप।




