प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब मैं शिविर में आती हूँ तो अच्छा लगता है मगर जब यहाँ से जाती हूँ तो मन बहुत उदास हो जाता है, ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत: एक बात बिलकुल पकड़ लीजिए। इंसान मजबूर नहीं पैदा हुआ है। परम मुक्ति हमारा दूसरा नाम है तो कोई भी अपनी मजबूरी की बात तो करे ही नहीं। हममें से कोई भी मजबूर नहीं है। हम सब पूर्णतया आज़ाद हैं। हाँ, अब आज़ाद होने के बाद आपको मजबूरी का खेल खेलने में मज़ा आता हो तो आपकी मर्ज़ी।
कोई ये ना कहे कि विवशता है, ज़बरदस्ती की उलझन है, बोझ है, बन्धन है। न, आज़ादी इंसान का दूसरा नाम है तो जो कुछ भी आपने अनावश्यक, अतिरिक्त अपने ऊपर डाल रखा हो वो आपकी लीला है, आप जाने। इसीलिए तो जिन्होंने जाना है उन्होंने बार-बार कहा है कि सारा दुख झूठ है,सारा दुख झूठ है। इसीलिए सत्य का नाम आनन्द हुआ। झूठ यदि दुख हुआ तो सत्य इसीलिए आनन्द हुआ। इसीलिए फिर सत्य को हमेशा आनन्द के साथ जोड़कर वर्णित करते हैं।
सत-चित-आनन्द इसलिए, क्योंकि दुख झूठ है। इस बात को सौ बार दोहरा लीजिए जबतक कि ये भीतर की धारणाको साफ़ ना कर दे। दुख झूठ है, दुख स्वांग है, दुख प्रपंच है, दुख नाटक है। जो जितनी जोर से बोले कि वो दुखी है कि बेसहारा है या बेचारा है उसको उतना ही ज़्यादा या तो दुख ढोने में रस है या फिर उतनी ही गहरी उसकी बेहोशी है कि वो जानता भी नहीं कि वो नाटक कर रहा है।
हम ऐसे अभिनेता हैं जो कई बार भूल ही जाते हैं कि हम अभिनय में है। दुख का अभिनय करते-करते, करते-करते ऐसे अभ्यस्त होते हैं कि लगता है कि दुख वाकई में है। आपने पकड़ा होगा तभी होगा, आप छोड़ दो नहीं रहेगा। दुख अनिवार्यता बिलकुल भी नहीं है। दुख मत छोड़िए अपनी पकड़ छोड़िए क्योंकि दुख कब आपसे स्वयं आकर के चिपटता है। आपकी पकड़ है जो दुख को बाँधे रखती है, दुख में अपनी कोई जान नहीं है, आप पकड़ छोड़ेंगे वो चला जाएगा।







