भीतरी युद्ध की शुरुआत का पता कैसे चलेगा? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2017)

प्रश्नकर्ता: युद्ध की शुरुआत की पहचान कैसे हो? वो जो कुरुक्षेत्र में हो रहा है, वहाँ तो शंखनाद हुआ, जिससे पता चला कि युद्ध शुरू हुआ। पर जो जीवन में युद्ध हैं, उनमें किसी एक युद्ध पर अगर ध्यान है, उसकी शुरुआत का पता कैसे चले?
आचार्य प्रशांत: असल में अर्जुन के लिए युद्ध है, श्रीकृष्ण के लिए युद्ध है ही नहीं, श्रीकृष्ण के लिए खेल है।
सवाल ये है कि जीवन में जो युद्ध चल रहा है उसकी पहचान कैसे करें, वो कहाँ से शुरू हो रहा है, कहाँ को जा रहा है, कैसे पता करें।
श्रीकृष्ण अर्जुन से कह ज़रूर रहे हैं बार-बार कि युद्ध कर, पर श्रीकृष्ण के लिए वो युद्ध नहीं है, श्रीकृष्ण के लिए तो क्रीड़ा है। और अर्जुन जब तक अर्जुन है, वो सामने घट रही घटना को, कुरुक्षेत्र में हो रही गतिविधि को युद्ध ही मानता चलेगा। और जहाँ उसने ‘युद्ध’ शब्द का प्रयोग किया, तहाँ वो डरा, तहाँ तामाम नैतिकता उसकी अड़चन बनी। अर्जुन, युद्ध, नैतिकता, भ्रम, संशय, हिंसा — ये सब एक तल के शब्द हैं। अर्जुन है तो युद्ध मानेगा, युद्ध मानेगा तो उलझनों में पड़ेगा। उलझन में इसलिए पड़ रहा है क्योंकि उसे लगता है हिंसा हो रही है।
आप भी अगर गीता से प्रेरित होकर के जीवन को युद्ध की तरह देखने लगें, तो एक चूक हो जाएगी, चूक ये होगी कि आप अर्जुन रह जाएँगी। क्योंकि युद्ध किसके लिए है सिर्फ़? अर्जुन के लिए है। श्रीकृष्ण थोड़े ही कहते हैं कि बड़ा भारी युद्ध होने जा रहा है! श्रीकृष्ण से पूछिए तो श्रीकृष्ण कहेंगे, 'जो यहाँ हो रहा है वो सदा से ही होता रहा है, ये खेल कब नहीं खेला जा रहा था!' श्रीकृष्ण से पूछिए तो वो कहेंगे, 'प्रकृति के तीन गुण हैं, उनकी आपसी गतिविधि, क्रियाकलाप हैं। ये तो हमेशा से ही चलते रहे हैं, इनमें नया क्या है!' तो श्रीकृष्ण के देखे इसमें कोई बड़ी बात है ही नहीं।









