प्रश्नकर्ता: प्रतिज्ञा क्या है? अधर्म का साथ क्यों दे दिया? क्या प्रतिज्ञा पर आबद्ध होना अहंकार है? इच्छामृत्यु क्या है?
आचार्य प्रशांत: अपनी दृष्टि में अधार्मिक कोई नहीं होता। अपनी दृष्टि में धार्मिक सब होते हैं, बस लोगों का धर्म व्यक्तिगत होता है, पूर्ण नहीं होता, निरपेक्ष नहीं होता, निर्वैयक्तिक नहीं होता।
भीष्म से पूछोगे तो वो यही कहेंगे कि “साहब, हम तो धर्म का पालन कर रहे थे।” लेकिन भीष्म का धर्म वह धर्म है जिसे बुद्ध ने कहा था हीन धर्म, और बुद्ध की शिक्षा है कि हीन धर्म का सेवन मत करो। उन्होंने यह नहीं कहा कि अधर्म का सेवन मत करो, क्योंकि अधर्मी तो कोई होता ही नहीं, अपनी-अपनी नज़र में सब धर्मी-ही-धर्मी हैं। तो बुद्ध ने कहा, “हटाओ! मैं तुम्हें अधर्मी बोलूँगा, तुम्हारे अहंकार को चोट लगेगी, तुम मुझे सुनोगे ही नहीं। मैं कहता हूँ कि दो धर्म होते हैं – हीन धर्म और महत धर्म।” बुद्ध ने कहा कि तुम महत धर्म का सेवन करो, हीन धर्म का नहीं।
हीन धर्म माने व्यक्तिगत धर्म, हीन धर्म माने शपथ, क़सम, प्रतिज्ञा, प्रण, कर्तव्य इत्यादि। क़सम, वादा, कर्तव्य, प्रतिज्ञा, ये सब क्या हैं? हीन धर्म। कुछ तो है जिसका तुम पालन कर रहे हो, पर तुम किसका पालन कर रहे हो? तुम अपना ही पालन कर रहे हो। तुम कह रहे हो कि, "मेरा संकल्प है, तो मैं पालन कर रहा हूँ।" इस अनुपालन में भी अनुशासन तो है ही, क्योंकि सब ऐसे नहीं होते जो अपने ही द्वारा लिये गए संकल्प का पालन कर पाएँ, सब ऐसे नहीं होते जो स्वयं द्वारा दिया गया वादा और ली गई प्रतिज्ञा भी रख पाएँ, इतना अनुशासन भी सबमें नहीं होता।
तो कुछ तो तुम कर ही रहे हो जब तुम कह रहे होते हो कि, "हम अपनी बात का अनुसरण कर रहे हैं, हम अपने विचार पर अटल रहेंगे", पर तुम गड़बड़ कर रहे हो; तुम अटल तो रहना चाह रहे हो, पर ग़लत जगह पर। तुम यह तो कह रहे हो कि, "मेरी प्रतिज्ञा अब नहीं टूट सकती"—तुम ग़लत चीज़ को टूटने से बचा रहे हो, तुम किसी व्यक्तिगत चीज़ को टूटने से बचा रहे हो। तुम उसको टूटने से बचा रहे हो जिसको कबका टूट जाना चाहिए था, टूटना जिसकी प्रकृति है और जो पल-प्रतिपल टूट ही रहा है, और जिसको तुम जितना टूटने से बचाओगे, उतना ज़्यादा नुकसान होगा।




