बार-बार वही गलतियाँ क्यों दोहराते हैं हम?

Acharya Prashant

23 min
459 reads
बार-बार वही गलतियाँ क्यों दोहराते हैं हम?
अपना दृष्टा होने का मतलब ये होता है कि मैं बस देखूँगा कि मैं कितना बिगड़ा हुआ हूँ। सुधारने का मेरा कोई इरादा नहीं है, कोई इरादा नहीं है। इरादा लेकर के जो ख़ुद को देखेगा, वो फंस गया। परपज़लेस, पूरे तरीक़े से परपज़लेस होना चाहिए आत्म-दर्शन, आत्मवलोकन। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपने अभी बताया कि कर्ता कभी नहीं बदलता। यदि कर्ता कभी नहीं बदलता और कर्म भी दोहराए ही जाते हैं, तो ग्रीक फिलॉसफ़र हेराक्लिटस के इस कोट का क्या अर्थ है — “ए मैन नेवर स्टेप्स इन द सेम रिवर ट्वाइस। फॉर इट्स नॉट द सेम रिवर एंड हीज नॉट द सेम मैन।”

आचार्य प्रशांत: हाँ तो रिवर भी बदल गई और मैन भी बदल गया, पर स्टेपिंग थोड़ी बदल रही है। ये तो हेराक्लिटस भी कह रहे हैं, ना कि “द मैन कीप्स स्टेपिंग इन द रिवर।” इट जस्ट़ दैट द रिवर हैज़ चेंज्ड और द मैन हैज़ चेंज्ड, बट हैज़ द स्टेपिंग स्टॉप्ड? हो गया।

वो जो वृत्ति है, रिवर क्या है? प्रकृति की धारा, जिसमें सब लगातार बदलता हुआ दिखाई देता है। मैं कौन हूँ? अहंकार, और मैं भी अभी किस विषय से जुड़ा हुआ हूँ, इससे जुड़ा हूँ, इससे जुड़ा हूँ, वो सभी बदलता रहता है। यही तो मूल माया होती है न, कि लगता है कि इस बार का प्रयत्न नया है। प्रयत्न नया होता तो तुम नदी में फिर से काहे को कूदते बेटा। पिछली बार नदी में कूदे थे कि नदी में तुम्हें मोती दिखाई दे रहे थे। ठीक है? तो तुम तब कौन थे? मोती-कामी। जिसको मोती की लालसा है।

पिछली बार तुम गए थे, तो नदी में तुम्हें मोती दिखाई दिया था। तो नदी की क्या परिभाषा हो गई, कि नदी वो जिसमें मोती है। और तब तुम्हारी क्या परिभाषा थी? तुम कौन हो? तुम मोती के कामी हो। तो ये पिछली बार हुआ था। अब अगली बार तुम गए, तो नदी बदल गई। अब तुम्हें मोती नहीं दिख रहा, अब तुम्हें वहाँ पर मोहिनी दिख रही है, तो नदी बदल गई न। हेराक्लिटस बाबा बिल्कुल ठीक बोल गए हैं — फॉर इट्स नॉट द सेम रिवर। रिवर तो बदल गई।

पिछली बार रिवर में क्या था? मोती था। अब मोती तो बह गया, धार ले गई। इस बार रिवर में क्या है? मोहिनी है। सो, द रिवर हैज़ चेंज्ड। तो बाबा ने जो शर्त बताई, वो बिल्कुल ठीक है, द रिवर चेंजेस।

पिछली बार तुम क्या थे?

प्रश्नकर्ता: मोती-कामी।

आचार्य प्रशांत: इस बार तुम क्या हो?

प्रश्नकर्ता: मोहिनी-कामी।

आचार्य प्रशांत: मोहिनी-कामी। तो बाबा हेराक्लिटस की जो अगली शर्त थी, वो भी पूरी हो गई, फॉर इट्स नॉट द सेम मैन। रिवर भी बदल गई, तुम भी बदल गए लेकिन स्टेपिंग तो नहीं बदली। तुम पिछली बार भी कूदे थे भवजल में, तुम इस बार फिर से कूद रहे हो भवजल में। पिछली बार तुम मोती की लालसा में कूदे थे, इस बार तुम मोहिनी की कामना में कूद रहे हो। पिछली बार तुम्हारा नाम कुछ था, मोतिया सिंह। इस बार तुम्हारा नाम कुछ और है, मोहिनी स्वामी। नदी भी बदल गई, तुम भी बदल गए। पर ये कुदफ़ांद तो नहीं बदल रही ना, ये गड़बड़ हो रही है।

तो आज श्रीकृष्ण जो कह रहे हैं, वो हेराक्लिटस से एक कदम आगे की बात है। हेराक्लिटस तो बस भेद देख पा रहे हैं। भेद क्या देख रहे हैं? कह रहे हैं कि नदी बदल गई और व्यक्ति भी बदल गया — “ए मैन डज़ नॉट स्टेप इनटू द सेम रिवर ट्वाइस, एंड इट्स नॉट द सेम मैन एंड नॉट द सेम रिवर।” उन्होंने भेद देख लिया। अच्छी बात है। बहुत बढ़िया बात कही है, दार्शनिक है भाई। नदी भी बदल गई, भेद देख लिया, व्यक्ति भी बदल गया, भेद देख लिया।

श्रीकृष्ण और आगे की बात कह रहे हैं, वो कह रहे हैं कि भेद कुछ है ही नहीं, नाम-रूप का भेद है। वही पुरानी आदिम मूर्खता, जिसे तुम दोहराए जा रहे हो, पुनरावृत्ति है। कल को तुम किसी और वजह से कूदोगे नदी में। इस बार कहोगे कि नदी के नीचे तेल है। मुझे रिवर-बेड की ड्रिलिंग करनी है और वहाँ से मैं क्रूड ऑयल निकालूँगा या नेचुरल गैस निकालूँगा। इस बार तुम्हारा नाम होगा एक्शन मोबिल। पिछली बार क्या नाम था?

प्रश्नकर्ता: मोहिनी स्वामी।

आचार्य प्रशांत: इस बार तुम सीधे आओगे अमेरिका से। क्या बनके? किसी बड़ी एनर्जी कंपनी का रिप्रेजेंटेटिव बनके आओगे और कहोगे, “ये नदी है, इसमें ड्रिलिंग करनी है, इसमें से नेचुरल गैस निकलेगी।” और ये बोल के तुम क्या करोगे? नदी में कूद जाओगे। क्या फ़र्क़ पड़ता है किस वजह से कूदे, नदी में कूदना तो तुम्हारा यथावत है न। ये जो नदी में कूदना है, यही तो है — प्रकृति के साथ तादात्म्य।

तुम्हें तटस्थ होना है, उसकी जगह तुम प्रकृतिस्थ हो जा रहे हो। प्रकृतिस्थ भी किस अर्थ में? प्रकृति के भोक्ता बनकर, प्रकृति होकर नहीं।

आ रही है बात समझ में?

अरे, वजह कोई भी हो, गदहवा कल पिटा था। क्यों पिटा था? कल धूप बड़ी कड़ी निकली थी, तो लोगों ने आके लठ बजा दिए कि “आसमान की ओर मुँह करके रेंक रहा है, इसी ने सूरज को कुपित करा है।” गदहवा आज फिर पिट गया, आज बारिश बहुत हो गई। जनता ने कहा, “यही कहता रहता है कि थोड़ा पानी बरसे तो घास हरी-हरी, मुलायम हो जाए। ज़रूर इसी ने कोई तरीक़ा निकाला है बारिश करवाने का।” आज फिर पिट गया।

अरे, कभी सूरज के लिए पिट रहे हो, कभी घास के लिए पिट रहे हो। पिट तो रोज़ ही रहे हो न।

श्रीकृष्ण कह रहे हैं, “पिटना बंद कर दे भाई। यस, इट्स नॉट द सेम लठ, एंड नॉट द सेम लठैत, बट इट्स द सेम यू बीइंग बीटन अगेन एंड अगेन।” या इसमें बड़े गौरव की बात है कि देखो, आज हम उस वजह से नहीं पिटे, जिस वजह से कल पिटे थे।

वो था न कि संता-बंता वाला। संता आया, बहुत खुशी-खुशी, एकदम पिटा हुआ। बाल उखड़े हुए हैं, कपड़े फटे हुए हैं, चेहरा काला-नीला हो रहा है। लोगों ने कहा, “इतने पिटे हुए हो तो इतने खुश काहे को हो?” बोल रहा है, “जितनों ने पीटा है, 50 की भीड़ थी, सबको बेवकूफ़ बना के आ रहा हूँ।” बोले कैसे? बोले, “वो मुझे बंता समझ के पीट रहे थे, मैं तो संता हूँ।”

कभी तुम किसी वजह से पिटते हो, कभी किसी वजह से पिटते हो। कभी तुम बहुत गौरव के साथ पिटते हो, कभी बहुत जलील होकर पिटते हो। पर पिटे तो जा ही रहे हो न। वही काम कर रहे हैं, जो लगातार चल रहा है। लगातार चल रहा है। लगातार वो चले जिसमें आनंद हो, मुक्ति हो। जहाँ बंधन है, दुख है, वो लगातार क्यों चले? उसी को रोकना अध्यात्म है। आ रही है बात समझ में?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या बुद्ध की भी बात इसी संदर्भ में थी कि हम प्रतिपल बदल रहे हैं?

आचार्य प्रशांत: प्रतिपल तो बदल ही रहे हैं, लेकिन भीतर कोई बैठा हुआ है जो मानता ही नहीं कि जितने इधर-उधर के बदलाव हैं, वो बस उन्हीं से रिश्ता रख के अपने आप को ज़िंदा रखे हुए है। वो कहाँ मानता है? वो तो अपने आप को अपरिवर्तनीय मानता है। अहम् क्या बोलता है? “मैं आत्मा हूँ।” आत्मा माने कौन? जो बदलता नहीं।

अहम् वृत्ति बनी ही रहती है। लगातार परिवर्तनशील प्रवाह से अपने आप को जोड़-जोड़कर के। जान उसकी किसने बचा रखी है? उसने जो परिवर्तनशील है, और दावा उसका क्या है? “मैं वो हूँ जो अपरिवर्तनीय है।” तो बुद्ध ने कहा, “बेटा, ये जितना परिवर्तनशील जगत है, ये ना हो तो तुम शून्य हो। इस जगत के बिना तुम्हारी कोई हैसियत नहीं, तुम्हारी कोई सत्ता नहीं, तुम शून्य हो। तुम्हारी सत्ता शून्य हो गई।”

अब इस बार तीर्थ यात्रा के बहाने डुबकी मारना। बहुत हो गया कामनाओं के कारण डुबकी मारना, कभी मोती, कभी मोहिनी, कभी मीथेन निकालनी है। अब इस बार क्या करना है? इस बार तो डुबकी मारेंगे पुण्य कमाने के लिए। कुंभ आ ही रहा है। कुछ बदला क्या, कुछ बदला? ये संसार, ये प्रकृति ही तो नदी है, और उसमें तुमने जब भी डुबकी मारी है कामनावश ही मारी है। कामनाएँ बदलती रहती हैं, तुम्हारे इरादे बदलते रहते हैं, लेकिन ये मान्यता नहीं बदलती न, कि दुनिया के प्रवाह में डुबकी मार करके संतुष्टि मिल जाएगी।

प्रश्न कर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा नाम विपुल तिवारी है, और मैं रीवा, मध्य प्रदेश से हूँ। मैं अभी आईआईटी पीएचयू से पीएचडी कर रहा हूँ।

मेरा प्रश्न है आचार्य जी कि जो सत, रज, तम में बदलाव हो रहे हैं, वो प्रकृति में हो रहा है कि अहम् में हो रहा है? क्या प्रकृति में कुछ ऐसी चीज़ें नहीं हैं जो सत, रज, तम हैं? जैसे कि प्रसिद्ध है — नशा, तम है। प्याज, लहसुन इत्यादि तम है। तुलसी, पीपल, बरगद, सुबह उठना इत्यादि सत है। एक्सरसाइज़ करना, स्वर्ण भस्म, शिलाजीत इत्यादि रज है। तो ये प्रकृति में है या अहम् में है?

आचार्य प्रशांत: प्रकृति में कुछ नहीं है अहम् के अलावा। अहम् नहीं है तो कहाँ से आ गए सत, रज, तम? सत, रज, तम सब किसके लिए हैं? अहंकार के लिए हैं। प्रकृति कोई ऑब्जेक्टिव चीज़ थोड़ी है कि वो सत रखा, वो रज रखा, वो तम रखा हुआ है। ये दीवार है, ये पंखा है, ये बिस्तर है।

प्रकृति आपको जैसी दिखाई देती है, वो आपके कारण वैसी दिखाई देती है। सत, रज, तम भी आपके लिए हैं।

तो सांख्य योग बोलता है — सतोगुणी अहंकार, रजोगुणी अहंकार। आप ना हो तो हम कह रहे हैं, “प्रकृति तो क्या है, प्रकृति ही सत्य है।” फिर प्रकृति में कोई विविधता नहीं, प्रकृति में कोई भेद नहीं। फिर कौन सा सत, कौन सा रज, कहाँ का तम? ये सब कुछ अहम् के लिए है।

आप गलती ये कर रहे हैं कि द्वैतात्मक मान्यता पकड़ ली है कि प्रकृति वो बाहर है, और उसमें कुछ-कुछ है, इंडिपेंडेंट ऑफ़ मी। प्रकृति में कुछ भी नहीं है जो आपसे स्वतंत्र हो। आपको नदी दिखाई देती है, तो नदी ऐसा थोड़ी है कि आपसे स्वतंत्र नदी है। आप एक तरह से देख सकते हो कि आपको वहाँ नदी दिखाई दे रही है।

इतना तो समझाते हैं न बाबा अष्टावक्र, क्या? जगत प्रक्षेपण है आपका। तो जगत माने क्या? प्रकृति ही तो। तो जैसी प्रकृति आपको दिखाई देती है, वो इसलिए क्योंकि उसका दृष्टा अहंकार है। अहंकार न दृष्टा हो तो प्रकृति वैसी थोड़ी रह जाएगी। समझ में आई ये बात? सत, रज, तम ये सब अहंकार के लिए हैं, इनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब ये बात की जा रही है कि सब कुछ प्रकृति में ही, सत, रज, तम, में ही बदल रहा है, तो ये अहम् को ही कहा जा रहा है कि अहम् ही बदल रहा है।

आचार्य प्रशांत: हाँ।

प्रश्नकर्ता: जी, जैसे मेरे अंदर गुस्सा आया, तो मेरे अंदर कुछ केमिकल बदला, मेरे अंदर की प्रकृति बदली, जिससे मैं बदल गया। तो ये तो प्रकृति बदली न।

आचार्य प्रशांत: एक बैठा हुआ है जो अनुभव कर रहा है। आपके भीतर बहुत कुछ बदले, पर जो अनुभव करता है, वो ज़रा भी न बदले, तो आपको गुस्सा आ जाएगा। आपका हाथ है, आम तौर पर आके कोई हाथ मरोड़ दे, तो गुस्सा आ जाता है। है न? पर गुस्सा किसको आता है? क्या हाथ को आता है?

प्रश्नकर्ता: नहीं, मुझे आता है।

आचार्य प्रशांत: हाँ, तो जिसको गुस्सा आता है, वो न बदले तो गुस्सा आ सकता है क्या? हाथ पूरा ही मरोड़ दिया, पर जिसको गुस्सा आता है वो ज़रा भी नहीं हिला, तो क्या गुस्सा आएगा?

तो जो कुछ भी हो रहा है, वो किसी के लिए हो रहा है। जिसके लिए हो रहा है, वो आप हैं। उसको अपनी ओर देखना होता है। वो अपनी ओर जब नहीं देखता, तो वो सोचता है कि ये बाहर जो कुछ है, इसका वस्तुनिष्ठ, ऑब्जेक्टिव कोई अस्तित्व है। नहीं है। इसलिए ये जो शब्द है, छोटा सा ‘है’ — अस्ति। अगर आप बिल्कुल शुद्ध भाषा में बात करना चाहो, तो आपको ये भी नहीं कहना चाहिए कि प्रकृति है। ‘है’ वास्तव में, केवल सत्य के साथ लगाया जा सकता है। ‘है’ मात्र उसके साथ लगाया जा सकता है, जिसका होना स्वतंत्र हो, अनाश्रित हो।

प्रकृति, जैसे आप उसको देखते हो — नदी, पहाड़, सड़क, दरवाजा, खंभा, लोग, इनको ये भी नहीं कह सकते कि ये हैं। ये प्रतीत होते हैं, ये है नहीं। माने, इनका होना उस पर आश्रित है, जिसको ये प्रतीत होते हैं। सत्य अकेला है जो है, उसका होना-न होना किसी के अनुभव पर निर्भर नहीं करता। कोई है ही नहीं जो सत्य का अनुभव करे। तो सत्य अकेला, जिसके लिए कह सकते हैं ‘है।’ अन्यथा, जैसे हम अपनी हल्की भाषा में कह देते हैं न, वो कुर्सी रखी हुई है, या कि ये सब जो पहाड़ वग़ैरह, आसमान है, ये बड़े भ्रम का कारण बन जाता है।

जैसे ही आप कह देते हो, कुर्सी है, आसमान है, आपने उसको एक स्वतंत्र अस्तित्व की मान्यता दे दी, और अहंकार बहुत जोर से तब किलकारी मारता है, क्योंकि वो चाहता ही यही है कि उसकी करतूत छुपी रह जाए। अब वो कुर्सी क्या है? वो कुर्सी वो चीज़ है जिसे अहंकार ने प्रक्षेपित करा है। वो कुर्सी वो चीज़ है, जिसका होना संभव ही नहीं हो सकता था बिना अहंकार के।

लेकिन जब आप कहते हो, कुर्सी है, तो उसमें आपने कहीं ये थोड़ी कहा कि कुर्सी प्लस अहंकार है? क्या आपने ये कहा? नहीं। तो आपने कहा, कुर्सी है। अब उस कुर्सी के होने में अहंकार का जो रोल है, वो छुप गया। अहंकार के मजे आ गए। वो कुर्सी नहीं है जो आपको दिख रही है। वो कुर्सी प्लस अहंकार है।

तो ये जो साधना जिसने कर ली न, कि जो कुछ भी दिख रहा है, उसको देखते हुए अपने हर अनुभव में ये याद रखे कि ये अनुभव ऑब्जेक्टिव नहीं है। क्योंकि कुर्सी को देखना भी एक अनुभव है न? कुर्सी भी एक अनुभव है। मुझे अभी इस कुर्सी का अनुभव हो रहा है। वो हर अपने अनुभव में याद रखिए कि कोई ऑब्जेक्टिविटी नहीं है, इसमें अहंकार बैठा हुआ है।

फायदा ये हो जाता है कि वो अपने अनुभवों को सच का नाम देने से बच जाता है, क्योंकि सच तो वो है जिसमें अहंकार बिल्कुल भी सम्मिलित नहीं है। और हमारे सब अनुभवों में अहंकार बैठा हुआ है। तो अनुभवों की फिर कोई सत्यता नहीं होती, और सत्य का फिर कोई अनुभव नहीं होता।

अनुभवों में कोई सत्य नहीं होता और सत्य का कोई अनुभव नहीं होता।

जो आदमी इस बात को समझ गया, उसके लिए बड़ा फिर निरहंकार होना, मुक्त होना आसान हो जाता है। जो नहीं समझा, वो अनुभवों के फेर में ही पड़ा रह जाता है।

अभी सन्नाटा है। है?

प्रश्नकर्ता: जी।

आचार्य प्रशांत: नहीं सन्नाटा नहीं है बिल्कुल।

प्रश्नकर्ता: सन्नाटा प्लस अहंकार है।

आचार्य प्रशांत: हाँ, न जाने कितनी ऐसी प्रजातियाँ हैं पशुओं की, जिन्हें यहाँ ले आओ तो कहेंगे बहुत शोर है। ये सन्नाटा सिर्फ़ तुम्हारे लिए है, क्योंकि तुम 20 हर्ट्ज़ से नीचे और 20,000 हर्ट्ज़ से ऊपर सुन ही नहीं सकते। तो मैं और तुम कहेंगे सन्नाटा है। सन्नाटा नहीं है। ये जिसका अनुभव हो रहा है, वो है सन्नाटा प्लस अहंकार। कोई और आएगा, तो कहेगा, सन्नाटा बिल्कुल नहीं है।

तो बताओ, सन्नाटा सच है क्या? पर सन्नाटे का अनुभव तो हुआ न? तो कोई भी अनुभव सच होता है क्या? देखो, सन्नाटे का अनुभव हुआ, तब भी सन्नाटा सच नहीं था। कोई भी अनुभव सच नहीं होता। लेकिन जो लोकधर्म होता है, उसमें अनुभव को बड़ी मान्यता दी जाती है। लोग कहते हैं, “बताओ, तुम्हारे आध्यात्मिक अनुभव क्या हैं?” और जो व्यक्ति आध्यात्मिक अनुभव की बात करे, मतलब ये है कि उसने अभी अध्यात्म का ‘अ’ भी नहीं पढ़ा है।

कोई भी अनुभव आध्यात्मिक नहीं हो सकता। अध्यात्म का मतलब ही है — अनुभवों के खेल को समझना।

कोई बताता है, “मेरा आध्यात्मिक अनुभव ये हुआ कि मैं बिस्तर पर सो रहा था, तभी घंटियाँ बजने लगीं। तभी खिड़की अचानक से खुल गई और बिल्कुल एक ज़बरदस्त किस्म की दिव्य आत्मा मेरे कमरे में घुस आई। और उसने कहा, भाई साहब, आपका वाशरूम यूज़ कर सकते हैं क्या?”

ये सब है न? सुना है, नहीं सुना है?

बहुत लोगों को ध्यान लगाते वक़्त विशेष अनुभव होते हैं कि ध्यान लगा रहे थे, तभी कुछ ऐसा हुआ। एलियंस आ गए ध्यान में, कुछ हो गया। एलियंस आए, तो उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को पकड़ रखा था। और फिर वो बहुत कूद-कूद के बताते हैं, “मेरे ऐसे अनुभव, मेरे वैसे अनुभव। लंबी-लंबी फेंकने की बाजी लगती है।” मेरा वैसा हुआ था। मेरे तो स्वयं श्री हरि उतरे थे मेरे आध्यात्मिक अनुभव में।

अनुभव को महत्त्व देना माने अहंकार को महत्त्व देना। अहंकार ही तो अनुभोक्ता है न। अनुभव को बहुत सत्यता देना, माने अहंकार जो कह रहा है वही सत्य है। हमको लग रहा है, इसलिए सत्य है। ख़ुद को पागल बनाने वाली बात है।

बताओ, कुछ जम रहा है या नहीं?

प्रश्नकर्ता: जी सर, धन्यवाद।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। जैसे वृत्तियों के दृष्टा बनने की बात होती है, मोह, काम, क्रोध, लोभ। हम देखते हैं कि ये हमें बहा ले जाते हैं। तो इनका दृष्टा बनने की मैंने बहुत कोशिश करी काफ़ी, कि ये तो वृत्तियाँ हैं, मैं तो इनसे तटस्थ होकर जीता हूँ और अपने डिसीजन जिससे इन्फ्लुएंस नहीं होने देना चाहता हूँ।

बट फिर भी, इनका इन्फ्लुएंस बहुत भारी रहता है। वो वृत्तियों का जो इन्फ्लुएंस है, वो भारी पड़ जाता है डिसीजंस पर, एक्शंस पर। तो ये कैसे सक्रिय हो कि वृत्तियाँ, न एक्ट करें हमारे ऊपर या इनके प्रभाव?

आचार्य प्रशांत: तुमसे ये किसने कह दिया कि दृष्टा का मतलब ये होता है कि अब बहोगे नहीं? तुमसे ये किसने कह दिया कि दृष्टा बनने का मतलब होता है कि अब पुलिस वाले बन गए हो अपने ऊपर और पहले बह जाते थे, अब जब बहोगे, तो पीछे से पकड़ के रोक लोगे?

दृष्टा होने का मतलब होता है कि अब बहोगे तो बहते हुए स्वयं को देखोगे।

पहले से ही उम्मीद या इरादा लेकर जाओगे कि गंदे-गंदे काम चल रहे हैं अंदर, वृत्तियों के और अब मैं आ गया हूँ उन सब गंदे कामों को रोकने के लिए — सिंघम। दृष्टा-सिंघम। भीतर तमाम तरह के नालायक, गुंडे बैठे हुए हैं, वृत्तियों वाले, षड्रिपु, और मैं आया हूँ अब साक्षी-सिंघम। और मैं इन सबको पीटूंगा, ये करके जाओगे तो कुछ नहीं होता। कोई इरादा नहीं होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता: जैसे जब हम सांख्ययोग में भी पढ़ रहे थे कि थोड़ा सा दृष्टा देखोगे, तो प्रकृति से अलग देख पाओगे अपने आप को। और जब स्वयं को जानने की कोशिश करोगे, तो इसमें मतलब समझ नहीं पा रहा। मैं कोई कर्म कर रहा, तो फिर तो मैंने वो कर्म कर ही दिया न, फिर तो उसका परिणाम भी भोगना पड़ेगा मुझे। तो फिर तो स्वयं को देखने से क्या फायदा? वही समझना।

आचार्य प्रशांत: हाँ तो जो फायदा माँग रहा है, उससे स्वयं को देखने से यही होगा, कुछ नहीं। बिना फायदे की चाह के देखा जाता है स्वयं को। फायदे की चाह जिसको है, वो कौन है? अहंकार। और तुम क्या बनना चाहते हो? अहंकार के?

प्रश्नकर्ता: मालिक।

आचार्य प्रशांत: तुम अहंकार को देखने जा रहे हो, मालिक बन के देखने जा रहे हो? तुम अहंकार के क्या बनना चाहते हो?

प्रश्नकर्ता: अहंकार को काटना चाह रहे हैं।

आचार्य प्रशांत: अरे, मत काटो। थोड़ी देर के लिए देख लो पहले। यार, हथियारबंद ज़्यादा हो। कभी ये काट रहे हो, कभी कुछ कर रहे हो। सारे इरादे किसके लिए होते हैं? अहंकार के लिए, उसे फायदा चाहिए हर काम में। है न? अहंकार बिना फायदा गिने, कोई काम करता है? नहीं करता।

अब तुम क्या बनना चाहते हो अहंकार के?

प्रश्नकर्ता: दृष्टा भाव।

आचार्य प्रशांत: दृष्टा भाव नहीं, दृष्टा। तुम अहंकार के दृष्टा होना चाहते हो। और तुम पूछ रहे हो कि दृष्टा बनने से क्या फायदा होगा? यही पूछा अभी?

प्रश्नकर्ता: हाँ जी।

आचार्य प्रशांत: फायदा गिनने वाला कौन होता है?

प्रश्नकर्ता: अहंकार।

आचार्य प्रशांत: तो तुम अहंकार बनना चाहते हो या दृष्टा बनना चाहते हो?

प्रश्नकर्ता: दृष्टा बनना चाहते हैं।

आचार्य प्रशांत: पर तुम तो फायदा गिन रहे हो, और जो फायदा पैदा किया, वो तो अहंकार होता है। दृष्टा वो नहीं हो सकता जो फायदा गिन रहा हो। जो फायदा गिन रहा है, उसका दृष्टा बन जाता है। ये थोड़ी है कि “मैं ये विधि लगाऊँगा, तो मुझे ये फायदा हो जाएगा।”

और इसमें तुम्हारी गलती नहीं है, क्योंकि लोकधर्म में ऐसा ही चला है कि “लो बच्चा, फलाना मंत्र मार लो। इससे तुम्हें ये फायदा हो जाएगा। लो बच्चा, फलानी विधि लगा लो, एग्ज़ाम पास हो जाएगा। लो बिटिया, जाकर ये इतने व्रत कर लो, मनचाहा पति मिल जाएगा।” हर चीज़ में आध्यात्मिक फायदा बताया गया है, और फायदे गिनने वाला तो हमेशा अहंकार होता है। तो ये फिर, तुम सारा अपना आध्यात्मिक प्रपंच करके भी अहंकार ही बने रह गए। फायदे ही गिन रहे हो।

कभी भी दृष्टा सोद्देश्य नहीं हुआ जाता। सप्रयोजन नहीं हुआ जाता, सकाम नहीं हुआ जाता। ये कहकर नहीं हुआ जाता कि “आज मैं देख रहा हूँ कि मैं कैसे क्रोध करता हूँ, कैसे कामना करता हूँ, कैसे ईर्ष्या करता हूँ। तो शाम तक फायदा ये हो जाएगा कि मेरा क्रोध, कामना, ईर्ष्या ये सब कम हो जाएँगे।” जो इस तरह गणित ले के जा रहा है, वो कुछ नहीं पाएगा। जो किसी भी तरह गणित ले के जा रहा है, वो कुछ नहीं पाएगा।

ये खेल पाने वग़ैरह का नहीं है, ये खेल देखने का है। ये खेल उनके लिए है जो पाने से ऊब गए हैं। तुम पहले से ही एक कल्पित छवि ले के जाओगे कि तुम्हारे लिए क्या अच्छा है, और चाहोगे कि मैं दृष्टा बन करके अब उस कल्पित छवि को सजीव कर दूँगा। तो ये गड़बड़ हो गया।

आत्म-आवलोकन में बहुत सारे लोग यही भूल कर रहे होंगे। वो आत्मवलोकन का मतलब ऐसे समझ रहे हैं कि जैसे आप अपने ऊपर एक पुलिस वाला बनकर बैठ गए हैं। या जैसे छोटे बच्चों की क्लास में कोई टीचर हो, जो सबको सुधारने के लिए आई है। अपना दृष्टा होने का मतलब ये नहीं होता कि “अब मैं लठ्ठ लेकर ख़ुद को सुधारूँगा।”

अपना दृष्टा होने का मतलब ये होता है कि मैं बस देखूँगा कि मैं कितना बिगड़ा हुआ हूँ। सुधारने का मेरा कोई इरादा नहीं है, कोई इरादा नहीं है। इरादा लेकर के जो ख़ुद को देखेगा, वो फंस गया। परपज़लेस, पूरे तरीक़े से परपज़लेस होना चाहिए आत्म-दर्शन, आत्मवलोकन।

और उसमें क्या फिर फंसता है?

ख़ुद को देखा, गंदगी दिखाई दी। गंदगी दिखाई दी तो आप उसको कम्पेन्सेट करना चाहते हो। आप कहते हो “ठीक है, भीतर गंदगी है, पर मैं तो अच्छा वाला दृष्टा हूँ न। मैं कह रहा हूँ, “गंदगी साफ़ करो, गंदगी साफ़ करो। भीतर चोर है पर मैं तो पुलिस वाला हूँ न।”

नहीं। भीतर अगर चोर है, तो तुम्हें मानना पड़ेगा कि तुम चोर हो, तुम्हें पुलिस वाला नहीं बनना है। भीतर अगर चोर है, तो तुम कौन हो? तुम चोर ही हो। पर तुम कहते हो “नहीं, भीतर चोर दिख गया।” तो अपनी ग्लानि को हटाने के लिए, मैं तराजू के दूसरे पलड़े पर एक पुलिस वाला खड़ा कर देता हूँ और कहता हूँ “हाँ, मेरे भीतर चोर है, पर साथ ही साथ मैं पुलिस वाला भी तो हूँ। देखो, मैं भीतर के चोर को सुधारने आया हूँ या दंड देने आया हूँ।”

नहीं। तुम पुलिस वाले नहीं हो। तुम विटनेस हो, तुम साक्षी हो। तो भीतर अगर चोर है, तो सीधे बोलो “हाँ, मैं चोर हूँ।” अपने आप को क्यों बेकार में इज़्ज़तदार दिखाना चाहते हो।

प्रश्नकर्ता: फिर इससे ही हमें आगे का रास्ता पता लगता है कि ये सब कैसे, मतलब होगा।

आचार्य प्रशांत: तुम लगे अभी आगे में ही हो। “आगे क्या मिल जाएगा? आगे का रास्ता हो जाएगा।” अभी भी हिसाब रुक नहीं रहा है। आगे का रास्ता पता लगे-न लगे, कुछ मिले-न मिले — देखो कि क्या चल रहा है। जब तुम्हें यही नहीं पता कि क्या चल रहा है, अभी तो तुम आगे की क्या बात कर रहे हो।

प्रश्नकर्ता: ठीक है सर।

आचार्य प्रशांत: बहुत निराश हो गए।

प्रश्नकर्ता: नहीं, नहीं सर। चल, मुझे पता लगता है कि जैसे मैंने आपकी काफ़ी सारी वीडियोज़ देखी हैं, तो मुझे थोड़ा न, उसमें कंफ्यूजन होता है कि आपकी कौन सी बात को समझ के करने में। मैं उस कॉन्टेक्स्ट में पूछ रहा था कि जैसे मैं देख भी लिया कि आपकी एक वीडियोज़ में ये पार्ट है या दूसरा पार्ट है।

आचार्य प्रशांत: सारी बातें जो बोली हैं न, भूल जाओ। अभी जो बात बोली है, बस ये बात याद रख लो। और अगली बार अगर मुझसे बात करना तो आज की बात भी भूल जाना। उस दिन जो बात बोली होगी बस वो याद रख लेना।

प्रश्नकर्ता: ठीक है सर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories