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बाहर आओ जवान! वो बुला रही है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश:। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।

जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को अपने भीतर सिकोड़ लेता है उसी प्रकार, जब ज्ञानी अपनी इन्द्रियों को अपने भीतर सिकोड़ लेता है, तब उसकी बुद्धि सत्य में प्रतिष्ठित हो जाती है। ~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ५८)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। ये जो श्लोक क्रमांक अट्ठावन है जो कूर्मयोग है। ये मेरे सबसे पसन्दीदा श्लोकों में से है। तो इसमें जब ये बात हो रही थी कि आप अपने इन्द्रियों को समेट लीजिए या समेटने की बात हो रही थी फिर आपने स्मृति की भी बात की। तो इससे इस गीता के श्लोक से ईशावा्ष्य उपनिषदों के बहुत सारे श्लोक अचानक से एकदम से क्लियर (समझ आ गये) हो गये जैसे, वो बहुत विख्यात श्लोक है जो —

"वायुर् अनिलम् इदम्, अस्माकम् शरीरम्। ॐ क्रतो स्मर, कृतं स्मर।”

तो इसकी जो पहली पंक्ति है— प्राण और इन्द्रिय समष्टि में समेट जाएँ। तो वो बात मुझे उससे सम्बन्धित लगी कि जो इन्द्रियाँ जो है, वो कृष्ण खोल के अन्दर समेट जाएँ और फिर जो स्मरण की बात कही थी आपने।

आचार्य प्रशान्त: तो देखो, पहली बात तो ये कि जब कुछ अच्छा लगे कि बहुत पसन्द आये तो थोड़ा सावधान हो जाया करो, कहीं ऐसा तो नहीं कि जगत में पैठना नहीं चाहते इसलिए ये बात बहुत लुभावनी लग रही है कि कछुए की तरह इन्द्रियों को समेट लो, कहीं ऐसा तो नहीं। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि जो कुछ भी पसन्द आएगा उसमें ख़तरा ही होता है। लेकिन भूलो नहीं मन की प्रवृत्ति, मन को आमतौर पर पसन्द वही आता है जो मन की वृत्तियों को और स्थापित और बलवान करता है।

जिस श्लोक का आप हवाला दे रहे हो, उसको बहुत आसानी से मन, जगत से अपनेआप को खींच लेने के पक्ष में प्रमाण की तरह प्रयोग कर सकता है। वो विथड्रॉल (निकाल लेना) के लिए एक आसान सहयोग बन सकता है, वो नहीं होना चाहिए।

मैं जानता हूँ न ऐसे लोगों को, संस्था में ही हैं। जो जब किसी जगह पर अपनेआप को बहुत उपयुक्त नहीं पाते, एक तरह से जब वो किसी जगह पर अपनेआप को हीन पाते हैं, तो वो कछुए की तरह अपनेआप को समेट लेते हैं, कृष्ण ने ऐसा नहीं चाहा है।

पर मन किसी भी श्लोक का, किसी भी तरह से उपयोग कर सकता है। मैं आशा यही कर रहा हूँ कि तुमने ऐसा कुछ नहीं करा होगा, पर सावधान करने के लिए तुमको ये सब कह रहा हूँ। कछुए की तरह स्वयं को खोलने, समेटने का अर्थ ये नहीं होता है कि तुम किसी जगह पर हो और वहाँ जाकर कोने में दुबक गये।

कृष्ण का जो व्यक्तित्व है न, वो बहुत हद तक गीता के संदेश से मेल भी खाता है। कुछ बातें उसमें ऐसी भी हैं जिनका गीता से कोई सरोकार नहीं दिखता। कृष्ण एक बहुत व्यावहारिक और संसार कुशल व्यक्ति हैं, जंगल में उपदेश नहीं दे रहे हैं, रण के बीचों-बीच मौज़ूद हैं। उनको तुम देखकर के ये बिलकुल नहीं कह पाओगे कि इस व्यक्ति ने कछुए की तरह अपनेआप को समेट लिया है दुनिया से।

कृष्ण को देखकर कभी भी ऐसा लगता है क्या?

लड़ाई में वो मौजूद हैं, राजनीति में वो मौजूद हैं, मुकुट उन्होंने धारण कर रखा है, सारथी भी वो हैं, सेना उनके पास है, विनोद प्रिय वो हैं, मज़े ही लेते रहते हैं, चुटकुले कहते रहते हैं, जितना वो कठोर हो सकते हैं युद्ध में वध करते समय, तमाम स्त्रियाँ हैं उनके जीवन में उनके साथ वो उतने कोमल भी हो जाते हैं। उन्हें शकुनी से भी बात करना आता है और कुन्ती से भी बात करना आता है और दोनों के साथ ही जब वो बात करते हैं, तो एक सी दक्षता के साथ।

बहुत कम ऐसे चरित्र हैं। धर्म के पूरे क्षेत्र में ज़्यादातर जो चरित्र हैं, वो किसी एक प्रकार के हैं, आप उनका वर्गीकरण कर सकते हो कि ये इस तरह के हैं, इनको इस वर्ग में फिट किया जा सकता है, डाला जा सकता है। कृष्ण को आप नहीं कर पाओगे, वो रण में भी विजेता हैं और रास में भी, है न? वो शत्रुओं को भी जीत लेते हैं और प्रेमिकाओं को भी।

और वही कृष्ण अगर कह रहे हों कि कछुए की तरह भीतर खींच लो अपनेआप को, तो फिर सोचो कि वो क्या कह रहे होंगे? वो तुमको ये तो नहीं कह रहे होंगे कि जीवन से अपनेआप को भीतर खींच लो, वो तुमको ये भी नहीं कह रहे होंगे कि जीवन के किसी भी क्षेत्र से अपनेआप को हटा लो। कृष्ण ने जीवन के किसी भी क्षेत्र से अपनेआप को हटाया है क्या?

एक ओर तो धर्म की स्थापना करना भी उनको आता है, दूसरी ओर तमाम नियमों को तोड़ना भी कोई कृष्ण से सीखे। वही कृष्ण जो गीता में ही, कुरूक्षेत्र में ही खड़े होकर कह रहे हैं — "धर्म संस्थापना अर्थाय" — धर्म की संस्थापना के लिए ही सब कुछ कर रहा हूँ। वही कृष्ण युद्ध के न जाने कितने नियमों को अगले अठ्ठारह दिनों के भीतर स्वयं ही तोड़ने वाले हैं।

द्रोण, भीष्म, कर्ण, जयद्रथ, दुर्योधन और भी हैं। तो अब ये सब देखकर के समझो कि भीतर होने का मतलब क्या है और जो भीतर हो जाता है, वो कैसा हो जाता है। अगर तुमने वाक़ई कूर्म सूत्र जैसा तुम कह रहे हो, वाक़ई समझा होगा तो तुम्हारे व्यक्तित्व में भी उसी प्रकार की पूर्णता रहेगी जैसे कृष्ण के व्यक्तित्व में है।

तुम सिर्फ़ ज्ञानी से नहीं बन जाओगे। क्या वो पूर्णता उभर रही है, पूछना अपनेआप से, मैं नहीं जानता। तुम्हें कुछ प्रश्न दे रहा हूँ बस — कहीं रेक्लूस (बैरागी) तो नहीं बन रहे, गीता का संदेश नहीं है ऐसा। गीता न तुमको अलग होना सिखाती है, न भागना। जो कुछ भी है प्रकृति में उपलब्ध, उसको तुम प्रसाद की तरह भोग सकते हो।

इसीलिए बहुत कम धार्मिक चरित्र हैं जो नाचते हैं, कृष्ण नाचते हैं। तुम नाच पा रहे हो? कल वीकेंड है, मैं तुम्हारी गीता तब पूरी जानूँ जब तुम कल रात में नाच कर दिखाओ। सॅटरडे नाइट चैलेंज (शनिवार रात की चुनौती )।

प्र: मुझे लगता है आपने बिलकुल सही पकड़ा क्योंकि मुझे पतंजलि के योग सूत्र में भी प्रत्याहार सबसे ज़्यादा पसन्द था और मुझे ये वर्क फ्रॉम होम (घर बैठे काम) खोलने से भी डर लगता है। तो लगता है आपने सही पकड़ लिया है, ऐसा मुझे बहुत अच्छा भी नहीं लगता है लोगों से बात करना।

आचार्य: कल गीता को बिलकुल छोड़ दो और कृष्ण के साथ हो लो ठीक है। किस शहर में हो अभी?

प्र: कोलकाता में हूँ।

आचार्य: कोई डिस्को ठीक है वहाँ? किससे पूछ रहा हूँ (हँसते हुए), तुम्हें पता ही होता तो मुझे इतना समझाना क्यों पड़ता, कल जाओ और स्टैग एंट्री (अकेले लड़के को प्रवेश) नहीं मिले तो उसका प्रबन्ध करके जाओ, जवान आदमी हो ठीक-ठाक दिखते हो, कुछ-न-कुछ प्रबन्ध हो ही जाएगा।

प्र: आप डिस्को की बात कर रहे हैं, मुझे तो वीडियो कॉल में भी, मैं दफ़्तर में किसी महिला कर्मचारी से बात करता हूँ, तो वहीं मुझे डर लगता है।

आचार्य: मेरा तो काम है, जहाँ रोग है सीधे वही ऊँगली रख देना। तुम ज्ञानमार्गी होना चाह रहे हो, मैं तुम्हें होने थोड़े ही दूँगा। जो भक्ति की ज़्यादा बात करते हैं, जैसे अभी देवी जी कर रही थीं, उनको मैंने ज्ञान की बात बतायी। तुम ज्ञान की ज़्यादा बात कर रहे हो, मैं तुमको नाच की बात बताऊँगा। जो व्यक्ति जो ही मार्ग बहुत ज़ोर से पकड़े हो, समझ लेना उसने वहाँ अब सुविधा तलाश ली है, वहाँ अब उसने ठिकाना बना लिया और अहंकार वहाँ आश्रय पा रहा है।

तुम्हारे लिए अब ज़रूरी है कि कल तुम जाओ बेटा और अगला सवाल तभी पूछना, चाहो तो वहाँ से लाइव पूछ सकते हो, मैं तैयार हूँ। ये कैसी बात है कि महिला कर्मचारी से बात करते हुए भी तुम असहज हो जाते हो, ये क्या बात है? तुम्हारा सारा ज्ञान कहाँ गया? वो भी तो पंचभूत है। ये ज्ञान नहीं याद आता तब?

प्र: मैं पॉकेट गीता रखता भी हूँ साथ में लेकिन...

आचार्य: भूत-पिशाच निकट नहीं आवे, क्या कर रहे हो राजदीप! लोग क्या कहेंगे? आचार्य जी के साथ इतने दिनों से हो और महिलाओं से बात करते हुए पॉकेट गीता रखनी पड़ती है साथ में। कृष्ण की है गीता, यूँही नहीं उनकी पारम्परिक छवि भी बनायी गयी है कि एक कृष्ण बीच में खड़े हैं और दस गोपियाँ उनके इर्द-गिर्द नाच रही हैं। तुमसे एक नहीं बनायी जाती?

ये देखो, चेहरे पर विवशता के भाव! चलो, कोई बात नहीं, अकेले जाकर बैठकर आ जाओ, लेकिन जाओ ज़रूर। नहीं समझ पाओगे दुनिया को, अगर समय से पहले ही अपनेआप को कछुए की तरह वापस खींच लोगे।

मैं पूछूँगा तुमसे, कल बस जाकर बैठ आना, इतना कर दो। ठीक है? कोई ख़तरा नहीं है इसमें, सिर्फ़ अवलोकन के लिए तो जा सकते हो न? बैठे हो, देख रहे हो क्या है, बस देख लो, कुछ मत करना। कुछ खाना नहीं, कुछ पीना नहीं, द्रष्टा की तरह देख तो सकते हो, इतना तो कर लो।

प्र: हाँ, मैं आपकी बातों को कंसिडर (सोच-विचार) करूँगा।

आचार्य: सारा शिष्यत्व ग़ायब हो गया। अब ’कंसिडर करूँगा!’ ये हाई कमांड हैं, जो मेरी पेटिशन को कंसिडर करेंगे! अब अगला सवाल तभी पूछना जब पहले फ्लोर (डिस्को में) पर कम-से-कम आधा घंटा बिताकर आ जाओ।

प्र२: मेरा प्रश्न ये है कि आपने अध्याय दो और श्लोक अट्ठावन, उसमें जब कछुए के उदाहरण को समझाया था, तब आपने कहा था कि इसका अर्थ दुबककर छुपना नहीं होता। एक भाई को आपने क्लब जाने को भी कहा था। पर फिर मेरे मन में प्रश्न है कि क्या ऐसा करना कुसंगति नहीं होगा, जिसका विपरित प्रभाव भी पड़ सकता है?

आचार्य: कुसंगति अगर पहले ही भीतर बैठी हुई हो और उसको एक्सपोज़ करने के लिए, अनावृत करने के लिए, उसका पर्दाफ़ाश करने के लिए किसी माहौल में जाने की ज़रूरत हो तो?

प्र: उससे लड़ाई करने के लिए?

आचार्य: लड़ाई तो तब करोगे न जब पहले पता होगा कि भीतर क्या बैठा हुआ है। तुम्हारे भीतर वासनाएँ बैठी हैं कई तरह की, लेकिन तुमने उनको धक्का इत्यादि देकर के, किसी कोने में अपने भीतर छुपा रखा है और अपनेआप को ही तुम समझाए हुए हो कि मेरे भीतर ऐसी वासनाएँ हैं ही नहीं।

तो तुमको दिखाया कैसे जाए कि हैं, और अगर नहीं दिखाया जाएगा तो तुम तो यूँही अपने भ्रम में ही बड़े प्रसन्न रहोगे, तुम कहोगे — मेरा तो काम हो गया। झूठ को साफ़ करने से पहले उसको उघाड़ना पड़ता है न? ठीक वैसे, जैसे ज़ख्म का इलाज करने से पहले जो तमाम तुमने कपड़े पहन रखे होते हैं, उतारने पड़ते हैं। फिर जो पट्टी बाँध रखी होती है वो खोलनी पड़ती है, ज़ख्म को भी उखाड़ना पड़ता है, तभी इलाज होता है।

प्र२: तो अभ्यास मतलब कैसा होगा? वहाँ जाने के बाद अगर ये चीज़ें नोटिस करें?

आचार्य: तुम वहाँ जाओ तो पहले, अभ्यास क्या करना है, वो तो बाद की बात है। पहले जो पुराना अभ्यास है सब वहाँ बिखरने तो दो। ये जो शालीनता का और सौम्यता का अभ्यास करे बैठे हो, पहले ऐसे माहौल में तो जाओ, जहाँ ये अभ्यास तार-तार हो जाएँ, जहाँ जैसे ही माहौल की चोट पड़े, एकदम बिखर जाओ और फिर समझ में आये कि जो ये भीतरी मेरे व्यवस्था थी, जो भीतरी मेरा अनुशासन था, वो कितना कमज़ोर था!

ज़्यादातर लोग तो इसी गुमान में, ग़लतफ़हमी में ज़िन्दगी बिता देते हैं कि हम भीतर से बड़े साफ़-सुथरे लोग हैं, बड़े अनुशासित लोग हैं और वो ऐसा भ्रम अपनेआप को सिर्फ़ इसलिए दे पाते हैं क्योंकि वो कभी ऐसे माहौल में जाते ही नहीं जहाँ उनके अनुशासन को, आन्तरिक व्यवस्था को चुनौती मिले।

तुम अपनेआप को बोल दो, ‘तुम दुनिया के नम्बर एक टेनिस प्लेयर हो, राफेल नाडाल क्या चीज़ है, तुम्हारे सामने कुछ भी नहीं!’ तुम ऐसे अपना बाजू दिखाओ, बोलो, ‘ये देखो, मेरा देखो, उसका क्या है!’ अपने घर में बैठे-बैठे ये दावा करना कितना सुविधा प्रद होता है न? तो ऐसों को फिर मैं कहता हूँ, ‘तुम जाओ और कोर्ट पर उतरो और वहाँ पर बिखरो।’

नहीं तो अपनेआप को ये प्रमाणपत्र देना कि मैं सज्जन आदमी हूँ, मैं भला बन्दा हूँ, मैं तो इच्छाओं, कामनाओं को जीत चुका हूँ इत्यादि, इत्यादि। ये बड़े मज़े की बात होती है। अहंकार बड़ा तृप्त होता है इससे।

प्र२: अभी जैसा आपने कहा, वैसा थोड़ा-बहुत तो होता ही है। अभी ऑफिस में भी रहते हैं तो कहीं-न-कहीं बिखर तो जाते हैं, तो अब मतलब किस तरह का अभ्यास, मतलब कैसे करें?

आचार्य: संगति की बात करी थी तो अब अपनेआप से पूछो न, कि किसकी संगति कर रहे हो कि हालत इतनी कमज़ोर है भीतर से?

प्र२: न चाहते हुए इस माहौल में रहना पड़ता है।

आचार्य: न चाहते हुए भी रहना पड़ता है, आ गयी मजबूरी।

प्र२: नहीं, मतलब ऑफिस में अब पास में भी कोई बैठा है, तो इस तरह की बातें।

आचार्य: पास में कोई बैठा है या पास में कोई बैठी है, क्या कर सकते हैं मजबूरी है, क्या कर सकते हैं। मजबूरी का मेरे पास कोई इलाज नहीं होता।

प्र२: तो रास्ता यही बचता है कि छोड़ ही दें उसको?

आचार्य: तुमसे किसने कह दिया कि कोई पास बैठा हुआ है तो उसकी वजह से तुम्हें इच्छाएँ उठ आती हैं? पहली कुसंगति भीतर की होती है। तुम जो आन्तरिक ज्ञान लेकर चल रहे हो, तुम जो बिलीफ़्स, जो मान्यताएँ लेकर चल रहे हो, उनके कारण आन्तरिक माहौल ख़राब होता है। बाहर वाला तो वही है न, बाहर वाला?

बाहरी ज़्यादा निकट है तुम्हारे या जो भीतरी है, जो तुम्हारे भीतर ही बैठा है? तो कुसंगति बाहर वाला होगा पर वो बाद की कुसंगति है, पहले जो आन्तरिक कुसंगति है, वो ख़तरनाक है। आन्तरिक कुसंगति की हम बात करना नहीं चाहते हैं, तो हम दोष डाल देते हैं बाहरी माहौल पर।

कहते हैं — ‘क्या करें हम मजबूर हैं। ऑफिस जाते हैं, वहाँ तो जो लोग हैं, वो हैं ही ऐसे, हम उनका क्या कर सकते हैं, उनको थोड़े ही बदल सकते हैं।’ उनको नहीं बदल सकते, भीतर जो कुछ है उसको तो बदलो। पर भीतर जो कुछ है उसी का नाम है — मैं। वो है तुम्हारा व्यक्तित्व, वो है तुम्हारी हस्ती, उसको बदलने में जान ही चली जाती है, ऐसा ही लगता है कि प्राण उड़ गये बिलकुल।

तो आदमी कैसे उसको बदले? क्योंकि वही तो सबकुछ है न मेरा? मेरी आदतें, मेरे विचार, मेरी पसन्द, मेरी नापसन्द; जिन चीज़ों को मैं ठीक मानता हूँ, जिनको मैं ग़लत मानता हूँ, मेरा देखने का नज़रिया — यही तो ज़िन्दगी है मेरी।’ हाँ! यही कुसंगति है तुम्हारी और यही कुसंगति फिर अपना असर दिखाती है, जब बाहरी माहौलों में जाते हो और फिर जब बाहरी माहौलों में जाकर के पिटाई पाने लगते हो, तो दोष किस पर दे देते हो? माहौल पर।

तुम कहते हो, ‘माहौल ऐसा है, हम क्या करें? मजबूरी है।‘ तुम कमज़ोर हुए बैठे हो, साधारण हवा चले तुम्हे छींके आनी शुरू हो जाए, तुम हवाओं को दोष दोगे? उन्हीं हवाओं में एक मज़बूत आदमी रस पा रहा होगा, पा रहा होगा कि नहीं?

हवा चल रही है, मान लो थोड़ी सी तेज़, एक मज़बूत आदमी है वो कहेगा, ‘बहुत अच्छा मौसम है।’ एकदम हवा चल रही है वो बाहर निकल जाएगा, उसे अच्छा लगेगा, हवा में उसके बाल उड़ेंगे, हवा में उसके कपड़े थोड़ा उड़ेंगे, वो दौड़ ही लगाने लगेगा, उसका सब पसीना सूख जाएगा, बड़ा उसको आनन्द रहेगा।

और एक कमज़ोर आदमी है, वो इतनी हवा में वो ख़ुद ही उड़ा जा रहा है। ‘अरे रे, रे! तूफ़ान आ गया, चक्रवात आ गया है! आइ हैव बीन कैरीड बाइ साइक्लोन (मुझे तो तूफ़ान अपने साथ ही ले गया था)।’ हवा की ग़लती है? कमज़ोरी आन्तरिक है क्योंकि कुसंगति आन्तरिक है। आन्तरिक कुसंगति को रखे-रखे बाहर की संगति की क्या बात कर रहे हो तुम?

और ये हमने खूब ग़लती की है, भीतर का कचरा हम सहेजकर रखते हैं, जैसे हीरा-मोती हो और बाहर को लेकर के हम बड़ी सतर्कता दिखाते हैं, ‘देखो, वो गन्दा आदमी है, उससे बात मत करना।‘ ‘देखो, वो ग़लत लोगों का इलाका है, उधर मत चले जाना।’ अरे, ग़लत लोगों का असली इलाका किधर है? वो इधर है (शरीर की ओर संकेत), वो भीतर है और उसके सरगना हो तुम, ग़लत लोगों के, पर होता है। क्लास का जो सबसे बिगड़ा हुआ लड़का होता है न, उसको उसकी माँ यही बोलती है कि देखो, गन्दे बच्चों की संगति मत करना, वो तुम्हें बिगाड़ देंगे।

और हक़ीक़त ये होती है कि ये वही जनाब हैं जिन्होंने पूरे स्कूल को बिगाड़ रखा है, लेकिन इनकी मम्मी को डर ये है कि कहीं इनको कोई और न बिगाड़ दें। ‘मेरा दुधमुँहा! मेरा लाल! दूसरे बच्चे आकर के न जाने कैसी-कैसी बातें सिखा जाते हैं इसको! शक्ल से ही कितना मासूम है!’

प्र२: तो आचार्य जी, लड़ना अपने कुसंगति से, अपने वेग से जीत पाने का क्या मतलब है?

आचार्य: पहले तो साक्षात्कार करना पड़ेगा कि कितना कचरा है भीतर और वो कचरा तो पता चलेगा निडर प्रयोग से ही, अपने अनुभवों के दायरे को विस्तार दो और दे भी रहे हो। विस्तार देने की ही प्रक्रिया में ये अनुभव भी शामिल है, जो अभी आपको मेरे साथ हो रहा है। क्योंकि इस अनुभव से भी यही हो रहा है न कि भीतर जो कचरा है, भीतर की जो बातें हैं, उनको सामने लाने में मदद मिल रही है।

तो जैसे साहसपूर्वक आप इस अनुभव से गुज़र रहे हो, वैसे ही और तमाम अनुभवों को भी आमन्त्रित करो जो तुम्हें तुम्हारा ही परिचय बताएँगे, उसमें तकलीफ़ होती है, बड़ा बुरा लगता है कि हम ऐसे आदमी हैं क्या! लेकिन जब तक उस तकलीफ़ से नहीं गुज़रोगे तब तक कोई सुधार भी नहीं होगा।

प्र२: तो अनुभवों के मूल तक जाने की आवश्यकता है?

आचार्य: मूल वगैरह छोड़ दो। मूल तो ऐसा हो जाता है कि अनन्त, वहाँ कभी पहुँच ही नहीं सकते। ‘बढ़िया है! बच गये! आचार्य जी ने बोला मूल तक जाना है। मूली खाकर सो जाओ!’ सीधी-सीधी आम ज़िन्दगी की बातें हैं, सीधी बातें। उनको देखना, स्वीकारना और अपनेआप से पूछना कि ये चल क्या रहा है मालिक और जो कुछ चल रहा है, थोड़ा मुझे और पता करने की ज़रूरत है कि ये क्या है, क्यों है?’

किसी की गाड़ी देखी, उसकी गाड़ी को देखते ईर्ष्या भी उठ रही है, लालच भी उठ रहा है उस बात को जल्दी से दफ़न मत कर दो, बात आयी-गयी मत कर दो, बात को पकड़ लो। बोलो, ‘अभी-अभी जो मैंने अनुभव करा, इससे मुझे मेरा हाल पता चलता है। मैं इस बात को छोड़ नहीं सकता। मैं तो बल्कि इस अनुभव को बार-बार करना चाहता हूँ, मैं देखना चाहता हूँ कि मेरे सामने जब किसी का पैसा आता है, तो उसका मुझ पर क्या प्रभाव पड़ता है, मैं देखना चाहता हूँ।’

और देखो, और स्वीकारो कि बहुत बुरे हालात हैं। स्वीकारने से क्या होगा? स्वीकारने से यही होगा कि जो अन्धेरे का जन्तु है, उस पर रोशनी पड़ जाएगी। जाड़े जब आने लगते हैं तो कम्बल वगैरह जो सब तह करके रख दिये होते हैं ट्रंकों में, अलमारियों में, उनको सीधे बाहर निकालकर के ओढ़ने लगते हो क्या?

पहले क्या किया जाता है घरों में? उनको निकालकर के धूप में डाल देते हैं एकाध-दो दिन को, क्यों? कुछ कर नहीं रहे, सिर्फ़ उन्हें धूप दिखा दी, उन्हें प्रकाश दिखा दिया। बस ऐसे ही, कुछ करना नहीं है, सिर्फ़ प्रकाश डाल देना है। भीतरी जन्तु भी हमारा ऐसा ही है, उसके साथ कुछ करना नहीं है बस उसे प्रकाशित कर दो, उस पर रोशनी डाल दो, उसका पर्दा फ़ाश कर दो, उसे एक्सपोज़ कर दो, उससे मुक्ति मिल जाती है।

अन्धकार और अहंकार एकदम साथ-साथ चलते हैं, दोनों का साझा नाम है अज्ञान; अन्धेरा। दोनों को अन्धेरा चाहिए, अहंकार को भी, अज्ञान को भी, न पता हो — इसलिए ज्ञान को प्रकाश कहा गया है, वो दिखा देता है कि बात क्या है। प्रयोग करोगे तो बात दिख जाएगी और जो बात दिखेगी फिर साहस दिखाओ उस बात को स्वीकार करने का, उसको अभिस्वीकृत देने का, एक्नॉलेज करने का।

कि हाँ! मेरे भीतर पशुता भर नहीं है, मेरे भीतर पूरा जंगल है। पशुता तो बहुत छोटा शब्द है, मेरे भीतर गीदड़, सियार, लोमड़ी, कौंआ सब बैठे हुए हैं। जितने तरीक़े के पशु हो सकते हैं, सब हुआ-हुआ, काँव-काँव सब कर रहे हैं। अच्छा नहीं लगता, ‘हैं! ऐसा है? पूरा जंगल है भीतर?’ हाँ। हम ’वाइल्ड लाइफ़ सैंक्चुरी (वन्य जीव अभयारण्य) है?’ हाँ।

‘हैं! हम तो इज़्ज़तदार आदमी थे!’ वो हटा दो, तुम किसी भी तरीक़े से इज़्ज़त वगैरह के लायक़ हो नहीं। ‘हैं! हम इतने गिरे हुए हैं?’ हाँ।‌ भूलिए नहीं कि अर्जुन की भी नग्नता का पल है जिसके उपरान्त गीता फलित होती है। नहीं तो साधारण परिस्थितियों में अर्जुन तो बड़े बेजोड़ योद्धा थे, मज़बूत। ‘बोलो, क्या करना है? किसको जीतना है? किसको मारना है?’

लगभग पचास साल की ज़िन्दगी जी चुके हैं अर्जुन महाभारत के युद्ध के समय पर। और पचास साल में किसको नहीं उन्होंने जीता, इतने युद्ध करे, इतनी विपत्तियाँ भी सही, दसों साल तो जंगल में बिता दिये। ‘मज़बूत आदमी हैं!’ जब तक वो मज़बूत आदमी थे गीता उतरी ही नहीं, फिर एक क्षण आता है जब ये मज़बूत आदमी जिसका विजय का, मज़बूती का, सामर्थ्य का दशकों का इतिहास है।

वो एक क्षण आता है जब ये मज़बूत आदमी कहाँ पर है? ये रो रहा है, ये गिरने को तैयार है, ये एक बच्चे की तरह बिलख रहा है। इस मज़बूत आदमी से धनुष उठाया नहीं जा रहा है। कृष्ण से ऐसे कह रहा है कि शरीर में ज्वर उठ रहा है, रोयें खड़े हो रहे हैं, आँखें लाल हो रही हैं। ‘ये जो सामने खड़े है मेरे अपने इनको कैसे मारूँ, माफ़ करो मैं नहीं लडूँगा।’ ये क्षण आना ज़रूरी है, तुम्हें दिखाई दे कि कितने कमज़ोर हो तुम!

दशकों तक तुमने जो आत्म छवि सहेजकर रखी है जब वो छन-छनाकर टूटती है, तब गीता उतरती है। जब तक तुम अपनी नज़रों में सामान्य इज़्ज़तदार, मज़बूत, सामर्थ्यशाली बने हुए हो, तब तक गीता मिलेगी नहीं तुमको।

तुम तो मज़बूत आदमी हो, मज़बूतों को क्या करना है? गीता तो बल देती है। जो पहले से ही बली है, वो अतरिक्त बल का क्या करेगा? जीवन से प्रार्थना करो कि वो तुम्हें ऐसे कुरक्षेत्र में खड़ा कर दे, जहाँ तुम्हारा सारा नकली बल, तुम्हारा सारा खोखला सामर्थ्य एकदम उद्घाटित हो जाए, असलियत अपनी पूरी विभत्स नग्नता के साथ प्रकट हो जाए।

सम्मान और सामर्थ्य का तुमने जो मुखौटा पहन रखा है, चीथड़े हो जाएँ, तार-तार। तुम कहीं के न बचो, तुम अपनी नज़रों में गिर जाओ, तुम किसी को मुँह दिखाने लायक़ न रहो। जब अहंकार इतनी विभत्सता से टूटता है, तब जाकर के गीता की सम्भावना बनती है। उपनिषद् भी तुम्हें क्या लगता है, ऐसे ही उतर आयें हैं? कि एक औपचारिक संवाद है, कि आ गया है कोई शिष्य बनकर के ऋषि के सामने बैठ गया है और पूछना उसने शुरू कर दिया है — ‘बताइए, माया क्या है? तितिक्षा क्या है? उपरति क्या है? आत्मा क्या है? बताइए, बताइए।’ ऐसे नहीं है।

मैं तुम्हें वो बता रहा हूँ जो उपनिषदों में लिखा नहीं जाता, क्योंकि लिखना शालीनता की बात नहीं होती। शिष्य रोया है, गिड़गिड़ाया है, आवश्यक नहीं है कि ऋषि के सामने, जीवन के सामने। शिष्य टूटा हुआ है तब जाकर के ऋषि से उपनिषद् मिलता है उसको।

जो शिष्य, ऋषि के सामने टूट नहीं सकता, गिड़गिड़ा नहीं सकता; जीवन नहीं, मौत की भीख नहीं माँग सकता, उसको उपनिषद् नहीं मिलेगा। जो ऋषि के सामने भी अभी सम्माननीय बना हुआ है, सज्जन बना हुआ है, औपचारिकता जिसने अभी पहन रखी है, जिसका कुशल क्षेम यथावत् है, जो कह रहा है मेरे जीवन में तो सबकुछ ठीक ही चल रहा है, बस एक-दो उत्सुकताएँ थी, उसको शान्त करने के लिए आपके पास आ गया ऋषिवर। जो इस तरह की बातें कर रहा है उसको उपनिषद् मिलेंगे ही नहीं। एक हारा हुआ, टूटा हुआ मन चाहिए।

सत्य के आगे समर्पण तो तभी होगा न, जब सत्य की चोट पहले तुम्हें चकनाचूर कर दे? तुम चकनाचूर अभी हुए नहीं तो समर्पण कैसे होगा?

जो ऋषि के सामने भी खड़ा हो, जिसकी ग्रीवा तनी हुई हो, जिसकी रीढ़ अभी बिलकुल सीधी हो, जो ऋषि की आँखों में आँखें डालकर के देख रहा हो, ऐसों को उपनिषद् नहीं मिलते। अर्जुन जैसा हाल होना चाहिए — भूमि पर लोट जाने को तैयार।

अर्जुन एक अवसर पर कहते हैं, ‘मर ही जाऊँ तो ज़्यादा अच्छा है न! ये जिस हाल में मुझे आज जीवन ने खड़ा कर दिया है, इससे तो बेहतर ये है कि मैं स्वयं ही मर जाऊँ।’ तुम्हारी भी जब वो स्थिति हो जाएगी कि तुम कहोगे कि जीने से बेहतर है मौत, तब गीता मिलेगी तुमको।

जब तक ज़िन्दगी अभी तुम्हारे काम की है, तब तक अपना काम चलाते रहो, कृष्ण का क्या करोगे?

सबसे बड़ा अनाधिकारी कौन होता है? अनाधिकारी समझते हो? अनाधिकारी माने? कुपात्र, अनडिज़र्विंग। सबसे अनाधिकारी कौन होता है? जो व्यथित नहीं होता, जो पीड़ा में नहीं होता, जिसके भीतर एक मन्थन नहीं चल रहा, जिसको लग रहा है कि जीवन ठीक-ठाक ही है और अगर कुछ ऊँच-नीच है भी तो — ‘मैं सम्भाल लूँगा, मैं ठीक कर लूँगा, हो जाएगा। मैं इसे सम्भाल लूँगा, मैं इसे मैनेज कर लूँगा कोई दिक्क़त नहीं है।’ ये सबसे बड़ा कुपात्र है, इसे कुछ नहीं मिल सकता।

सत्य की एक बड़ी खूबसूरत अदा है, वो इतना सामर्थ्यशाली है कि कभी किसी को विवश नहीं करता, मजबूर नहीं करता चूँकि वो अति सामर्थ्यशाली है, चूँकि वो पूर्ण बल रखता है इसलिए वो आपको पूर्ण स्वतन्त्रता भी देता है। वो कहता है — ‘ठीक है, जैसा तुम्हारा चल रहा है चलाओ। तुम्हारे पास अगर कई ठिकाने हैं तो उन ठिकानों पर मौज मनाओ, तुम्हें लगता है कि तुम अपना क़िस्सा ख़ुद ही सम्भाल लोगे तो सम्भाल लो बख़ूबी। हमें कोई शौक नहीं तुम्हारे जीवन में हस्तक्षेप करने का, हम काम बस उन्हीं के आते हैं, जिन्हें दिख जाता है कि अब वो अपने काम के भी नहीं रह जाते हैं।’

जो अभी अपने काम का है, सत्य उसके काम नहीं आएगा, कृष्ण उसके काम नहीं आएँगे, गीता उसके काम नहीं आएगी। आप क्या करोगे निष्काम कर्म जानकर के? अभी तो आपकी सकामता में ही आपकी आशा बँधी हुई है। करोगे क्या? आशा बँधी हुई है सकामता के साथ कि मैं फ़लाना काम कर लूँ, तो उससे मुझे फ़लाना परिणाम मिल जाएगा, बड़ा मज़ा आएगा।

आशा वहाँ बाँध रखी है और अध्यात्म खोलकर, बैठकर निष्काम कर्मयोग को पढ़ रहे हैं। करोगे क्या तुम निष्काम कर्म का? तो गीता ऐसों के लिए बन्द हो जाती है। स्थूल दृष्टि से देखोगे तो ऐसा लगेगा कि गीता पुस्तक की एक प्रति तुम्हारे सामने अभी खुली हुई है, पर सूक्ष्म तल पर जानते हो क्या होता है? वो पुस्तक अपनेआप बन्द हो जाती है, तुम्हें लगेगा खुली हुई है, वो अपनेआप बन्द हो जाती है।

जैसे तुम्हारे पास आँखे है गीता को देखने के लिए न, गीता के पास और ज़बरदस्त आँखें हैं, सूक्ष्म दृष्टि है तुम्हें देखने के लिए। जब तुम और गीता आमने-सामने होते हो, तो दोनों एक-दूसरे को देख रहे होते हैं। तुम स्थूल दृष्टि से देखते हो, गीता सूक्ष्म दृष्टि से देखती है और गीता अगर देख लेती है कि तुम्हारे पास अभी कृष्ण के अलावा और भी ठिकाने हैं, तो वो अपनेआप बन्द हो जाती है।

बन्द हो गयी, तुम्हें लग रहा खुली हुई है, वो बन्द हो चुकी है, लो पढ़ लो। और फिर तुम सिर खुजाते हो कि समझ में नहीं आ रही। अरे, बन्द हो चुकी है! कैसे समझ आएगी? "नायम् आत्मा प्रवचनेन लभ्यो" — श्रुति कहती है, ‘बहुत प्रवचन सुनने वाले को नहीं मिलती आत्मा।’ उसको भी नहीं मिलती आत्मा, जिसने बहुत अध्ययन करा है।

तो फिर किसको मिलती है आत्मा? इसी श्रृंखला में, श्लोक है उपनिषद् में और उत्तर देते हैं उपनिषद् — ‘आत्मा उसको मिलती है जिसको आत्मा स्वयं चुनती है।’ जो बलहीन है उसको नहीं मिलती, जो बहुत प्रवचन सुनता है उसको नहीं मिलती, जो बहुत ग्रन्थ पढ़ता है उसको भी नहीं मिलती। तो किसको मिलती है? जिसको वो स्वयं चुनती है। कैसे चुनती है? अपनी दृष्टि से देखकर चुनती है। गीता चुनती है कि तुम्हें गीता मिलेगी कि नहीं मिलेगी, गीता तुमको देखती है कि इसके कितने ठिकाने हैं, अगर इसके चार ठिकाने हैं तो हटाओ अस्वीकृत, रिजेक्टेड। तुम अब अपनेआप को बहलाने के लिए गीता लेकर घूमते रहो इधर-उधर, वो बन्द हो चुकी है।

आज ही लेकर आये थे मेरे पास "एकम् एव अद्वितीयम् ब्रह्म" — एक अद्वितीय, दूसरा अगर कोई बचा हुआ है तुम्हारे पास, अगर तुमने अभी अपनी ज़िन्दगी में बैकअप (कोई दूसरा विकल्प) रखा हुआ है तो निश्चित हो गया कि तुमको गीता तो नहीं मिलेगी। "एकम् एव" — एक ही, "अद्वितियम् ब्रह्म" — एक ही, दूसरा नहीं होना चाहिए, दूसरा ठिकाना होना ही नहीं चाहिए, दूसरी उम्मीद होनी ही नहीं चाहिए, प्लान-बी जैसा कुछ होना ही नहीं चाहिए।

और मन अगर कभी तुम्हारे प्लान-ए — प्लान-ए माने गीता, मन कभी प्लान-ए से बहुत भागे तो प्लान-बी होना चाहिए — गो बैक टू प्लान-ए। क्या है प्लान-बी? गो बैक टू प्लान-ए ( जो दूसरा प्लान है वो यही है कि प्लान-ए की तरफ़ या पहले प्लान की तरफ़ जाओ) । "एकम् एव अद्वितिय ब्रह्म" — दूसरा नहीं होना चाहिए, नो बैकअप्स। द बैकअप इटसेल्फ़ मेक्स द प्लान-ए फेल (जो दूसरा रास्ता होता है वही पहले रास्ते को असफल बना देता है)।

प्र२: तो अभी आपने जैसे कहा कि बैकअप या आश्रय नहीं होना चाहिए, तो जो हम आत्मनिर्भरता की बात करते हैं क्या वो बैकअप या आश्रय नहीं है?

आचार्य: आत्मनिर्भरता माने क्या?

प्र२: जो हम सोचते हैं कि हम ख़ुद ही कर लेंगे या किसी और पर निर्भर नहीं होना चाहिए ऐसा?

आचार्य: आत्मनिर्भरता में आत्म, कौनसा आत्म है, अहंकार वाला या दूसरा वाला? किस पर निर्भर हो, किसका आश्रय?

प्र२: ये निर्भरता भौतिक वाली तो वो ही हो गयी।

आचार्य: तो फिर तो तुम्हें बुद्धि का आश्रय है। पहले पता करना पड़ेगा न कि जब मैं आत्म कहता हूँ, मैं कहता हूँ — मैं, अहम् तो अहम्, कौनसा अहम् है मेरा, कितने पानी में अहम् चल रहा है अभी? आत्मनिर्भरता के दो बहुत विपरीत अर्थ हो सकते हैं। एक होती है रावण की आत्मनिर्भरता और एक होती है कि "तुलसी भरोसे राम के निर्भय होके सोए" — इन्होंने भी तो कोई प्रबन्ध नहीं कर रखा है, वो जब सो रहे हैं, जहाँ भी सो रहे हैं तो वहाँ उन्होंने कोई चौकीदार थोड़ी बैठा रखे हैं, वो भी तो आत्मनिर्भर हैं।

पर कौनसी वाली है तुम्हारी आत्मनिर्भरता?

प्र२: स्थूल रूप से तो देखने पर लगता है कि तुलसी दास जी ने अपने लिए कोई आश्रय नहीं रखा है, तो क्या हम भी अपने लिए कोई आश्रय न रखें?

आचार्य: पहले तुम समझ तो लो कि तुम हो कौन, मैं भी कोई आश्रय न रखूँ। जो आश्रित है ही वो कह रहा है, ‘मैं कोई आश्रय न रखूँ,’ ये कैसे हो पाएगा? जिसकी परिभाषा ही ये है कि वो आश्रित है, वो कोई आश्रय कैसे नहीं रखेगा? पहले अपनी दैनिक गतिविधियों को ग़ौर से देखकर के, अपनी मजबूरियों को ग़ौर से देखकर के ये पता तो करो कि आप हो कौन।

आप बहुत आश्रित हो, उसका एक निश्चित प्रमाण तो ये शब्द ही होता है मजबूरी। जो आश्रित नहीं है वो मजबूर नहीं हो सकता। आप किसी से बात करें और दो मिनट के अन्दर-अन्दर वो मजबूर शब्द या मजबूरी शब्द चार-पाँच बार बोल दे, तो जान लीजिएगा कि इस व्यक्ति के जीवन में आत्मा जैसी कोई चीज़ है नहीं, क्योंकि अहंकार ही होता है जिसके अपने पाँव नहीं होते, वो बैसाखियों पर चलता है, आश्रित।

मजबूरी का क्या अर्थ होता है? मजबूरी का ये अर्थ होता है कि अगर मैंने फ़लानी चीज़ नहीं की, तो मुझे कौन बचाएगा, ये होता है। तभी तो कहते हो फ़लानी चीज़ ग़लत है, पर मैं कर रहा हूँ, ‘क्योंकि नहीं करूँगा तो मुझे कौन बचाएगा? मैं कहाँ जाकर छुपूँगा? मुझे कौन सहारा देगा? — इसी को मजबूरी कहते हो न?’

ये वक्तव्य सिर्फ़ तब आता है जब तुम्हारे पास एक उत्तर न हो छोटा सा, उस उत्तर का नाम है — कृष्ण या राम या सत्य। तो मजबूरी शब्द ही तभी पैदा होता है जब जीवन में राम न हों, नहीं तो तुरन्त कहोगे, कैसी मजबूरी?

जो नहीं ठीक है वो नहीं करेंगे, जो ठीक है वो बिलकुल करेंगे, अंजाम कौन सँभालेगा? सच्चाई सम्भालेगी — द ट्रुथ। हमारा काम है सही काम करना, अंजाम सम्भालना हमारा काम थोड़े ही है? अब जैसे ही मैं ये बोलता हूँ तो एकदम मुँह उतर जाता है, कहते हो, ‘नहीं तो चोट लग जाएगी, वो बहुत बड़े-बड़े बॉस लोग हैं, वो आकर के हमारे साथ बहुत बुरा कर देंगे। आचार्य जी, हमें ग़लत राह पर मत भेजिए, बहुत पिटाई होगी हमारी।’

मैं इनकार नहीं कर रहा कि पिटाई होगी, मैं आपको ये कह रहा हूँ, ‘आप जानते नहीं है कि आपमें कितनी पिटाई पी जाने का दम है।‘ यहाँ तक तो आपने सही पकड़ा है कि पिटाई बहुत होगी अगर निराश्रय होकर जियोगे, यहाँ तक बात बिलकुल ठीक है। लेकिन उसके आगे की बात आप नहीं जानते, आप कहते हो, ‘पिटाई बहुत होगी’; मैं सहमत हूँ, उसके आगे आप कहते हो, ‘वो जो पिटाई होगी, मुझे तोड़ देगी’; वहाँ मैं असहमत हूँ।

पिटाई बहुत होगी वो, आप जानते हो कि आपने लोगों की पिटाई होती कभी देखी होगी या आपकी भी एक-आध बार हुई होगी लेकिन उसके आगे की जो बात है, वो आपने कभी होने नहीं दी इसलिए आपको उसका कोई परिचय नहीं है।

उसके आगे की बात ये है कि आप अपनी ही ताक़त से बहुत अनजान हैं, आप नहीं जानते कि आपके भीतर कोई बैठा है जो अति सामर्थ्यशाली है, वो न जाने कितनी पिटाई पी जाएगा! बल्कि वो जितनी पिटाई पियेगा उतना मज़बूत होकर उभरेगा। ये सब जो आपके मालिक बनकर आपको मजबूर करते हैं, इन्हें मौक़ा दो अपनेआप को पीटने का, पिटो इनसे थोड़ा, जब पिटोगे तभी तुम्हारी ताक़त जगेगी, जब पिटोगे तभी तुम्हें पता चलेगा कि वो पिटाई झेली जा सकती है, कि पिटने के बाद भी तुम न सिर्फ़ साबुत हो, बल्कि और मज़बूत हो।

लेकिन ये बात आपको पता नहीं है, क्यों नहीं पता? क्योंकि आपने अपनेआप को पिटने का कभी मौक़ा ही नहीं दिया, आप डर के मारे पिटाई से मुँह चुराते रहे हो, पिटो तो, जब वो पिट रहा होगा, लगेगा कि बस अब अन्त हो गया, ‘सबकुछ मेरा ख़त्म हो गया, हस्ती का आख़िरी पल है अब ये।’ लेकिन ऐसा होगा नहीं, जी जाओगे, उठोगे।

प्र२: मैं संस्था से जुड़ा हुआ हूँ, तो मेरे लिए तो वो जॉब ज़रूरी है क्योंकि जो राशि मुझे मिल रही है उसी से मैं संस्था को आर्थिक सहायता भी कर पाऊँगा।

आचार्य: तो मैं, ये मैं आपसे नहीं, मैं सबसे कह रहा हूँ, कोई भी व्यक्ति अगर अपने जीवन में ग़लत नौकरी इसलिए करे जा रहा है कि वो ग़लत नौकरी करूँगा तभी तो मैं संस्था को योगदान दूँगा, तो कृपा करके संस्था पर ये एहसान न करें। बड़ा उल्टा हो जाएगा न, संस्था इसलिए है ताकि आप अपनी ग़लत नौकरियों से आज़ाद हो सकें और आप कह रहे हैं, ‘संस्था को बनाये रखने के लिए ही मैं ग़लत नौकरी कर रहा हूँ।‘ तो ये तो उल्टी गंगा!

प्र२: नौकरी ग़लत नही हैं लेकिन जो आम ऑफिस का जो माहौल होता है वो चीज़ है, बाक़ी ऐसा कुछ काम वो ग़लत नहीं है।

आचार्य: सब नौकरी में शामिल होता है न, नौकरी का और क्या मतलब होता है? माहौल और नौकरी दो अलग-अलग चीज़ें थोड़े ही होता है। देखो भाई, संस्था को इतनी मेहनत करनी इसलिए पड़ती है क्योंकि लोग ग़लत धारणाओं में, ग़लत रिश्तों में, ग़लत नौकरियों में फँसे हुए हैं। आप लोग जहाँ-जहाँ ग़लतियों में और तथाकथित मजबूरियों में फँसे हुए हो, आप वहाँ से अगर ख़ुद ही आज़ाद हो जाओ, तो संस्था का काम तो ख़ुद-ब-ख़ुद आसान हो जाएगा न, फिर संस्था को बहुत आर्थिक योगदान की ज़रूरत पड़ेगी काहे को?

आप जो संस्था को देते हो, संस्था वो आपकी ही देखभाल पर तो खर्च करती है। आप अगर बीमार रहो ही नहीं तो संस्था को आपके ऊपर इतना खर्च क्यों करना पड़ेगा? तो कृपा करके अपनी बीमारी को ये कहकर न बचाये रखिए कि अगर मैं बीमार नहीं रहा तो संस्था को दवाई कौन देगा। संस्था को दवाई चाहिए किसके लिए? संस्था ख़ुद थोड़े ही पीती है, संस्था वो दवाई आपको ही पिलाती है।

आप बीमार नहीं रहिए तो संस्था का ही काम आसान हो गया। वैसे ये आप जो भी नौकरी कर रहे हैं, आप कह रहे हैं कि वो नौकरी करके आप संस्था को आर्थिक योगदान देते हैं, ये आप कब से कर रहे हैं इस तरह की नौकरियाँ?

प्र२: आठ-नौ साल से।

आचार्य: और संस्था से कब से जुड़े हैं?

प्र२: २०१९ से।

आचार्य: मतलब तीन साल से। आप तो कह रहे हैं कि आप उस तरह की घटिया नौकरी संस्था की खा़तिर करते हैं। संस्था से तो तीन ही साल से जुड़े है, उसके पहले छ: साल से काहे कर रहे थे?

प्र२: घटिया नौकरी मतलब वैसी नहीं है। मतलब जो है कि बहुत घटिया नहीं है।

आचार्य: ठीक है! थोड़ी-बहुत घटिया है। जो मैं पूछ रहा हूँ, वो बताइए न। संस्था से तो तीन ही साल से जुड़े हैं और संस्था से जुड़ते ही कोई तत्काल बहुत योगदान करना भी नहीं शुरू कर देता। पहले तो आराम से लोग साल-दो साल बैठकर के पीते हैं, उसके बाद कहते हैं — 'ठीक है, ये आदमी उतना भी मक्कार नहीं है जितना शक्ल से लगता है। इसकी सहायता करी जा सकती है।‘

तो वो वाली नौकरी आप कर रहे हो नौ साल से, नौ साल से क्यों कर रहे थे, संस्था तो अभी आयी है आपके लिए? ‘आचार्य जी, मैं न बहुत ही विचित्र तरह की नौकरी में फँसा हुआ हूँ, बस आपकी खा़तिर’। मेरी खा़तिर? नौ साल से!

मेरे ऊपर डाल दो, कतई ब्रह्मास्त्र चलाया है!

प्र३: प्रणाम आचार्य जी। अभी जो चर्चा हो रही थी, उसमें एक स्थिति आपने ये बतायी कि अहंकार को ऐसी परिस्थितियों में जाना चाहिए, जहाँ पर वो पूरी तरह एक्सपोज़ हो जाए और पिट जाए। तो अभी जो व्यवस्था चल रही है संसार में और दुनिया में और स्पेशली जो वामपन्थी उदारवादी विचारधारा की धारणा हैं। जिसमें बिलकुल एक तरह से उलट होता है, वहाँ पर कहा जाता है कि जो उनके कार्यस्थल हैं और हर जगह पर ये होता है कि सीमाएँ होनी चाहिए और सबको एक ऐसी जगह मिलनी चाहिए जहाँ पर वो ख़ुद की एक समझ-बूझ भी रखे।

लॉज़ में भी इस तरह की चीज़ें लिखी हुई हैं कि कार्यस्थल पर शोषण और टाइमिंग्स और बहुत सारी ऐसी चीज़ें वहाँ पर होती हैं और वो इसलिए होती हैं कि?

आचार्य: माने पर्सनल सेल्फ़ को एक सेंक्चुरी मिले।

प्र: तो पूरी-की-पूरी व्यवस्था इसी तरह की पर्सनल सेल्फ़ को एक सेंक्चुरी मिले (आत्म व्यक्तित्व है को बचे रहने के लिए कोई जगह मिले)।

आचार्य: और वो व्यवस्था लगभग इसी तरह की सदा से रही है क्योंकि देखो, मूल व्यवस्था न लेफ्ट लिबरल (वामपन्थी) होती है, न राइट की होती है, न कंज़र्वेटिव (संकुचित) होती है, न ऑर्थोडॉक्स (रूढ़िवादी), कुछ नहीं। मूल व्यवस्था प्राकृतिक होती है।

ये जितनी व्यवस्थाएँ चल रही हैं, ये सब प्रकृति की ही छोटी-छोटी उपधाराएँ हैं। है तो सबकुछ प्रकृति के अन्तर्गत ही न? तो चलने दो अगर वो कह रहे हैं कि सबको अपने पर्सनल सेल्फ़ को नर्चर (अपनेआप को जानने और उस को पोषण देने के लिए) करने के लिए, एक्सप्रेस (अभिव्यक्त करना) करने के लिए एक सेफ स्पेस (सुरक्षित जगह) मिलनी चाहिए तो अच्छी बात है। उसी सेफ स्पेस से तो फिर पता चलेगा न, कि कितना दर्द है, कितनी तकलीफ़ है? वो अच्छी बात है।

आपको आपकी धारणाओं के मुताबिक़ आपकी पसन्द, नापसन्द के मुताबिक़ जीवन जीने की पूरी छूट मिलनी चाहिए। लेकिन गीता आपको तभी मिलेगी जब आपको स्पष्ट दिखाई दे कि आप जिस तरह के चुनाव कर रहे हैं और जैसी ज़िन्दगी जी रहे हैं, वो कितनी भारी पड़ रही है आपको।

भाई, कोई भी व्यवस्था आपको अधिक-से-अधिक आपकी मर्ज़ी के अनुसार चलने की छूट दे सकती है न? यही तो कर देती हैं आजकल की उदारवादी व्यवस्थाएँ। जो जैसा करना चाहता है कर सकता है। बस कानून कुछ है, उनको मत तोड़ना, उनके अलावा जो जैसी ज़िन्दगी जीना चाहता है जिये, यही तो है न?

तुम्हें पूरी छूट है जैसी ज़िन्दगी जीना चाहते हो जियो। क्या वो तुम्हें ये भी छूट दे सकते हैं कि जैसी ज़िन्दगी जी रहे हो, उसका परिणाम नहीं भोगो? ये छूट भी दे सकते हैं वो? ये छूट तो बिलकुल दे सकते हैं जिसको जो करना है करो; अब ये छूट भी तो दे दो कि जो कुछ भी जो कर रहा है व्यक्ति, वो करके अंजाम भुगते बिना साफ़ निकल जाए।

ऐसी छूट कोई व्यवस्था तुमको दे सकती है? वो बिलकुल तुमको छूट दे सकते हैं, तुम आठवी मंज़िल से ज़मीन पर कूदना चाहते हो, कूद जाओ; ‘मेरी मर्ज़ी!’ लेकिन क्या तुम्हें ये छूट भी दे सकते हैं कि जब नीचे गिरोगे तो चोट नहीं लगेगी, ये भी बात मेरी मर्ज़ी पर होनी चाहिए निर्भर? ‘ये मेरी मर्ज़ी पर निर्भर होना चाहिए कि मैं गिरूँगा तो मुझे चोट लगेगी या नहीं लगेगी।’ तुम कूदोगे या नहीं कूदोगे ये तुम्हारी मर्ज़ी, पर चोट लगेगी या नहीं लगेगी ये अस्तित्व की मर्ज़ी। इसमें कोई लिबरल विचारधारा तुम्हें बचा नहीं पाएगी, कोई भी विचारधारा लिबरल, इल्लिबरल कैसी भी, कोई भी।

खेल प्रकृति का है। और जब फिर चोट लगेगी तो मेरी प्रार्थना है कि एकदम टूट जाओ, जब एकदम टूट जाते हो तो कृष्ण के लिए तुम्हारे द्वार खुल सकते हैं। द्वार कोई होता ही नहीं है, बस दीवारें होती हैं, जब दीवारें टूटती हैं तो द्वार बनता है।

अहंकार के पास द्वार होता नहीं, बस चार अन्धेरी दीवारें होती हैं। जिनमें कोई झीर्री नहीं, कोई रोशनदान नहीं। द्वार तो बहुत बड़ी बात है, कोई झीर्री तक नहीं होती; चार दीवारें, भीतर खूब अन्धेरा! तो द्वार फिर कैसे बनेगा? एक ही तरीक़ा है — ध्वस्त हो सबकुछ, विध्वंस चाहिए और विध्वंस ज़्यादा आसानी से हो जाता है, जब तुम्हें छूट मिल जाती है ‘मेरी मर्ज़ी की’।

अपनी मर्ज़ी पर जियोगे तो ज़्यादा जल्दी विध्वंस होगा, तो फिर ज़्यादा सम्भावना बनेगी कि कृष्ण आएँगे तुम्हारे पास।

प्र३: पर आचार्य जी, मैं अमेरिका में भी रहा हूँ कई साल, तो वहाँ पर ऐसा होता है कि आप जिस पूर्ण विध्वंस की बात कर रहे हैं या ऐसी स्थिति में कोई पहुँच जाए, जहाँ पर उसे समझ में आया कि स्थिति बहुत ही ख़राब है या कई कारण से नहीं आ पाती, अगर कोई साइकोलॉजिस्ट (मनोरोग विशेषज्ञ) के पास भी जाए तो, उनका भी पूरा ये रहता है कि कोपिंग अप पर रहता है।

जैसे-जैसे आप कोपअप करके फिर वापस चले जाइए, तो फिर उस हिसाब से उनको छूट भी एक तरह से मिली हुई है लेकिन?

आचार्य: मैंने कब कह दिया की अहंकार चाहता है कि कृष्ण मिल जाए? मैंने कब कह दिया की प्रकृति आतुर ही है कि जल्दी से लय हो जाए? प्रकृति को ही तो माया कहते हैं, वो पूरी ही अगर लीन हो जाएगी तो सब खेल ही ख़त्म हो जाएगा। तो उसका तो आग्रह यही रहता है कि ज़रा दूरी बनी रहे। वो तरह-तरह से उपाय करती है और आज से नहीं, हमेशा से खेल जैसा चल रहा है, चलता रहे, चीज़ें कभी भी टूटने की कगार पर पहुँचे ही नहीं।

पानी गरम रहे पर कभी इतना न खौल जाए कि भाप बनकर मिट जाए, उस बिन्दु तक नहीं आने देती माया। अस्सी चलेगा, नब्बे चलेगा, निन्यानवे चलेगा, सौ डिग्री होने नहीं देती वो पानी को क्योंकि सौ डिग्री हो गया तो मिट जाएगा न। तो वो तुमको थोड़ा बचा कर रखती है और उसको तुम बोलते हो द एवरेज लाइफ़ (आम ज़िन्दगी) कि बचे हुए हैं।

बचे हुए हैं, थोड़ा सुख है, थोड़ा दुख है। थोड़ा है, थोड़े की ज़रूरत है। अगर तुम पूरी ही तरह विपन्न हो जाओ, अगर इस संसार का झूठ तुमको पूरी ही तरह दिख जाए तो तुम क्या टूटोगे, तुमसे पहले माया टूट जाएगी न?

व्यवस्था बनी रहे इसके लिए आवश्यक है कि व्यवस्था तुमको थोड़ी-बहुत सुख-सुविधाएँ ज़रूर देती रहे। अगर व्यवस्था बिलकुल ही दमनकारी हो जाए, वो हर तरीक़े से बिलकुल प्रकट होकर के तुम्हारा शोषण करने लगे तो तुम विद्रोह कर दोगे। तो इसीलिए व्यवस्था तुमको कुछ चीजें ठीक देकर के रखती है।

तीस दिन अगर तुम्हारा खून चूसती है, तो एक दिन तुमको कुछ पैसे दे देती है। दिनभर अगर तुमको परेशान रखती है तो रात में तुम्हें दस, पन्द्रह, चालीस मिनट का कुछ विश्राम भी दे देती है। पाँच दिन, छ: दिन तुम बिलकुल आकारान्त रहे, सातवें दिन उसी व्यवस्था ने बना रखा है कि जाकर घूम आओ, फिर आओ, पिक्चर देख आओ।

बच गये, अगर सातवें दिन जो तुम्हारा प्रेशर रिलीज़ होता है, वो न होने पाये तो फिर व्यवस्था चरमराने लगेगी। व्यवस्था बनी रहे, इसके लिए बहुत आवश्यक होता है कि जो दबाव है, वो बीच-बीच में प्रेशर कुकर की सीटी की तरह फूटता रहे, उसको वीकेंड बोलते हैं।

ये सब चलता रहेगा, मुक्ति सबको चाहिए नहीं, सबको मिलेगी नहीं और जिनको चाहिए, नियम है कि उनको मिलकर रहेगी।

बात अमेरिका की नहीं है, बात आज के युग की नहीं है। भारत को तुम आध्यात्मिक बोलते हो, भारत क्या बुद्ध के काल में भी या उपनिषदों के काल में भी या कबीरों के काल में भी पूरी तरह आध्यात्मिक हो गया था? क्या ऐसा हो गया था कि आम आदमी ही मुक्ति-मुक्ति गा रहा है, ऐसा हो गया था?

ये चीज़ तो ऐसी है जिसको चाहिए होती है, उसको मिलती है और उसको चाहने वाले ही बहुत कम होते हैं। ज़्यादातर लोग इतना हौसला ही नहीं दिखा पाते कि जो चाहने लायक़ है, उसको चाहें। जो वास्तव में प्रेम के क़ाबिल है, उसे चाहने के लिए आकर्षण नहीं, साहस चाहिए होता है।

आकर्षण तो टुच्ची चीज़ों से भी हो जाता है। जो वाक़ई प्रेम का हक़दार है, उसे चाहने के लिए हिम्मत चाहिए, इतनी हिम्मत हममें होती नहीं।

प्र३: जैसे आपने प्रेशर कुकर का उदाहरण दिया, तो कभी-कभार ऐसा होता है कि हम अध्यात्म को भी एक तरह का दबाव कम करने के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं। तो उससे कैसे बचें?

आचार्य: बचें क्या, देख लो कि ऐसा कर रहे हो, अध्यात्म का यही इस्तेमाल होता ही है ज़्यादातर। घटिया ज़िन्दगी जियो और फिर राम नाम जप लो, थोड़ा सा भजन कर लो, कोई आध्यात्मिक किताब पढ़ लो, कोई धार्मिक चर्चा कर लो किसी से। और भीतर जितने राक्षस बैठे हुए हैं, उनको पलने-पनपने दो, उनकी बात ही मत करो।

अध्यात्म का समाज ने उपयोग किया ही यही है। जेलों में भी जानते हो? नमाज़ वगैरह के लिए जगह बनायी जाती है, समय निर्धारित होता है, छूट दी जाती है। पूजा घर होते हैं, वहाँ जाकर के लोग दर्शन-आरती ये सब करते हैं। जेल के अन्दर जो अपराधी हैं, पूजा क्या ये हमेशा से कर रहे होंगे? गिरफ़्तार होने से पहले भी? अगर इनकी पूजा में दम होता, ये मत कह देना, अगर दम होता तो पकड़े क्यों जाते? पकड़े जाते नहीं, अगर दम होता तो ये अपराधी क्यों होते?

लेकिन ये बिलकुल सम्भव है कि तुम अपनेआप को कहो कि मैं ज़बरदस्त भक्त हूँ, मैं तो इतनी पूजा करता हूँ, मैं ये व्रत रखता हूँ, मैं फ़लाने तीर्थ करके आया हूँ, मैं फ़लाने देवता की बड़ी उपासना करता हूँ और तुम पर हत्या, अपहरण, बलात्कार, चार-सौ-बीस के आठ मामले दर्ज़ हों, बिलकुल हो सकता है, एकदम हो सकता है।

बल्कि अपराधियों को ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है धार्मिक होने की, सामने आ गये चार पुलिसवाले, तुरन्त बोलते हैं, ‘अरे, बाप रे! “जय कपीस तिहुँ लोक उजागर” — आज बचा लो भगवान, , आज बचा लो!’ अपराध करने के लिए भी हम भगवान का आसरा ढूँढ लेते हैं। सबने करा हुआ है, बड़े अपराध क्या बात करें!

बचपन से बच्चे करना शुरू कर देते हैं — ‘गॉड प्लीज़, कल पास करा देना’ छोटा सा होगा, अभी आठ साल का है और इतना जान गया है जब सालभर मौज मार रहा था तब गॉड कहीं नहीं और परीक्षा से पहले वो ऐसे खड़ा होगा, ऐसे करके (आँख बन्द करके हाथ जोड़ने का अभिनय) — ’गॉड, प्लीज़ गॉड।’

धर्म को हमने क्या बना लिया है? अपने अपराधों का आश्रय। याद ही भगवान जी की आती तब है, जब बढ़िया अपराध कर रखे होते हैं। सोचकर देखना, जितनी तुमने ज़िन्दगी में ज़लील हरकतें कर रखी होंगी, उतना तुम्हें ज़्यादा भगवान जी की याद आएगी। ’गॉड, प्लीज़ दिज़ वन लास्ट टाइम जस्ट वन लास्ट टाइम!’ (भगवान, ये आख़िरी बार है, आख़िरी बार बचा लीजिए!)

फिर इसीलिए साहब बोल रहे हैं, "सुमिरन मेरा हरि करे मैं पाऊँ विश्राम।" बोल रहे हैं, ‘मेरे पास अब कोई आवश्यकता ही नहीं बची है हरि का सुमिरन करने की, क्योंकि भीतर जो अहंकार बैठा होता है, अपराधी कहीं का! है जन्मों का अपराधी — "मैं अपराधी जन्मों का नख-शिख भरे विकार।“ अहंकार के लिए ही कहा गया है ये। बहुत पुराना अपराधी हूँ मैं, विकार-ही-विकार है।

वो जो अपराधी है, उसी को आवश्यकता पड़ती है बार-बार हरि का सुमिरन करने की। तो अपराध और ये जो तुम भगवान का इतना नाम लेते हो, ये दोनों बातें साथ-साथ चलते हैं। और वो अपराधी है, इसलिए वो नाम भी इस तरीक़े से लेता है कि उसको अपराध करने में सहूलियत बनी रहे।

अगर उसने वाक़ई ईमानदारी से, हृदय से नाम लिया होता तो अपराधी मिट जाता, अपराध मिट जाता, जिसको बार-बार भक्ति दर्शानी पड़ती है, वो भी मिट जाता। नहीं तो वो इस तरीक़े से नाम नहीं लेता, वो नाम इस तरीक़े से लेता है कि उसका कारोबार चलता रहे। और जिन्होंने सही से नाम लिया, उनको नाम लेने की आवश्यकता ही ख़त्म हो गयी।

"सुमिरन मेरा हरि करें, मैं पाऊँ विश्राम" — मैं अब नहीं सुमिरन करता। ‘मैं क्या सुमिरन करूँ! मेरा अपराधी मर गया! मैं अब क्या बार-बार अपील करूँ कि मुझे बचाओ, मुझे बचाओ। मेरा अपराधी बचा नहीं, अब हरि मुझे याद कर लेते हैं। मेरा ऐसा प्रेम देख लिया उन्होंने, मैं इतने निकट आ गया उनके कि वही हो गया मैं।’

अब वो मेरा सुमिरन कर लेते हैं, मैं नहीं करता। ये मामला बहुत सूक्ष्म, पेचीदा है। जब अहंकार को याद दिलाओगे कि तू ध्यान या भक्ति या योग इसलिए करता है ताकि तुझे तेरे अपराधों में सुविधा बनी रहे, तो वो तत्काल ये निष्कर्ष भी निकाल सकता है — ‘ठीक है। आज से ध्यान, भक्ति, योग, ज्ञान ये सब बन्द।‘ वो ये भी निकाल सकता है।

जबकि तुम उसको समझा क्या रहे थे? तुम उसे समझा रहे थे कि भक्ति करनी है तो सच्ची कर, ध्यान करना है तो सच्चा कर, लेकिन सच्चाई से तो उसको कोफ़्त है। तुम उसको कहोगे, ‘तेरा ध्यान तेरे अपराधों के समर्थन के लिए है,’ तो वो अपराध नहीं त्यागेगा, वो ध्यान ही त्याग देगा। वो कहेगा, ‘अच्छा, तो मेरा ध्यान झूठा है! तो ऐसा करते हैं, ध्यान बन्द कर देते हैं’!

अद्वैत लाइफ़ एजुकेशन का समय था, एक बार एक को मैंने पकड़ कर बहुत झाड़ लगायी। कैंपस प्लेसमेंट हुआ था, वहाँ से ट्रेनीज़ लेकर आये थे। मैंने कहा, ‘तेरे छ: महीने हो रहे हैं यहाँ पर, तूने सीखा क्या? तेरे तो छ: महीने ही व्यर्थ जा रहे हैं, कुछ सीख तो तू रहा नहीं है।’

अगली सुबह उसने इस्तीफ़ा भेज दिया। बोला, ‘आपने बिलकुल ठीक कहा है, मुझे भी यही लग रहा है कि मेरे छ: महीने व्यर्थ गये हैं, मैंने कुछ सीखा नहीं। तो आपकी बात का सम्मान करते हुए मैं रिज़ाइन करता हूँ।’

समझाया क्या जा रहा था? कि बेटा, सीखो। उसने क्या पकड़ा? ‘कि हाँ, कुछ सीखा नहीं। ये बात तो बिलकुल ठीक है, मैंने कुछ नहीं सीखा, छ: महीने बिता दिये हैं, सीखा कुछ नहीं।’ क्या त्यागना था? न सीखने की वृत्ति। त्याग क्या दिया? सिखाने वाली जगह। क्या त्यागने को कहा जा रहा था कि ये जो तुम्हारी अड़ी हुई वृत्ति है, जो सीखने की राह में बाधा है, इसको त्याग दो, उसकी जगह क्या त्याग दिया? जो सिखाने वाली जगह थी, उसको ही त्याग दिया।

‘हम कुछ भी कर सकते हैं, हम होनहार हैं।’ इसलिए ये संसार है, नहीं तो निर्वाण हो गया होता। यहाँ ऐसा है और ऐसा ही चलेगा। तुम्हें क्या करना है, वो तुम तय कर लो।

प्र४: जैसे आपने बोला अहंकार तो नासमझी में पलती है। तो ये नासमझी भी समझ में ही आती है, समझ से ही आती है जो हम ग़लत जो भी कुछ समझ रहे हैं।

आचार्य: चालाकी! मामला महीन है इसको समझना होगा। जिसको आप नासमझी कहते हो, वास्तव में चालाकी है। नासमझ बने रहने में अहंकार का स्वार्थ होता है। मैं पहली-दूसरी दफ़े की बात नहीं कर रहा हूँ — पहली बार गड्ढे में गिरते हो उसकी माफ़ी मिल सकती है, ये जो चौथी, पाँचवीं, सौवीं, बार गड्ढे में गिरते हो; ये नासमझी नहीं है, चालाकी है।

उस गड्ढे में नीचे कहीं मज़ा आ रहा है तुमको, उस गड्ढे में कुछ ऐसा है जहाँ तुम्हारा स्वार्थ टिका है। अब ये ग़लती नहीं है, ये मौज चल रही है। देखो, दूसरों को तो फिर भी एक बार माफ़ कर दो ये बोलकर कि नासमझ है। अपनेआप को माफ़ मत किया करो आसानी से। अपने प्रति ये रवैया रखने का अभ्यास कर लो, अपने ख़िलाफ़ एक गुस्सा होना चाहिए अगर अपनेआप से प्यार करते हो तो।

जो आदमी अपनेआप से प्रेम करता हो, उसकी निशानी ये होती है कि वो अपनेआप से बड़ा असन्तुष्ट रहता है और अपनेआप से क्रोधित रहता है। और जो अपने शुभचिन्तक नहीं होते, वो बहुत आसानी से अपनेआप को माफ़ कर देते हैं। जो वाक़ई अपनेआप से प्यार करते हैं, वो अपनेआप को सज़ा खूब देते हैं।

अपना गुरु बनने का भी लगभग यही आशय है। अगर अपनी तरक़्क़ी वैसे ही चाहते हो, जैसे गुरु तुम्हारी तरक़्क़ी चाहता है तो जैसे गुरु तुमको सज़ा देता है, वैसे सज़ा तुम अपनेआप को ही दिया करो। क्योंकि जो शारीरिक गुरु है, वो हर समय तो उपस्थित रहेगा नहीं तुम्हारे कारनामे पकड़ने के लिए, तुमको सज़ा देने के लिए, तुम ख़ुद ही अपनेआप को सज़ा दे दिया करो।

अपनेआप से पूछा करो, ‘वो होता तो उसने क्या कहा होता’, वैसे ये भी बहुत अच्छा सूत्र है सुधरे रहने का, इसका भी अभ्यास कर लो। कुछ कर रहे हो, अपनेआप से पूछा करो, ‘वो होता तो उसके सामने क्या मैं ये करता? क्या उसको बताकर के ये कर पाऊँगा मैं? वो होता तो क्या कहता?’ पूछा करो अपनेआप से। ये एक तरीक़ा होता है भीतर के गुरु को जाग्रत करने का, बाहर वाले के भरोसे कब तक बैठना है। जो बाहर का आदर्श है, उसे भीतर स्थापित कर लो। यही पूछना है, ‘अगर वो सामने खड़ा होता, तो क्या मैं वो कर पाता जो अभी कर रहा हूँ मैं?’ बस।

जो अपनेआप को सज़ा देना सीख लेता है, वो ज़िन्दगी की सज़ाओं से बच जाता है। और अपनेआप को तुम ख़ुद नहीं दोगे सज़ा, तो पूरी ज़िन्दगी सज़ा बन जाएगी। ये उनके लिए है जो बहुत क्रोधित हो जाते हैं और बड़ा विरोध करते हैं जब उन्हें सज़ा दी जाए या उन्हें कोई कड़वी बात बोल दी जाए।

निसर्गदत्त महाराज का था वो, एक बार ऐसे ही किसी ने पूछा, बोले, ‘देखो बेटा, दो ही हैं जो सिखाते हैं — एक गुरु और एक जीवन। इन दो के अलावा कोई नहीं सिखाता। या तो गुरु सिखा देगा या ज़िन्दगी सिखाती है। अन्तर बस ये है कि गुरु बहुत हद तक तुम्हारे जैसा है, गुरु चैतन्य है, गुरु तुम्हारी पीड़ा समझता है, गुरु जानता है कि तुम्हारा कष्ट कैसा है। तो गुरु कष्ट भी तुमको एक सीमा में देगा।‘

गुरु सिखाने भी के लिए कष्ट देता है, पर गुरु करुणा भी रखता है तो तुमको तकलीफ़ भी एक सीमा में देगा। ज़िन्दगी जब सिखाती है तो कोई लिहाज नहीं करती, ज़िन्दगी को तुम्हारा नाम ही नहीं पता, ज़िन्दगी के पास तुम्हारे लिए कोई मोहलत नहीं है, ज़िन्दगी की नज़र में तुम कुछ नहीं हो।

ज़िन्दगी की नज़र में तुम बिलकुल वैसे ही हो, जैसे कोई बरसाती कीड़ा। तुम हो, नहीं हो क्या फ़र्क पड़ता है? तुम जैसे अरबों हैं प्रजातियाँ, उनमें से एक प्रजाति के अरबों सदस्यों में से एक हो। ज़िन्दगी के लिए तुम कुछ भी नहीं हो और ये बात हम कर रहे हैं पृथ्वी ग्रह की और पृथ्वी ग्रह ही क्या है? ब्रह्मांड में धूल के एक तिनके से भी, कण से भी छोटा।

तो अस्तित्व तुम्हारा कोई ख़याल, कोई लिहाज, कोई सम्मान नहीं करता। तो वो तुमको सिखाना चाहता ही नहीं है, वो तो बस तुमको कर्म-दंड देता है। सरल है बात —

जीवन सज़ा दे इससे पहले तुम स्वयं को सज़ा दे लो।

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