बाहर आओ जवान! वो बुला रही है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश:। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।
जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को अपने भीतर सिकोड़ लेता है उसी प्रकार, जब ज्ञानी अपनी इन्द्रियों को अपने भीतर सिकोड़ लेता है, तब उसकी बुद्धि सत्य में प्रतिष्ठित हो जाती है। ~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ५८)
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। ये जो श्लोक क्रमांक अट्ठावन है जो कूर्मयोग है। ये मेरे सबसे पसन्दीदा श्लोकों में से है। तो इसमें जब ये बात हो रही थी कि आप अपने इन्द्रियों को समेट लीजिए या समेटने की बात हो रही थी फिर आपने स्मृति की भी बात की। तो इससे इस गीता के श्लोक से ईशावा्ष्य उपनिषदों के बहुत सारे श्लोक अचानक से एकदम से क्लियर (समझ आ गये) हो गये जैसे, वो बहुत विख्यात श्लोक है जो —
"वायुर् अनिलम् इदम्, अस्माकम् शरीरम्। ॐ क्रतो स्मर, कृतं स्मर।”
तो इसकी जो पहली पंक्ति है— प्राण और इन्द्रिय समष्टि में समेट जाएँ। तो वो बात मुझे उससे सम्बन्धित लगी कि जो इन्द्रियाँ जो है, वो कृष्ण खोल के अन्दर समेट जाएँ और फिर जो स्मरण की बात कही थी आपने।
आचार्य प्रशान्त: तो देखो, पहली बात तो ये कि जब कुछ अच्छा लगे कि बहुत पसन्द आये तो थोड़ा सावधान हो जाया करो, कहीं ऐसा तो नहीं कि जगत में पैठना नहीं चाहते इसलिए ये बात बहुत लुभावनी लग रही है कि कछुए की तरह इन्द्रियों को समेट लो, कहीं ऐसा तो नहीं। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि जो कुछ भी पसन्द आएगा उसमें ख़तरा ही होता है। लेकिन भूलो नहीं मन की प्रवृत्ति, मन को आमतौर पर पसन्द वही आता है जो मन की वृत्तियों को और स्थापित और बलवान करता है।









