अपनी ही छवि को भगवान बनाकर उसकी पूजा कर रहे हो?

Acharya Prashant

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अपनी ही छवि को भगवान बनाकर उसकी पूजा कर रहे हो?
यहाँ जिस प्रेम की बात हो रही है, वो वो प्रेम है जहाँ दूसरे के होने से आपका होना मिट जाता है, गाढ़ा नहीं हो जाता, बढ़ नहीं जाता। "तुम ही हो जिसमें सारी सत्यता है। और तुम यदि सामने हो, तो मैं पूरी तरह असत्य हो गया।" ग़ज़ब का प्रेम है ये। "सारी सत्यता तुम में है, तो फिर तुम्हारे सामने मैं क्या हो गया? मैं असत्य हो गया और असत्य माने, जो फिर है ही नहीं। नकली, मिथ्या।" यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

आचार्य प्रशांत: भक्ति शब्द के मूल में ही “भज” है। उसका अर्थ होता है, बटना या दूरी। भक्ति का दर्शन है कि, "मैं अहंकार हूँ, मैं निकृष्ट हूँ, दोष सारे मुझ में हैं। और जो इष्ट है, आराध्य है मेरा — वो मुझसे इतना ऊपर है, इतना अलग है, कि मुझे ये कहने का भी अधिकार नहीं कि मुझमें और उसमें थोड़ी भी समानता है।"

तो एक दूरी फिर कही जाती है। भक्त कहता है, "ये मैं हूँ, और मुझसे अलग, मुझसे विभाजित, मुझसे विभक्त, मुझसे दूर — मेरा पूज्य है, मेरा भगवान है।" और उसको भक्त बहुत ईमानदारी, बड़ी सत्य निष्ठा के साथ कहता है कि "हाँ, दूर तो तुम हो ही। मुझे मानना पड़ेगा कि अभी तो तुम मुझसे बाहर ही स्थापित हो, क्योंकि हम में अंतर इतना है कि मैं कैसे कह दूँ कि तुम मेरे भीतर हो, कि मेरे निकट हो, कि मैं तुम्हें स्पर्श कर सकता हूँ? ये सब मैं कह नहीं सकता। तो मैं विभक्त हूँ, मैं वियुक्त हूँ।" इसलिए वियोग शब्द सदा भक्ति के साथ चलता है — "हम अलग हैं।"

और ये कहने में बड़ी विनम्रता है, "मैं आपका स्थान भी जानता हूँ, मैं अपना स्थान भी जानता हूँ। और मैं जानता हूँ कि हमारे स्थानों में आकाश-पाताल का अंतर है। आप अलग हो, मैं अलग हूँ।" इस विनम्र अंतर को देखने से शुरुआत होती है भक्ति की। "मुझ में ऐसा कुछ भी नहीं जो आप में हो, और आप में ऐसा कुछ भी नहीं जो मुझ में हो। तभी तो आपके आगे सर झुकाता हूँ न।"

अगर हम दोनों में कुछ साझा ही हो, अगर हम दोनों कुछ एक से ही हों, तो फिर सर भी कहाँ झुक पाएगा? और झुकाने की कोई ज़रूरत भी नहीं रह जाएगी। "आप वहाँ, हम यहाँ। और ये मैं कभी भूलना नहीं चाहता कि सब उत्कृष्टताएँ, सब विभूताएँ आप में निहित हैं। और मैं क्या हूँ? धूल, छुद्रता की मूर्ति।"

भक्ति शुरू होती है। तो शुरुआत में ही ये बात है, कि आराध्य में आराधक जैसा कुछ नहीं होना चाहिए। दोनों में कुछ भी साझा नहीं हो सकता, क्योंकि मामला विभक्ति का है, मामला वियुक्ति का है, मामला भक्ति का है। और भक्ति की शुरुआत मतलब, तुम वहाँ, हम यहाँ।

हमको, तुमको — बस एक प्रेम की डोर जोड़ सकती है। गुणों की डोर नहीं जोड़ सकती। मेरे गुण, तुम्हारे गुण नहीं हो सकते। हाँ प्रेम हो सकता है मुझे तुमसे, और वो प्रेम भी वैसा साधारण प्रेम नहीं हो सकता जैसा एक गुणी, दूसरे गुणी से करता है। गुणी, माने जीव।

हम गुणों के पुतले हैं न प्रकृति के। तो जैसा प्रेम एक देही, एक शरीरधारी, दूसरे से करता है, वैसा उससे नहीं हो सकता। क्योंकि गुण तो सारे मेरे पास हैं, और तुम बिल्कुल मेरे जैसे नहीं हो, तो मेरे गुण तुम में तो हो नहीं सकते। तो तुमसे मेरा प्रेम भी विशिष्ट किस्म का होगा, और मेरा तुम्हारा रिश्ता मात्र प्रेम का हो सकता है। और कोई चीज़ नहीं है जो मुझको और तुमको जोड़ सकती हो। और मुझ में और तुम में कुछ भी, बिल्कुल भी साझा नहीं हो सकता।

ये बात बहुत ज़ोर देने की है, बहुत स्मरण रखने की है — मुझ में, तुम में कुछ भी साझा नहीं हो सकता। हम में अगर कोई रिश्ता है, तो बस एक बड़े गहरे प्रेम का है, और नहीं कोई साझापन है।

देखिए, साधारण मानवीय प्रेम में जो कुछ हम में और दूसरे व्यक्तियों में एक सा होता है, उसी के आधार पर बनता है रिश्ता। भावनाएँ एक सी हैं, रिश्ता बन जाएगा। विचार एक से हैं, रिश्ता बन जाएगा। शरीर एक सा है, रिश्ता बन जाएगा। आप साथी की तलाश में निकलते हैं तो आप कहते भी हैं कि, "भाई, ढूँढ़ रहा हूँ कोई हमारे जैसे विचार रखता हो, तो बात बने।" आप एकत्व ढूँढ़ते हो।

भक्ति में प्रेम बिल्कुल अलग है, वहाँ प्रेम है ही इसीलिए क्योंकि तुम मेरे जैसे बिल्कुल भी नहीं हो। तुमसे प्रेम इसलिए नहीं है कि तुम होते हो तो हमारी सत्ता को, हमारी हस्ती को वैधता मिलती है। है न? यही होता है न आम प्रेम में? आप कुछ सोचते हैं। आपका कोई मित्र है — वो आ जाता है, वो कहता है, "हाँ, तुम ठीक ही सोच रहे हो।" तो आपकी जो हस्ती है, वो सत्यापित हो जाती है, है न?

आप माँ हैं, बच्चा है। बच्चा जब होता है, तो आप और ज़्यादा माँ बन जाती हैं। दूसरे के होने से आपकी हस्ती और गाढ़ी हो जाती है।

आप पुरुष हैं, आपको स्त्री से प्रेम है। स्त्री होती है, आप और ज़्यादा पुरुष बन जाते हैं। दूसरे के होने से आपका होना और वजनी और गाढ़ा हो जाता है। ये साधारण प्रेम होता है।

यहाँ जिस प्रेम की बात हो रही है, वो वो प्रेम है जहाँ दूसरे के होने से आपका होना मिट जाता है, गाढ़ा नहीं हो जाता, बढ़ नहीं जाता। "तुम ही हो जिसमें सारी सत्यता है। और तुम यदि सामने हो, तो मैं पूरी तरह असत्य हो गया।" ग़ज़ब का प्रेम है ये। "सारी सत्यता तुम में है, तो फिर तुम्हारे सामने मैं क्या हो गया? मैं असत्य हो गया और असत्य माने, जो फिर है ही नहीं। नकली, मिथ्या।"

इसलिए फिर कहा जाता है — “भक्ति करे कोई सुरमा।” क्योंकि साधारण प्रेम तो आपको और बढ़ा देता है। आपको माने अहंकार को।

साधारण प्रेम में या मित्रता में या रिश्तों में तो अहंकार और बढ़ जाता है, और भक्ति का अर्थ होता है कह देना कि सच्चा सिर्फ़ तू है, और मैं हूँ बिल्कुल नकली। तो भक्ति मतलब मिटना।

इसलिए “भक्ति करे कोई सुरमा।” मिटने को कौन तैयार होगा? मिटने को कौन तैयार होगा? इसलिए है कि “ये तो घर है प्रेम का। शीश उतारे भुई धरे, तब बैठे घर माही।। खाला का घर नाही।"

यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाही। शीश उतारे भुई धरे, तब बैठे घर माही।।

~संत कबीर

हम भी सोचते होंगे, इतना क्यों मुश्किल है भाई? 'खाला' माने अपनी ही हैं। उनके यहाँ जाना, सर कटाना, ये तो कोई तुक नहीं हुआ। आपकी बुआ, मौसी, ताई, फूफी — ये लोग बोला करते हैं क्या कि, "हमारे यहाँ आए हो तो बेटा, सर कटाओ पहले, फिर बैठो घर में?" ऐसा तो नहीं होता।

सर कटाना असली प्रेम में होता है। नकली प्रेम में तो नकली सर और बचा रह जाता है।

असली प्रेम का मतलब, जो कुछ भी मेरा है, मुझसे संबंधित है, जिससे मेरा रिश्ता हो सकता है, वो सब मैंने कह दिया कि मिथ्या — तो सर कट गया। सर माने अहंकार, विचार, सिद्धांत और धारणाएँ, वो सब कट गए। समझ में आ रही है बात?

भक्ति माने दूरी, विभाजन। और एक ऐसी दूरी, जिसमें एक उधर है, एक इधर है और सारी सच्चाई उधर है। और सारी सच्चाई अगर उधर है, तो मैं क्या हो गया? मैं पूरे तरीक़े से मिथ्या हो गया। तो अपने बारे में तो बस यही कहा जाता है कि “मो सम कौन कुटील खल कामी।”

सारे जितने दोष हो सकते हैं, वो इधर हैं। और सारी जो अच्छाइयाँ हो सकती हैं, वो उधर हैं। ठीक है। और मुझ में और तुम में साझा कुछ भी नहीं है, बस एक बड़े गहरे प्रेम की डोर है, जो हमें जोड़ सकती है। वरना साझा हम में तुम में कुछ नहीं है, जैसे धरती और आकाश में क्या साझा होता है? कुछ भी नहीं।

तो बहुत महीन चीज़ होती है, प्रेम। हम यहाँ पर परा प्रेम, परम प्रेम की बात कर रहे हैं, साधारण भौतिक प्रेम की नहीं। वो बहुत महीन चीज़ होती है। उसकी शर्त ये होती है कि अपने जैसा कुछ भी उसके ऊपर आरोपित मत कर देना, थोप मत देना।

शर्त याद रखिएगा — “विभाजन है, मैं इधर हूँ, तुम उधर हो। और मुझ में और तुम में कुछ भी साझा नहीं हो सकता।” क्योंकि मुझ में और तुम में अगर कुछ समानता ही निकल आई, तो फिर सर झुकाने की क्या ज़रूरत है? आईने के सामने कोई सर झुकाता है क्या? जो कुछ अपने ही जैसा है, उसके आगे सर झुकाने से क्या होना है? कुछ नहीं। तो सर तो तभी झुकेगा न जब तुम बिल्कुल मुझसे एक अलग आयाम के हो, तभी सर झुकेगा। तो इसलिए भक्ति एक बहुत कड़ी शर्त रखती है।

आपका आराध्य बिल्कुल भी आपके जैसा नहीं होना चाहिए। अगर वो आपके ही जैसा है, तो फिर उसके सामने सर झुकाना माने अपने ही अहंकार के सामने सर झुकाना। वो बिल्कुल भी वैसा नहीं होना चाहिए जैसे तुम हो।

तुम अगर उसको कोई रूप भी दे रहे हो, तो रूप बिल्कुल वैसा नहीं हो सकता जैसा तुम्हारा है। कोई समानता मत छोड़ देना। तुम जिस भी तरीक़े से उसको देख रहे हो, ये नहीं होना चाहिए कि तुमने अपने आप को ही सुसज्जित, अलंकृत करके उसका रूप रच दिया — नहीं तो भक्ति की शुरुआत ही फिर दूषित हो गई न। भक्ति की पहली शर्त का ही उल्लंघन हो गया।

भक्ति की पहली शर्त क्या है, फिर से बताइए?

श्रोता: समानता नहीं होना।

आचार्य प्रशांत: भक्त और भगवान में कोई समानता नहीं हो सकती। क्योंकि समानता ही है, तो फिर भगवान कैसे? फिर सर क्यों झुकाना? जो अपने ही जैसा है, उसे कौन प्रणाम करता है?

तो कुछ उसमें अपने जैसा मत रखना। पर अहंकार प्रेम को, भक्ति को लील जाता है। वो चुपचाप एक साज़िश कर देता है। वो कहता है — अगर सर झुकाना ही है, तो जिसके सामने सर झुका रहे हैं, क्यों न वो अपना रिश्तेदार हो? बढ़िया लगेगा न? जिसके सामने सर झुका रहे हैं, अगर वो हमारा ही हमशक्ल हो, तो सर झुक भी जाएगा और सर कटाने की नौबत भी नहीं आएगी।

क्योंकि जो हमसे बिल्कुल ही भिन्न है, इस हद तक कि हमारी सोच से भी आगे का है, उसके आगे सर झुक गया तो हम पूरे तरीके से मिथ्या साबित हो गए। हो गए न? वो अगर सत्य है, और सत्य के आगे ही तो झुका रहे हो सर — वो अगर सत्य है, तो हम क्या हो गए? असत्य।

तो वास्तविक नमन का अर्थ तो फिर गमन हो जाता है, कि अगर झुके तो मिटे। तो अहंकार एक सस्ता रास्ता खोज निकालता है। वो कहता है, हाँ झुकेंगे, भक्त कहलाएँगे। पर क्यों न किसी ऐसे के आगे झुकें जो हमारे ही जैसा हो, समगुणी हो। जो गुण हम में हैं, वो गुण उसमें भी हो। जो कहानी हमारी है, वही कहानी उसकी भी हो। जो शक्ल हमारी है, वही शक्ल उसकी भी हो।

तो सर भी झुक जाएगा, और किसके आगे सर झुका? अपने ही एक ज़्यादा विस्तृत रूप के आगे सर झुका। तो सर झुक भी गया, भक्त भी कहला गए, और सर कटाने की नौबत भी नहीं आई। तो इसलिए कह रहे हैं संत शिरोमणि "थोड़ी भगति बहुत अहंकारा, ऐसे भगता मिलै अपारा।"

तुम्हारी भक्ति सिर्फ़ तुम्हारे अहंकार का विस्तार है। क्योंकि तुम जिसको पूज रहे हो, जिसको भगवान कह रहे हो, उसको तुमने अपनी ही छवि और अपनी ही कहानी में गढ़ दिया है। उसको तुमने बिल्कुल अपने जैसा बना दिया है। तो ये जो तुम सर झुका रहे हो, ये तुम किसी और के आगे नहीं, अपने ही आगे झुका रहे हो।

अगर तुम्हारा भगवान, तुम्हारे अहंकार का विस्तार है — तो बताओ, सर झुकाने से अहंकार का निस्तार हुआ या विस्तार हुआ? विस्तार ही हुआ न। थोड़ा ही अहंकार गड़बड़ चीज होती है, और तुमने एक छवि बना ली जिसमें बहुत बड़ा हो गया तुम्हारा अहंकार — 10 गुना कर दिया। तो उसके आगे सर झुकाया, तो अहंकार शून्य होने की जगह और प्रचंड हो जाएगा।

"थोड़ी भगति बहुत अहंकारा, ऐसे भगता मिलै अपारा।"

और यही चला है भक्ति के नाम पर। हमारे सब देवालय, हमारे ही घरों और बाज़ारों का विस्तार होते हैं। हमारे सब आराध्य देवी-देवता, हमारी ही कहानियों के पात्र होते हैं। और इसलिए फिर ऐसी भक्ति से कुछ लाभ नहीं होता।

भक्ति में आप जो कहानियाँ कह रहे हैं या सुन रहे हैं, अगर वो कहानी घर-घर की है — तो फिर ये भक्ति है या टीवी का मनोरंजन, कहिए? और इसीलिए आप देखिए, कि बिल्कुल विडंबना की बात है, लेकिन एकदम तार्किक — कि हमारे आराध्यों की कहानियाँ टीवी पर बहुत आसानी से मनोरंजन बन जाती हैं। बन जाती हैं न?

क्योंकि उन कहानियों में हमारा ही तो अहंकार झलक रहा है। हमने ही ऐसे उनको रचा है कि हमें बदलना न पड़े। आप जो कुछ करते हो, आप 'परफेक्शन,' पूर्णता की अपनी परिभाषा बना लो — कि मैं जो कुछ करता हूँ, उसको ही 100 गुना कर दिया जाए, तो ये कहलाएगा 'परफेक्शन'। तो ये परफेक्शन है या क्या है?

लेकिन अहम् की मान्यता भी यही रही है। किसी के 100 में से 50 नंबर आए, और आप उससे पूछो — पूर्णता क्या होती है? तो कहेगा, "वो जो मुझसे दो गुनी है।" 100 में से 50 नंबर आए। आप उससे पूछिए, "पूर्णता की परिभाषा बताओ।" वो कहेगा, "वो जो मुझसे दो गुना है।" तो इसी तरह से फिर हमने अपने ईश की छवि रच ली, "वो जो हमसे दो गुनी है या बीस गुनी है, दो हज़ार गुनी है।"

हमने ख़ुद को मिटाया नहीं, हमने ख़ुद को और बढ़ा दिया। थोड़ी भक्ति, बहुत अहंकार। मेरा कद छह फीट का है, तो मेरे पूज्य का बारह फीट का होना चाहिए। मेरे दो हाथ हैं, उसके चार होने चाहिए। मेरी दो आँखें हैं, उसके आठ होनी चाहिए। ख़ुद को ही बढ़ा दिया — थोड़ी भक्ति, बहुत अहंकार।

ख़ुद को बढ़ा करके जो पूजेगा, वो कैसे मिटेगा? लेकिन सांसारिक अनुभव तो यही रहता है न — जो है, उससे कुछ गुना मिल जाए तो आप संतुष्ट हो जाओगे, आप यही सोचते हो न। "1 करोड़ है मेरे पास।" कोई पूछे, "हाँ भाई, कब तृप्ति मिलेगी?" तो बोलोगे, "100 करोड़ हो गया, तो उसके बाद कुछ नहीं मांगेंगे।"

"1 करोड़ है, 100 करोड़ हो गया। उसके बाद बिल्कुल कुछ नहीं मांगेंगे।" तो तृप्ति का, संतुष्टि का, पूर्णता का हमने अर्थ क्या निकाला? — 100 एक्स, सौ गुना। ये परिभाषा बन गई। "मैं जो हूँ, उससे जो 100 गुना है, मैं कहूँगा — वो पूर्ण कहलाता है।"

तो यही फिर दुनिया भर में आराध्यों के साथ हुआ है। आप जो हो, उसको ही 100 गुना कर देते हो और उसको पूजना शुरू कर देते हो। जाना ऊपर को था, और विस्तार यहीं धरती पर कर लेते हो। धरती पर अगर एक फीट का आपका आकार था, तो उसको ही 100 फीट का करके सोचते हो, यही भगवान है। निशाना ही आकाश की ओर नहीं है। और ये सब कहाँ से हो रहा है? ये इंद्रियगत अनुभव से हो रहा है, क्योंकि दुनिया में तो हमें संतुष्टि की यही परिभाषा मिलती रही है न?

एक बच्चा है, एक बच्चा और हो जाए तो घर पूरा हो जाएगा। यही सुनते हो न? तो पूरा करने का क्या मतलब? — दो गुना कर दो, पूरे हो गए। एक था, दो कर लिया तो पूरा हो जाएगा। 2.5 घंटे की पिक्चर देखी। डेढ़ की अभी नहीं देखी, तो पिक्चर पूरी कैसे होगी? 2.5 में 2.5 जोड़ दो — दुना कर दो तो पूरा।

संसार में तो अनुभव यही रहा है न, कि जितना है उसको दुना कर दो तो पूरा हो जाता है। दुना कर दो, चौगुना कर दो, 100 गुना कर दो, तो पूरा हो जाता है। तो फिर हम इसी तरीकक़े से छवियाँ रच लेते हैं, कहानियाँ बना देते हैं — और उन कहानियों को पूजना शुरू कर देते हैं।

हाँ, अपनी ओर से हम उसमें एक सावधानी ज़रूर रखते हैं। कि जैसे व्यक्ति स्वयं में कुछ गुण, कुछ दोष देखता है न? तो जब हमें अपने आराध्य की प्रतिमा बनानी होती है मानसिक। तो अपने देखें मानसिक नज़र से, अपने मूल्यों के हिसाब से। हम अपने दोषों को एक तरफ़ रख देते हैं। अपने गुणों को — जिन्हें हम ‘सद्गुण’ बोलेंगे — हम अपने गुणों को उठा लेंगे और उन गुणों को ही वृहदाकार करके अपने आराध्य का निर्माण करेंगे। सारी अच्छाइयाँ उसमें डाल देंगे।

तो अपनी ओर से हम ये सावधानी ज़रूर रखते हैं, "देखो, अपने सारे दुर्गुण मैंने हटा दिए, और अपने सारे सद्गुणों से मैंने अपने ईश की प्रतिमा रची है।" यह सावधानी हम निसंदेह रखते हैं, बिल्कुल। लेकिन ये तो बता दो, कि कौन-सा गुण ‘अवगुण’ है और कौन-सा ‘सद्गुण’ है? इसका फैसला भी किसने किया?

श्रोता: अहंकार ने।

आचार्य प्रशांत: अहंकार ने। तो अहंकार ने तय करा कि प्रकृति के गुणों में कौन-सा गुण रखने लायक है। तो 18 गुण उसकी दृष्टि में आए। 18 में से उसने 8 छाँट लिए — "ये बढ़िया वाले हैं।" 10 को उसने बोल दिया, "ये गड़बड़ वाले हैं।" और उन 8 को लेकर के उसने 100 गुना बढ़ा दिया और कहा, "अब ये मेरा आराध्य है।" यही है न?

पर जिस कसौटी पर अहंकार ने कहा कि 10 अवगुण हैं और 8 सद्गुण हैं, वो कसौटी भी उसे कहाँ से मिली है?

श्रोता: समाज से।

आचार्य प्रशांत: शरीर से और समाज से। भाई, एक संस्कृति में कोई चीज़ ‘अवगुण’ मानी जाएगी, दूसरे में वही ‘सद्गुण’ मान ली जाती है। एक जगह कोई चीज़ ‘कुरूपता’ मानी जाएगी, दूसरी जगह वही ‘सौंदर्य’ मानी जाती है। एक जगह एक प्रकार का व्यवहार अमान्य होता है, दूसरी ओर वही सामान्य होता है। होता है कि नहीं? और ये सब कैसे होता है? — शरीर और समाज के प्रभाव से। जैसी जहाँ परंपरा चल रही थी।

तो ले-देकर, सद्गुणों का निर्धारण भी किसने करा? अहंकार ने, शरीर और समाज के प्रभाव में। तो इस तरीक़े से फिर जो आराध्य है, उसकी रचना हुई। तो फिर वो शारीरिक होता और सामाजिक होता है, आध्यात्मिक थोड़ी हुआ।

अगर आपके आराध्य की रचना शारीरिक और सामाजिक प्रभावों के गत हुई है, तो फिर वो आध्यात्मिक है या शारीरिक और सामाजिक है? कहिए न।

जिस प्रकार के वस्त्र समाज में चलते होंगे, आप यदि किसी स्त्री आराध्य को रचेंगे, तो उससे बहुत भिन्न वस्त्र उसको नहीं पहनाएँगे, यही होगा न? बहुत भिन्न वस्त्र पहना देंगे, तो उनकी भक्ति करने में समस्या आ जाएगी। तो उच्चतम का निर्धारण भी कौन कर रहा है? — समाज। तो ये तो पूरा खेला सामाजिक हो गया — सोशल फिनॉमेना, नॉट स्पिरिचुअल। और साथ ही जैविक, दैहिक — बायोलॉजिकल, अगेन नॉट स्पिरिचुअल।

सबसे मूल बात तो ये कि दुनिया भर में ज़्यादातर लोगों ने अपने गॉड को, अपने परमेश्वर को इंसान जैसा ही दिखाया है। कितनी बड़ी बायोलॉजिकल शर्त बना दी, देख रहे हो। आप अपने ही शरीर की पूजा करने लग गए न, और ये शरीर क्या है? कुछ नहीं, प्रकृति की विकास यात्रा से आया है। और आपने कह दिया — "यही शरीर जो है, परमेश्वर है।" क्योंकि परमेश्वर को भी आपने यही शरीर तो पहना दिया है। बिल्कुल ऐसा ही। और ईमानदारी इतनी भी नहीं है कि स्वीकार करो कि अपने परमेश्वर को आपने ये शरीर पहना दिया।

आप कहते हो — "नहीं, परमेश्वर तो वैसा शरीर पहले से रखे हुए हैं। उसने हमें ये शरीर पहना दिया।" उसने आपको आपका शरीर पहनाया है, या आपने उसको उसका शरीर पहनाया है? और ये बड़ी शारीरिकता की बात है, कि जैसा मेरा शरीर है, वैसे ही मेरे आराध्य का होगा। और जैसे मेरे वस्त्र हैं, वैसे ही मेरे आराध्य के होंगे। और जो कुछ मुझे ‘सद्गुण’ जैसा लगता है, वो 100 गुना मैं अपने आराध्य में स्थापित कर दूँगा। “थोड़ी भगति बहुत अहंकारा,” इसीलिए अड़चन हो जाती है।

कोई कहानी अगर हज़ार साल पहले की होगी, धार्मिक कहानी, और सब धर्मग्रंथों से ही तो भरे हुए हैं। बाइबल से लेकर हदीस से ले के, पुराण तक — मामला कहानियों का ही चल रहा है। अब वो कहानियाँ हैं पुरानी, और सामाजिक मूल्य इन हज़ार सालों में बदल गए। तो उनमें बहुत सारी बातें ऐसी हैं, जो तब मान्य थीं जब कहानी रची गई थी और आज समाज में वो बातें अमान्य हैं, अच्छी नहीं मानी जातीं।

अब बड़ी दिक्कत आ जाती है, आपने अपने गॉड को बहुत सारे ऐसे काम करता दिखा दिया अपने ग्रंथ में, जो काम आज अच्छे नहीं माने जाते। अब क्या करोगे? तो फिर हम कहानियों के उन हिस्सों को दबाने की कोशिश करते हैं। कहते हैं — “नहीं, ऐसा तो हुआ ही नहीं।” क्योंकि मामला तो सामाजिक है न। समाज में कभी कुछ अच्छा माना जाता है, कभी कुछ और। जब कहानी रची गई थी, तब समाज में कुछ बातें अच्छी मानी जाती थीं — वो सारी बातें गॉड में और ईश्वर में डाल दी गईं। अब समाज बदल गया, वो बातें अच्छी नहीं मानी जातीं, अब उन बातों का क्या करें? अब वो फँस गईं गले में। अब क्या करें?

तुम कहते हो “नहीं, नहीं ये... या फिर इसका दूसरा अर्थ करो ये हुआ ही नहीं, इसका दूसरा अर्थ करो। इसका ये मतलब नहीं है।” उदाहरण के लिए — आप बाइबल को अगर लेंगे, तो जो ओल्ड टेस्टामेंट माने यहूदियों का जो गॉड है, और न्यू टेस्टामेंट माने ईसाइयों का जो गॉड है, वो बड़ा अलग-अलग है।

गॉड का ही व्यवहार बदल गया, एक ही ग्रंथ के अंदर! एक ही ग्रंथ के दो खंड और उसमें गॉड का व्यवहार बड़ा अलग-अलग है।

आपने फिल्मों में देखा होगा या अगर आपने ईसाइयत का कुछ अध्ययन किया हो, तो आपको पता होगा। आम धारणा रहती है न, "गॉड द मर्सिफ़ुल" यही रहता है न? आप इतना ही जा कर वहाँ देखते हो, कि कोई बोलता है — “ओ फ़ादर, फ़ॉर्गिव मी!” और आमतौर पर होता है कि — हाँ भाई, फ़ॉर्गिवनेस मिल गई, बिकॉज़ गॉड इज़ मर्सिफ़ुल.

ओल्ड टेस्टामेंट का गॉड मर्सीफ़ुल नहीं है। वो गॉड द फ़िरोशस है। गॉड द मर्सिफ़ुल नहीं है। वो मार देता है, और बहुत ग़ुस्से में रहता है। ओल्ड टेस्टामेंट के समय की बात है। उस समय यही ज़रूरी था कि जो मारता हो, उसको गॉड माना जाए।

अब वक़्त बीत गया, ईसा आए। उन्होंने कहा, "यह तो बात गड़बड़ लग रही है।" तो उन्होंने फिर कहा “नहीं, मेरा जो गॉड होगा, वो तो मर्सिफ़ुल होगा।” असल में जो न्यू टेस्टामेंट है, वो वास्तव में बहुत तरीक़ों से ओल्ड टेस्टामेंट का खंडन करता है। बहुत तरीक़ों से।

और इसीलिए तो फिर जीसस को फांसी दे दी गई थी, क्योंकि वो जो बात बोल रहे थे, वो उस समय की प्रचलित धारणा के बिल्कुल खिलाफ़ जाती थी। उन्होंने कहा, कि “ये सब जो कमांडमेंट्स हैं, मैं नहीं इनको फ़ॉलो करता। एक बेहतर गॉड हो सकता है। आपने जैसा गॉड रचा है, और आपने जैसा धर्म रचा है — उससे बेहतर हो सकता है।”

लोगों ने कहा, “हम तो नहीं मानते।” कुछ लोगों ने मानना शुरू किया। जिन्होंने मानना शुरू किया मुट्ठी भर ही थे। वो नहीं बचा पाए जीसस को, उनको टांग दिया। समझ में आ रही है बात? “थोड़ी भगति, बहुत अहंकारा।”

और सब जो भक्त होते हैं, ऐसे ही होते हैं। “ऐसे भगता मिले अपारा।” वास्तविक भक्त तो कोई बिरला होता है। "भक्ति करें कोई सुरमा, जाति वरन कुल खोये।" जाति, वरन, कुल — इन तीनों का संबंध किससे है? अतीत, इतिहास, परंपरा, शरीर। जाति कहाँ से आती है? शरीर से आती है। कुल शरीर है।

जो शरीर को और समय को लांघने को तैयार हो, बस वही कर सकता है भक्ति। जो अपने मन के अनुसार धारणाएँ, कल्पनाएँ बनाता हो, और उन्हीं कल्पनाओं पर नाचने लगता हो, वो भक्ति का अधिकारी नहीं है। समझ में आ रही है बात?

प्रेम मार्ग बहुत ऊँचा है लेकिन उनके लिए है, जो अपनी ही छाया से प्रेम ना करने लग जाएँ।

अगर कोई मुझसे कहे कि, “प्रेम मार्ग, ज्ञान मार्ग से भी ऊँचा है।” मैं ‘हाँ’ कर दूँगा। लेकिन उसमें शर्त लगी हुई है — एक इतनी सतर्कता रखनी है कि प्रेम कर किससे रहे हो। फिर वहाँ ज्ञान आ जाता है। प्रेम तो कर रहे हो पर किससे कर रहे हो? अब किससे कर रहे हो, ये जानना ही ज्ञान कहलाता है। तो इसलिए ये दोनों आपस में गुथे हुए हैं। ये बात बिल्कुल नादानी की है कि ये दो अलग-अलग मार्ग हैं। खूब कहा जाता है, ये अलग-अलग मार्ग।

अलग क्या मार्ग हैं? प्रेम! चलो तुम प्रेम मार्गी हो। किससे प्रेम कर रहे हो, ये पता नहीं? नहीं पता, तो काहे का प्रेम? अपने सपने से प्यार कर रहे होंगे, सपनों में बहुतों को प्यार हो जाता है। तो प्रेम भी करना है, तो ज्ञान चाहिए। और ज्ञान माने — आत्मज्ञान। तब तक नहीं आएगा जब तक मुक्ति से प्रेम न हो। तो ये दोनों मार्ग अलग कैसे करते हैं?

ज्ञान आ नहीं सकता बिना प्रेम के, और प्रेम बिल्कुल दूषित हो जाएगा बिना ज्ञान के। ज़्यादातर जो लोग अपने आप को प्रेमी बोलते हैं आध्यात्मिक अर्थ में, या भक्त बोलते हैं, वो अपनी ही छाया से, अपनी ही छवि से प्यार कर रहे होते हैं।

जैसे कोई — आप शीशे के दर्पण के सामने खड़े हो जाइए, हाथ में हल्दी ले लीजिए, चावल ले लीजिए, और सामने जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसको खूब सजाइए। कर सकते हैं कि नहीं कर सकते? करिए, बढ़िया है। उसको करके उसकी रिकॉर्डिंग भी कर लीजिए। “थोड़ी भगति, बहुत अहंकारा।”

सोचिए — खड़े हुए हैं दर्पण के सामने, और जो दिख रहा है उसकी टिकली, बिंदी, झूमर-वूमर सब चिपका दिया है। और फिर क्या कह रहे हैं? (हाथ जोड़कर) ये बन जाती है भक्ति, दुर्भाग्य से। तुमने ख़ुद को ही तो अलंकृत कर दिया न, तुम और किसको पूज रहे हो? तुम ये भी अगर कहो कि “नहीं, उनमें सारे सद्गुण हैं।” तो तुम्हें कैसे पता कि उन्हीं गुणों को सद्गुण बोलना है?

और दूसरी बात, गुण तो सब गुण होते हैं। तुम किसको अवगुण बोल रहे हो, किसको सद्गुण बोल रहे हो इसकी रेखा तो तुमने ही खींची है। अन्यथा गुण तो सब गुण हैं, समूची प्रकृति एक है। कुछ अच्छा, कुछ बुरा — ये तो अहंकार की धारणा होती है।

अगर तुम्हें वो सब कुछ ही छोड़ना है, हटाना है जो बंधन का कारण है, तुम कहते हो, “वो सब कुछ मैं नहीं रखूँगा अपने आराध्य में।” तो तुम फिर ये नहीं कर सकते कि, कुछ गुण हटा दिए अवगुण बोल के, और बाकी गुण आराध्य में स्थापित कर दिए सद्गुण बोल के। ये नहीं कर सकते।

फिर क्या करना पड़ेगा? फिर आराध्य में सारे ही गुण हटाने पड़ेंगे। क्योंकि गुण तो सब एक से हैं — कोई सद्गुण नहीं है, और फिर कोई अवगुण भी नहीं है। और वो जितने गुण हैं वो सब पहले ही तुम में हैं। तो अगर आराध्य को सचमुच अपने से अलग स्थापित करना है, तो उसमें फिर कोई गुण नहीं होना चाहिए।

और ये होती है संतों की, जैसे यहाँ संत कबीर हैं — इनकी निर्गुणी भक्ति। जैसे सिख पंथ है पूरा निर्गुणी भक्ति का। निर्गुणी भक्ति, बहुत समझदारी की बात है। कह रहे, “जिसके आगे सर झुका रहे हैं, उसमें गुण स्थापित करने का अधिकार हमें किसने दे दिया?” और उसमें अगर हमने गुण डाल दिए तो गुण तो हम में भी हैं, फिर हम में और उसमें क्या अंतर रह गया? समझ में आ रही बात? निर्गुणी भक्ति।

और सच पूछो तो बड़ा मुश्किल हो जाएगा कि आप कहें कि भक्ति साफ़ है, स्वच्छ है, पर निर्गुणी नहीं है। गुण ही तो दोष होता है ना। जिसको एक तरफ़ से देखते तो गुण है; दूसरी तरफ़ से उसी को देखो, तो दोष है। तो अगर भक्ति निर्गुणी नहीं है, तो निर्दोष भी नहीं हो सकती फिर, उसमें दोष होंगे। समझ में आ रही है बात?

पर जब भक्ति वैसी हो जाती है जैसी प्रचलित है, दुनिया भर में, भारत में — तो भक्ति बहुत प्रचलित हो जाती है। पूरी दुनिया में धर्म का मतलब ही भक्ति है, 99.9%। कोई बोले अगर कि वो "रिलिजियस" है, तो संभावना यही है कि कहेगा "मैं डिवोटी हूँ।” और अगर कोई कहे कि वो भक्त है, तो संभावना यही है कि वो अपनी ही किसी छवि को पूज रहा होगा।

और फिर इसीलिए दुनिया भर में धर्म के नाम पर ज़बरदस्त लड़ाइयाँ होती हैं। क्योंकि आप पूज रहे हो अपनी छवि को, और वो पूज रहा है अपनी छवि को। और आप दोनों की छवि एक जैसी है नहीं। और आपके अनुसार आपकी छवि ही सर्वोत्तम है, और उसके हिसाब से उसकी ही छवि सर्वोत्तम है। अब ये दोनों भिड़ जाएँगे।

जो ये तक कहते हैं, जैसे कि इस्लाम में — कि "हम जिसको पूज रहे हैं उसका कोई रूप, रंग, आकार नहीं हो सकता — अल्लाह का।" वो भी इतनी सतर्कता नहीं रख पाए कि अगर रूप, रंग, आकार नहीं है, तो फिर कहानी भी तो नहीं होनी चाहिए। क्योंकि सगुण आप सिर्फ़ रूप-रंग से नहीं हो जाते। सगुण आप तब भी हो गए अगर आपसे संबंधित कोई कहानी बता दी गई, या आपका कोई कृत्य बता दिया गया।

जो प्रकृति से अतीत है, माने निर्गुण है — वो तो साक्षी होता है, वो तो कुछ कर ही नहीं सकता ना। अगर वो रचयिता हो गया तो वो सगुण हो गया, भले ही आप उसको नाम, शक्ल, आकार देने से इंकार कर दें। फिर भी आपने उसको सगुण बना दिया, क्योंकि आपने उसके साथ कोई कृत्य जोड़ दिया। आपने कह दिया "वो रचनाकार है," और आपने ये भी कह दिया कि "क़यामत भी वही लाएगा," आपने ये भी कह दिया कि "इंसाफ और फैसले भी वही करता है," आपने ये भी कह दिया कि "पृथ्वी पर हवा भी नहीं चलती जब तक वो नहीं चाहे।"

अगर आपने ये सब कह दिया तो आपने उसे सगुण ही बना दिया। भले ही आपने उसको शक्ल नहीं दी है, पर फिर भी आपने उसको सगुण तो बना ही दिया ना। तो सगुण बनाने के प्रलोभन से कोई भी नहीं बच पाया है, दुनिया भर में कोई नहीं बच पाया है। और इसीलिए धर्म का क्षेत्र इतना दूषित हुआ। क्योंकि उसको गुण देना माने उसको अपने जैसा बना देना। और हम तो थे ही पहले से ही फन्ने खाँ, उसको 100 गुना फन्ने खाँ बना दिया। अब लड़ाई नहीं होगी, दुख नहीं फैलेगा तो और क्या होगा?

“वो उस दिशा में मिलता है ज़्यादा, उसने ये कहा, ये उसका संदेश है” ये सब बातें भी उसे क्या बना देंगी? सगुण। अब फिर फँसोगे। ठीक है, तुमने उसको नाम-शक्ल नहीं दी, पर उसके साथ एक दिशा जोड़ दी। अब कोई और लोग होंगे जो कोई और दिशा जोड़ देंगे। अब दोनों में लड़ाई होगी। वो कहेगा "उस दिशा", वो कहेगा "इस दिशा"। दिशा पर ही लड़ाई हो जाएगी, खूब खून बहेगा।

दिशाएँ सब किसके लिए होती हैं? हमारे लिए। तो हमारी दिशाओं का परम सत्ता से क्या संबंध? क्या परम सत्ता भी प्राकृतिक है? सब दिशाएँ प्रकृति के अंतर्गत होती हैं, है ना? क्या परम सत्ता भी प्राकृतिक है कि उसका रिश्ता आप दिशाओं से जोड़ रहे हो? और अगर परम सत्ता भी प्राकृतिक है, तो फिर हमें कोई परम सत्ता चाहिए ही नहीं — क्योंकि प्राकृतिक तो हम पहले से ही ख़ुद ही हैं।

फिर तो झुक-झुक के अपने ही पाँव छुआ करो। स्ट्रेचिंग भी हो जाएगी, बढ़िया रहेगा। कुछ तो फायदा मिलेगा। किसी और को नमन करने से अच्छा, ईमानदारी की बात ये है कि अपने ही पाँव छुओ, सोचो। भक्ति का अर्थ यही होना चाहिए — सब भक्त खड़े हैं कतार में, ऐसे झुक-झुक के अपने ही पाँव छू रहे हैं। बढ़िया है, पीठ खुल जाएगी, टाँगें खुल जाएँगी, कुछ लाभ होगा।

नासमझी में भक्तों ने भक्ति जैसी ऊँची बात को बिल्कुल अपने ही तल पर उतार लिया। अहंकार ने कहा होगा, “आसमान, मैं फंदा डाल के उसको ज़मीन पर उतार लूँगा।" और देखो, उसने उतार भी लिया है।

अभी गणेश चतुर्थी में देख रहा था, कि कैसे गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। उसमें एक बड़ी भारी मैंने देखी प्रतिमा, उसका विसर्जन कैसे किया जा रहा था? उसको पुल से नीचे फेंक रहे थे। पुल से नीचे फेंक रहे थे! वो तो है ही एक बहुत कुरूप बात।

लेकिन जिनको वक्रतुंड महाकाय बोला जाता है, उनके एब्स दिखा रखी थी! गणपति के रूप के वर्णन में ही ये निहित है कि उनका पेट निकला हुआ है। लेकिन भक्त ने अपनी छवि उनके ऊपर लाद दी — बोले, "आजकल तो एब्स होना माँगता।" तो गणपति के एब्स! और ये एक भक्त ने नहीं किया होगा। इतने लोग आए होंगे प्रतिमा का दर्शन करने, प्रणाम करने, नमन करने, किसी ने भी आपत्ति नहीं करी। कि वक्रतुंड महाकाय की एब्स कहाँ से आ गईं?

क्योंकि मामला बहुत सीधा है — हम जैसे होते हैं, वैसा ही हम अपने भगवान को भी रच देते हैं, अपनी पसंद-नापसंद के अनुसार। जैसे आप किसी रेस्टोरेंट में जाओ और अपने स्वादानुसार कहो, "ये ले आओ, ये ले आओ", और सब मिला-जुला के कहो, "ये आज का मेरा पसंदीदा भोजन।"

या जैसे जब कोई रेसिपी होती है तो उसमें अंत में लिखा होता है ना — "नमक स्वादानुसार।" सब कुछ बता देंगे, अंत में — नमक स्वादानुसार। वैसे ही हमारा रहता है — नमन स्वादानुसार। जहाँ स्वाद आया, वहाँ नमन कर लिया। समझ में आ रही हैं बातें?

ज्ञान और भक्ति अलग-अलग नहीं हैं। भक्ति को आँखें देता है, ज्ञान। भक्ति को शुद्धता देता है, ज्ञान। और ज्ञान को हृदय देती है, भक्ति। और भक्ति और कुछ नहीं है, विशुद्ध प्रेम के अलावा।

ऐसा प्रेम जिसमें स्वयं को बचाने की कोई शर्त है ही नहीं। ऐसा प्रेम जिसमें जो बिलोव्ड है, वही सब कुछ है। अपनी ओर से मिटने की पूरी तैयारी है। प्रेमी कहता है "प्रियतम, मैं नहीं, तू।" तो इसीलिए जैसे ज्ञान मार्ग में "मैं" बड़ा केंद्रीय शब्द होता है — कि "मैं को पकड़ो और मैं को शुद्ध करो," और "मैं को शुद्ध करके" हम कहते हैं — आत्मा।

हम कहते हैं "मैं जब बिल्कुल हट जाएगा, तो जो बचेगा — वो है आत्मा।" वैसे ही भक्ति में बिल्कुल उसी बात को ऐसे कहा जाता है, "मैं जब बिल्कुल हट जाएगा, तो बचेगा तू।" अब ये जो "तू" है, ये ज्ञान में नहीं सुनना पड़ता। पर भक्ति का "तू" और ज्ञान का "आत्मा" बिल्कुल एक बात है। क्योंकि दोनों में एक ही शर्त है — "मैं" का मिटना।

भक्ति कहती है "मैं मिटा, तू बचा।" ज्ञान कहता है "मैं मिटा, सत्य बचा।" और जो सत्य है, वो "मैं" ही हूँ, आत्मा। ज्ञान कहता है, "मैं मिटा, आत्मा बचा।" भक्ति कहती है, "मैं मिटा, तू बचा।" भक्ति ‘तू’ की भाषा में बात करेगी, लेकिन दोनों में जो केंद्रीय बात है, वो तो एक ही है। मैं मिटा।

जो मैं को मिटाने को तैयार नहीं, उसके लिए कुछ नहीं। अब मैं को मिटा दिया, उसके बाद चाहे तू बचा बोलो, चाहे आत्मा बची ये बोलो, कोई अंतर ही नहीं पड़ता। क्योंकि बोलने को है ही कौन? मैं ही था जो बोलता था, बक-बक-बक। जब मैं मिट गया, तो अब ये भी कौन बोलेगा कि तू बचा? और ये भी कौन बोलेगा कि आत्मा बची?

तो सारी बात ये बोलने की नहीं है कि तू बचा, कि ये बचा, कि वो बचा। सारी बात मिटने की है। मिट जाओ, मिटने के बाद जो बोलना हो, बोलना। जी आपको जो बोलना है, आप सब बोलिए — पहले मिट जाइए।

अध्यात्म का सारा खेल इसका नहीं है कि अंत में क्या है। अध्यात्म का सारा खेल ये है कि वर्तमान में "मैं" है, और ये बड़ा गड़बड़ है, इसको मिटाओ। उसको मिटाने के बाद क्या बचेगा, इस बात पर काहे के लिए लड़ाई कर रहे हो? कि "तू" बचेगा या विशुद्ध "मैं" बचेगा?

ज्ञानी कहता है, विशुद्ध "मैं" बचेगा, उसका नाम आत्मा है। भक्त से पूछोगे तो कहेगा, "मैं" मिट जाएगा, फिर विशुद्ध "तू" बचेगा। "मैं" मिट गया, फिर कुछ नहीं बचेगा। उसको "तू" बोलो, कि "मु" बोलो, कि "जु" बोलो, कि "कु" बोलो, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। "मैं" का मिटना ही केंद्रीय बात है।

ज्ञान में अहंकार कैसे प्रवेश करता है? ज्ञान मार्ग में अहम् का सबसे बड़ा लक्षण हम क्या देखते हैं? हम कहते हैं — अहम् अपने आप को आत्मा मानता है, ठीक है ना। अहम कहता है — "मैं ही सत्य हूँ, मैं ही आत्मा हूँ।"

इसी तरीक़े से भक्ति में अहंकार कैसे प्रदूषण करता है? अपनी छवि को भगवान बना देता है। दोनों ही में काम वो एक ही कर रहा है। ज्ञान की दृष्टि से देखो तो वो कहता है, "मैं ही आत्मा हूँ।" अहंकार अपने आप को आत्मा बोलेगा। और भक्ति की दृष्टि से देखो तो जो भक्त है, वो अपने आप को ही भगवान बना रहा है। और मान भी नहीं रहा कि उसने ऐसा करा।

उसे बोलो कि तू ख़ुद को ही तो भगवान बना रहा है, तो बोलेगा — "नारायण नारायण! कैसा ये पाप वचन कह दिया! बड़े अधर्मी हो! मैं अपने आप को कभी भगवान बोल सकता हूँ?" पर तुम कर तो यही रहे हो। देखो ना अपने कर्मों को। वचनों की बात नहीं है — कर्मों को देखो अपने।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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