यहाँ जिस प्रेम की बात हो रही है, वो वो प्रेम है जहाँ दूसरे के होने से आपका होना मिट जाता है, गाढ़ा नहीं हो जाता, बढ़ नहीं जाता। "तुम ही हो जिसमें सारी सत्यता है। और तुम यदि सामने हो, तो मैं पूरी तरह असत्य हो गया।" ग़ज़ब का प्रेम है ये। "सारी सत्यता तुम में है, तो फिर तुम्हारे सामने मैं क्या हो गया? मैं असत्य हो गया और असत्य माने, जो फिर है ही नहीं। नकली, मिथ्या।"
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आचार्य प्रशांत: भक्ति शब्द के मूल में ही “भज” है। उसका अर्थ होता है, बटना या दूरी। भक्ति का दर्शन है कि, "मैं अहंकार हूँ, मैं निकृष्ट हूँ, दोष सारे मुझ में हैं। और जो इष्ट है, आराध्य है मेरा — वो मुझसे इतना ऊपर है, इतना अलग है, कि मुझे ये कहने का भी अधिकार नहीं कि मुझमें और उसमें थोड़ी भी समानता है।"
तो एक दूरी फिर कही जाती है। भक्त कहता है, "ये मैं हूँ, और मुझसे अलग, मुझसे विभाजित, मुझसे विभक्त, मुझसे दूर — मेरा पूज्य है, मेरा भगवान है।" और उसको भक्त बहुत ईमानदारी, बड़ी सत्य निष्ठा के साथ कहता है कि "हाँ, दूर तो तुम हो ही। मुझे मानना पड़ेगा कि अभी तो तुम मुझसे बाहर ही स्थापित हो, क्योंकि हम में अंतर इतना है कि मैं कैसे कह दूँ कि तुम मेरे भीतर हो, कि मेरे निकट हो, कि मैं तुम्हें स्पर्श कर सकता हूँ? ये सब मैं कह नहीं सकता। तो मैं विभक्त हूँ, मैं वियुक्त हूँ।" इसलिए वियोग शब्द सदा भक्ति के साथ चलता है — "हम अलग हैं।"
और ये कहने में बड़ी विनम्रता है, "मैं आपका स्थान भी जानता हूँ, मैं अपना स्थान भी जानता हूँ। और मैं जानता हूँ कि हमारे स्थानों में आकाश-पाताल का अंतर है। आप अलग हो, मैं अलग हूँ।" इस विनम्र अंतर को देखने से शुरुआत होती है भक्ति की। "मुझ में ऐसा कुछ भी नहीं जो आप में हो, और आप में ऐसा कुछ भी नहीं जो मुझ में हो। तभी तो आपके आगे सर झुकाता हूँ न।"




