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अपना कर्मफल कृष्ण को अर्पित करने का व्यवहारिक अर्थ क्या है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्। अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव। मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि।।

यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापित करने में समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन! अभ्यास योग के द्वारा मुझमें प्राप्त होने की इच्छा कर।

और अगर तू इस अभ्यास में भी असमर्थ है तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्तिरूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा।

—श्रीमदभगवदगीता, अध्याय १२, श्लोक ९-१०

प्रश्नकर्ता: चरणस्पर्श, आचार्य जी। श्रीकृष्ण कहते हैं, “अगर तू मन को मुझमें अचल स्थापित करने में समर्थ नहीं है तो मुझे अभ्यास से पाने की इच्छा कर। और अगर अभ्यास भी नहीं कर सकता तो केवल मेरे लिए कर्म करने के परायण हो जा।”

तो मन को अचल स्थापित करने का क्या तात्पर्य है? और उस स्थापना का तरीका क्या है? क्योंकि हम जब गुरु कबीर साहेब के संग होते हैं तो वे कहते हैं कि जो कुछ भी मन पर छाया हुआ है, वह सब माया का ही रूप है। हम क्या समझें कि कृष्ण क्या कह रहे हैं?

आचार्य प्रशांत: तीन बातें कह रहे हैं कृष्ण। पहली — मन को अचलता से मुझमें स्थापित ही कर दे। दूसरी बात कह रहे हैं कि यह नहीं कर सकता तो भाई, अभ्यास योग कर ले। अभ्यास योग का मतलब होता है जप, तप, कीर्तन, साधनाएँ, विधियाँ इत्यादि। उसके बाद कह रहे हैं कि इतना भी नहीं किया जाता तो फिर ज़िन्दगी में यह सब जो तू काम करता है, उनको ज़रा निष्कामभाव से करना सीख। अपने सब कामों के फल छोड़ता चल।

इसमें जो पहली बात बोली है, उसकी कोई विधि नहीं है। बाकी दो विधियाँ ही हैं। जो पहली बात बोली है, वह स्वयं लक्ष्य है। पहली बात बोली है कि मन को दृढ़ता से अचल स्थापित कर दे कृष्णत्व को, सहज कर दे, बिना किसी विधि के कर दे। तत्काल कर दे, पलक झपकते, जैसे स्विच दबाने पर रोशनी हो जाती है, जैसे पलक उठाने पर प्रकाश दिखाई देता है, जैसे जगते ही सपना टूट जाता है, ऐसे। उसमें कोई विधि नहीं है। नींद तोड़नी है, विधि क्या है? कुछ ग़लत है, कुछ मिथ्या है जो पकड़ा हुआ है, उसमें विधि क्या है?

और वह ऊँची-से-ऊँची बात है क्योंकि वह तत्काल है। अभी हो जाएगा तो इसीलिए सबसे पहले उसका नाम लिया श्रीकृष्ण ने। बोले कि ऐसे ही कर देना, बिना किसी तरीके के, बिना किसी ज़ोर-ज़बरदस्ती के, बिना किसी उपाय के, शोर-शराबे के, ताम-झाम के सीधे मुझमें स्थापित हो जा, क्योंकि यह बात बड़ी सहज है। कर दे, अर्जुन, ऐसा।

अब यह बात सहज तो है, पर केवल उनके लिए सहज है जो इतनी सहजता के लिए तैयार हैं। जिन्होंने अपना मन इतना साफ़ रखा हुआ है, जिनमें इतनी निर्मलता है, और जिनमें सच्चाई के लिए, कृष्ण के लिए इतना प्रेम है कि वे पलक झपकते कृष्ण में ही स्थापित हो जाए। ये वो लोग हैं जो कृष्ण में स्थापित हैं ही लगभग, जो निन्यानवे दशमलव नौ नौ डिग्री पर रहते हैं। जिनको भाप बनने में कोई समय नहीं लगना है। जो इतने तैयार हैं, जिनके भीतर इतनी उर्जा, इतनी ऊष्मा है, उनके लिए है यह पहली बात। विधि क्या लगानी है? तुम तो उड़ ही जाओ न भाप बनकर, निन्यानवे दशमलव नौ नौ पर तो तुम बैठे ही हो, एक कदम और बढ़ाओ, तुम्हारा काम हो गया।

लेकिन यह विधि सहज और सरल होते हुए भी ज़्यादातर लोगों के लिए व्यावहारिक नहीं है। क्यों? क्योंकि ज़्यादातर लोग उतनी तैयारी करके बैठे ही नहीं होते कि पलक झपकते उनका काम हो जाए।

तो फिर कृष्ण आगे बढ़ कर दो और बातें बताते हैं। वे कहते हैं, “भाई, अभ्यास कर लो। तुम्हारी तैयारी पूरी नहीं है। तुम सहज ही, बिना किसी श्रम के, बिना किसी विधि के अगर मुझमें स्थापित नहीं हो पा रहे हो तो अभ्यास कर लो। पढ़ा करो, सुमिरन किया करो, जपा करो, विधियों का पालन किया करो, सेवा किया करो, यम-नियम का पालन किया करो। त्यागपूर्ण जीवन जियो, संयम और अनुशासन बरतो।” ये सब अभ्यास योग में आता है।

अभ्यास योग में आपको अपने कर्म बदलने होते हैं। कुछ पकड़ना होता है, कुछ छोड़ना होता है, कुछ अनुशासन रखना होता है। फिर कहते हैं, “अर्जुन, देख, अगर तेरी हालत इतनी ख़राब है कि तू यह करने लायक भी नहीं है कि जैसी ज़िन्दगी तू जी रहा है, तू उसको बिल्कुल बदल नहीं पा रहा, तो एक काम कर फिर – जो कुछ भी कर रहा है, उसके फल की इच्छा रखनी बंद कर दे।”

अब ये जो तीसरी बात है, इसको समझिएगा कि ये क्या विधि है। हम जो कुछ कर रहे होते हैं, बड़ी बेहोशी में कर रहे होते हैं, बहुत बेहोशी में। लेकिन उम्मीद हमारी यही होती है कि हमें इससे सुख मिलेगा। असल में जीव कुछ कर ही नहीं सकता अगर उसको सुख की आकांक्षा नहीं है।

अहम् एक तड़प है, एक जलन है, एक काला दुःख है, उसे जो कुछ भी करना है, सुख पाने के लिए ही करना है, उसके पास कोई चारा नहीं है। तो भले आप बेहोशी में काम कर रहे हो, पर करोगे यही सोच करके कि इससे मुझे सुख मिलेगा। और सुख की जो इच्छा है, यही आपकी बेहोशी को कायम रखती है। क्योंकि साहब, आप जब सुख की इच्छा कर रहे हैं बेहोशी से, तो देखिए न कि आपने आधारभूत मान्यता क्या रखी है। आपकी मान्यता यह है कि बेहोशी में सुख है। काम चल रहे हैं बेहोशी में और उससे उम्मीद किसकी है? सुख की। तो इस पूरे तंत्र के नीचे मान्यता है कि बेहोशी में सुख है।

सुख की जो लालसा है, वही बेहोशी को बनाए रखती है, क्योंकि हमने सुख का संबंध ही किससे जोड़ दिया है? बेहोशी से। देखते नहीं हो कि जब लोगों को खुश होना होता है तो वे पीते हैं। तुमने कहीं देखा है कि घर में कोई ख़ुशी का मौका आया हो और सब लोग ध्यान लगाकर बैठ गए हो? जैसे ही खुशियाँ बरसती है घर में, वैसे ही तत्काल क्या होता है? सब बेहोश करने वाले काम चालू हो जाते हैं। ज़ोर-ज़ोर से नगाड़ा बजाओ, धूमधाम करो, पियो, सब बेहोशी के काम करो। कहीं ऐसा देखा है कि ख़ुशी के मौके पर ध्यान को गहराने वाले काम हो रहे हो? कहीं ऐसा होता है?

हमने सुख का संबंध ही किससे जोड़ा है? बेहोशी से। तो सुख के फल की जो कामना है, वही बेहोशी को बनाए रख रही है। श्री कृष्ण कह रहे हैं, “चलो, तुम जो कर रहे हो, वही करो, बस फल की कामना मत करो, सुख की कामना मत करो। इतना कर लो।”

देखने में ऐसा लग रहा है कि जैसे श्रीकृष्ण कह रहे हों कि तुम्हारा जो भी काम-धाम चल रहा है, तुम्हारे जीवन का जो भी ढाँचा चल रहा है, उसको चलने दो, बस सुख की कामना मत करो। लेकिन वे बड़ी विस्फोटक बात कह रहे हैं, क्योंकि अगर सुख की कामना नहीं करी तो ये बेहोशी भी चलेगी नहीं। ये बेहोशी चल ही रही है सुख का आसरा पा करके। वह सुख वास्तव में कभी मिलता नहीं है लेकिन उसकी आशा तो रहती है। वह जो आशा है, वही बेहोशी को बनाए रह जाती है।

कृष्ण कह रहे हैं कि मैं इससे सीधे-सीधे बोलूँगा कि तू बेहोशी छोड़ दे, तो ये छोड़ेगा नहीं। तो मैं एक काम करता हूँ, इसको कहता हूँ कि तू एक काम कर, तू बेहोशी बनाए रख, बस बेहोशी का फल भोगने की उम्मीद मत रख। समझ रहे हो? यह एक बेहोश आदमी को जगाने की छुपी हुई तरकीब है। और इसीलिए इसको सब तरकीबों के बाद, अंत में बताया है। यह तरकीब बस उनके लिए है जिनके ऊपर कोई और तरकीब काम नहीं करती।

सबसे ऊँची तरकीब तो यह है कि तुम जगने को तैयार ही थे, बस किसी ने ज़रा-सी आवाज दी, थोड़ी आहट करी, और तुम उठ करके बैठ गए। ये तो सबसे ऊँची बात हुई। इससे नीचे का जो तरीका है, वह यह है कि तुम्हारे भीतर ख़ुद ही उठने की प्रेरणा है। बेहोश हो, लेकिन होश में आना चाहते हो इसलिए तुम अभ्यास करने को तैयार हो, तपश्चर्या को तैयार हो। तुम ख़ुद ही मेहनत करोगे। और जो तीसरी तरकीब है, वह उन लोगों के लिए है जो बेहोश हैं और जिन्हें अपनी बेहोशी को तोड़ना भी नहीं है।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम बेहोश रह आओ। तुम बस एक छोटा-सा काम कर दो — निष्काम बेहोशी रखो। या अपनी बेहोशी का जो फल है, वह तुम मेरे सुपुर्द कर दो। इससे बेहोशी ही टूट जानी है। बात समझ रहे हैं?

याद रखिएगा, कर्म के फल से आपने जो रिश्ता रखा है, वह रिश्ता अगर आप बदल दें तो कर्म करने वाला बदल जाता है।

यह गीता की विश्वभर के दर्शनशास्त्र को बड़ी मौलिक देन है, उसको समझिएगा। आदमी को बदलने का यह जो नुस्ख़ा श्रीकृष्ण दे रहे हैं, बड़ा विलक्षण है। उन्होंने एक संबंध खोज निकाला है। वह संबंध यह है कि तुम यूँ ही कुछ नहीं करते। तुम जो करते हो, उसे भोगने के लिए करते हो न? तुम जो करते हो, उसके परिणाम की इच्छा से करते हो न? तुम जो करते हो, वह किसी के लिए करते हो न? कभी समाज के लिए करते हो, कभी अपने परिवार के लिए करते हो, कभी बीवी, कभी बच्चे, कभी माँ-बाप के लिए और कभी कहते हो कि मैं अपने लिए कर रहा हूँ। तो सारे जो कर्म हैं, वो तुम इन लोगों के लिए करते हो न, इन विषयों के लिए करते हो? सारे गड़बड़ काम तुम इन लोगों के लिए करते हो न? कृष्ण यहीं पर बड़ी धारदार बात कहते हैं। वे कहते हैं कि चूँकि इन लोगों के लिए करते हो, इसलिए काम गड़बड़ है। वे कहते हैं कि तुम गड़बड़ काम इन लोगों के लिए नहीं कर रहे हो; क्योंकि तुम इन लोगों के लिए काम करते हो, इसीलिए काम गड़बड़ है।

काम तुम बदल नहीं पा रहे क्योंकि तुम्हें आदत लग गई है, तो इतना कर लो कि उस काम का फल इन लोगों को मत अर्पित किया करो, इनको मत चढ़ाया करो। वह फल मुझे चढ़ा दिया करो। वह फल अगर मुझे चढ़ाने लग गए तो तुम्हारा काम ही बदल जाएगा। काम बदल गया तो तुम बदल गए। कर्मफल के भोक्ता में अगर परिवर्तन आ गया तो कर्म बदल जाएगा। कर्म बदल गया तो कर्ता को भी बदलना पड़ेगा। सब जुड़े हुए हैं, बल्कि तीनों एक हैं।

आप जिस उद्देश्य के लिए काम करते हैं, अगर वह उद्देश्य ही बदल जाए तो आपका काम नहीं बदल जाएगा? श्रीकृष्ण कह रहे हैं, “जो करना है कर, उद्देश्य मुझे बना ले।” ख़ूब कमाते हो, देखो कि कहॉं चढ़ा आते हो। क्योंकि ग़लत जगह चढ़ा आते हो, इसलिए ग़लत तरीके से कमाते हो। तुम एक काम करो, जहॉं चढ़ाते हो, वहॉं चढ़ाना बंद कर दो। तुम कह दो कि यह मेरी सारी कमाई कृष्ण की हो गई, तुम्हारा जीवन बदल जाएगा बिल्कुल। बात समझ में आ रही है?

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः।।

मुझ अंतर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा संपूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और संतापरहित होकर युद्ध कर।

—श्रीमदभगवदगीता, अध्याय ३, श्लोक ३०

प्र२: मैं तो अभी तक अपने घर वालों को ही अपने सारे कर्म समर्पित करता आ रहा हूँ, घर के मासिक ख़र्चे देता हूँ। यह सब मुझे अनिवार्य लगता है। पर कृष्ण कह रहे हैं कि अपने सारे कर्म मुझे समर्पित कर दो, तो मैं क्या समझूँ?

आचार्य: कृष्ण कोई व्यक्ति तो हैं नहीं। जब कृष्ण कह रहे हैं कि मुझे अपने सारे कर्म समर्पित कर दो, तो कृष्ण कोई व्यक्ति, कोई इकाई तो हैं नहीं। कृष्ण क्या हैं?

कृष्ण कृष्णत्व हैं। गीता में जिन श्रीकृष्ण से आप मिलते हैं, वे वास्तव में सत्य का ही साकार रूप हैं। वे बोलते भी हैं, “मैं और क्या हूँ? मैं परम ब्रह्म ही तो हूँ—निर्गुण, निर्दोष, निर्विकार, निराकार।”

अब प्रश्न समझिएगा। कह रहे हैं कि मैं तो कमा करके सारी कमाई घरवालों को चढ़ाता हूँ, पर गीता में श्रीकृष्ण बोल रहे हैं कि जितने कर्म करो, उनका फल मुझे चढ़ा दो। तो इसका मतलब क्या हुआ? किसको चढ़ाऊँ? घरवालों को न चढ़ाऊँ? और अगर घर वालों को न चढ़ाऊँ तो? कृष्ण कोई व्यक्ति तो हैं नहीं। कहॉं हैं? मंदिर में चढ़ा आऊँ? कृष्णभक्तों के सुपुर्द करा आऊँ, कि लो, बेटा। तुम लोग लो। खीर, मालपुआ उड़ाओ। जय कन्हैया लाल की, अंतरराष्ट्रीय घोड़ा पालकी!

यह चलता है ख़ूब। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ हैं कृष्ण के नाम पर। वो कहती हैं कि यही तो बोल गए हैं कृष्ण, कि सब कुछ श्रीकृष्ण को समर्पित कर दो। आज और कौन है कृष्ण का नाम लेवा? हम ही तो हैं। लाओ, सब समर्पित करो यहॉं पर। ऐसे-ऐसे करके वो अंतरराष्ट्रीय हो गए। कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं हैं। न कृष्ण अपना कोई वंशज छोड़ गए हैं, कि तुम कहो कि अब वे तो हैं नहीं तो उन्हीं के ख़ानदान के लोगों को जाकर चढ़ा आएँ।

कृष्ण माने कृष्णत्व। तो अगर कमाकर लाते हो और परिवार पर ही ख़र्च करना है तो परिवार में वहॉं पर ख़र्च करो जहॉं पर कृष्णत्व है। बात समझ में आ रही है? यह हुआ कर्मफल को कृष्ण को समर्पित करने का अर्थ।

घर में भी दोनों हैं – कृष्ण भी हैं और शकुनि भी है। हर जगह यही दोनों हैं। जैसे कहते हैं न, हर जगह राम हैं, रावण है, हर जगह रोशनी है, अंधेरा है। चूँकि हम दो हैं, इसलिए हमारे लिए हर जगह दो हैं। अहम् है और आत्मा है, सत और असत है। वैसे ही हर घर में रोशनी भी है, अंधेरा भी है। और ये दोनों ही व्यक्ति नहीं हैं, ये दोनों ही ताकतें हैं। इन्हीं ताकतों का परस्पर द्वंद चलता रहता है, उसी का नाम संसार है। इस द्वंद को जब तुम सत्य की दृष्टि से कहते हो, तो कह देते हो लीला। और इस द्वंद में अगर तुम्हारी पिटाई हो रही है, तो तुम कह देते हो इसे माया। हर घर में ये दोनों हैं, कृष्ण और शकुनि। और मैं फिर कह रहा हूँ, ये इंसान नहीं हैं, ये ताकतें हैं। तो आप अपनी जो कमाई लाते हो घर में, देखो कि घर के कृष्णत्व को दे रहे हो या शकुनित्व को दे रहे हो।

कमाई इसमें भी ख़र्च हो सकती है कि बेटे के लिए नया प्लेस्टेशन लाऊँगा और कमाई इसमें भी ख़र्च हो सकती है कि बेटे को ले जाऊँगा और हिमालय के किसी शांत, निर्जन, एकाकी जगह पर उसके साथ रहूँगा। जब तुम उसके लिए वीडियो गेम और इन सब ताम-झाम का इंतज़ाम कर रहे हो, तो तुम अपने घर में शकुनि की तरह दुर्योधन खड़ा कर रहे हो। देखो कि तुमने अपना सब कर्म अर्थात अपनी सारी कमाई किसको समर्पित कर दी है। और उसी बेटे को ले जा रहे हो और शांति का, एकाकी माहौल दे रहे हो, जिसमें वह ध्यानस्थ हो सके, तो तुमने अपने घर के कृष्णत्व को बल प्रदान किया। यह अर्थ है कर्मफल कृष्ण को समर्पित करने का।

हम सब जीव हैं जो कर्म करते हैं। जब कर्म करते हैं तो हमें कुछ मिलता भी है। तो देखो कि तुम्हें जो मिल रहा है, उसका तुम क्या उपयोग कर रहे हो। उसी उपयोग को कहते हैं कर्मफल का समर्पण। तुम्हारे पास जो कुछ है, उसको तुम किसकी सेवा में इस्तेमाल कर रहे हो? अभी हमने पैसे की बात करी। इसी तरह हमारे पास और क्या चीज़ें हैं? हमारे पास ध्यान है, हमारे पास समय है, हमारे पास ताकतें हैं, हमारे पास ज्ञान है, यह सब हम किस दिशा में भेज रहे हैं? कृष्ण की दिशा में या शकुनि की दिशा में? बात समझ में आ रही है?

अब समय है आपके पास, वह समय आपने कहॉं को लगाया? उसी से तय हो जाएगा कि तुम कुरुक्षेत्र में किधर की ओर खड़े हो, शकुनि की तरफ या कृष्ण की तरफ। अपना समय किसके साथ गुजार रहे हो? और तुम्हारा एक बहुत बड़ा संसाधन है यह तुम्हारा मानसिक भंडार, जिसमें तुम्हारे पास स्मृतियाँ हैं, ज्ञान है। बताओ, क्या याद रख रहे हो? बताओ, तुम अपने ज्ञान का क्या इस्तेमाल कर रहे हो? तुम्हारे पास ताकत है, तो तुम लड़ सकते हो दुर्योधन की तरफ़ से भी और तुम लड़ सकते हो कृष्ण की तरफ़ से भी। बताओ, तुम किसकी ओर से लड़ रहे हो? तुमने प्रसिद्धि इकट्ठा करी है। बताओ, उस प्रसिद्धि का क्या इस्तेमाल कर रहे हो?

तो बात यह नहीं होती है कि तुम्हारे पास कितना है, बात यह होती है कि तुम्हारे पास जो है, तुमने उसका इस्तेमाल क्या किया। इसी प्रयोग को कहा जाता है समर्पण। जिस उद्देश्य के हेतु तुमने अपने संसाधनों का इस्तेमाल किया, उसी उद्देश्य को तुम समर्पित माने गए। समझ में आ रही है बात?

कह रहे हो कि घर के ख़र्चे में मेरी भागीदारी रहती है जो मुझे अनिवार्य लगती है। इसी अनिवार्यता की थोड़ी जाँच-पड़ताल कर लिया करो। ये घर के ख़र्चे क्या चीज़ होते हैं और कितने होते हैं? मैं जानना चाहता हूँ। कुछ बोलो लोगों को तो वे खड़े हो जाते हैं, “घर भी तो चलाना है।” अरे! घर है कि डायनासोर है? जिसको धक्का भी देते रहो तो चलता नहीं। कितनी ताकत लगती है चलाने में, भाई?

“नहीं, साहब, घर के ख़र्चे हैं।” इस मुहावरे के पीछे न जाने तुम क्या-क्या छुपा ले जाते हो। घर का ख़र्चा माने क्या? दीवार खा रही है? घर खाता है? घर माने? ग़ौर से तो बताओ कि इसमें ठीक-ठीक कहॉं ख़र्च कर रहे हो। एक-एक रुपया ज़रा लिखकर दिखाना कि कहॉं जा रहा है। ऐसे मत लिख दो, पत्नी के ख़र्चे सत्तर हज़ार। ऐसे थोड़े ही होता है कि पत्नी के ख़र्चे सत्तर हज़ार। यह क्या है? यह नहीं चलेगा। सुस का जेब ख़र्च तीस हज़ार, सुहासिनी, बेटी है। क्या करती है वह इतने पैसे का? पर यह सवाल तुम पूछना नहीं चाहोगे, क्योंकि तुम्हें पता है कि वह मुँह नोच लेगी तुम्हारा अगर तुमने उससे पूछा कि तीस हज़ार का तू करती क्या है। हिम्मत नहीं है बीवी से पूछने की कि महीने का जो तू लाख उड़ाती है, वह जाता कहॉं है।

घर का ख़र्चा माने क्या? और अगर तुम्हारा ख़र्चा सिर्फ़ रसोई चलाने में जा रहा है या मकान का किराया देने में जा रहा है तो मैं उस पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा, फिर मेरी कोई आपत्ति नहीं, बिल्कुल नहीं। अगर कह रहे हो कि आचार्य जी, ईमानदारी से, हक़ीक़त में मेरी तो सारी तनख़्वाह बस रोटी-पानी में जाती है, घर के किराए में जाती है और थोड़े-बहुत कपड़े-लत्ते खरीद लेता हूँ, उसमें जाती है, तो मैं कहूँगा कि फिर ठीक है। पर ऐसा आमतौर पर होता तो नहीं है न।

ऐसा नहीं होता है कि हमारे बिल्कुल बंधे हुए ख़र्चे हैं जिसमें हम एकदम मजबूर हैं। हम निर्धारित तो करते ही हैं न, इतना तो करते हो न कि महीने में एक पिक्चर देख आते हो। करते हो न? वहॉं पर भी यह तय हो रहा है कि तुम कृष्णत्व की दिशा जा रहे हो या शकुनित्व की दिशा जा रहे हो। पिक्चर देखने में अगर परिवार के साथ जा रहे हो तो हज़ार-दो हज़ार तो ख़र्च करके ही आते हो? वो हज़ार-दो हज़ार किसको भेंट चढ़ा आए, भाई? एक-से-एक पिक्चरें रिलीज होती हैं और दो-दो सौ, चार-चार सौ, छः-छः सौ करोड़ जा रही हैं। वो तुम्हारी ही तो जेब से जा रही हैं और तुम कहते हो, “नहीं-नहीं, आचार्य जी, मेरे पास तो पैसा नहीं है।” वो छः सौ करोड़ का बिजनेस (व्यापार) कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं, उनको देखने फॉर्ब्स फाइव हंड्रेड वाले तो आते नहीं, कि आते हैं?

रेस-4 और गोलमाल-6 और घपला-8, कमांडो 11:45, ये सब जो पिक्चरें रिलीज़ हो रही हैं और चार-चार सौ करोड़ बटोर रही हैं, ये मध्यम वर्ग ही तो ख़र्च कर रहा है न? ईमानदारी से बताना। या अंबानी-अडानी आते हैं इनको बैठकर देखने सिनेमा हॉल में छः-छः सौ का टिकट लेकर? वे तो आते नहीं। ये जो पिक्चरें इतना पैसा बनाती हैं, ये किसकी जेब से जा रहा है? तुम्हारी जेब से जा रहा है। और मेरे सामने आकर बोलते हो, “आचार्य जी, हमारी तो बड़ी सीमित कमाई है। हमारे पास सही में पैसा नहीं है, बिल्कुल एकदम पैसा नहीं है।”

एक-से-एक लोग हैं। यहॉं संस्था में जो हमने अनुदान तय किया है, उसको माफ़ कराने के लिए एक पैमाना बनाया है, कि भाई, जो लोग वाक़ई सहायता के पात्र हैं, जो लोग वाक़ई आर्थिक दृष्टि से थोड़े निर्बल हैं, उनको सब कुछ नि:शुल्क करो। लेकिन पता कैसे चले कि सही में कोई सहायता का पात्र है। दान देने के लिए भी सुपात्र होना चाहिए न? तो उसके लिए उनसे कहा जाता है कि क्या आप किसी तरीके से प्रमाणित कर सकते हैं कि आप उतने ही दीन-हीन और आर्थिक रूप से निर्बल है जितना आप फ़ोन पर बता रहे हैं। “नहीं, नहीं, गुरुजी, मेरी तो हालत अभी ऐसी है कि बात करते-करते फोन डिस्कनेक्ट हो सकता है, बिल नहीं दिया है। यह भी हो सकता है कि अचानक बात करते-करते बेहोश हो जाऊँ, छः दिन से कुछ खाया नहीं है।” अच्छा, आपकी बात से तो आप बड़े आग्रही लग रहे हैं, कुछ प्रमाण देंगे? तो फिर वे अपना बैंक स्टेटमेंट भेज देते हैं। उसमें लाइन से दो रुपया दस पैसे, बड़े-बड़े अंडे कुछ नहीं। तो ऐसे लोगों को कहा जाता है कि आप आइए, आपका स्वागत है। आप आइए और हमसे ही कुछ ले जाइए। तो फिर वह शिविर में आएगा प्रतिभागी बनकर तो एसयूवी (कार) से उतरेगा। बड़ा ग़ज़ब होता है!

यहॉं खुले सत्र का आयोजन होता है। परसों भी है। देखिएगा, बड़ा मजा आएगा। वह होता ही अपने उन मित्रों के लिए है जो बेचारे या तो बेरोजगार हैं, या छात्र हैं या वाक़ई आर्थिक विषमताओं से जूझ रहे हैं। फिर उनको कहा जाता है कि आओ, खुला सत्र है। और उस दिन बाहर यहॉं से लेकर वहॉं तक गाड़ियों की कतार लगती है। ये बड़ी-बड़ी! उतर रहे हैं उसमें से। और जब वे आते हैं तो हम उनसे कहते हैं कि लो, समोसा खाओ। यह भी तुम मुफ़्त का ही ले जाओ।

हम वाक़ई क्या उतने निर्बल, उतने निर्धन हैं जितना हम स्वयं को जताते हैं और दूसरों को जताते हैं? बताइएगा, हैं क्या? चाहे वह पिक्चर का छः सौ करोड़ का कलेक्शन हो, चाहे घरवाली के गहने-जेवर हों, वे सब कहॉं से आए हैं? बोलिए, कहॉं से आए हैं? तो इसका मतलब हमारे पास आज़ादी होती है कि हम तय कर सके कि हमें पैसा कहॉं लगाना है। बस हम उस आज़ादी का दुरुपयोग करते हैं। हम सब व्यर्थ जगहों पर पैसा फूँकने को तैयार हो जाते हैं, हम शकुनि के पक्षधर हो जाते हैं। बात समझ में आ रही है?

और जितनी शकुनि वाली जगहें होंगी, वहॉं हमें ज़रा भी हिचक नहीं होती पैसा फूँकने में। दो सौ का पॉपकॉर्न खा रहे हैं, तब कहॉं से आ गया पैसा, भाई? बीवी को एनिवर्सरी (वर्षगाँठ) पर कुछ ख़ास ला करके देना है, तब कहॉं से आ गया पैसा? और यह सब बताना, कृष्ण को समर्पित हो रहा है या शकुनि को? बोलो। छग्गालाल-जग्गूमल ज्वैलर्स, उनको जाकर अपनी गाढ़ी कमाई सौंप आए, लाज नहीं आती? क्या कर रहे हो? कर क्या रहे हो? बात बिल्कुल ज़मीनी तौर पर साफ़ हो रही है कि कर्मफल कृष्ण को समर्पित करने का क्या अर्थ है? और किस तरह हम कर्मफल कृष्ण की जगह शकुनि को लेकर देते रहते हैं?

घटिया पिक्चर का जो टिकट खरीदते हो, जानते हो न कि उसी टिकट के पैसे से दुनिया में घटियापन और बढ़ता है। जब तुम एक घटिया पिक्चर को चार सौ करोड़ का बिजनेस दे देते हो तो क्या नतीजा निकलेगा? वैसी ही पिक्चरें और बनेंगी, और जिन्होंने वह घटिया पिक्चर बनाई थी, यह उन्हें प्रोत्साहन मिल रहा है। वे पेट पकड़कर हँस रहे हैं, “देखो, हमने एकदम ही गई-गुजरी पिक्चर बनाई और भर गई हमारी तिजोरी!”

जब तुम पैसा फूँकते हो सिर्फ़ दूसरों को दिखाने की ख़ातिर, तो वह पैसा कृष्ण को समर्पित हो रहा है या शकुनि को? और बहुत मोटी-मोटी राशियाँ इसमें व्यय होती है कि नहीं? सिर्फ़ दूसरों को दिखाने में। ये जो पूरी बैंकट हॉल इंडस्ट्री (विवाह-समारोह उद्योग) है, ये चल ही इसी पर रही है। तुम्हें दूसरों को दिखाना है, और मज़ें मार रहे हैं ये तंबू-आशियाने वाले। एक-से-एक बैंकट हॉल हैं। उसी की तो तमन्ना है! काहे को इनकी तिजोरियाँ भरते हो? और फिर उनकी तिजोरियाँ भरने के लिए ही हर तरह के गंदे काम करने पड़ते हैं।

ये जो इतनी घूस ली जाती है, जिसको ले करके तुम अपना चरित्र, अपना मन, सब गंदा करते हो। घूस इसलिए तो लेते नहीं कि उससे रोटी चलेगी। घूस इसीलिए लेनी पड़ती है न, और दुनियाभर की कमीशनबाजी, और दलाली और नकली काम इसीलिए करने पड़ते हैं न क्योंकि उस पैसे से फिर मौज़ मारी जाएगी। यह जो मौज़ मारने में पैसा ख़र्च होता है, ये कृष्ण को समर्पित है या शकुनि को? जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ तो बहुत थोड़े में निपट जाती हैं, बहुत थोड़े में। उसके ऊपर का जो पैसा होता है, वह तो सब शकुनि को समर्पित होता है।

ख़र्च करो, घर पर ख़ूब ख़र्च करो, पर ध्यान रखो कि किस चीज़ पर ख़र्च कर रहे हो। और अगर सही चीज़ पर ख़र्च कर रहे हो तो आमतौर पर ख़ूब ख़र्च करने की ज़रूरत पड़ेगी नहीं। यह बड़ी विडंबना है कि ज़्यादातर जो सही चीज़ें हैं, वो बहुत महँगी आती नहीं और जो चीज़ जितनी घटिया है, वह उतनी महँगी है। पर यह कोई नियम नहीं। अपनी साफ़ नज़र से, होश की रोशनी में देखना कि जो कमाई घर ला रहा हूँ, वह ठीक-ठीक मुझे कहॉं ख़र्च करनी है।

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