जब तक हमारा राष्ट्रीय चित्त भ्रमित रहेगा, तब तक हम नहीं कह सकते कि हम समग्र रूप से स्वतंत्र हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। सवाल ये है कि जो मीन्स वर्सेस एंड का डिबेट होता है, उसमें जैसे एक उदाहरण लेता हूँ, आज़ादी का। तो जैसे, अगर कोई योजना बनाता है कि मुझे बहुत जल्दी आज़ादी चाहिए और उसके लिए मैं ये-ये काम करूँगा, मैं बैक-ट्रेस करता हूँ कि सबसे जल्दी आज़ादी के लिए मुझे ये कुछ 10 चीज़ें करनी हैं और फिर मैं उस एक्शन को लेता हूँ। वर्सेस, एक दूसरा तरीक़ा है कि मैं अभी के हालात देखता हूँ और मुझे जो सबसे बेहतर कदम लगता है, मैं उसको लेता हूँ। तो क्या इन दोनों में कोई अंतर है?
आचार्य प्रशांत: कैसी आज़ादी की बात कर रहे हो?
प्रश्नकर्ता: 1947।
आचार्य प्रशांत: 1947, तो अंग्रेज़ों को क्यों हटाना है? बेचारे इंसान हैं, पड़े हुए हैं, उन्हें क्यों हटाना है? नहीं, बिल्कुल मूढ़ों वाले सवाल कर रहा हूँ। मुझे समझाओ थोड़ा। अंग्रेज़ों को हटाना है, क्यों हटाना है? कोई भी बात ऐसे मत शुरू करो कि "पर ऐसा तो होता ही है न," हर चीज़ पर थोड़ा सवाल उठाओ। तो अंग्रेज़ हैं, यहाँ इतने लोग रहते हैं, कुछ अंग्रेज़ भी रह रहे हैं, तो उनको हटाना क्यों है? हम समझना चाहते हैं, इसी से हमें आज़ादी का अर्थ स्पष्ट होगा। हम समझना चाहते हैं कि हमें अंग्रेज़ों को क्यों हटाना है? बताओ।




