अंग्रेज़ तो चले गए, पर आज़ादी कहाँ है?

Acharya Prashant

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अंग्रेज़ तो चले गए, पर आज़ादी कहाँ है?
जब तक हमारा राष्ट्रीय चित्त भ्रमित रहेगा, तब तक हम नहीं कह सकते कि हम समग्र रूप से स्वतंत्र हैं। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। सवाल ये है कि जो मीन्स वर्सेस एंड का डिबेट होता है, उसमें जैसे एक उदाहरण लेता हूँ, आज़ादी का। तो जैसे, अगर कोई योजना बनाता है कि मुझे बहुत जल्दी आज़ादी चाहिए और उसके लिए मैं ये-ये काम करूँगा, मैं बैक-ट्रेस करता हूँ कि सबसे जल्दी आज़ादी के लिए मुझे ये कुछ 10 चीज़ें करनी हैं और फिर मैं उस एक्शन को लेता हूँ। वर्सेस, एक दूसरा तरीक़ा है कि मैं अभी के हालात देखता हूँ और मुझे जो सबसे बेहतर कदम लगता है, मैं उसको लेता हूँ। तो क्या इन दोनों में कोई अंतर है?

आचार्य प्रशांत: कैसी आज़ादी की बात कर रहे हो?

प्रश्नकर्ता: 1947।

आचार्य प्रशांत: 1947, तो अंग्रेज़ों को क्यों हटाना है? बेचारे इंसान हैं, पड़े हुए हैं, उन्हें क्यों हटाना है? नहीं, बिल्कुल मूढ़ों वाले सवाल कर रहा हूँ। मुझे समझाओ थोड़ा। अंग्रेज़ों को हटाना है, क्यों हटाना है? कोई भी बात ऐसे मत शुरू करो कि "पर ऐसा तो होता ही है न," हर चीज़ पर थोड़ा सवाल उठाओ। तो अंग्रेज़ हैं, यहाँ इतने लोग रहते हैं, कुछ अंग्रेज़ भी रह रहे हैं, तो उनको हटाना क्यों है? हम समझना चाहते हैं, इसी से हमें आज़ादी का अर्थ स्पष्ट होगा। हम समझना चाहते हैं कि हमें अंग्रेज़ों को क्यों हटाना है? बताओ।

प्रश्नकर्ता: एक दमनकारी है, एक शोषणकारी है।

आचार्य प्रशांत: किसका दमन हो रहा है? ये कह रहे हैं कि अंग्रेज़ों को इसलिए हटाना है क्योंकि अंग्रेज़ दमन करते हैं। किसका दमन कर रहे हैं? वेदांत पूछेगा, किसका दमन हो रहा है? जो आम जनता है। आम जनता का क्यों हो रहा है दमन? मुट्ठी-भर अंग्रेज़ हैं, आम जनता पर छाए हुए हैं। कैसे दमन किया जा रहा है?

प्रश्नकर्ता: कलेक्टिव माइंड में अज्ञान फैला हुआ है।

आचार्य प्रशांत: ठीक है न। क्योंकि ये जो लोग हैं, ये सबसे पहले तो आपस में एक-दूसरे का भयानक दमन कर रहे हैं, ये अपना भी दमन कर रहे हैं। जब आप आज़ाद हुए हो न तब भी आप 40-50 करोड़ के देश थे, यूँ ही तो इतने करोड़ लोग ग़ुलाम नहीं बन गए न, कोई वजह है। और वो वजह अंग्रेज़ लेकर के नहीं आए हैं, वो वजह अंग्रेज़ों के आने से बहुत पहले से मौजूद है। और दमन का मतलब होता है, मुझे उस आदमी को बचाना है जिसका दमन हो रहा हो। करुणा तो यही है न? करुणा तो यही है। नहीं तो अंग्रेज़ तो आज भी मौजूद हैं। इतने सारे एम्बेसीज़ हैं, वहाँ सब बैठे हुए हैं, उनको भी जाओ, "अंग्रेज़ों भारत छोड़ो।” जाकर वहाँ खड़े हो जाओ, जितनी भी यूरोपियन एम्बेसीज़ हैं, वहाँ "क्विट इंडिया" लेकर खड़े हो जाओ।

क्यों नहीं करते हो?

क्योंकि आज वो तुम्हारा दमन नहीं कर रहे हैं, वरना हमें अंग्रेज़ों की खाल से थोड़ी कोई समस्या थी। हमें इस बात से समस्या थी कि जो आदमी हमें दिखाई दे रहा है, इस आदमी को इसकी संभावना पाने से रोका जा रहा है; न उसे पढ़ने दिया जा रहा है, न लिखने दिया जा रहा है; उसका पैसा लेकर के इंग्लैंड भेज दिया जा रहा है, ये समस्या थी न सारी हमारी, ये थी न? तो मेरी ये समस्या है, तो मैं इसी को केंद्र में रखकर अपना आज़ादी अभियान चलाऊँगा। मैं फिर ये नहीं कहूँगा कि एक गोरा आदमी मैंने भगा दिया तो मैं आज़ाद हो गया।

आप तो आज गोरों को आमंत्रित करते हो, बहुत खुश हो जाते हो। आप कहते हो, "प्लीज़-प्लीज़ एफ.डी.आई. (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) लेकर आओ, एफ.डी.आई. लेकर आओ।" गोरों का निवेश चाहिए न, और जब निवेश आता है तो अक्सर गोरे भी आते हैं। तब तो बहुत अच्छा लगता है, "देखो, गोरे आ गए, गोरे आ गए।"

तो गोरों की खाल से तो हमें समस्या नहीं थी न। हमारे साथ कुछ ग़लत हो रहा था, हमें इससे समस्या थी। तो मेरा पूरा जो स्वतंत्रता-संग्राम है, वो इस बात पर आधारित होगा कि भारतीयों के साथ कुछ ग़लत नहीं होना चाहिए। वो जो ग़लत हो रहा है, उसको रोकने के लिए यदि अंग्रेज़ों से सत्ता लेना आवश्यक है, तो मैं वो भी करूँगा, और उसके लिए अगर ये भी ज़रूरी है और ज़्यादा ज़रूरी है, कि भारतीयों की चेतना जागृत की जाए, तो मैं उसको और ज़्यादा महत्त्व दूँगा। नहीं तो, गोरे मालिक के हाथ से उठाकर भूरे मालिक के हाथ में तुमने सत्ता दे दी, तो भी जो भूरे ग़ुलाम हैं वो तो ग़ुलाम के ग़ुलाम ही रह गए न, या कुछ बदल गया उनका?

1947 में सबसे अमीर भारतीयों और सबसे ग़रीब भारतीयों में जो अनुपात था, आज वो उससे ज़्यादा ख़राब है। बताओ, दमन रुका है या बढ़ा है?

प्रश्नकर्ता: बढ़ा है।

आचार्य प्रशांत: हम जो दमित भारतीय है उसी की बात कर रहे हैं न, वो आज और ज़्यादा दमित है। अब क्या करें? हमें एक बहुत बड़ी समस्या थी कि अंग्रेज़ जो हैं, पैसा लूटकर ले जाते हैं और जो आम भारतीय ग़रीब रह जाता है। तो आज तो आम भारतीय 1947 से ज़्यादा ग़रीब हो गया अमीर भारतीयों की तुलना में। अब क्या करें? वास्तविक आज़ादी में दोनों बातों का ख़्याल रखा जाता है। ठीक है, जो ऊपर राजनैतिक आका बैठा है वो विदेशी न हो, एक बात वो हो गई और दूसरी बात ये भी हो गई कि आज़ादी का अर्थ आख़िरी आदमी के लिए क्या है, उसको क्या मिला है?

प्रश्नकर्ता: तो योजना की उपयोगिता क्या है?

आचार्य प्रशांत: योजना तो बनाओगे, पर योजना किसी उद्देश्य के लिए बनाई जाती है न। योजना का उद्देश्य बस ये नहीं हो सकता कि दिल्ली में जाकर के हमारा बंदा बैठ जाए, योजना का उद्देश्य ये होगा कि ये सब जो आम भारतीय हैं, इनका क्या होने वाला है।

जब बात होने लग गई कि अब अंग्रेज़ चले जाएँगे और भारतीयों के हाथ में सत्ता दे दी जाएगी, तो न जाने कितने विद्वानों ने कहा कि रुको, पहले समझने दो कि वो सत्ता किस तरह से दी जाएगी, किसके हाथ में दी जाएगी, उस सत्ता का होगा क्या? और ये सब लोग जो ये सवाल उठा रहे थे, ये कोई राष्ट्रद्रोही लोग नहीं थे ये बड़े से बड़े राष्ट्रप्रेमी थे, पर ये सवाल पूछ रहे थे। कह रहे थे, इतना ही काफ़ी नहीं कि अंग्रेज़ भाग गए, उसके बाद यहाँ होने क्या वाला है वो तो बता दो। क्योंकि अंग्रेज़ों के आने से पहले और ज़बरदस्त भयानक दमन की प्रक्रिया चलती थी भारत में, तभी तो युद्धों में भारत को इतनी हार मिली। कि अंग्रेज़ तो चले जाएँगे पर कहीं ऐसा तो नहीं कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद जो पुरानी शोषणकारी व्यवस्था थी वो वापस आ जाएगी, कहीं ऐसा तो नहीं?

अगर तुम ग़ौर से देखोगे, तो सच्चाई ये है कि जब अंग्रेज़ आए तब भारत में स्त्रियों की जो हालत थी, वो उससे बदतर थी कि जब अंग्रेज़ भारत छोड़ के गए। सती को अंग्रेज़ों ने रोका है, महिलाओं को पढ़ने का अधिकार अंग्रेज़ों ने दिया है, बाल-विवाह और बहु-विवाह पर कुछ हद तक अंकुश अंग्रेज़ों ने लगाया है। तो बताओ, महिलाओं के लिए आज़ादी का क्या अर्थ है?

हाँ, बिल्कुल, अंग्रेज़ों को भारत पर राज नहीं करना चाहिए, भारतीय सक्षम हैं अपने ऊपर राज करने में। बिल्कुल, बहुत अजीब बात है ये कि वहाँ से चंद द्वीपों से कुछ गोरे लोग आकर के इतने सारे 50 करोड़ भारतीयों पर राज कर रहे हैं, ये बिल्कुल नहीं होना चाहिए। लेकिन इसके विकल्प में हमें कौन-सी व्यवस्था चाहिए? हमें इस पर भी तो विचार करना पड़ेगा न, या सिर्फ़ उनको भगा देने से हो जाएगा। उनको भगा दो और फिर वही पुरानी स्थितियाँ आ गईं तो क्या करोगे? बोलो। तो वो सब भी सोचना पड़ता है।

यही बात दलितों की हालत के बारे में कही जा सकती है, इतने अधिकार थे जो उन्हें अंग्रेज़ों के ही समय में मिले हैं। हम नहीं कह रहे हैं, कि अंग्रेज़ी शासन भारत के लिए अच्छा था। हम कह रहे हैं, कि हमें आज़ादी को उसके अर्थ की समग्रता में जानना पड़ेगा।

आज़ादी बस ऐसे ही नरा नहीं होती है कि आपने नरा लगा दिया और झंडा फहरा दिया तो आज़ाद हो गए, आज़ादी बड़ी गहरी चीज़ होती है।

हमें बिल्कुल एक बाल-कथा जैसी बता दी गई। आम आदमी से पूछो, कि क्या होता था 1947 से पहले? तो कहेंगे, भारत बड़ा ज़बरदस्त देश था, सोने की चिड़िया था, अंग्रेज़ आए और हमारे यहाँ तो बिल्कुल राम-राज्य था, और अंग्रेज़ आए उन्होंने क़ब्ज़ा कर लिया और हमें बर्बाद कर दिया। और वो तो यहाँ आए ही थे ताकि वो हम पर अत्याचार कर सकें, और हमारी गौरवशाली सभ्यता से उन्होंने सारा ज्ञान-विज्ञान और कलाएँ लूट लीं, और फिर हमने विद्रोह करके आंदोलन चला कर के अंग्रेज़ों को भगा दिया। कुल मिलाकर ये कहानी हमें बताई गई है। ये बाल-कथा है सच्चाई दूसरी है, वो सच्चाई समझो, नहीं तो बहुत मेहनत से जो आज़ादी मिली थी उसको संभालना मुश्किल हो जाएगा।

सिर्फ़ अंग्रेज़ नहीं आए थे, कोई वजह थी। डच, पुर्तगाली, फ़्रेंच सब आए थे, कोई वजह थी। और किसी को बहुत मेहनत नहीं लगी यहाँ पर आकर के अड्डा बनाने में, उसकी भी कोई वजह थी। अंग्रेज़ नहीं होते तो कोई दूसरा यूरोपीयन पावर होता, उसने यहाँ पर कॉलोनी स्थापित कर ली होती, किसी-न-किसी ने करी होती। क्योंकि “निबल-बिछड़ा हुआ छप्पन रोग," तुम इतने दुर्बल थे कि कोई-ना-कोई तो तुम पर छाता ही। हमें खोज करनी पड़ेगी कि हमारी आंतरिक दुर्बलता के कारण क्या थे? सबसे पहले जानते हो अंग्रेज़ तो आए भी नहीं थे। सबसे पहले कौन आया था?

श्रोता: मुग़ल।

आचार्य प्रशांत: अरे यार, पुर्तगाली आए थे। क्यों आ गए थे? कैसे आ गए थे? कैसे छा गए थे? क्या बात थी? असली बात क्या है? ये बताओ। वो पता करने की जगह हमने आज़ादी का मतलब नरेबाज़ी लगा लिया है। बहुत सारे ऐसे राजे-रजवाड़े, जिनको हम बहुत इज़्ज़त की नज़र से देखते हैं, उन्होंने तक ने स्वागत किया था फ़्रांसीसियों का और पुर्तगालियों का। वो ऐसी चोरी-छुपे नहीं आ गए थे, उनको बड़े आदर और बड़े प्रेम से बुलाया गया था, "आओ, आओ, हमारा साथ दो, दूसरे राजा को हराते हैं मिलके।"

लॉजिस्टिक्स सप्लाई-चेन कुछ समझते हो? वहाँ यूरोप से यहाँ सप्लाई-चेन कैसे चलती रही होगी, सोचो तो सही, चल सकती है क्या? कितना चलेगी? निश्चित रूप से उनको जो आपूर्ति हो रही थी, वो भारत से ही हो रही थी। तुम्हें क्या लग रहा है, कितने अंग्रेज़ थे जब अंग्रेज़ों और मराठों की लड़ाई हुई, टीपू सुल्तान की लड़ाई हुई, सिखों से लड़ाई हुई, आपको क्या लग रहा है, उन युद्धों में अंग्रेज़ों की सेनाओं में अंग्रेज़ कितने होते थे? ये सब जाकर थोड़ा पढ़िए, तो आपको पता चलेगा कि ग़ुलामी कहाँ से आई।

आज़ाद तो हम थे ही, आई ग़ुलामी, और ग़ुलामी कहाँ से आई हम ये समझना नहीं चाहते, स्वीकार नहीं करना चाहते, क्योंकि उससे हमारे अहंकार को ठेस पहुँचती है। और ये भी नहीं कि जिन्होंने अंग्रेज़ों का साथ दिया वो सब के सब बड़े नलायक और दुष्ट लोग थे, वो सताए हुए लोग थे उनमें से बहुत सारे। वो शोषित लोग थे बहुत सारे जिन्होंने अंग्रेज़ों का साथ दिया, अंग्रेज़ों का, दूसरी ताक़तों का। उन कारणों को बरक़रार मत रखो, स्वतंत्रता बहुत ऊँची चीज़ है, उसका सम्मान करो, उसको समझो, तभी उसकी रक्षा हो पाएगी।

बहुत सारे राजे थे और बहुत बड़ा एक जनसंख्या का वर्ग था, पूरे भारत में फैला हुआ। इसने कहा कि जो अभी चल रहा है, इससे तो बेहतर है कि इस राजा को हटा कर के अंग्रेज़ ही आ जाए। आ रही है बात समझ में?

आज़ादी का मतलब है, आख़िरी आदमी भी आज़ाद रहे। एक वास्तव में स्वाधीन, स्वतंत्र राष्ट्र वो होता है जहाँ पर हर व्यक्ति स्वतंत्र हो, नहीं तो समाज को, समुदाय को, जो शोषित आदमी होता है उसकी हाय लगती है।

द्वितीय विश्व युद्ध हुआ था, हिटलर की सेनाएँ यूरोप में कम से कम चार दिशाओं में आगे बढ़ रही थीं — पश्चिम की ओर फ़्रांस, पूर्व की ओर पोलैंड, नीचे की ओर जाकर के इटली में भी वो लड़ रही थीं। मुसोलिनी को हटा दिया गया था 1943 में, और उत्तर-पूर्व की ओर जाकर उन्होंने 1941 में रूस पर दावा खोल दिया था। और उत्तर-पश्चिम की ओर ब्रिटेन पर तो चल ही रहा था, इतनी दिशाओं में लड़ रही थीं और हर दिशा से नतीजे अलग-अलग मिल रहे थे।

जानते हो, ये जो अलग-अलग नतीजे थे, इनमें एक बड़ा महत्त्वपूर्ण तत्व क्या था? जहाँ जर्मन सेनाएँ जा रही थीं, वहाँ के लोग अपनी सरकार से कितने खुश थे। रूस में जब जर्मन सेनाएँ घुसने लगीं, 1941 में “ऑपरेशन बारबारोसा” हिटलर ने रूस पर अटैक किया, तो हिटलर को आरंभ में बहुत जल्दी सफलता मिली। बताओ क्यों? क्योंकि वहाँ की जो आबादियाँ थीं, वेस्टर्न यूएसएसआर (यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स) की उस समय की, स्टालिन भी तो तानाशाह ही था न। वो स्टालिन से इतनी उख्ताई हुई थीं कि उन्होंने जर्मन सेनाओं का समर्थन कर दिया।

हाँ, हिटलर ने गलती ये की कि जो लोग समर्थन कर रहे थे, उसने उन्हीं का शोषण करना शुरू कर दिया, तो समर्थन बहुत दिन चला नहीं। और दूसरी ओर अब स्विट्ज़रलैंड है, वो बिल्कुल नीचे लगा हुआ है। हिटलर ने कभी नहीं अटैक किया स्विट्ज़रलैंड पर। बताओ क्यों? छोटा सा देश है इतना सा, पर पहाड़ी देश है और उसने पूरी तैयारी कर रखी थी। वहाँ की जनता ऐसी थी कि "ये यहाँ आएँगे तो क़ब्ज़ा तो कर लेंगे, पर हम इनको कभी भी यहाँ पर जमने नहीं देंगे।" “गुरिल्ला वॉरफ़ेयर” की पूरी तैयारी थी, वो भी जनता के द्वारा। हिटलर घुसा ही नहीं स्विट्ज़रलैंड में उसे पता था कि यहाँ पर जनता, सेना नहीं, भूलो नहीं युद्ध मात्र सेना से नहीं जीते जाते; क़ब्ज़ा तो अंततः तुम्हें शहरों और गाँव पर करना है न। अगर जनता ही सैनिक बन जाएगी, तो तुम शहरों और गाँव पर कैसे क़ब्ज़ा कर लोगे? भारत के 40 करोड़ लोग सैनिक क्यों नहीं बने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़? ये सवाल आपको पूछना पड़ेगा।

फ़्रांस पर हम सोचते हैं कि जर्मनी ने एक झटके में क़ब्ज़ा कर लिया, एक झटके में सेना हरा दी थी। उसके बाद लगातार फ़्रांसीसी जनता “गुरिल्ला वॉरफ़ेयर” करती रही जर्मनों के ख़िलाफ़, लगातार जब तक कि 1944 में नॉरमैंडी में जो एलाइड फोर्सेज थीं, उन्होंने लैंड कर के फ़्रांस को लिबेरेट नहीं करा दिया। अब वो भी लिबेरेट इसलिए करा पाए क्योंकि फ़्रांसीसी जनता लगातार अनसेटल करके रखे हुए थी जर्मन्स को। यहाँ तक कि जो फ्रेंच ट्रूप्स का मूवमेंट होता था, जो फ़्रांसीसी गुरिल्ला थे, उस मूवमेंट की ख़बर, क्योंकि वो तो देख रहे हैं, वो वहाँ पर सब एलाइड फोर्सेज को पहुँचा देते थे, तो बॉम्बिंग हो जाती थी ऊपर से कि “यहाँ पर हैं बॉम्बिंग कर दो।”

कोई देश अगर हारता है तो सिर्फ़ उसकी सेना नहीं हारी है, देश तब हारता है जब जनता ने ग़ुलामी चुनी होती है। आप बताओ न भारत की जनता ने ग़ुलामी क्यों चुनी? और कहीं ऐसा तो नहीं कि वो तत्व आज भी मौजूद हो?

प्यू एजेंसी है प्यू रिसर्च, उसने शोध किया तो उसने कहा कि भारत दुनिया में वो देश है जहाँ के 80% लोग आज भी तैयार हैं कि कोई हम पर आकर तानाशाह क़ाबिज़ हो जाए। वो ग़ुलामी स्वीकार करने वाला मन हमने आज भी बदला कहाँ है। हम आज भी आत्मसम्मान से भरे हुए लोग नहीं हैं कि “मैं अपने विवेक, अपनी आत्मा और अपने सत्य के अलावा किसी के आगे नहीं झुकूँगा।” हम तो बहुत आसानी से। देखते नहीं हो कितने लोग हैं जो कहते हैं कि “देखो साहब, असली मज़ा तब आता है जब कोई डिक्टेटर होता है।” हमें नॉर्थ कोरिया बनना है, हमें चीन बनना है, रूस के बहुत लोग दीवाने हैं क्योंकि पुतिन डे फैक्टो डिक्टेटर है।

जब जनता में इतना आत्मसम्मान होता है न कि “हम ग़ुलाम नहीं बनेंगे,” तब कोई विदेशी ताक़त आकर आपके ऊपर राज नहीं कर सकती। क्या हमारी जनता में आत्मसम्मान है वो आज भी? और वो आत्मसम्मान तो आत्मा से ही जागृत होता है, उसी आत्मसम्मान को जगाने का काम आपकी संस्था कर रही है। एक तरह से आपकी संस्था आज़ादी का गहरे से गहरा अभियान चला रही है। आप अगर जागृत हो जाओगे, सच्चाई के लिए आप में प्यार आ जाएगा, तो सच्चाई और आज़ादी — एक ही बात होते हैं।

जिस आदमी में सत्य के प्रति प्रेम आ गया, उसे दुनिया की फिर कोई ताक़त ग़ुलाम बनाकर ज़िंदा तो नहीं रख सकती। हाँ, उसे ग़ुलाम बनाकर मार सकती है, पर वो ये कहेगा कि “जिऊँगा तो नहीं ग़ुलामी में, मारना है तो मार दो।” आ रही बात समझ में?

आप पढ़िएगा जो “सीज ऑफ लेनिनग्राद” था और “सीज ऑफ मॉस्को,” ये दोनों पढ़िएगा। और उसमें जो आम जनता थी उसने जर्मनों को रोका, क्योंकि सेना तो जर्मनों ने उड़ा दी थी पूरी रूसियों की। और मालूम है कैसे रोका था? वो बोलते थे, “हग द एनिमी।” क्योंकि जर्मनों की जो वायुसेना थी, लुफ़्टवाफ़े, वो बहुत मज़बूत थी और क्वालिटी में भी सबसे बढ़िया थी, उनकी आर्टिलरी बहुत अच्छी थी। तो जहाँ कहीं भी दुश्मन होता था, वहाँ पर जाकर बहुत सक्षमता से वो बम गिराते थे।

आम जनता ने कहा, “हम दुश्मन सैनिकों के इतने पास आ जाएँगे कि तुम बम गिराओगे, तो तुम्हारा अपना सैनिक मारा जाएगा — “हग द एनिमी,” जाकर एनिमी से गले ही मिल लो। तो बोलते थे, “हम दूर से नहीं लड़ेंगे कि बंदूक से लड़ेंगे, हम सीधे तुम्हारे भीतर घुसे चले आएँगे। कैसे क़ब्ज़ा कर लोगे मेरे शहर पर?” ऐसे बचाया उन्होंने अपना लेनिनग्राद और मॉस्को, आम आदमी ने बचाया।

जब आम आदमी के दिल में ललक होती है न कि “ग़ुलाम नहीं होना,” तो कोई ताक़त कैसे आकर तुम्हें ग़ुलाम बना लेगी? आबादी कहेगी, “हम 40 करोड़ लोग हैं हम सबको मार दो पर हम ग़ुलाम बनकर जिएँगे नहीं। मार दो हम सबको, मार दो। तुम्हें क़ब्ज़ा करना है न भारत पर, पूरे भारत के एक-एक आदमी को मार दो, कर लो अंग्रेज़ों क़ब्ज़ा, हम जिएँगे तो नहीं।”

आपको क्या लगता है, सेकंड वर्ल्ड वार में सबसे ज़्यादा कौन लोग मरे थे? रूसी। रूसी कौन? रूसी सिविलियन्स। हिटलर को अमेरिका, ब्रिटेन, इन्होंने बाद में हराया है, हिटलर को सबसे पहले रूसी सिविलियन्स ने हटाया है। बर्लिन में भी एलाइड फोर्सेज पश्चिम की दिशा से नहीं घुसी थीं, पूर्व से घुसी थीं। जर्मन सेना को खदेड़ते-खदेड़ते रूसी सीधे बर्लिन में घुस आए, 1945 में। सबसे ज़्यादा रूसी सिविलियन्स मरे हैं। नंबर एक पर आते हैं रूसी सिविलियन्स, नंबर दो पर आते हैं रूसी सैनिक। नगरिकों ने कहा, “हमें ग़ुलामी चाहिए ही नहीं, हमें नहीं चाहिए।”

क्या भारतीय सिविलियन ये तैयार था कहने को कि “हमें ग़ुलामी नहीं चाहिए?” भगत सिंह का केस कौन लड़ रहा है? भारतीय, भगत सिंह के ख़िलाफ़ मतलब। भगत सिंह को फाँसी कौन दे रहा है? भारतीय, हमारे सिविलियन्स थे। भगत सिंह के पार्थिव शरीर के टुकड़े-टुकड़े कौन कर रहा है? भारतीय, ये हमारे सिविलियन्स थे। भारत में तो 95% लोग स्वतंत्रता संग्राम के समर्थन में कोई थे ही नहीं, वो या तो विरोध में थे या निष्पक्ष थे। “कौन रिप होए हमें का हानि?”

जिस दिन आम आदमी आत्मसम्मान से भरकर अपनी आज़ादी की रक्षा में खड़ा हो जाता है, उस देश को कोई ग़ुलाम नहीं बना सकता।

जर्मन मारते जा रहे हैं, मारते जा रहे हैं रूसी सैनिकों को और एक के बाद एक नई डिवीज़न खड़ी होती जा रही है रूसी सैनिकों की। बताओ, वो रूसी सैनिक कहाँ से आ रहे थे? वो सिविलियन्स थे, जो बिना ट्रेनिंग के या बहुत कम ट्रेनिंग के खड़े हो जाते थे। बोलते थे, “मैं सैनिक बनूँगा।” कितनों को मारेंगे जर्मन? जर्मन मार-मार के थक गए। जितने उन्होंने रूसी मारे उतना तो कोई नहीं मरा पूरे विश्व युद्ध में, दोनों विश्व युद्ध मिला के उतना कोई नहीं मरा। रूसी मरते जाते थे, उनकी जनता नए सैनिक खड़े करती जाती थी। बोलते, “हम आ रहे, अब हम आ रहे।” हर आदमी सैनिक है। बताओ, कैसे हरा लोगे?

उनकी टेक्नोलॉजी बेकार, उनकी ट्रेनिंग बेकार, जर्मनों के टैंक बेहतर हैं, जर्मनों के प्लेन्स बेहतर हैं, सब कुछ जर्मनों का बेहतर है — जीता रूस, क्योंकि वहाँ का आम आदमी ग़ुलाम बनने को तैयार नहीं था। जो जर्मन टैंक होते थे, उनका किल रेशियो होता था 10:1 या 5:1। इतने बेहतर उनके पास टैंक थे कि एक जर्मन टैंक जब 10 रूसी टैंकों को मारता था, तब वो नष्ट होता था।

तो रूसियों ने क्या किया?

उन्होंने कहा, “हमारे टैंक गड़बड़ हैं न? सब लोग लग जाओ।” पूरी इकॉनोमी उन्होंने रोक दी। बोले, “एक भी सिविलियन गुड मैन्युफैक्चर नहीं होगा, दिस विल बी अ टोटली वार इंडस्ट्री।” पूरी मैन्युफैक्चरिंग उन्होंने डिफेंस प्रोडक्शन में लगा दी। बोले, “घटिया ही टैंक हैं, पर हम 100 गुना ज़्यादा बनाएँगे। हम सिविलियन यूज़ की एक भी चीज़ नहीं बनाएँगे, जनता कष्ट सह लेगी लेकिन हम कपड़े, टिशू पेपर, ये-वो कुछ नहीं बनाएँगे, हम टैंक ही टैंक बनाएँगे।” तो जर्मन इतने टैंक मारते थे रूसियों के, उससे 10 गुना और आ जाते थे। बताओ, कैसे बना लोगे ग़ुलाम?

तो जब दोष अंग्रेज़ों पर देते हो न कि अंग्रेज़ों ने आकर हिंदुस्तानियों को ग़ुलाम बना लिया, पूछना पड़ेगा, हम 40 करोड़ लोग थे, हम बर्दाश्त कैसे करते रह गए? बात क्या थी? और कहीं वो बात आज भी मौजूद तो नहीं है?

एक कहानी है, नम नहीं याद आ रहा उनका, “रिमेम्बर द रोज़ेज़,” बहुत बेहतरीन कहानी है। तो जब नॉरमैंडी पर एलाइड लैंडिंग होने वाली थी फ़्रांस को लिबरेट कराने के लिए, तो उस समय की कहानी है, जो कि फिक्शन है पर एक सच्ची घटना पर आधारित है। ठीक है? उसमें जो समझने वाली बात है, उसको ही लीजिएगा। घटना कुछ हद तक सच्ची है, फिर उसको और ज़्यादा एक कहानी के रूप में विस्तार देकर उसमें कल्पना वग़ैरह भी जोड़ दी गई। तो एलाइड फोर्सेज लैंड करने वाली हैं फ़्रांस के तट पर, ताकि फ़्रांस को लिबरेट करा सके। सबसे पहले पोलैंड के बाद फ़्रांस पर ही क़ब्ज़ा किया था हिटलर ने, तो बड़ा वेस्टर्न पावर वही था जो अभी भी आधीन था।

तो कहानी ये है कि एक ब्रिटिश सोल्जर भेजा गया है जासूसी के लिए, एक जासूस है, कि वो पूरा सब देख ले क्योंकि अब ब्रिटिश ट्रूप्स लैंड करेंगे और छोटी-मोटी लैंडिंग नहीं थी, ऐसी लैंडिंग थी जिसमें 10,000 फ़ाइटर प्लेन्स लगे थे, जिसमें 20 लाख एलाइड सैनिक लगे थे। तो वो आकर के वहाँ पर सब देख रहा है। वो रात में आया है और उसे रात में ही अपना मिशन पूरा करके, जो भी उसे वहाँ पर रेकी करनी है, वो करके सुबह तक वापस लौट जाना है।

तो वो आता है और उसे कुछ पता तो है नहीं, वो तो और बहुत मुश्किल काम है, जिसके लिए उसको भेजा गया है। तो उसको वहाँ एक लड़की मिलती है, बहुत कम उम्र की टीनएजर लड़की, 17-18 साल की। और इसे कुछ पता नहीं चल रहा है, जर्मन सैनिक इस पर गोलियाँ चला रहे हैं अंधेरे में। तो वो इसको पूरी रात गाइड करती है, “अब ऐसे करो, अब ऐसे करो।” कहीं गिर रहा होता है, तो खींचती है, बचाती है, सब कुछ करती है। एक मौके पर जब इसके ऊपर गोलियाँ चल रही होती हैं, तो इसको हटा के वो सामने आ जाती है। और इसको ताज्जुब होता है, बोलता है, “तुम्हें गोलियाँ लगी नहीं?”

तो उसका बड़ा छोटा-सा, लेकिन गहरा जवाब है, बोलती है, “आइ हैव बीन थ्रू फ़ायर बिफ़ोर। आइ नो दिस।”

सुबह जब वो जाने लगता है, बिल्कुल सुबह हो गई है उसे जितनी इंफ़ॉर्मेशन चाहिए थी उसने ले ली। अब वो जाने लगता है तो बोलता है, “अगर एलाइड इन्वेज़न सफल हो जाता है, तो मैं तुम्हें कहाँ मिल सकता हूँ?” तो एक जगह बताती है, “वहाँ आ जाना।” बोलता है, “मैं तुम्हारे लिए क्या ला सकता हूँ?” बोलती है, “कुछ नहीं चाहिए पर मुझे लाल गुलाब बहुत पसंद है, ले आना।”

फिर दूसरा दृश्य आता है कहानी का, एलाइड फोर्सेज ने हमला करा है, फ़्रांस आज़ाद हो गया है, हिटलर को हराया जा चुका है और एक बहुत बड़ा उत्सव मन रहा है उस जगह पर। जगह कौन-सी है मुझे ठीक से याद नहीं। तो इस व्यक्ति को याद आता है, एवरी टेलर, इनकी कहानी है ये। तो ये वहाँ पहुँचता है, और इस बार अपना सूट-बूट पहन के आया है, अपनी ओर से तो एक जवान ख़ूबसूरत लड़की से मिलने जा रहा है न, अब ये सोल्जर नहीं है। और उसके लिए लाल गुलाब का पूरा गुलदस्ता ही लेके आया है।

तो उसने जो जगह बताई होती है कि “मैं तुम्हें वहाँ मिलूँगी” ये वहाँ पर जाता है, तो देखता है कि वहाँ जोन ऑफ़ आर्क की एक प्रतिमा लगी हुई है। और वहाँ पर लोग शताब्दियों से लाल गुलाब चढ़ाते हैं, तो लेखक ने कहानी को लगभग सेंसेशनलाइज़ कर दिया लगभग ये बता करके कि वही जोन ऑफ़ आर्क थी, जो उस रात गाइड कर रही थी। क्योंकि जोन ऑफ़ आर्क ने अपने समय में भी, 17 साल की लड़की है लेकिन फ़्रेंच सेनाओं का नेतृत्व किया था कि “फ़्रांस को मैं ग़ुलाम नहीं बनने दूँगी।”

और उसी जोन ऑफ़ आर्क ने दोबारा फ़्रांस को आज़ाद कराने के लिए…फिर मतलब ठीक है, वो लेखक का अपना हिसाब है। पर मतलब समझिए कि 17 साल की लड़कियाँ चाहिए और जोन ऑफ़ आर्क को अंग्रेज़ों ने ज़िंदा जला दिया था। क्या किया था? ज़िंदा जला दिया था। वो इसीलिए बोलती है, “आइ हैव बीन थ्रू फ़ायर बिफ़ोर।”

तो जिस देश में 17 साल के लड़के-लड़कियाँ आग से गुज़रने को तैयार हो जाएँगे, उस देश को कौन ग़ुलाम रख सकता है? कोई रख सकता है? पर जहाँ 17 साल के लड़के-लड़कियाँ आज़ादी का, मुक्ति का मतलब ही न समझते हों, इंस्टाग्राम में मुँह डाले बैठे हों, जिनका कुल योगदान राष्ट्रीय जीवन में इतना हो कि “काचा बादाम” पर मटकाते हैं, तो क्या होगा वहाँ?

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, तो अगर हमें जैसे आपने बात करी जिनकी, जिनको ज़िंदा जला दिया गया था, तो वैसा अगर करेज चाहिए तो क्या हमें पहले अपनी इन्द्रियों को जीतना होगा? और उसको जीतने का अब सबका अलग-अलग तरीक़ा होता है?

आचार्य प्रशांत: जो आदमी ख़ुद से हारा हुआ है, उसे बाहर से हराने में कोई दिक़्क़त नहीं होगी, समझो तुम। आपको जलेबी बहुत पसंद है, आप ख़ुद से हारे हुए हो। ठीक है न? बता दिया गया है कि डायबिटीज़ है, ये है, वो है, जलेबी खाओगे, ये होगा। उसके बाद भी ख़ुद से ही हारा हुआ आदमी है, जलेबी पर टूटा पड़ा है। मुझे तुम्हें ग़ुलाम बनाना है, मैं एक जलेबी का बस एक बक्सा लेके आ जाऊँगा, तुम बन गए ग़ुलाम। जो ख़ुद से हारा हुआ है, उसे तो बाहर वाला कोई भी ग़ुलाम बना लेगा न। मुझे तो बस ये पता करना है कि तुम्हारी अहमगत कमजोरी क्या है। किसी की अहमगत कमजोरी हो सकती है, पैसा। उसे ग़ुलाम बनाना बहुत आसान है। मैं जाऊँगा, उसे पैसे का डब्बा दिखा दूँगा, वो मेरा ग़ुलाम बन जाएगा।

किसी की कमजोरी है इज़्ज़त, उसको इज़्ज़त दे दो वो ग़ुलाम बन जाता है। उसे ग़ुलाम बनाना कितना आसान है, कोई भी बाहर का आदमी जाएगा, उसे इज़्ज़त दिखाएगा, ग़ुलाम बन जाएगा। अगर कोई बाहर वाला आके तुम पर किसी भी तरह शासन कर लेता है, इसका मतलब तुम सबसे पहले ख़ुद से हारे हुए आदमी हो। जो स्वयं को जीते हुए हैं, उन्हें बाहर से ग़ुलाम नहीं बनाया जा सकता। तो इसीलिए वास्तविक आज़ादी के लिए अध्यात्म बहुत-बहुत ज़रूरी है क्योंकि अध्यात्म तुम्हें ख़ुद के प्रति विजेता बना देता है। अब कोई बाहर वाला आकर तुम्हें ग़ुलाम कैसे बना देगा? कैसे बना देगा?

प्रश्नकर्ता: ओके। थैंक यू।

आचार्य प्रशांत: जब “ऑपरेशन बारबारोसा” था, तो उस समय पर रूसी प्रतिरोध में महिलाओं का क्या योगदान था? 8 लाख महिलाओं ने सोवियत सशस्त्र सेनाओं में काम किया जर्मनों के ख़िलाफ़, 8 लाख महिलाएँ। अब? “गोरी है कलाईयाँ तू ला दे मुझे हरी-हरी चूड़ियाँ।” हम इसी बात में बहुत ख़ुश हो जाते हैं, कोई फ़िल्मी गाना आता है जहाँ पर जो सैनिक है, वो गाँव में उसकी जो पत्नी है उसको याद कर रहा है और गाना गा रहा है। वो पत्नी ख़ुद क्यों नहीं है बॉर्डर पर? ये आपके दिमाग़ में कभी नहीं आता न।

1942 — 8 लाख महिलाएँ (सॉर्स: विकिपीडिया) और बढ़ती ही गईं, जैसे-जैसे जर्मनों ने जान लगा दी उनको दिखने लग गया था कि हारे और अगर ये ईस्टर्न फ़्रंट गया, तो पूरा वार गया। तो जैसे-जैसे जर्मनों ने जान लगा दी, वैसे-वैसे महिलाओं की तादाद बढ़ती गई। 89 महिलाओं को सोवियत यूनियन का जो उच्चतम अवॉर्ड होता है — “हीरो ऑफ़ द सोवियत यूनियन” वार के बाद वो मिला, उनके वार में योगदान के कारण (सॉर्स: विकिपीडिया)। उसमें से मेडिकल प्रोफ़ेशनल तो थीं ही, जो वहाँ पर मेडिकल सर्विसेज़ दे रही थीं, उसके अलावा पायलट्स, स्नाइपर्स, मशीन गनर्स, टैंक क्रू मेंबर्स, महिला पायलट है, महिला टैंक चला रही है और महिला स्नाइपर है। तब जाकर के आज़ादी की रक्षा होती है।

जहाँ पर सब बाबा जी लोग आपको बता रहे हों कि पति के पाँव दबाओ, यही तुम्हारा धर्म है, वहाँ थोड़ी मामला बनता है। जब जर्मनी ने अटैक किया 1941 में तो हज़ारों महिलाएँ सामने आईं, “हम भी सेना में जाएँगे”। तो शुरू-शुरू में उनको कहा गया, “नहीं।” लेकिन कुछ ही महीनों में, जून में आक्रमण हुआ था अक्टूबर आते-आते दिखने लग गया कि जर्मन तो चढ़ आएँगे। बिल्कुल मॉस्को से 20 कि.मी. तक आ गए थे जर्मन। तो फिर महिलाओं को सेना में सबको स्वीकृति दी गई। उनको फ़ाइटर के रूप में स्वीकार किया गया, कि आओ तुम भी फ़ाइटर बनो। उसके बाद एयरफ़ोर्स में कितनी थीं, उनके सबके नम हैं, उन्होंने क्या-क्या किया, कितनी महिलाओं ने कितने जर्मन प्लेन गिरा दिए।

सोवियत यूनियन बिकम द फ़र्स्ट नेशन टू अलाउ वुमन पायलट्स टू फ़्लाई कॉम्बैट मिशन्स (सॉर्स: विकिपीडिया)। कॉम्बैट मतलब पायलट होती हैं पर उनको दूसरे तरीक़े के मिशन दे दिए जाते हैं, लॉजिस्टिक्स का मिशन दे दिया, रिलीफ़ एंड रेस्क्यू का मिशन दे दिया, पर कॉम्बैट मिशन में महिलाएँ हैं।

3000 उड़ानें सोवियत महिला पायलटों ने भरीं कॉम्बैट रोल में (सॉर्स: विकिपीडिया)। और जो हीरोज़ ऑफ़ द सोवियत यूनियन का अवॉर्ड है, वो 20 महिला पायलट्स को मिला है। दो फ़ाइटर एसेस भी थीं। फ़ाइटर एसेस वो होती हैं जो दुश्मन के एक नहीं, कई जहाज़ मार के गिराती हैं। वो भी दो महिलाएँ थीं और पूरा इसमें विवरण है, आप लोग ख़ुद ही पढ़ लीजिएगा। फिर इन्फ़ेंट्री भी है। इसमें में तो फिर भी ऊपर हो दुश्मन के, इन्फ़ेंट्री में तो आमने-सामने आके। ये पूरा इन्फ़ेंट्री का है, मतलब लंबा आर्टिकल जिसमें नम ही नम, कि इन्होंने ये किया, इन्होंने ये किया।

18 साल की लड़की है, उसको हीरो ऑफ़ द सोवियत यूनियन का मिला, एंटी एयरक्राफ़्ट गन ले बैठ गई थी, आते जाओ। और इसके बाद जब जर्मनी का पूरा नश हो गया, तो जो पूरा जर्मन रिकंस्ट्रक्शन हुआ अगले 10 साल में, वो महिलाओं ने ही किया पुरुष तो बचे ही नहीं थे। मॉडर्न जर्मनी, जो आज का जर्मनी है, उसको महिलाओं ने ही बनाया है।

आज़ादी के भीतरी और गहरे मायने समझो, तुम जनसंख्या के सबसे बड़े वर्ग को घोषित कर दोगे, कुछ शूद्र हैं, कुछ अति-शूद्र हैं, कुछ अस्पर्शय हैं, उनको तो छुआ भी नहीं जा सकता, और कितने लोगों को? 80% आबादी को। तो सेना में कौन जाएगा? और जो 20% बचे भी हैं उनमें 10% महिलाएँ हैं, तो वो भी नहीं जा सकतीं। तो तुम्हारी सेना में अकेले बचा ही कौन?

ब्राह्मणों को तुमने वैसे ही कह दिया कि ये नहीं जाएँगे, वो अपना पोथा लेकर बैठ गए। वैश्य को बोल दिया कि तुम तो जाकर व्यापार करो, सेना तुम्हारी कितनी बड़ी बची? हमारी जो वर्ण-व्यवस्था चली, उसमें जिन्हें हम शूद्र, कहा गया है न वर्ण व्यवस्था में वो 50% हैं भारतीय आबादी के, ज़्यादा हैं 55% हैं। जिनको आधुनिक भाषा में ओबीसी (अदर बैकवर्ड क्लासेस) बोलते हैं।

उसके बाद नंबर आता है एससी-एसटी का, जो 20% हैं या उससे ज़्यादा ही हैं थोड़े (1931 सेन्सस ऑफ़ इंडिया)। हुई नहीं जातिगत जनगणना 1931 के बाद से तो पता नहीं है। ये 1931 के आँकड़े हैं, उसके बाद से जो ग्रोथ रेट रहा है, वो जितने ज़्यादा अशिक्षित और जितने ग़रीब रहे हैं बेचारे उनका और ज़्यादा रहा है, तो 20% से बढ़कर 25% ही हो गया होगा।

तो शूद्र और दलित, मानें ओबीसी और एससी (शेड्यूल्ड कास्ट) - एसटी (शेड्यूल्ड ट्राइब) आप इनको मिला दो, तो कितना हो गया? लगभग 80%। अब 80% में जो बाक़ी 20% है, उसमें महिलाएँ कितनी हैं? 10%। तो बचाकर कितने बचे अब? उसमें भी बामन, बनिए अलग कर दो, लड़ेगा कौन? लड़ेगा कौन? आज़ादी? क्या करें? और ऐसा नहीं कि जो बाक़ी वर्ग थे, लड़ने नहीं जाते थे। लड़ने जाएँ तो उनके साथ भेदभाव हो, उनको कहें कि तुम आर्मी में एक पोज़ीशन से ऊपर नहीं जा सकते। जिनको अंग्रेज़ों ने घोषित किया कि साहब ये जो हैं, ये फौजी कौमें हैं उन फौजी कौमों के भीतर भी भेदभाव।

ये जो हैं मिलिट्री रेसेज़ बोलते थे उनको, वो फौज में जा सकते हैं। तो उनमें सिख भी आते थे। अब सिखों में मज़हबी सिख होते हैं, मज़हबी सिख जानते हो? जिनको बड़े सम्मान से, बड़े प्रेम से आख़िरी गुरु साहब ने स्वीकार किया था कि तुम भी सिख हो। लेकिन वो आते थे हिंदुओं में, जो तथाकथित निम्न वर्ण है उससे आते थे, लेकिन सिखों ने उनको स्वीकार नहीं किया। तो सिख रेजिमेंट बनाकर उनमें वो उनको बोल दें, उनको अंग्रेज़ों ने कहा अच्छा, आओ तुम भी तो सिख ही हो। तो बाक़ी सब जो थोड़े उच्च-कुलीन सिख हैं, जैसे जाट सिख, वो बोलते हैं कि नहीं, तुम बस जब हमारी फौज चलेगी तो तुम आगे रोड बनाने का काम करना या तुम पानी पिलाने का काम करना।

अब कितनी ताक़त रह जाएगी फौज में?

और वही बंदा अगर पाला बदलकर अंग्रेज़ों के यहाँ चला जाए, तो ऊँचा अफ़सर बन सकता है अपनी प्रतिभा के दम पर। तो बताओ, पाला बदलेगा कि नहीं बदलेगा?

आज़ादी बड़ी गहरी और पेचीदा चीज़ है, उसको बाल कथा मत बना लो। उसकी न्यूइसन्स में, उसकी बारीकियों में प्रवेश करो और समझो कि असली बात क्या है। पहले भीतर से आज़ाद होना पड़ता है, फिर बाहर के सब दुश्मनों को खदेड़ा जा सकता है। दुर्योधन को हराया जा सके, इसके लिए पहले अर्जुन के भीतर से सारे भ्रम हटाए गए फिर दुर्योधन को हराना मुश्किल नहीं था।

जब तक हमारा राष्ट्रीय चित्त भ्रमित रहेगा, तब तक हम नहीं कह सकते कि हम समग्र रूप से स्वतंत्र हैं।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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