
प्रश्नकर्ता: बाबा बुल्ले शाह थे, उधर के आसपास सब जा रहे होंगे हज पर। बोले, “मैं मक्का क्यों जावां?” बोले, “मैं नहीं जा रहा, ये हैं तो मेरे मुर्शिद, यही है मेरा मंदिर।” आशय यही है, काया में अगर अहंकार बैठा है तो वही नरक है। ये काया ही नरक है, इसी घट में नरक है। और काया से अहंकार हट गया तो काया ही फिर मंदिर हो जाती है।
पौराणिक कथा है। तो महादेव बैठे थे, तो सब आ गए उनके पास देवता लोग। ये देवता आपस में बहुत, जब दानव नहीं मिलते तो ये आपस में ही लड़ जाते हैं। वैसे तो दानव बिल्कुल ठीक करके रखते हैं, चंड, मुंड, महिषासुर, और जब देवी इत्यादि आकर के दानवों को परास्त करके देवताओं को थोड़ी राहत देती हैं, तो फिर ये देवता लोग आपस में। तो ये सारे के सारे अपने-अपने वाहन ले आ गए। अब बताओ किस बात पर वाहन। बोलते हैं, हमारा फैसला नहीं हो पा रहा है, हम में से किसका वाहन सबसे बढ़िया? जैसे बच्चे, मेरी साइकिल कि उसकी। तो महादेव भी चौंके होंगे, बोले होंगे, कौन इनका निपटारा करे? बोले, एक काम करो, जाओ, पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा आओ। जिसका वाहन सबसे बढ़िया होगा, वो सबसे पहले लौट आएगा। ठीक है, सारे निकल गए।
उसमें हमारे गणेश जी भी आए हुए थे, उनके पास चूहा। बोले, ये पिताजी ने मेरे ही ख़िलाफ़, ये किस तरह की प्रतियोगिता रख दी। ये तो कोई बड़े हाथी पर है, कोई द्रुत पक्षी पर है, कोई किसी पर है। सबके पास अपने-अपने ज़बरदस्त हैं, मेरे पास चूहा। तो मैं तो किसी गिनती में ही नहीं आऊँगा। तो सब निकल गए। जब सब निकल गए तो गणेश जी बोले सोचते हैं। तो विनायक को बुद्धि का स्वामी बोलते हैं। बोलते हैं कि इसीलिए सबसे पहले उनकी पूजा होती है। बोले, कुछ भी करो, सबसे पहले बोध होना चाहिए न। वही जो श्रीकृष्ण की बात है, कि कर्मयोग कहाँ से आना है? आत्मज्ञान से आना है। तो कर्म से पहले क्या होना चाहिए? ज्ञान।
क्योंकि कर्म से पहले ज्ञान होना चाहिए। अध्याय तीन से पहले अध्याय दो आता है, इसीलिए किसी की भी पूजा करो, उससे पहले गणेश पूजन होता है। वो इसी बात का संकेत है कि कुछ भी और कर लो, उससे पहले बोध तो होना चाहिए न। बिना बोध किए कुछ करोगे तो वो पागलपन ही होगा, सबसे पहले गणेश जी।
तो जब सब निकल गए अपना-अपना लेकर के, तो बोले अब मैं बताता हूँ। उन्होंने शिव जी का ही चक्कर मार दिए, वहीं अपना मस्त बैठ गए, लड्डू खाने लगे। तो ये सब हाँफते-हूँफते लौटे थोड़ी देर में सब देवता लोग अपना-अपना परिक्रमा करके। सब आ गए तो देखते हैं, यहाँ पहले ही बैठे। बोलते, तुम क्या कर रहे हो यहाँ पर? बोले, मेरा हो गया। तो महादेव ने पूछा, कैसे तुम्हारा? बोले, आप ही हैं, आपकी परिक्रमा कर ली न। पूरा ब्रह्मांड तो आप ही हैं, आपकी कर ली तो सब जगह की हो गई। और फिर महादेव ने फैसला दिया, बोले, यही है सर्वश्रेष्ठ यही है। बा क़ी तुम सब अपने-अपने वाहन रखे रहो, सबसे अग्रणी देव तो गणपति ही रहेंगे। क्योंकि तुमने स्थूल दौड़ लगाई और इन्होंने सूक्ष्म बात पकड़ ली। और जो सूक्ष्म पकड़ेगा, वो स्थूल से सदा जीतेगा। नियम है ये। समझ में आ रही बात?
तो एक तो ये कि जो स्थूल पकड़ेगा, सूक्ष्म जीतेगा। दूसरी बात, महादेव की काया ही मंदिर है, और मंदिर सब कुछ है उसमें, पूरा ब्रह्मांड, या घट भीतर। तो ऐसे नहीं कहते कि इस घट में ही, लेकिन किसके घट के भीतर? जो घट अहंकार मुक्त हो। जिसका घट अहंकार मुक्त हो गया, उसका घट पूर्ण हो गया, सब कुछ वहीं है फिर। साहब हमारे कहते हैं, “संत पुरुष की आरसी।” बोलते हैं, अगर तुम अलख को लखना चाहते हो, “लखा जो चाहे अलख।” बोलते हैं, अलख है जो, जो ब्रह्म है, उसको भी लखना चाहते हो तो जो संत पुरुष है, उसकी देह में लख लेना।
संत पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह। लखा जो चाहे अलख को, उन्हीं में लख लेह।।
अगर निर्गुण का स्वाद लेना चाहते हो, तो संत की देह में मिल जाएगा। कहाँ तुम वरना निर्गुण को खोजने जाओगे? निर्गुण कहीं नहीं है। वो जो परम सत्य है, वो तुम्हें आँखों से कहीं नहीं दिखाई देगा। पर संत हो उसकी देह में तुम्हें उस निर्गुण का थोड़ा सा संकेत पता चल जाएगा कि ये निर्गुणता इसको कहते हैं। ये निर्गुणता है।
हिंदुओं में इसीलिए मूर्ति पूजा चली। सबको पता है कि मूर्ति एक स्थूल पदार्थ से बनी है, सब जानते हैं। लेकिन उसके पीछे एक विज्ञान है, विज्ञान ये है कि निर्गुण कहाँ से पता चलेगा? आँखों को नहीं दिखाई देगा, हम जान रहे हैं सत्य निर्गुण है, निराकार है, स्वीकार कर रहे हैं। लेकिन ये आँखें, ये शरीर तो उपाय माँगते हैं न। तो कहते हैं कि जो कोई ऐसा हुआ कि वो अपना अहंकार अधिक से अधिक गला पाया, उसकी देह का ही बार-बार स्मरण कर लो, मूर्ति के माध्यम से। और उसकी देह ही तुम्हें निर्गुण की थोड़ी-सी आहट दे देगी।
मूर्ति पूर्ण नहीं होती, बिल्कुल सही बात है। मूर्ति आख़िरी बात नहीं होती, बिल्कुल सही बात है। लेकिन मूर्ति उपयोगी ज़रूर होती है। और कोई नहीं कह रहा कि मूर्ति पूजा के अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं हो सकता, बिल्कुल हो सकता है। लेकिन मूर्ति पूजा भी सफल रही है। यही वजह है।
जैसे काया गंदी से गंदी हो सकती है। अभी हम दुर्गा सप्तशती कर रहे थे, उसमें एक दैत्य का आता है, उस दैत्य का ये था कि उसने जीवन भर इतनी मारकाट करी थी, इतनी मारकाट करी थी कि उसके जो रोएँ थे, शरीर के जो बाल होते हैं, यही बड़े होकर तीखे होकर धारदार तलवार जैसे हो गए थे। आपका अहंकार जैसा होता है न, वो आपके शरीर में चीज़ दिखाई देने लग जाती है। अंधविश्वास में मत पड़ जाइएगा, एक इशारे की तरह इसको समझ लीजिए।
अगर अहंकार शरीर को दूषित कर सकता है, तो अहंकार के न होने से ये काया पवित्र भी होने लग जाती है।
जो लोग सौंदर्य के बड़े आग्रही हों, वो खाल चमकाना बंद करें, वो अपनी भीतरी सफ़ाई करें। जो भीतरी सफ़ाई करता है, उसकी काया भी बहुत सुंदर हो जाती है।
हम जब भी बात करते हैं देवियों की तो क्या हम बार-बार नहीं कहते, बहुत सुंदर, बहुत सुंदर। कल अंबिका देवी का कैसे उल्लेख आ रहा था जब हम सप्तशती का पाठ कर रहे थे, तो अंबिका देवी का कैसे उल्लेख आ रहा था? कि जगत में इनसे सुंदर कोई नहीं। वो सौंदर्य कहाँ से आ रहा है? वो काया का सौंदर्य नहीं है, वो कहाँ का सौंदर्य है? (मुठ्ठी भींचते हुए), समझ में आ रही है बात ये?
तो ये प्रकृति है, अहंकार चाहे तो इसे मुक्त छोड़ दे, जो अहंकार को करना चाहिए। अहंकार चाहे तो इसको एकदम मलिन कर दे, बर्बाद कर दे, जैसा ज़्यादातर लोग करते हैं। और अहंकार चाहे तो स्वयं ही मुक्त हो जाए। और स्वयं मुक्त हो जाए तो ये फिर कांति देती है, आभा देती है।
इंद्रियों को उनके हाल पर छोड़ दीजिए, उनके लिए इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता कि आप उनके साथ छेड़खानी न करें। आपके पास करने के लिए अपना काम ही बहुत है। आपका क्या काम है? अपने आप को जानना और जानकर अपने आप को विदा कर देना। स्वयं को जानिए, स्वयं को विदाई दीजिए।
और जब आप स्वयं को विदाई दे देते हैं तो ये जो पूरा शरीर, जो अपने आप में एक बड़ी इंद्रिय है, ये पूरा शरीर ही निखर उठता है, चमक उठता है, कांतिमय हो जाता है। लेकिन इस उद्देश्य से अपने आप को विदाई मत दीजिएगा। विदा नहीं हो पाएँगे, फिर कहेंगे, मुझे तो रहना है। काहे के लिए रहना है? शरीर चमक गया होगा न। शरीर चमक गया होगा तो मुझे उसको देखना भी तो है और देख-देख के फिर भोगना भी तो है।
तो आप तो निष्काम होकर स्वयं को विदा करें। और अपने आप को जाने बिना स्वयं को विदा नहीं कर पाएँगे। और विदा करने की आप नियत ना भी रखें तो भी अगर अपने आप को जान लेंगे तो विदाई स्वतः हो जाती है। आप अपने आप को विदा करें, आप जब नहीं रहते हो तो आप बहुत खूबसूरत हो जाते हो। गंदे से गंदा आदमी भी जब सो रहा होता है न तो थोड़ा कम गंदा लगता है। देखा है कभी?
एक छोटी-सी राज की बात बताता हूँ, मुझे बहुत-बहुत पहले से ये रहा है। मैं लोगों को सोते हुए देखना पसंद करता हूँ, बिना उनकी नींद में खलल डाले। क्योंकि शायद वही एक क्षण होता है जब वो कम कुरूप होते हैं। जब जो चेतना की पूरी गंदगी होती है, वो डॉरमेंट हो गई होती है, सो चुकी होती है, तो चेहरे पर एक मासूमियत आ जाती है। नफरत तो नहीं कर पाता किसी से, पर क्रोध अक्सर कर लेता हूँ, जिन पर मुझे क्रोध भी रहता है।
अब मैं तो रात भर जगता ही हूँ, तो कई बार रात में उनके कमरे में झाँक लेता हूँ। और वही बस समय होता है जब मैं उनका चेहरा देखना चाहता हूँ, सोता हुआ। ठीक ऐसे ही रहो। लेकिन अभी वो जगेगा और जगते ही उसके चेहरे पर फिर कुटिलता आ जाएगी, फिर कुरूपता आ जाएगी। कई बार तो मैंने यहाँ ही बोध स्थल में एक-एक करके सबके वीडियो डाल दिए हैं रात में। ये सो रहा है और देखो ये चल रहा है, ये चल रहा है, ये चल रहा है। वो बैठा तो है पीछे (श्रोता की ओर इंगित करते हुए)। तो मैं ऊपर से नीचे आता हूँ, सो रहे होते हैं, अच्छा लगता है, बच्चे जैसे लगते हैं अपने। सब सो रहे हैं, मैं जगा हुआ हूँ अच्छा लगता है।
अब मैं वहाँ नीचे आऊँगा देखूँगा। मेरा ही इसने फोन पर वीडियो लगा रखा है, वीडियो मस्त चल रहा है और ये खर्राटे मार रहा है। और फिर मैं उस पूरी चीज़ का वीडियो बना लूँगा। मैं कहता हूँ, तुम्हारे लिए भी भला, मेरे लिए भी भला। दिन में किसी समय मेरे सामने पड़ोगे तो बस डाँट खाओगे। तो अच्छा है, मैं इसी समय आकर तुम्हें देख जाता हूँ। ठीक है, हाँ ठीक है। बढ़िया है, चलो आगे देख लेते हैं।
तुम सोए माने तुम्हारा अहंकार सो गया कुछ हद तक, सोया ही है, मर नहीं गया है। अभी तुम उठोगे, वो फिर अंगड़ाइयाँ लेगा और अपनी नालायकी शुरू कर देगा। आपको किसी से बहुत भी रोष हो गया हो, उसको सोते समय देख लीजिएगा। रोष ठंडा पड़ेगा थोड़ा, और अगर भीतर जो द्वेष है वो और कम करना है तो उसकी बचपने की तस्वीर देख लीजिएगा। कभी बहुत ही हिंसा भीतर उठ रही हो, किसी को मारने का, पीटने का, हत्या का ही ख़्याल आ रहा हो, उसकी बचपने की कोई तस्वीर देख लीजिएगा। कहिएगा, इसको मारना है। मार पाओगे क्या?
किसी के प्रति और भी किसी प्रकार की हिंसा का विचार आ रहा हो, यहाँ तक कि किसी के शरीर को भोगने का भी बहुत ख़्याल आ रहा हो, तो उसके बचपन की तस्वीर देख लीजिएगा। ख़्याल उतर जाएगा, और अगर नहीं उतरा तो आप बहुत ख़तरनाक आदमी हैं, ख़तरनाक आदमी बन बैठे हैं, होता तो कोई भी नहीं है। बाक़ी तो हमारा चुनाव है, जो ही बन बैठो। समझ में आ रही है बात कुछ?
जब आप इंद्रियों से संयुक्त हो जाते हैं, इंद्रियों पर चढ़ बैठते हैं। सांख्ययोग के अनुसार जब पुरुष ज़बरदस्ती प्रकृति के साथ संसर्ग कर लेता है, आप पुरुष हैं, इंद्रियाँ प्रकृति हैं—जब पुरुष प्रकृति के साथ बलात संसर्ग करता है तो दोनों ही पक्ष विकृत हो जाते हैं। इंद्रियाँ अपनी प्राकृतिक सहज गति खो देती हैं, जैसे नदियाँ ख़राब हो जाती हैं।
पुरुष आप हैं और नदी क्या है? प्रकृति। आप नदी के साथ बलात संसर्ग करोगे तो नदी भी ख़राब हो जाएगी और आप भी दुख पाओगे। ये जो मिलन है ये दोनों के लिए ही अच्छा नहीं है। उसको उसकी जगह रहने दो, तुम अपनी जगह रहो, इसी में दोनों की भलाई है। तुम मुक्त हो जाओगे, वो खूबसूरत हो जाएगी। तुम मुक्त हो जाओगे और वहाँ सौंदर्य निखर आएगा।
पुरुष की श्रेष्ठता है मुक्ति में और प्रकृति की श्रेष्ठता है सौंदर्य में। और दोनों को अपनी-अपनी श्रेष्ठता उपलब्ध होती है परस्पर एक अनुशासन रखने में।
तुम अपनी जगह रहो, हमें हमारी जगह रहने दो। हम में तुम में कोई द्वेष नहीं है, हम तुम एक सम्मान का और प्रेम का रिश्ता रखते हैं। और प्रेम हमारा यही है, तुम अपना काम देखो, हम अपना काम देखें। और ये प्रेम याद रखिए, प्रकृति की ओर से नहीं आएगा क्योंकि चेतना उधर नहीं है। वो प्रेम आएगा आपकी ही ओर से। तो जो करना है, वो आपको ही करना है। वो क्या करेगी बेचारी? उसको कुछ नहीं करना, आपको करना है। आ रही है बात समझ में?
आप मुक्त हो जाओ, आपका जो सब कुछ है वो सब सुंदर हो जाएगा।
आप मुक्त हो तो आपकी आँखें सुंदर, आपकी काया सुंदर, आपके कर्म सुंदर, आपके वचन सुंदर, आपका जीवन सुंदर। अगर आप मुक्त हो तो आपका जो कुछ है, सब सुंदर हो जाएगा। और अगर आप मुक्त नहीं हो तो आपका जो कुछ है, वो सब बहुत ही विकृत और कुरूप रहेगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका घर भी सुंदर हो जाएगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका ग्रह भी सुंदर हो जाएगा। ग्रह भी और गृह भी। गृह माने घर, ग्रह माने प्लैनेट दोनों सुंदर हो जाएँगे। हमारा न ग्रह सुंदर है, न गृह सुंदर है क्योंकि हम अहंकार हैं। आप मुक्त हो जाओ।
तो अगर ग्रह सुधारना हो तो क्या करना पड़ेगा? कोर्ट में मुकदमा नहीं करना पड़ेगा, उससे नहीं सुधरेगा। जो गृहवासी हैं, जो घर के लोग हैं, उनको थोड़ी गीता देनी पड़ेगी। उनमें थोड़ा आत्मज्ञान जागृत करना पड़ेगा, घर सुधर जाएगा। और ग्रह सुधारना हो, ग्रह बर्बाद हो रहा है एकदम। जो लोग थोड़ा भी पढ़ते-लिखते हैं, सजग हैं पृथ्वी के प्रति, उनको पता है क्या हो रहा है इस समय पृथ्वी पर।
ग्रह सुधारना हो तो भी क्या करना पड़ेगा? ग्रहवासियों को थोड़ा आत्मज्ञान देना पड़ेगा।
आत्मज्ञान जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा, पृथ्वी वैसे-वैसे अपना सौंदर्य वापस पाती जाएगी। और आत्मज्ञान के बिना आप जितनी भी कोशिशें कर लो, ये जो आपके सब फोरा हैं, समिट्स हैं, कॉनक्लेव्स हैं, सब कुछ तो आप करते रहते हो। इससे कोई लाभ नहीं है।
जब बोध नहीं होता तो वाणी सौंदर्य खो देती है। वाणी में भी सौंदर्य कहां से आएगा? बोध से आएगा। वाणी में सौंदर्य गले से नहीं आता। कहाँ से आता है? बोध से आता है। अब गला होगा बड़ा सधा हुआ, सुरीला। कोई फ़र्क़ पड़ा? यही बात है। आप जब मुक्त होते हो, सिर्फ़ तब आपका सब कुछ सुंदर हो जाता है। सिर्फ़ तब।