डॉ. अंबेडकर के काम का कैनवस बड़ा विस्तृत है। वो दिल से कोई राजनीतिक नहीं थे — खरे इंसान थे, दो टूक बात करने वाले। उनकी शुरुआत अर्थशास्त्र से हुई, फिर एडमिनिस्ट्रेशन, एकेडमिक्स, लीगल प्रैक्टिस, इन्वेस्टमेंट कंसल्टिंग — राजनीति में आने से पहले उन्होंने सारे द्वार खटखटाए हैं। अंबेडकर की प्राथमिक लड़ाई धार्मिक रूढ़िवादिता के खिलाफ थी। फिर दलितों, महिलाओं, गरीबों, युवाओं के लिए काम करना — उसी लड़ाई के अलग-अलग मोर्चे हैं।
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राणा यशवंत: स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक राजनेता जो अपने विचार, निर्णय, दृष्टि और दर्शन इस लिहाज से सर्वाधिक चर्चित रहा। जो सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तनों पर सबसे गहरा असर डालता रहा। जिसके नाम से दलित चिंतन और दलित राजनीति दोनों चलती रही और देश में जो बाकी दल थे। वो अपने अपने राजनैतिक नेतार्थों के लिए बाबा साहब अंबेडकर और उनके चिंतन को या उनकी चिंता को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाकर चलते रहे। आज की तारीख में अगर सबसे अधिक विवाद किसी को लेकर के है तो बाबा साहब अंबेडकर की सार्थकता, उनकी प्रासंगिकता और उनके नायकत्व को लेकर के है। बाबासाहेब आंबेडकर, उनकी दृष्टि, उनके विचार भारतीय राजनीति और समाज में जो परिवर्तन हुए उन पर उनका असर, गढ़ मामला है।
जाहिर है इस तरह के गूढ़ प्रश्नों पर एक चर्चा जरूरी है और आचार्य प्रशांत से अलग कोई दूसरा व्यक्ति नहीं हो सकता है कि इस पर लंबी और अच्छी चर्चा की जाए और लोगों के सामने एक साफ सुथरी राय रखी जाए। आपका बहुत-बहुत स्वागत है।
कैसे देखते हैं आप डॉ. अंबेडकर और उनके विचार और भारत को लेकर के उनके नजरिए को
आचार्य प्रशांत: मानवतावादी विद्वान है वो, जो जीवन के हर क्षेत्र में, इंसान कितनी ऊंचाइयां छू सकता है इसको जानते समझते थे और ये भी देख रहे थे कि कैसे हमारी जनसंख्या के बहुत सारे हिस्से हैं जो उन अनेक प्रकार की चोटियों पर पहुंचने से वंचित हैं। तो पहली बात तो यह कि




