आत्मा न अलग-अलग है, न एक-जैसी है। नहीं कहा जा रहा है कि वो अलग-अलग है, नहीं कहा जा रहा है कि वो एक-जैसी है; नहीं कहा जा रहा है वो एक भी है। क्योंकि अगर वो एक है तो आत्मा नहीं हो सकती; वो होगा कोई मानसिक विचार, होगी कोई धारणा। इतना ही समझ लीजिए कि हम सबका अलग-अलग प्रतीत होना भ्रम है; पर वहाँ तक मत जाइए कि हम सब एक हैं। न ही अलग हैं, और एक भी नहीं हैं।
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प्रश्नकर्ता: 'सबका आत्मा एक ही होने के कारण वह सभी प्राणियों में स्थित है। यद्यपि आत्मा एक है किंतु जल में चंद्रमा के प्रतिबिंबों की भांति नानावत भासता है।' इसमें सबका आत्मा एक ही है या एक-जैसा है?
आचार्य प्रशांत: तीन-चार तलों पर भ्रम हो सकता है।
पहला भ्रम तो ये है कि आत्मा, मतलब एसेंस (मूलतत्व) अलग-अलग है सबका; आमतौर पर हम इसी भ्रम में जीते हैं। आपने अपनी जितनी व्यक्तिगत पहचान बनाई है, आपके लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा ये स्वीकारना कि आपकी और जिसको आप दूसरे का नाम देते हो उनकी सत्ता मूलभूत रूप से एक है, क्योंकि अगर मूल-रूप से एकत्व है तो फिर अलग पहचान का सवाल नहीं उठता। अलग पहचान अगर नहीं है तो अहंकार नहीं हो सकता, तो एक आम मन जो अहंकार में जीता है वो तो यही मानेगा कि हम पूरी तरह से दुनिया से और दूसरों से अलग ही हैं। तो उससे आप कहेंगे, 'सब अलग हैं?' 'हाँ, सब अलग हैं।' शब्दों में भले वो ये मान ले कि आत्मिक रूप से एक हैं, पर गहरी धारणा उसकी यही है कि आत्मिक रूप से भी मैं अलग ही हूँ। तो ये तो निम्नतम तल का भ्रम हो गया, कि 'सब-कुछ अलग है, आत्मा भी अलग है।'
जब रंगभेद की नीति चलती थी, उन दिनों में आप अगर किसी गोरे से कहते कि तेरी और काले की आत्मा एक है, तो कहता, 'नहीं है।' विश्वयुद्ध के दिनों में बहुत दिनों तक ये भ्रम बना रहा, और ये भ्रम फैलाया गया कि खून भी अलग-अलग होता है; ये बात भाषा में आज तक है, आप कहते हो, 'खानदानी खून है।' तो ये बात जब सामने आई थी कि खून तो बिल्कुल एक ही होता है और उसके जो भेद होते हैं वो भी बस गिने-चुने ही हैं तो ये बात बहुत लोगों को पसंद नहीं आई थी, कि 'गोरे और काले का, हिन्दू का, मुसलमान का खून एक-जैसे कैसे हो सकता है? आदमी और औरत का खून एक कैसे हो सकता है? अलग-अलग होना ही चाहिए।' जब बाद में ये पता लगा कि आदमी का और चिम्पांजी का




