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आत्मा जन्मी नहीं तो पुनर्जन्म कैसे, कर्ता नहीं तो भोक्ता कैसे || (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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एवं पूर्वकृतं कर्म नित्यं जन्तुः प्रपद्यते। सर्व तत्कारणम येन विकृतो अयमिहागतः।।

भावार्थ: इस प्रकार जीव सदा अपने पूर्व जन्मों में किए हुए कर्मों का फल भोगता है। यह आत्मा निराकार ब्रह्म होने पर भी विकृत होकर इस जगत में जो जन्म धारण करता है, उसमें कर्म ही कारण है।

~ उत्तर गीता (अध्याय ३, श्लोक २३)

प्रश्नकर्ता: आत्मा निर्विकार होते हुए भी किस प्रकार कर्म में संलिप्त होती है तथा किसके पुनर्जन्म की बात की गई है, कृपया मार्गदर्शन करिए।

आचार्य प्रशांत: आत्मा निर्विकार होते हुए भी कर्म कर रही है — ऐसा किसको लग रहा है? एक ओर तो आप कह रहे हैं कि आत्मा निर्विकार होती है, दूसरी ओर आप कह रहे हैं कि वो सकाम कर्म कर रही है। जो कर्म सकाम है वो सविकार भी होगा। अब एक ओर तो आप कह रहे हैं आत्मा निर्विकार है और दूसरी ओर आप कह रहे हैं कि कर्म में संलिप्त है माने सविकार है। ये दोनों बातें एक साथ कैसे? जो वास्तव में जानते हैं कि आत्मा निर्विकार है उन्हें आत्मा कोई कर्म करती दिखाई नहीं देती। वो कहते हैं ये सब तो आत्मा की क्रीड़ा है, कर्म नहीं खेल है। आत्मा को लेकिन निर्विकार कह ही वही सकते हैं जो स्वयं निर्विकार आत्मा में स्थापित हों।

प्रश्न के पीछे के प्रश्नकर्ता पर जाओ। किसको लग रहा है ये कि "आत्मा तो संलिप्त हो गई, अरे अरे आत्मा तो भ्रम में फँस गई, अरे अरे आत्मा तो विकारयुक्त कर्म करने लग गई, अरे अरे आत्मा तो कामना ग्रसित हो गई।" ये किसको लग रहा है? ये उसी को लग रहा है न जो भूलवश आत्मा को ऐसे देख रहा है। जो स्वयं आत्मस्थ है क्या वो ये कभी कहेगा कि, "आत्मा भ्रम में फँस गई है। आत्मा कर्मों के कीचड़ में संलिप्त हो गई है"? क्या वो ऐसा कहेगा? नहीं। तो इसी से समझ लो।

थोड़ी देर पहले तुम्हें लग रहा था कि आत्मा लिप्त हो जाती है, आत्मा भी सविकार कर्म करने लगती है। अभी ये बातें सुनोगे तो शायद तुम्हें स्पष्ट हो जाएगा कि आत्मा कोई सविकार कर्म वगैरह कर ही नहीं रही, ये तो देखने वाले की नज़रों की भूल है। तुम ठीक से देख नहीं पा रहे इसलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है। अब तुम्हें ऐसा नहीं लग रहा, क्यों नहीं लग रहा? क्योंकि तुम ठीक से देख पा रहे हो। अब तुम ध्यान में हो इसलिए अब तुम्हें नहीं लग रहा कि आत्मा सविकार या सकाम कर्म करती है। तो माने क्यों लग रहा था तुमको कि आत्मा संलिप्त हो जाती है? क्योंकि तुम ध्यान में नहीं थे।

ध्यान के अभाव में द्रष्टा को ऐसा लगने लग जाता है ज्यों माया है। ध्यान दो तो माया है कहाँ? जैसे कि कोई मेरे पास आए, आधी नींद में और उसने हाथ में रस्सी का टुकड़ा उठा रखा है एक और मेरे पास आकर कहे "ये साँप मेरे पर किसने छोड़ा?" और ख़ुमारी भी चढ़ी हुई है, नींद में है और हाथ में ऐसे लेकर के पूछ रहा है कि "साँप मेरे पर किसने छोड़ा?" तो अब मैं ये समझाऊँ कि साँप उसपर किसने छोड़ा? उसे मैं इस बात पर विवेचना दूँ? खुफ़िया रहस्य बताऊँ कि साँप कहाँ से आया है, या झंझोड़ दूँ और एक चाटा मारूँ कि, "उठ"?

अब वो जग गया तो अब उसे साँप के बारे में समझाने की ज़रूरत है क्या? साँप था ही नहीं। इसी तरीके से जो नशे में है उसको ये लगता है कि आत्मा भी भ्रमित हो गई है और आत्मा भी माया के जाल में फँस गई है और आत्मा भी इस जगत में संलिप्त हो गई है। जैसे तुम रस्सी को साँप समझ सकते हो, तो वैसे ही तुम आत्मा को भ्रमित क्यों नहीं समझ सकते। पर जब तुम्हें लग रहा है कि आत्मा भ्रमित हो गई है तो वास्तव में भ्रमित कौन है? तुम, देखने वाले।

ये प्रश्न तुमने इसलिए पूछा है ताकि मैं तुम्हारा भ्रम काट दूँ। अब जब तुम आत्मा को देख रहे हो, क्या आत्मा तुम्हें भ्रमित लग रही है? नहीं लग रही, क्यों? आत्मा में कुछ बदल गया क्या? नहीं आत्मा में कुछ नहीं बदल गया, तुम्हारी जो स्थिति थी भ्रमित वो बदल गई है।

तुमने ये उत्तर सुना, तुम्हारी स्थिति साफ़ हो गई, अब तुम्हें रस्सी साँप जैसी नहीं लगेगी। अब तुम्हें आत्मा भ्रमित नहीं लगेगी, न संलिप्त लगेगी। बात समझ में आ रही है?

तो लोग आकर पूछते हैं, "कारण क्या है, इतनी माया क्यों फैली हुई है? ब्रह्म माया क्यों बन जाता है? आत्मा अह्म क्यों बन जाती है?" अरे पगले! किसके लिए बन जाती है, पहले ये तो बता।

लोग कहते हैं, "इससे बड़ा राज़ नहीं हो सकता कि अचल, अकर्ता ब्रह्म पूरे संसार का कर्ता क्यों बन जाता है।" किसके लिए बन जाता है? तुम्हारे लिए ही बन जाता है न। तुम्हें ही ऐसा लग रहा है, तुम्हीं सवाल कर रहे हो; तुम्हीं बड़े होशियार हो।

ये एहसास किसको हो रहा है कि अकर्ता, अचल ब्रह्म संसार में आकर चलायमान हो गया है, साकार हो गया है? ये किसको लग रहा है? तुम्हें लग रहा है न। तुम्हें लग रहा है न कि ब्रह्म ने इतने शरीर, इतने रूप, इतने आकार क्यों धारण कर लिए और तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है? क्योंकि तुम खुद अपने आकार में बहुत विश्वास रखते हो। चूँकि तुम अपने शरीर रूपी आकार से तादात्म्य रखते हो तो इसलिए तुम्हें चारों ओर दिखाई क्या देते हैं? आकार ही आकार। तुम खुद अपने शरीर को सच समझते हो तो तुम्हें अपने चारों ओर जो दुनिया दिखाई देती है, आकार दिखाई देते हैं, वस्तुएँ दिखाई देतीं हैं तुम उनको भी सच समझते हो।

अपने इस झूठे सच की बुनियाद पर आकर फिर तुम इस तरह के सवाल करते हो, कि "निराकार ब्रह्न साकार क्यों हो गया?" हुआ कहाँ? या फिर किसके लिए हुआ? तुम्हारे लिए ही तो हुआ। ब्रह्म को वैसा कौन जानता है जैसा तुम जानते हो? तुम्हीं तो, और कौन? कौन कह रहा है कि ब्रह्म साकार हो गया है? तुम। और तुम्हें तो कहना पड़ेगा तुम्हारी मजबूरी है क्योंकि तुम्हें लगता है तुम साकार हो।

जिस दिन तुम्हें ये लगना बंद हो गया कि तुम साकार हो, क्या तुम ये पूछोगे कि, "ब्रह्म साकार क्यों हो जाता है"? बोलो। जब तुम कहते हो, "अरे आत्मा ने ये मायावी दुनिया क्यों रच दी है?" तो निश्चित रूप से तुम्हें माया का एहसास हो रहा है, है न? तभी तो तुम कह रहे हो कि दुनिया मायावी है। जिस दिन तुम माया से आगे आ गए उस दिन माया मिट गई तुम्हारे लिए, या अब है माया? अब नहीं है माया। तो अब क्या तुम पूछोगे कि "परमात्मा ने इस मायावी संसार की रचना क्यों की?" करी ही नहीं, या सिर्फ़ उसके लिए करी जो ख़ुद माया में फँसा हुआ है।

परमात्मा ने मायावी संसार की रचना क्यों की? ये मत पूछो "क्यों की?" पूछो, "किसके लिए की?" "कौन कह रहा है ये?" तुम कह रहे हो क्योंकि तुम माया में फँसे हुए हो। तुम्हें माया ही माया दिखाई देती है और तुम कहते हो "परमात्मा ने माया क्यों रची?" रची ही नहीं। माया परमात्मा ने नहीं रची बाबा, फिर किसने रची? तुमने रची।

तुम माया से ग्रसित हो, तुम्हें माया चारों ओर दिखाई दे रही है। इल्ज़ाम तुमने परमात्मा पर लगा दिया। भ्रम में संलिप्त तो तुम हो — अहंकार, लेकिन इल्ज़ाम तुमने आत्मा पर लगा दिया, कि "आत्मा संसार में संलिप्त क्यों हो जाती है?" आत्मा नहीं संलिप्त हो जाती, तुम संलिप्त हो जाते हो। तुम अह्म हो, अह्म संलिप्त होता है। आत्मा नहीं संलिप्त होती संसार में, अह्म संलिप्त है।

अब आगे तुम सवाल करोगे, कहोगे, "अच्छा ये बताइए फिर अह्म क्यों संलिप्त हो जाता है?" वो तुम जानो।

कौन संलिप्त हुआ है, आत्मा या अह्म? और अह्म माने? तुम, जो ये सवाल कर रहा है। तो तुम्हीं संलिप्त हुए हो संसार में, तुमने ही फैसला किया है दुनिया की कीचड़ में लोटने का और फिर तुम आकर मुझसे पूछ रहे हो, "बताइए मैं दुनिया की कीचड़ में क्यों लोटता हूँ?" क्योंकि तुम बादशाह हो, तुम जानो।

जिस क्षण तुम फैसला कर लोगे कि अब और नहीं लोटना है दुनिया में, तुम लोटना बंद कर दोगे। अभी भी तुम दुनिया में इसलिए लोट रहे हो क्योंकि तुमने फैसला करा है और वो फैसला तुम्हारी अपनी बादशाहत है। उसमें हम कुछ नहीं बोल सकते। अपनी मर्ज़ी से तुम फैसला करते हो, जब मर्ज़ी चुक जाएगी तुम फैसला बदल दोगे।

"अच्छा जी, हमें फैसला करने का इतना अधिकार है? हम इतने बड़े हैं?" जी आप उतने ही बड़े हैं। और उतना बड़ा अह्म तो हो नहीं सकता, फिर आप कौन हैं? आप आत्मा ही हैं, बस आपने तय कर लिया है कि अभी आपको अपने-आपको आत्मा नहीं मानना है, आप अपने-आपको कुछ और मानना चाहते हैं। आप अपने-आपको लड्डू सिंह मानना चाहते हैं, गुल्लू भैया मानना चाहते हैं, धोन्धु लाल मानना चाहते हैं, टुईयाँ सिंह मानना चाहते हैं। आपको अपने-आपको जो मानना हो मानते रहिए। आपकी मर्ज़ी है। जब झटके खा खा कर, जब चाँटे खा खा कर तबियत ज़रा मस्त हो जाएगी तो फिर तय कर लीजिएगा कि "अब बहुत हो गया अपने-आपको टुईयाँ लाल मानना, अब हम ज़रा होश में आ जाते हैं। आत्मा होना ही ठीक है भाई! ये अहंकार होना घाटे का सौदा है।" फिर बदल जाएगा फैसला।

पर फैसला चाहे इस तरफ का हो चाहे उस तरफ का हो, फैसला है आपका। आत्मा पर ज़बरदस्ती बात मत थोपो। आत्मा कोई निर्णय नहीं करती। वो अकर्ता है और जो अकर्ता है वो निर्विकल्प भी है, जो निर्विकल्प है उसे कोई निर्णय करना नहीं। आत्मा को कोई निर्णय नहीं करना है कि ये करें कि न करें, अह्म के पास बहुत सारे चुनाव होते हैं। उसको पाँच-सात-दस रास्ते हमेशा दिखाई देते हैं। उसे निर्णय करने पड़ते हैं। जिस दिन आप भी ऐसे हो जाएँगे कि आप कहें "हमें और कोई निर्णय करना नहीं भाई! एक बात मिल गई, एक चीज़ पकड़ ली, एक जगह पहुँच गए, वही है मंज़िल, इधर-उधर देखना नहीं।" उस दिन आपके लिए भी न भ्रम रहेंगे, न संलिप्तता रहेगी, न माया रहेगी, न इस तरीके के सवाल रहेंगे।

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