प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं प्रेम के बारे में जानना चाहती हूँ। मैं पाँच साल से किसी के साथ थी और अब मुझे खुद को उसके साथ नहीं रहना है। मैं जानना चाहती हूँ कि क्या हम किसी को प्यार करने के लिए खुद को मजबूर कर सकते हैं, और ये मुझे पता तब चला जब मैं किसी और की तरफ़ आकर्षित हुई। तो मुझे जानना है कि मुझे चाहिए क्या जो मैं अलग-अलग लोगों से जुड़ना चाहती हूँ और हो क्या रहा है ये।
आचार्य प्रशांत: आपको वही चाहिए जो इस संसार में हर कीट-पतंगे को, हर पशु-पक्षी को, जलचर हो, थलचर हो, नभचर हो, सबको चाहिए। आपको वही चाहिए जिसके कारण इतनी करोड़ों प्रजातियों का अस्तित्व है, और विकास की पूरी धारा करोड़ों साल से बहते-बहते यहाँ पहुँच गयी है। सब जीवों में वो आवेग न उठे तो कैसे प्रकृति का खेल आगे बढ़े? क्यों आपको ऐसा लग रहा है कि आपको कुछ अलग, कुछ विशेष चाहिए? इतनी तो साफ़ बात है न। उसमें संशय, भ्रम भी कहाँ हो जाता है?
छोटी रही होंगी आप पाँच साल की तो हम कहते हैं, ‘हमारी सहेलियाँ हैं।‘ तब तो नहीं पुरुषों से मित्रता हो जाती थी, पर पाँच से पन्द्रह का होते ही पुरुष प्यारा लगने लगता है स्त्री को। कुछ नहीं है, पाँच की थी तो भीतर कुछ रसायन थे, पन्द्रह की हो गयी तो अलग तरह के रसायन आ गये। पुरुष भी पन्द्रह का हो गया, उसमें भी कुछ रसायन आ गये। दोनों रसायन एक-दूसरे को खींच रहे हैं।
और ये जो पूरी रासायनिक प्रक्रिया होती है, इस पर कोई एकाधिकार दो ही रसायनों का होता नहीं है। अब सोडियम है, वो रिएक्ट तो सारे ही हेलोजेन्स से कर सकता है, सोडियम, पोटेशियम, किसी को भी ले लीजिए। तो क्लोरीन, आयोडीन, ब्रोमीन, फ्लोरीन सबसे ही कर सकता है। पर एक हेलोजन से कर रहा हो और उससे ज़्यादा ताकतवर दूसरा आ जाए, तो पीछे वाले को भूल जाएगा, भले ही पीछे वाले से पाँच साल तक वो रिएक्ट कर रहा था। और जिससे रिएक्ट कर रहा था, उसी की कोटि का एक ज़्यादा ताकतवर एलिमेंट आ गया तो पिछले वाले को भूल जाता है, और कोई बात नहीं है। कुछ और है ही नहीं इसमें।




