
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा नाम रजनी गुप्ता है। मैं रायपुर से आई हूँ, छत्तीसगढ़ से। मेरा प्रश्न ये है कि आजकल यूथ (युवा) जो हैं, ऐंग्ज़ायटी, डिप्रेशन, ओवरथिंकिंग से जूझ रहे हैं। मतलब, बाहर से देखने पर ऐसा लगता है ठीक चल रहा है, पर भीतर ही भीतर बेचैनी रहती है। जैसे प्रायोरिटी कुछ सेट करते हैं, तो वो फुलफिल नहीं हो पाती, तो वो भीतर ही भीतर बेचैनी खलती रहती है और गिल्ट होता है। तो क्या ये बेचैनी, मतलब एक प्रकार से हमारे मन के ही भीतर का झूठ है? या फिर कुछ और?
आचार्य प्रशांत: नहीं, झूठ क्यों है? जब आप उसे अनुभव कर रहे हैं, अनुभव में आ रहा है, तो आपके लिए तो वो झूठ नहीं है न। आप उसको अनुभव कर रहे हैं, उससे आपको तक़लीफ़ हो रही है। बेचैनी के क्षण में धड़कनें बढ़ जाती हैं, पसीना आ जाता है, सिर दर्द हो सकता है। तो ये सब बातें, हम कैसे कह दें कि झूठ हैं? अच्छा प्रश्न है।
देखिए जवानी, युवावस्था बड़ा एक खास और ज़बरदस्त समय होती है। आप दुनिया को समझने-बूझने लगे हैं, और आपके पास मानसिक ताक़त आ गई है और शारीरिक परिपक्वता आ गई है। तो अब आप बच्चे तो हो नहीं। अचानक दिखाई पड़ता है कि ये जो पूरी दुनिया है, ये आपकी पहुँच में है। एक जीवन आपके सामने खड़ा हुआ है, जिसको बनाने, संवारने, सार्थक करने की ज़िम्मेदारी आपकी है। बहुत बड़ा एक आकाश खुल जाता है। दूसरों पर चूँकि आश्रित नहीं हैं, तो दूसरों की बात मानने का या दूसरों के अनुशासन में रहने का ना दायित्व बचता है, ना डर बचता है।
उतनी ऊर्जा जितनी ना बच्चे में हो सकती है, ना प्रौढ़ में हो सकती है, ना वृद्ध में हो सकती है — अचानक आपको उपलब्ध हो जाती है, एक युवा होने के नाते। उस ऊर्जा का करें क्या? वो ऊर्जा यूँ ही नहीं होती, निरर्थक नहीं होती है वो ऊर्जा। वो ऊर्जा किस लिए होती है, चर्चा करते-करते हम शायद पहुँचे वहाँ तक।
लेकिन ये निश्चित है कि आज के युवा को जितने विकल्प उपलब्ध हो गए हैं अपनी ऊर्जा को पचास तरफ़, सौ तरफ़ बिखेर देने के, विभाजित कर देने के, उतने विकल्प पहले कभी नहीं थे। और वो कोई साधारण विकल्प नहीं हैं जो आपको आज उपलब्ध हैं। वो बड़े आकर्षक हैं, वो आपको खींच के रखते हैं। वो बनाए ही इस तरह से गए हैं कि वो चित्त को मोह लें, बांध लें।
तो अब आप जवान हैं और आपके भीतर कुछ बैठा है जो कह रहा है, यही तो जीवन का मेरे स्वर्ण काल है। इसी में कुछ करके दिखाना है पर क्या करके दिखाना, ये स्पष्ट नहीं है। पर ये निश्चित है कि अब कोई बहाना नहीं चलेगा। क्योंकि पढ़-लिख गए हो, मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो, बुद्धि भी खूब है, और शारीरिक क्षमता भी पूरी है। आपको मालूम है बहुत कम लोग हैं किसी भी क्षेत्र में, जिन्होंने अपने क्षेत्र का उत्कृष्टतम काम 40-45 की उम्र के बाद किया हो। ये तो हम सब जानते ही हैं कि 30-35 की उम्र के बाद, प्रतिवर्ष आपकी मांसपेशियों की क्षमता लगभग 1% कम होने लगती है। 1% प्रतिवर्ष आपकी जो बौद्धिक क्षमता होती है ना, वो भी कम होने लग जाती है। तो यौवन वो समय होता है जब आप ना सिर्फ़ शारीरिक, बल्कि मानसिक रूप से भी अपने शिखर पर होते हो।
अगर आप एक साधारण सी सर्च करेंगे गूगल पर या एआई से पूछेंगे कि जितने नोबेल लॉरिएट हुए हैं, उनको जब नोबेल पुरस्कार मिला था, तो उनकी उम्र क्या थी? तो आपको दिखाई देगा कि बहुत कम लोग हैं पचास पार के, बहुत कम लोग हैं। और अगर आपको 35-40 या 45 में नोबेल प्राइज़ मिल रहा है, तो माने आपने जो अपना सबसे उत्कृष्ट काम है, वो 30-35-40 की उम्र के आसपास किया है और उसकी शुरुआत उससे और 5-10 साल पहले कर दी होगी। तो ऐसा है जैसे आपका जन्म ही इसी काल के लिए हुआ हो। यही जो अवधि है, आपको सौंपी गई है ताकि आप जो सबसे ऊँची चोटी है, उसको छू सकें। लेकिन पता नहीं, वो ऊँची चोटी है क्या?
भीतर कुछ आग्रही रहता है, तड़पता रहता है, कुछ कर जाने के लिए, कुछ अलग पाने के लिए लेकिन वो "कुछ" माने क्या? और "क्या माने क्या"?
कहाँ है वो हिमालय जिसकी चोटी पुकारती है, उसका कुछ पता नहीं चलता। पता क्या चलता है? ये जो चारों तरफ़ बाज़ार सजा दिए गए हैं, इनकी चकाचौंध पता चलती है। और अभी थोड़ी देर पहले हमने कहा कि जितने बड़े और आकर्षक ये बाज़ार आज हैं, उतने मनुष्य के इतिहास में कभी नहीं रहे। ये न सिर्फ़ आपको खींचते हैं, बल्कि इतने ज़्यादा विकल्प देते हैं कि आपको किसी भी तरीक़े से निराश होने का मौका नहीं मिलता।
आपको एक चीज़ से अगर मोहभंग होता है, जो दुनिया भर के बाज़ार सजाए गए हैं — आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक और दैहिक भी; उनमें अगर आपको किसी एक विषय से निराशा मिलती भी है, मोहभंग होता भी है, तो इतनी विविधता है माल की, कि एक हटा तो दस खड़े हो जाते हैं कि "कोई बात नहीं, पिछली बार बात नहीं बनी, अब हमें आज़माओ, इस बार बात बन जाएगी।" और जो युवा व्यक्ति है, उसे कुछ चाहिए। कुछ बहुत बेताबी से चाहिए, कुछ बहुत प्राण-प्रण से चाहिए, पता बस नहीं है कि क्या चाहिए। पता नहीं है क्या चाहिए। तो जब उसके सामने सस्ते और लुभावने विकल्प परोस दिए जाते हैं, तो वो उनको आज़माना शुरू कर देता है।
वो सोचता है, "शायद यही चाहिए, शायद यही चाहिए।" लेकिन वो उनको जितना आज़माएगा, उतना भीतर से और खोखला होता जाएगा। क्योंकि उनको आज़माने पर एक के बाद एक बस हार मिलनी है। और सीधी हार मिल जाए ना, तो भीतर उतनी चोट नहीं लगती, उतना दिल नहीं टूटता जितना कि जब छुपी हुई हार मिलती है, जब जीत में हार मिलती है।
बाज़ार इसलिए तो नहीं सजाया गया है ना कि आप माल ख़रीद ही न सको, कि वहाँ जो कुछ है वो आपकी पहुँच से बाहर का रहे, नहीं। बाज़ार तो इसलिए है कि आप जाओ — अपना श्रम, अपने संसाधन, अपना जीवन, ऊर्जा, ध्यान, प्रेम; सब किसी विषय पर लगा दो, तो विषय आपको प्राप्त भी हो जाता है, मिल जाता है। जिस चीज़ के दाम चुकाओ, बाज़ार वो चीज़ आपको सौंप देती है। ऐसा ही है ना? तो आपको लगता है जीत हो गई। "फलानी चीज़ का मैंने प्रयास करा, और वो मुझे हासिल हो गई। जीत हो गई।" और ये सबसे बुरी हार होती है, क्योंकि इसने आपको जीत का आश्वासन दे दिया होता है।
आप कुछ घर लेकर आते हो — कोई डिग्री हो सकती है, वो कोई नया फ़ोन हो सकता है, वो गाड़ी हो सकती है, वो जीवन में कोई नया व्यक्ति हो सकता है जिसको बड़ी मेहनत से आपने हासिल करा है। कुछ भी हो सकता है, नौकरी हो सकती है, पैसा हो सकता है। वही पुरानी चीज़ें, पुरानी चीज़ें पर बहुत सारे नए-नए लुभावने और विविध प्रकार के रूप-रंगों में। है ना? तो ये सब आप ला सकते हो, जीत सकते हो इनको। और थोड़ी देर के लिए ऐसा लगता है जैसे दुनिया एकदम इंद्रधनुष ही हो गई, वही मिल गया जो हमें चाहिए था, और फिर पता चलता है कि ये तो वो है ही नहीं।
अब वो शब्द आपको समझ में आ रहे हैं? आपने कहा, “युवा बेचैन क्यों है? क्यों इतना डिप्रेशन है, ऐंग्ज़ायटी है? जबकि आज आमतौर पर लोगों के पास इतना पैसा है, इतना पुरानी पीढ़ियों के पास तो नहीं होता था। जितनी आपके पास आज टेक्नोलॉजी है, इतनी पुरानी पीढ़ियों के पास तो नहीं थी। लेकिन आज जितनी मेंटल इलनेस है, वो भी पुरानी पीढ़ियों में नहीं थी। कारण कुछ दिखाई देना शुरू हो रहा है?
एक के बाद एक बाज़ार आपके सामने माल खड़ा करता जाता है "ये चीज़ ले लो, अब ये चीज़ ले लो।" आपका दिल टूटता है, तो आप समझ पाएँ कि पूरी प्रक्रिया क्या थी; उससे पहले ही आपके सामने चार-पाँच और लुभावनी चीज़ें आ जाती हैं। "कोई बात नहीं, यहाँ असफलता मिली तो अब ये कर लो।"
बहुत अच्छी नौकरी लगी थी, वहाँ दो-तीन दिन जॉइन करा तो पता चला कि यहाँ तो मामला ही गड़बड़ है। तो कोई बात नहीं। वीकेंड पर कहीं चले जाओ मॉल में चले जाओ, खा पी लो, घूम फिर लो, कुछ ख़रीद लो। जहाँ कहीं से भी असलियत, सच्चाई दिखनी शुरू हो रही हो, उसके सामने फिर एक आकर्षक पर्दा डाल दो। ठीक वैसे ही जैसे उपनिषद् कहते हैं, कि “सोने के आवरण के पीछे ढका रहता है सच।” जैसे ही सच ज़रा सा भी दिखना शुरू करे — कोई और ऐसी चीज़ आपके सामने परोस दी जाती है, जिससे कि आपका नशा बरकरार रहे। बात समझ रहे हैं ना?
एक रिश्ता टूटा, कोई बात नहीं। कोई ऐप (ऐप्लिकेशन) है, उस पर चले जाओ, प्रयास करो पाँच, सात, दस बार, नया रिश्ता बन जाएगा। एक कोर्स बताया गया कि इसको कर लो तो बिल्कुल सोने की फसल काटोगे। पता चला ऐसा तो कुछ होता नहीं है। कोई बात नहीं, ये दूसरा एक शॉर्ट टर्म कोर्स है, इसको कर लो। ये कोर्स कर लोगे तो बहुत अच्छे करियर प्रॉस्पेक्ट्स हैं, ये कर लो। और क्यों कर लो? आपको कोई आकर अपनी आपबीती सुना देगा — टेस्टिमोनियल दे देगा, या आपको कोई वीडियो फॉरवर्ड कर दिया जाएगा, प्रचार होगा, विज्ञापन होगा। आपको लगेगा, "यही रास्ता है मेरे लिए, यही तो मुझे करना था और ये अगर मिल गया तो बात बन जाएगी।"
आप गए, आपने एक तरह के कपड़े ख़रीदे और वो कपड़े जैसे दुकान में लगते हैं, घर लाकर पहनने के बाद पता नहीं क्यों कभी वैसे नहीं लगते। किस-किस के साथ हुआ है?
(कुछ श्रोता अपना हाथ उठाते हैं।)
कोई बात नहीं, कोई बात नहीं। अभी बहुत सारे और कपड़े मौजूद हैं दुकानों में, जाके उनको आज़माओ ना। पिछली बार जो तुम्हें धोखा मिला इसमें गलती दुकान की नहीं है, व्यवस्था की नहीं है, इसमें गलती तुम्हारी आँख की है। तुमने ठीक से चुना नहीं। और कोई बात नहीं गलती हो गई तो, चलिए दोबारा चलते हैं शॉपिंग भी करेंगे, पॉपकॉर्न भी खाएँगे, और कुछ और लेकर के आएँगे। पर ये सब करते-करते जवानी कब बीत जाती है, आपको पता नहीं चलता। ना पैसा अनंत होता है, ना समय अनंत होता है, ना संसाधन अनंत होते हैं। ये सब जल्दी ही ख़र्च हो जाते हैं, बीत जाते हैं। और आप हक्के-बक्के से देख रहे हो अपने चारों ओर, कि "ये हुआ क्या मेरे साथ?"
यह दुनिया है जिसने मुझे लुभाया था, बड़ा भरोसा दिलाया था कि "आओ, आओ, आओ, मैं बिल्कुल बाँहें खोलकर तुम्हारे स्वागत के लिए तत्पर हूँ। तुम आओ तो मेरे पास, तुम्हें इतने तरह के सुख दूँगी मैं।" और हम भी बिल्कुल उत्तेजित हो गए थे, उन्होंने बुलाया हम चल भी पड़े थे — कभी इस दिशा, कभी उस दिशा। और फिर एक दिन आप आइने के सामने खड़े होते हैं, देखते हैं, "ये क्या सफ़ेद-सफ़ेद क्या है? क्या! सफ़ेद बाल? मैं बूढ़ी हो रही हूँ?” ये कैसे हो गया? समय सारा कहाँ चला गया? ऊर्जा सारी कहाँ चली गई?
जो लोग 40 पार के यहाँ बैठे हैं, अगर वो याद करना चाहेंगे कि उन्होंने अपने 20s एक पूरा दशक कहाँ गुज़ारा था, उनको ठीक से याद नहीं आएगा। जैसे बहुत तेज़ी से पानी बह गया हो, कहाँ चला गया पता ही नहीं। पर कहीं चला नहीं गया, वो किसी ने आपसे लूट लिया।
सिद्धांत ये है कि कुछ अगर आप खो रहे हैं, तो कोई है जो उसको इकट्ठा भी कर रहा है। एक चीज़ जो आपके पास थी आपके पास नहीं है, तो किसी और के पास पहुँच गई है। यौवन अगर आपके जीवन का स्वर्णकाल है और वो स्वर्णकाल आपने अगर गँवाया है, तो किसी ने उसे अपनी झोली में भर भी लिया है, और चुपचाप मुस्कुराते हुए वो निकल लिया है — कि "हो गया! यही तो चाहिए था!"
जवानी क्या नहीं कर सकती? दुनिया की बड़ी से बड़ी क्रांतियाँ जवानों ने करी हैं पर जवानी को पता ही नहीं चलता कि उसका समय कब 'रील्स' देखते हुए, और 'स्क्रॉलिंग' करते हुए बीत गया।
अनंत स्क्रॉलिंग, जब तक अंगूठा टूट के ना गिर जाए, पता ही नहीं चलता कहाँ चला गया। कहीं नहीं चला गया, किसी के मुनाफ़े में चला गया, किसी की जेब में चला गया। और जिनके पास चला गया, ऐसा नहीं कि उन्हें भी कुछ मिल रहा है। बर्बाद उनकी ज़िंदगी भी है, पर उनकी होगी तो होगी। उनकी मूर्खता की ख़ातिर आप अपनी ज़िंदगी क्यों बर्बाद करें? क्यों आप इस हड़बड़ी में रहते हैं कि जल्दी से जो आसपास विकल्प दिखाई ही दे रहे हैं, "एक ये रखा, एक ये रखा, एक ये रखा, ये तो सामने के ही हैं, इनमें से ही कोई उठा लो।" और जब वहाँ पर चोट पड़े, धोखा मिले — तो चलो ये नहीं, तो ये वाला ले लो। ये नहीं, तो ये वाला ले लो।
और इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन हो चुका है औद्योगिक क्रांति के बाद। अब तो इलेक्ट्रॉनिक क्रांति भी हो चुकी है। आपको ऐसे-ऐसे विकल्प दिए जाएँगे जो आपने सोचे भी नहीं, माँगना तो दूर की बात है। आप माँगने नहीं गए थे, आपने सोचा भी नहीं पर आपको परोसा जाएगा कि देखो अब ये आठ नए तरह के बर्गर हैं, 18 नए तरीक़े के फ़ीचर्स हैं फ़ोन में। फलाने माल में इतने तरह की वैरायटी आ गई है। अरे! कहाँ तुम इधर-उधर बस भारत में ही घूम रहे हो? ये देखो, ये 18 प्रकार की नई एग्ज़ॉटिक वेकेशन डेस्टिनेशंस हैं। क्या यार, तुम जवान आदमी हो और अभी तक तुम यहाँ घूमने नहीं गए? क्या कर रहे हो?
और हाँ अगर घूमने जाना है, तो उसके लिए हम ही लोग तुम्हें लोन दे देंगे। आप घूम के आइए, ये देखिए ये बहुत बढ़िया जगह है, इसकी आपको तस्वीर दिखाई जा रही है। जवान आदमी, अभी नहीं जाओगे तो कब जाओगे भाई, जब दाँत गिर जाएँगे? अभी जाओ, यहाँ जाओ तो वहाँ पर बिल्कुल स्वर्ग लोक उतरा हुआ होगा पोस्टर पर, और कुछ सुंदरियाँ, अप्सराएँ भी। आप बिल्कुल तुरंत राज़ी हो जाएँगे "हाँ, मुझे जाना है!" पैसे नहीं हैं? कोई दिक्कत नहीं, सिर्फ़ 15% की दर पर हम दे रहे हैं ना। हम आपको ये डेस्टिनेशन भी दे रहे हैं — जाइए, और हम उसको फाइनेंस भी कर रहे हैं — जाइए।
इतना कुछ चारों ओर बिखरा रहता है कि आप बिल्कुल आतुर हो जाते हो, लालायित हो जाते हो — ये बाज़ार का काम और इसके साथ फिर समाज है, और शरीर है। समाज में तो शुरुआत अपने ही परिवार से होती है, कि जल्दी से कोई चुनाव करो ना! जल्दी से कोई रास्ता, कोई ढर्रा पकड़ो ना! बाज़ार दरवाज़े पर खड़ा ही हुआ है, पूरा ट्रक लेकर के, "ये चीजें हैं, इनमें से बताओ क्या-क्या चाहिए?"
आप घर के अंदर हो, वो ट्रक आपके दरवाज़े पर खड़ा है। और जो घर के अंदर लोग हैं, वो भी आपको धक्का दे रहे हैं, "अरे देखो, इधर का बंटू और उधर की पिंकी उन्होंने तो माल चुन लिया और वो जाकर के सेटल हो गए। तुम क्या कर रहे हो? तुम भी जल्दी से कुछ उठाओ!" और बाज़ार और समाज के बाद सबसे बड़ा दुश्मन तो अपने सबसे पास, अपना शरीर ही है। वो भी चिल्ला रहा है, "हाँ, मुझे सुख चाहिए! सुख चाहिए!" जवान है तो देह का सुख चाहिए, वो भी चिल्ला रहा है।
तो आप जल्दी से जाकर के यही जो सस्ते लेकिन विविध विकल्प अपने चारों ओर देखते हो, इनमें से कुछ उठा लेते हो। चोट लगती है, तो फिर दूसरा उठा लेते हो, तीसरा उठा लेते हो, करते जाते हो, करते जाते हो। 20–25 साल गँवाना कौन सी बड़ी मुश्किल बात होती है, बूढ़े हो जाते हो। ये है कुल मिलाकर जवानी की कहानी। और जितना तुम ये सब करते जाते हो उतना ही भीतर जो बैठा हुआ है, जो छटपटा रहा है कुछ और पाने के लिए, वो बेचैन होता जाता है, वो रो पड़ता है।
वो भीतर से बस यही चिल्ला रहा है "ये नहीं! ये नहीं! ये भी नहीं! नहीं! नहीं! ये भी नहीं! ये भी नहीं!" तुम उसे ला-ला के नए-नए तरीक़े के रंगीन माल दिखा रहे हो, "अब ये ले लो, अब ये ले लो, अब ये ले लो।" सतही तौर पर तुम खुश भी होते जा रहे हो। लेकिन कोई है भीतर, आप उसे कितनी भी घूस दिखा दो वो ईमान नहीं छोड़ता। वो कहता है "नहीं, ये नहीं चाहिए था!" तो तुम कहते हो "ये ले लो! ये ले लो! ये ले लो!" उसे ललचाते हो, लुभाते हो वो नहीं मानता। वो कहता है कि "तुम्हें ऊपर-ऊपर से भोग करना है, सुख मनाना है, तुम कर लो, हम तो नहीं मानेंगे।"
मेरे ख़्याल धूमिल जी का वक्तव्य है, मैं ठीक-ठीक पूरा शायद न उद्धरत कर पाऊँ पर कुछ इस तरह है — “जब-जब महफ़िलों में होता हूँ, बाज़ारों में होता हूँ; रह-रह कर चहकता हूँ।” ये जवानों को अपनी-सी बात लग रही है, कितने जवान हैं यहाँ पर? मैं तो दोनों ही हाथ खड़े कर देता हूँ। “जब-जब महफ़िलों में होता हूँ, बाज़ारों में होता हूँ; रह-रह कर चहकता हूँ।” जैसे आप चहकते हो।
आपने देखा है कभी आप मॉल वग़ैरह जाते हो, आपको कुछ ना भी ख़रीदना हो तो भी मूड अच्छा हो जाता है। इतनी सारी चिज्जू दिखाई दे रही होती हैं ना बस। शीशे की दीवार है उससे आप देखो चिज्जू दिख गई है, देखने में ही बड़ा अच्छा लग जाता है और एसी भी है। बस देखने में ही मन अच्छा हो गया — दर्शन हो गए, दर्शन हो गए। लेकिन वापस आकर, अपने कमरे के एकांत में जूते से निकाले पाँव-सा महकता हूँ।
जब-जब महफ़िलों में होता हूँ, बाज़ारों में होता हूँ, खूब चहकता हूँ। लेकिन वापस आकर, अपने कमरे के एकांत में जूते से निकाले गए पाँव-सा महकता हूँ।
ये है कहानी — चहको, चहको, चहको, पर भीतर कोई है जो चहकने से इंकार कर देगा। वो नहीं मानेगा। वो कहेगा, "मुझे ये सब चीज़ें चाहिए नहीं थीं।" आप झल्ला जाओगे, आप पूछोगे, "ये नहीं चाहिए था तो क्या चाहिए था?" तो वो कहेगा, "मेरे पास इसका जवाब नहीं है।" तो आप कहोगे, "जब तुम्हारे पास जवाब नहीं है, तो मुझे ये सब जो मिल रहा है मुझे यही भोगने दो ना!" वो कहेगा, "नहीं! इससे बात नहीं बन रही है। कुछ और! कुछ और!"
यह जो "कुछ और" है ना — यही जीवन का, जवानी का उद्देश्य है। उसी को पाना है, और वो असंभव नहीं है और वो ऐसा भी नहीं है कि बहुत-बहुत मुश्किल है, बहुतों ने पाया भी है। और आपका भी जन्म बस उसी को पाने के लिए हुआ है। और उसको नहीं पाओगे, तो अंजाम यही होगा — अवसाद, तनाव, और अपनी आंखों के सामने बर्बाद होता हुआ एक जीवन।
बर्बादी की कोई यही परिभाषा थोड़ी होती है वो पुरानी, बासी परिभाषा थी — कि बर्बादी का मतलब है कि खाने को पैसे नहीं हैं और पांव में फटी चप्पल है। दुनिया आर्थिक रूप से अब जितनी उन्नत है, भारत भी शामिल है उसमें, उतना कभी नहीं थी। मैं हर चार-पाँच साल में भोपाल आता हूँ और चीज़ें बदलती हुई पाता हूँ । सबसे पहले मैंने 2004 में वक़्त गुजारा था यहाँ चार महीने और उसके बाद से कुछ-कुछ सालों में आता रहता हूँ। हर बार तरक्की हो रही है, तरक्की हो रही है, सब हो रहा है।
तो बर्बादी की परिभाषा अब ये नहीं है कि पैसे ही नहीं हैं, पैसे अब सबको मिल जाते हैं। जितनी आपकी कामना हो, उतने कभी नहीं मिलते, पर हैं। कितने मोबाइल फोन हैं भारत में, पता है ना? कितने हैं, पता करिएगा। तो ऐसी स्थिति तो बिल्कुल भी नहीं है कि लोगों के पास खाने-पीने को या पहनने को नहीं है या सर छुपाने को नहीं है। है वो, पर अब वो सब कम होता जा रहा है और आगे और भी कम हो सकता है। अभी —
बर्बादी की परिभाषा दूसरी है, और बर्बादी की परिभाषा ये है कि जन्म ही अकारथ चला गया।
एक के बाद एक चीज़ें आज़माते रहे, रिश्ते आज़माते रहे, अनुभव आज़माते रहे और जब उनमें चोट पड़ी तो ये किया कि, और चीज़ें और रिश्ते आज़माएँगे और आपका जन्म इसलिए नहीं हुआ है। भीतर है कुछ, जो कुछ और माँगता है। अभी "कुछ और" अगर साफ़-साफ़ परिभाषित होता तो हम सब कह देते, "मुझे भी कुछ और चाहिए," और एक बहुत बड़ी दुकान खुल जाती, यहाँ कुछ और मिलता है।
इस "कुछ और" के साथ एक राज़ जुड़ा हुआ है, और वो राज़ ये है कि इसको पाना नहीं बहुत मुश्किल है। ये चीज़ लगती बहुत दूर की है, पर इसको पाना नहीं बहुत मुश्किल है, बशर्ते जो कुछ आपको लुभाने के लिए बाज़ार, समाज और शरीर ने तैयार कर रखा है, आप उसके प्रति थोड़ा विवेक और थोड़ा संयम रख पाएँ तो। संयम की भी ज़रूरत नहीं है, विवेक पर्याप्त है। विवेक से संयम अपने आप आ जाता है। जो भी कुछ आपको दिया जा रहा है, हड़बड़ी में उसको आप स्वीकार करने से अगर आप इंकार कर दें, इतना काफ़ी होता है। पर जल्दी बहुत होती है और आप डर जाते हैं, क्योंकि ट्रेन छूटी जा रही है और उस ट्रेन पर सभी सवार हैं, "मैं अकेला ही तो नहीं रह जाऊँगा कहीं पर।"
और विशेषकर भारत में हमारी परवरिश में डर का बड़ा माहौल रहता है। और डर माने यही नहीं होता कि थप्पड़ मार दिया, सज़ा दे दी। जहाँ कहीं भी आज्ञाकारिता पर बहुत ज़ोर है, वहाँ माहौल डर का ही है। जहाँ कहीं भी अच्छा बच्चा उसको माना जाता है जो आज्ञाकारी है, वहाँ समझ लो कि डर गहरा है।
और जब डर बहुत होता है ना, तो आप सवाल नहीं कर पाते, आप नकार नहीं कर पाते। आप नहीं कह सकते कि, "ये सब लोग जो कर रहे होंगे, कर रहे होंगे। ये कुछ पा रहा होगा, ये किसी दिशा जा रहा होगा इनको जाने दो, मैं अभी तैयार नहीं हूँ, मुझे कुछ और देखना है। क्या देखना है पता नहीं, पर ये नहीं चाहिए ये निश्चित है।" ये कह पाने के लिए एक भीतरी आज़ादी चाहिए, जो हमें भारत में आमतौर पर हमारे घरों में, परवरिश में मिलती नहीं है। हमारी संस्कृति भी जैसी है और लोकधर्म जैसा है, उसमें डर पर बहुत ज़ोर है। सर झुका कर चलो, बहस मत करो, पुराने लोगों की बातें मानो।
तो आप बात मान भी लेते हो और जो कुछ पुराने लोगों ने करा था, वही आप भी कर जाते हो। तो जैसे पुराने लोगों की ज़िंदगी बर्बाद थी, वैसे ही आपकी भी हो जाती है। जो सब आपको बता रहे हैं कि — "जल्दी से बेटा, अब जो नौकरी मिल रही है ले लो और उसके बाद फिर ये करना, फिर एक अटेम्प्ट और देना, फिर उसमें ऐसे कर लेना, वैसे कर लेना" — जो ये सब बता रहे हैं, उन्होंने ख़ुद ज़िंदगी में क्या हासिल कर लिया?
ठीक है, छोटी-मोटी चीज़ें सब हासिल कर लेते हैं। रिटायर होने के बाद एक घर सबका होता है, अब गाड़ी भी लोगों के घरों में होने लगी है, बहुत अच्छी बात है। लेकिन वो जो "कुछ और" है, क्या उन्होंने हासिल करा है? और नहीं करा है, तो जीवन तो बर्बाद ही गया ना। पैदा आप खाने और सो जाने के लिए नहीं हुए थे। वो काम तो सारे जानवर भी करते हैं। बंदर भी कोशिश करता है कि जिधर सबसे ज़्यादा फलदार, रसदार पेड़ हो, उधर पहुँच जाऊँ और कब्जा कर लूँ और ज़िंदगी पूरी मौज में बीते। ये काम तो जानवर भी कर लेते हैं।
इंसान का जन्म किसी और उद्देश्य के लिए होता है। फिर हम आ गए "कुछ और," "कुछ और"। काश कि ये "कुछ और" सामने आ जाता, पहुँच में होता। जिन्होंने जाना, उन्होंने कहा कि — ना उस तक पहुँचने की ज़रूरत है, ना उसे सामने कहीं खोजने की ज़रूरत है। बस जिन चीज़ों में तुम खो जाते हो, उनमें खोना मत। वो चीज़ मिली ही हुई है, जिसके लिए तुम पैदा हुए हो।
तो फिर हमें करना क्या है? तुम्हें करना ये है कि तुम्हें खोने से बचना है, ये तुम्हारा काम है। तुम्हें करना ये है कि दुनिया भर की रोशनियाँ और चकाचौंध जब तुम्हें खींचे अपनी ओर तो तुम्हें कहना है, "क्या इसके लिए पैदा हुआ हूँ?" तुम्हें करना ये है कि अगर सुननी ही है, तो बाज़ार, समाज, शरीर की सुनने की अपेक्षा उनकी सुनो — जिनके दम पर आज हम अपने आप को इंसान कह पाते हैं। वो चंद लोग, मुट्ठी भर लोग वो अपने आसपास मिलेंगे नहीं, क्योंकि वो बिरले होते हैं। लाखों-करोड़ों में एक होते हैं।
तो आपको अपने आसपास यहाँ मोहल्ले में ही, या ज़रूरी नहीं है कि शहर, गाँव, कस्बे में टहलते हुए कहीं पर मिल जाएँगे या अपनी यूनिवर्सिटी में मिल जाएँगे, बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है। संभावना बहुत कम है। पर वैसे लोग अपने पीछे अपना हाल छोड़ गए हैं, अपनी बात छोड़ गए हैं, अपनी सीख छोड़ गए हैं, अपनी जीवनी छोड़ गए हैं। उसको पढ़ो। उसको पढ़ने से हौसला आता है कि — झोंका आ रहा है, उसके साथ बह जाना ज़रूरी नहीं है कि खड़ा रहा जा सकता है, अपने पैरों से अपनी ज़मीन पर डट करके कि कोई आगे मेरे बहुत अपना धन, वैभव, प्रतिष्ठा, बल दिखा रहा हो तो भी रीढ़ सीधी रखी जा सकती है।
याचक बनना, गिड़गिड़ाना, किसी कतार में जाकर खड़े हो जाना, बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है।
और जैसे-जैसे जो कुछ आपकी आँखों के सामने है, आप उसका सामना करना शुरू करते हो, समझो बात को। वो हमारी आँखों के सामने तो होता है, पर हम कभी उसका सामना नहीं करते हैं। हम उसके आगे घुटने टेक देते हैं। जो कुछ आँखों के सामने है ना, उसका सामना करना सीखो। तो वैसे-वैसे जो आँखों के पीछे है, वो अपने आप प्रकट होने लगता है। वही वो "कुछ और" है, जिसके लिए जवानी मिली है आपको।
फिर उसके बाद नए आविष्कार होते हैं, नया साहित्य रचा जाता है, कलाएँ अपने सुंदरतम रूप में निखरती हैं, सामने आती हैं, अन्याय के शोषण के खिलाफ़ बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ हो जाती हैं। तब होता है।
जिनके मुँह में बर्गर भरा हुआ है, वो क्रांति के नारे क्या लगाएँगे, कैसे लगाएँगे? उनको कहा जाए, मुट्ठी भींचो और ऐसे बोलो "आजादी," "सत्य," "मुक्ति" — तो कहेंगे, "अरे, इसमें वो नया आइफ़ोन है, वो कहाँ रखें पहले?" हमें बर्गर से और आइफ़ोन से कोई समस्या नहीं है। हमें समस्या है उस जीवन से जो सोचता है कि, "यही सब पाना मेरा उद्देश्य है।" जीवन को सार्थकता देने में फोन काम आ रहा हो, तो बहुत अच्छी बात है फोन होना चाहिए। पर फोन पा लेना और सोचना कि, "वाह, क्या बढ़िया चीज़ मिल गई है!" ये पागलपन है।
आपके पास एक अच्छी, ऊँची, सुंदर मंज़िल हो पहुँचने के लिए और फिर आप कहें कि, "जूते चाहिए उस यात्रा के लिए" तो बिल्कुल हक़ है आपका कि अच्छे, समुचित जूते आप हासिल करें। पर आना-जाना कहीं है नहीं — मियां की दौड़ मस्जिद तक — ऐसे ही बस अपने ही इर्द-गिर्द परिक्रमा करनी है और कह रहे हो कि "जूते चाहिए, 20,000 के।” कान में झुलाने हैं जूते? क्या करोगे उन जूतों का? तुम्हारे पास कोई वाजिब मंज़िल नहीं है पहुँचने के लिए, क्या करोगे जूतों का? बात आ रही है समझ में?
जवानी इसलिए है ताकि दुनिया में जो कुछ भी ठीक नहीं है, उसे आप ठीक कर सको। और "दुनिया" माने, भीतर की दुनिया और बाहर की दुनिया, दोनों जगह। और वो काम अगर आपने अपनी युवावस्था में नहीं करा है, तो मत सोचिएगा कि जब पैसा बहुत हो जाएगा और सुरक्षित अनुभव करूँगा और बूढ़ा हो जाऊँगा, तो रिटायर होने के बाद कुछ करके दिखाऊँगा। लाठी टेकते हुए क्रांतियाँ क्या करोगे जब जवानी में ही नहीं करी।
बाहर आप कुछ बदलो न बदलो, भीतर तो कोई बैठा है ना, जिसको जवाब देना होता है — वो असली चीज़ है। उसी के साथ रहना होता है। चेहरा भी उसी को दिखाना पड़ता है, क्योंकि वो पूर्णता माँगता है। और आपकी ज़िंदगी इसीलिए है कि उसे पूर्णता दे पाओ। आपने उसको दी नहीं है, तो आप अपनी नज़रों में ही शर्मिंदा रहोगे। आईने को देखोगे और कहोगे "मैं इस व्यक्ति का सम्मान नहीं कर सकता।" आप अपना ही अगर सम्मान नहीं कर सकते, तो कैसी है फिर ज़िंदगी? कुछ आ रही है बात समझ में?
दुनिया को आज जितने सुधार की ज़रूरत है "सुधार" नहीं, छोटा शब्द है, 'आमूलचूल परिवर्तन' की ज़रूरत है। बहुत कुछ ऐसा है जिसको जड़ से उखाड़ फेंकने की ज़रूरत है। उतनी तो ज़रूरत इतिहास में कभी भी नहीं रही। और विकसित होते हुए राष्ट्रों की जवानी आज जितनी सोई हुई है, उतनी कभी नहीं सोई हुई थी। कभी भी नहीं। और ये ग़ज़ब बात है, क्योंकि आज आपके पास शिक्षा भी ज़्यादा है, तकनीकी भी ज़्यादा है, सूचना ज़्यादा है और पैसा भी ज़्यादा है।
थोड़ा पिछली शताब्दी पर ग़ौर करिएगा, ठीक है? पूर्वार्ध और उत्तरार्ध पिछली शताब्दी का — 1950 से पहले का पाँच दशक और 1950 के बाद के पाँच दशक। आप जब महापुरुषों की बात करते हो, तो ज़्यादातर नाम आपको कहाँ से मिलते हैं? 1950 माने लगभग आज़ादी से पहले या बाद में।
श्रोता: पहले।
आचार्य प्रशांत: ये कैसे हो गया? आज़ादी से पहले तो भुखमरी की हालत थी। भुखमरी की हालत थी और जितने भी बड़े नाम हैं, जिनको आज आप इतिहास पुरुष कहते हो, वो तो सब आपको 1950 से पहले के दिखाई दे रहे हैं, 90%। उसके बाद क्या हुआ? हमारे जीन्स बदल गए क्या? उसके बाद जवानी बिक गई क्योंकि बाज़ार में चिज्जू आ गईं, क्या करना है? क्यों टैगोर की तरह लिखें? क्यों भगत सिंह की तरह भिड़ें? करना क्या है? इतनी सारी चीज़ें आ गई हैं दुनिया में, अब मौज करते हैं ना। करना क्या है?
विज्ञान के क्षेत्र में भी आप देखिएगा, तो जो बड़ी खोजें भारतीयों ने करी हैं, वो आपको 1950 के बाद की नहीं मिलेंगी। और 1900 से 1950 के बीच में आपको विज्ञान के क्षेत्र में भी कई बड़े भारतीय नाम मिल जाएँगे। जहाँ नया-नया पैसा आने लग जाता है, वहाँ बड़ी समस्या हो जाती है। अतीत ग़रीबी का है ना — ग़रीबी नहीं, भुखमरी का अतीत है, अकाल का अतीत है, दुर्भिक्ष चारों तरफ़। तो नया-नया जब पैसा आता है तो भोग वृत्ति विस्फोट ले लेती है, कि हमारी कई पीढ़ियों ने जो चीज़ें नहीं भोगीं और वंचित रह गए, वो सब हम भोग डालेंगे।
जैसे बेचारा कोई गाँव का हो, उसने कुछ ना देखा हो, वो गाँव भी कोई सुदूर पिछड़ा हुआ गाँव, उसको अचानक आप ले जाओ किसी बहुत बड़े शहर में, यूरोप के, अमेरिका के और उसके हाथ में पैसा भी दे दो — वो क्या करेगा अब? उसको बचाना पड़ेगा, वो मर ना जाए। वो इतना कन्ज़म्प्शन करेगा, इतना कन्ज़म्प्शन करेगा कि मरने को आ जाएगा। ये हमारी हालत है।
हर तरफ़ से हमें खींचा जा रहा है — देखो, तुम ये कर लो, तो तुम्हें ये मिल जाएगा, ये कर लो, ये मिल जाएगा, ये कर लो, ये मिल जाएगा। और जिन चीज़ों को हमें दिखाया जा रहा है, वो चीज़ें हमारे बाप-दादाओं को तो कभी नसीब थी नहीं, तो हमें लगता है कि बड़ी अद्भुत चीज़ें हैं। और चूँकि उन चीज़ों का अनुभव हमारे घर, परिवार, समाज में किसी ने पहले नहीं करा था, तो हमें कोई बताने वाला भी नहीं है कि, "बेटा! हम इनका अनुभव कर चुके हैं और इनमें कुछ नहीं रखा है।"
विदेशों में जो इंडियन यूथ है, इसको आप जानते हैं किस दृष्टि से देखा जाता है? कुछ तो जो बिल्कुल क्रीमी हो गए, वो अलग हैं। पर बाक़ी जो ये इंडियन मैनपावर इतना बड़ा है करोड़ों में, इसको कैसे देखा जाता है? चीप लेबर। चीप लेबर — इनको पैसा दिखाओ थोड़ा, और ज़्यादा दिखाओ, फिर थोड़ा और ज़्यादा दिखाओ, कुछ भी करने को तैयार हो जाएँगे। और मेरे लिए अफ़सोस की बात है कि वो जो सोच रहे हैं, जो कह रहे हैं, वो शायद बहुत ग़लत नहीं है। स्थिति ऐसी ही है।
जब तुम कुछ भी करने को तैयार हो जाओगे, तो भीतर बेचैनी उठेगी कि नहीं उठेगी? इंसान हो भाई, पत्थर नहीं हो, जानवर भी नहीं हो। गधा होता है, उसके ऊपर आप दुनिया की सबसे ऊँची किताबें रख दो और बोलो कि ढो 20 किलो — वो ढो देगा, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। कहेगा, "भैया, मुझे तो क्या मिलना है?" ये सब हो जाए, उसके बाद शाम को थोड़ा सा खाना मिल जाए ना, वो तो मुझे मिल ही जाएगा। 20 किलो था, मैंने ढो दिया। उसको कहा जाए, "चल हीरे-मोती हैं, महंगे हैं," वो ढो देगा 20 किलो, वो भी ढो देगा। रेत-बालू 20 किलो, वो भी ढो देगा। और लाशें हों, लोगों के कटे हुए अंग हों, खून बह रहा हो 20 किलो का ऐसा बोझ हो, वो उसको भी ढो देगा। उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। वो क्या बोलेगा? "कुछ भी ढो दो, मुझे मेरा पैसा तो मिल ही जाता है ना!" और गधे के लिए "पैसा" माने "वो तो मिल ही जाता है ना!"
पर आप पशु नहीं हो। आप और हम अपने काम में सार्थकता माँगते हैं। हम ऊपर-ऊपर से भले ना मानते हों, पर भीतर कोई बैठा है, जो पूछता है कि "ये जो दिन भर कर रहे हो, ये है क्या?" और ये वो सवाल है, जिसके सामने आपको खड़े होना पड़ेगा। आपको बहुत सारे उपलब्ध रास्ते अपने लिए बंद करने पड़ेंगे। आपको बहुत सारे तोहफ़े और न्यौते ठुकराने पड़ेंगे। कल्पना बहुत हो गया कि कुछ मिल जाए, कुछ मिल जाए, कुछ मिल जाए, कुछ मिल जाए। वो सब कुछ, जो बिल्कुल तश्तरी पर सजाकर आपको मिल रहा होगा — आपको उसको भी ठुकराना सीखना होगा।
और जब आप ये सब कर रहे होंगे, उस वक़्त हो सकता है आपका साथ देने वाला कोई ना हो। हो सकता है बिल्कुल नितांत अकेलापन, सूनापन हो — क्योंकि एक रेलगाड़ी आई थी और पूरी भीड़ उसमें सवार होकर चली गई। आप अकेले हो, जिसने कहा, "नहीं, मैं नहीं चढ़ूँगा।" बिल्कुल हो सकता है, पर इसका सामना आपको करना पड़ेगा। ये सामना करने में दम लगता है। इसीलिए आपको जवानी मिली है, क्योंकि जवानी में दम होता है। दम का दो तरह से इस्तेमाल हो सकता है।
मेरे पास ताक़त है उसका दो तरह से इस्तेमाल हो सकता है। आप जवान हो, आज आपके पास ताक़त है — बुद्धिबल बाहुबल, सब है, उसका दो तरह से इस्तेमाल हो सकता है। एक ये कि जिन्होंने पूरी पृथ्वी को ही आज बर्बाद कर दिया, मैं उनका सेवक बन जाऊँ, अपनी शक्ति को उनकी चाकरी में लगाऊँ, बिल्कुल हो सकता है। हो सकता है ना? और आप ये करोगे तो तुरंत आपको लाभ भी हो जाएगा, वो कुछ चीज़ें आपकी ओर फेंक देंगे, "ले।"
और हमारी जवानी बहुत उत्सुक है किसी के सामने जाकर के घुटने टेक देने के लिए, कि जाएँ और वो जो भी कुछ करवा रहा हो, जो भी कुछ करवा रहा हो, गधे के ऊपर चाहे वो लाशें ढोने को कह रहा हो "मैं ढोऊँगा, बस तू मुझे कुछ फेंक देना।" रुपया, पैसा, सोने के दो-चार टुकड़े, जैसे कुत्ते को बोटी फेंकी जाती है। माफ़ करिएगा मुझे मालूम है कड़े शब्द हैं, पर ये कड़े शब्द किसी को तो कहने पड़ेंगे ना। जो नंगी सच्चाई है, उसकी बात कोई तो करे। सवाल बेचैनी पर है। मैं कुछ बोल जाऊँ, उससे बेचैनी दूर भी ना हो, तो कोई फायदा? तो आपने सवाल पूछा है, तो मुझे फिर सीधे-सपाट शब्दों में जवाब देने की भी अनुमति दें। तो एक तो ये इस्तेमाल हुआ अपने दम का। और दूसरा इस्तेमाल क्या है?
पहला इस्तेमाल है कि जो कुछ ग़लत है, तुम उसी को समर्पित हो जाओ। जो शोषक है, तुम उसी की सेवा में लग जाओ। ये पहले तरीक़े का इस्तेमाल है अपनी ताक़त, अपने दम का। और दूसरा इस्तेमाल ये है कि दम मिला है ना, तो तुझे तोड़ेंगे। और तुझे तोड़ने की प्रक्रिया में हम टूट भी गए, तो क्या हो गया? ठीक है, क्या हो गया?
14 बिलियन साल पुरानी पृथ्वी, 4 बिलियन साल पुराना जीवन हमारा। उसकी तुलना में हम 60-80 साल जिएँ या 30-40 साल जिएँ, सब एक बराबर है। सब एक बराबर है। और ये तो बिल्कुल अति की एक्सट्रीम बात हो गई कि मरना ही पड़ेगा। आमतौर पे मरना नहीं पड़ता, बस संघर्ष करना पड़ता है। दम जो आपको मिला है ना — वो संघर्ष ही करने के लिए मिला है, बाज़ार का ख़रीदार बनने के लिए नहीं मिला है। कुछ बन रही है बात?
तो दो आपके सामने विकल्प हैं — एक है ऊपर-ऊपर का चैन और भीतर की बेचैनी। ऊपर-ऊपर का चैन मिल जाता है, किसी विदेशी ब्रांड की नई टी-शर्ट ख़रीद लो — उससे भी मिल जाता है, ऊपर-ऊपर का चैन। अच्छा तो लगता है, ये सभी को अच्छा लगता है। कोई आपको ऐसी नई डिश खाने को मिल गई जो भारत में चलती ही नहीं है, पर आप गए, महंगी थी, आपने ख़रीद के खा ली — अच्छा तो लगता ही है। लगता है कि नहीं लगता? अरे, मुझे तो लगता है। ठीक है, बाक़ी सबको नहीं लगता, मुझे लगता है। लगता है पर बस थोड़ी देर के लिए ही। हम लेकिन तैयार हो जाते हैं काफ़ी कुछ दे देने को, है ना?
तो एक तो ये है कि बाहर-बाहर का, ऊपर-ऊपर का चैन और भीतर की बेचैनी। और दूसरा रास्ता ये है कि बाहर की बेचैनी आमंत्रित करनी पड़ेगी, स्वीकार करनी पड़ेगी भीतर के चैन के लिए। भीतर और बाहर दोनों तरफ़ का एक साथ चैन मिल जाए, ये मनुष्य जन्म को सुविधा नहीं है। नहीं है। “देह धरे का दंड है, सब काहू को होय,” किसी तल पर तो बेचैनी स्वीकार करनी पड़ेगी।
ये आपको चुनना है कि आपको भीतरी बेचैनी चाहिए या बाहरी। और जिनको भीतरी बेचैनी चाहिए, स्वीकार है जिन्हें, वो बाहर के चैन के आगे बहुत जल्दी बिक जाते हैं, कहते "भीतर बेचैन हैं कोई बात नहीं, बाहर तो ठीक चल रहा है, चलने दो।" लेकिन अगर यहाँ सुकून चाहिए, तो बाहर फिर संघर्ष झेलने पड़ेंगे। बाहर संघर्ष झेलने पड़ेंगे — ये अनिवार्य कीमत है, जो चुकानी पड़ेगी।
किधर को चाहिए चैन — बाहर या भीतर? भीतर अगर चाहिए, तो बाहर की बेचैनी के लिए तैयार हो जाइए। दोनों एक साथ नहीं मिलेंगे। और बाहर, जिनके जीवन में — अर्थ ये निकलता है कि बाहर जिनके जीवन में आपको चैन बहुत दिखाई दे, कोई संघर्ष है ही नहीं, सब बढ़िया है, ‘चिल’, ‘ऑल कूल’ सब बढ़िया चल रहा है। इतने बजे जाते हैं, नौकरी करते हैं, मस्त वापस आ जाते हैं, कोई समस्या नहीं है, घूस भी मिल जाती है, कोई दिक्कत नहीं है। वापस आते हैं, बढ़िया अपना सब कुछ व्यवस्थित तरीक़े से चल रहा है। व्यवस्थित तरीक़े से परिवार बना लिया है, बच्चे-वच्चे भी हो गए, नौकरी भी वैसे ही चल रही है, और नौकरी सधी-सधाई है, जमी-जमाई है — कहीं संघर्ष जैसी कोई बात है नहीं।
जिनके जीवन में बाहर संघर्ष नहीं, बेचैनी नहीं — वो भीतर से बहुत बेचैन जिएँगे, ये अभिशाप है।
और जिनको भीतर से शांत होना है, उनको बाहर संघर्षों को न्योता देना पड़ेगा। हाँ, आप उनको देखेंगे बाहर-बाहर से तो आपको लगेगा, इसकी ज़िंदगी में तो बहुत ज़्यादा खलबली मची हुई है, उथल-पुथल मची हुई है, उठापटक, मारपीट। कुछ भी इसको आसानी से नहीं मिल रहा है, ये तो हर मोर्चे पर जूझ रहा है। बाहर-बाहर आपको ऐसा दिखाई देगा। पर वो व्यक्ति जानेगा कि संघर्ष बाहर है, भीतर संतुष्टि है। अभी आप चुन लो। बेचैन तो होना ही है, या तो बाहर बेचैन हो लो या फिर भीतर की बेचैनी को झेलो। दोनों चीज़ें एक साथ नहीं मिलेंगी, कि बाहर भी जूझना ना पड़े और भीतर भी आत्मस्थ रहे, बिल्कुल शांत, मौज, बहुत अच्छा चल रहा हो — नहीं, नहीं।
अर्जुन को लड़ने को इसीलिए कहा गया था। अर्जुन, बाहर अगर नहीं लड़ोगे ना तो भीतर तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे। अर्जुन, बाहर अगर नहीं लड़ोगे, तो भीतर तुम्हारे ज़िंदगी भर लड़ाई चलती रहेगी। और यही सज़ा होगी तुम्हारी — लगातार एक बँटा हुआ, खंडित जीवन जिओगे, अंतर्द्वंद रहेगा। आ रही बात समझ में?
मैं आपको नहीं बता पाऊँगा क्या करें, क्योंकि मुझे ख़ुद नहीं पता था कि क्या करना है। पर मुझे ये दिखाई दे रहा था, क्या नहीं करना है। और ये दिखाई देना बहुत मुश्किल काम नहीं होता। आप पढ़े-लिखे लोग हैं, आपके पास सूचना, जानकारी, बाहरी ज्ञान भी है, अपना विवेक भी है। क्या नहीं करना है ज़िंदगी में, ये स्पष्ट हो।
फिर ट्रेन छूटती हो, तो छूटे। इंतज़ार करना पड़े, संघर्ष करना पड़े — उसके लिए तैयार रहिए। रास्ते अपने आप खुलते हैं, नए रास्ते खुलते हैं। देखिए, अगर बिरलों के रास्तों पर चलना है, तो वो रास्ते आपको पहले से तयशुदा, तैयार तो नहीं मिलेंगे। वो रास्ते भी बिरले होंगे ना, वो रास्ते भी धीरे-धीरे अपने आप खुलेंगे। दूसरे लोग आपको नहीं बता पाएँगे कि ये तुम्हारा रास्ता है।
एक चीज़ अपने लिए लेकिन निश्चित रखिए कि जिन रास्तों पर सभी चल रहे हैं, उन रास्तों में तो 99% संभावना यही है कि मामला गड़बड़ है। मत करिए, ये पहले से निश्चित तो भी सतर्क रहिए। बहुत सावधानी से परखिए, कि ये सब मुझे बताया जा रहा है, "ऐसा-ऐसा कर लो," पर ये तो सभी ने करा, और हमेशा से करा — और उनको क्या मिला है? और उनको जितना मिला है, अगर मैं उतने से संतुष्ट हूँ, तो कोई बात नहीं। पर अगर कुछ ज़्यादा चाहिए, कुछ बेहतर चाहिए, तो ठुकराना सीखो। ठुकराना सीखो। और कोई बहुत सर पर ही चढ़कर के बोले "नहीं, ये फलानी चीज़ तो स्वीकार करो," "फलाने रास्ते पर तो चलो जरूर," तो सिर्फ़ ठुकराना ही नहीं, लात मारना भी सीखो।