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आध्यात्मिकता - व्यक्ति गौण, सत्य सर्वोपरि || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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कुल करनी के कारने, ठिग हो रहिगो राम । तब कुल का को लाज है, जब जम की धूम धाम ॥

~ कबीर

वक्ता: जो एक आम साधारण गृहस्थ है, जो अपने चारों ओर हमें दिखाई देता है, उसके लिए कहा है ये दोहा कबीर ने।

“कुल की मर्यादा चलाने के लिए, अपने कथाकथित कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए, राम से च्युत हो बैठे रहे तुम, राम से अलग हो बैठे रहे तुम। अब कहाँ है वो कुल, जब मृत्यु सामने खड़ी है? कहाँ है?” बात को समझेंगे कि इशारा किधर को है।

सतह पर तो कबीर वही कह रहे है और उतना ही कह रहे है, जितना अभी हमने कह दिया। “जीवन भर तुम्हारे लिए ही खटता रहा, जीवन भर तुम्हारे ही लालन-पोषण में लगा रह गया। जब समय था तो परिवार, गृहस्थी, बीवी-बच्चे, इन्ही झंझटो में लगा रह गया। अब मौत सामने खड़ी है, तो पूरा जीवन जो व्यर्थ गया, वो साफ़ दिखाई दे रहा है। अब तुम क्या साथ चलोगे?”

थोड़ा समय लेकर के आए थे, उसी को हम जीवन कहते हैं। वो समय मुक्ति की साधना में भी व्यतीत हो सकता था। और वो समय बीत गया घरेलू झंझटो में, निम्नतम पचड़ो में। तो एक तो ये तल है जिस पर ये अर्थ है। और एक दूसरा तल है, जिस पर मृत्यु वही नहीं है जो जीवनकाल के इतने वर्षों के बाद आती है। वहाँ पर मृत्यु वो घटना है, जो प्रतिपल ही घटती है। वहाँ पर मृत्यु वो घटना नहीं है जो गृहस्थी में बिताए गए सारे वर्षों के बाद आए, वहाँ पर मृत्यु वो डर है, जिसके कारण आप गृहस्थी में संग्लग्न रहते हैं।

कबीर कह रहे हैं, “कुल करनी के कारने…”

कुल करनी में व्यक्ति फँसा ही क्यों रहता है? क्यों बढ़ते हैं परिवार? क्यों खिंचतीं हैं सीमाएँ? क्यों बाँध दिया जाता है दो-चार लोगों को एक दूसरे से, और शेष दुनिया को उनसे अलहदा कर दिया जाता है? यदि कबीर में हम उतरे हों, तो इन सब में मात्र मृत्यु का डर दिखाई देगा। देखिये सारे डर एक ही परिवार के होते हैं, और उन सब में मूल है- मृत्यु का डर। ये पहली बात है जो समझनी ज़रूरी है।

सारे डर एक हैं, और प्रत्येक डर कहीं ना कहीं विलुप्त हो जाने का ही डर है। मौत का ही डर है। “मैं नहीं रहूँगा,” इसके अतिरिक्त कोई और डर होता नही। क्योंकि देहभाव हमारा बहुत सघन होता है, इसलिए देह के नष्ट हो जाने का डर बहुत गहरा डर होता है। उसको हम कहते हैं, “मौत का खौफ है,” हमारे बाकी सारे डर भी वही डर हैं। “मैं नहीं रहूँगा, मेरी पहचान नष्ट हो जाएगी। मानसिक तौर पे मृत्यु हो जाएगी।”

हर मृत्यु मानसिक तौर पर ही है। शरीर भी जब मरता है, तो उस मृत्यु का अनुभव करने वाला तो मन ही है ना।

ये जितने डर हैं, इन सारे डरों का हमारी अस्मिता से सम्बंध है। “मैं हूँ कौन? मैं हूँ कौन?” आप डरे हुए हो इसलिए आपको ज़रूरत पड़ती है कि आप एक परिवार बनाओ। और क्योंकि आप एक परिवार बनाते हो, तो आप और डर जाते हो। समझियेगा बात को।

प्रेम आपने जाना नहीं। बस आकर्षण आपने जाना है। और जहाँ आकर्षण है, वहाँ पर सामने कोई वस्तु है जिससे आकर्षण है। जहाँ आकर्षण है, वहाँ लगातार ये डर रहेगा कि ये वस्तु, ये देह मुझसे छिन ना जाए। “मैं इसका भोग कैसे करूँगा अगर छिन गया तो?” तो प्रेम आपने जाना नहीं, इस कारण आपको विवाह करना पड़ेगा। अब ज्यों ही विवाह कर लोगे, त्यों ही आपकी एक पहचान बनेगी। अब आपको वो सारे काम करने पड़ेंगे जो उस पहचान को बनाए रखने के लिए ज़रूरी हैं।

डर से बनती है पहचान, और पहचान आपके भीतर डर को और गहरा देती है। “कहीं ये पहचान टूट ना जाए, कहीं ये पहचान छूट ना जाए।” जो ये कथाकथित प्रेमी है, ये डरा हुआ है । ये पति बनेगा और पति बनकर और गहराई से डर जाएगा कि कहीं इसका पतित्व छिन ना जाए। मूल में डर का खेल चल रहा है, मूल में यमराज का खौफ है। इसलिए कई मौकों पर कहा है कि तुम्हारा कोई भी रिश्ता सिर्फ तभी प्राणवान हो सकता है, जब उसका आधार आध्यात्मिक हो। तुम्हारे रिश्तों का आधार आध्यात्मिक नहीं, सामाजिक है। इसलिए उनमें जान नहीं होती, उनमें सिर्फ हिंसा होती है। बात समझ में आ रही है?

जो कुल करनी है, ये आत्मिक नहीं होती है, ये सामाजिक होती है। जो कुछ भी सामाजिक होगा, वहाँ होगा ही यही कि व्यक्ति महत्वपूर्ण है, और राम गायब हैं। समाज क्या है? रामों का समाज होता है क्या? किसका समाज है? व्यक्तियों का। जो समाज को महत्व दे रहा है, वो किसको महत्व दे रहा है?

श्रोतागण: व्यक्तियों को।

वक्ता: और आध्यात्मिकता का अर्थ ही यही है कि- व्यक्ति गौण है, सत्य सर्वोपरि है।

आध्यात्मिकता और सामाजिकता इसलिए कभी साथ नहीं चल सकते। आध्यात्मिक व्यक्ति समाज के अतीत होगा। उसे असामाजिक कहना तो उचित नहीं होगा, पर वो समाज से आगे होगा। वो किसी दूसरे तल पर है। बात समझ में आ रही है? जो सामाजिक मन है, वो किसको महत्व देता है? व्यक्तियों को। आध्यात्मिक मन किसको महत्व देता है? सत्य को, समष्टि को। तो ये दोनो साथ कैसे चलेंगे? कोई तरीका नहीं है इनके साथ चलने का।

‘कुल करनी’ जहाँ आई, तहाँ कौन महत्वपूर्ण हो गया? कौन महत्वपूर्ण हो गया? व्यक्ति। अब दुविधा उसमें ये है कि ये जो व्यक्ति महत्वपूर्ण हुए हैं, इनके साथ तमगे लगे हुए हैं कि ये तो महत्वपूर्ण हैं ही हैं। “अरे! ये कोई साधारण व्यक्ति नहीं है, ये कौन है? ये पिता है।” बड़ी मुश्किल है। आध्यात्मिक व्यक्ति तो जानता है कि जीवन में एक ही है जो महत्वपूर्ण है। वो कौन?

श्रोतागण: सत्य।

वक्ता: और समाज तुमसे कह रहा है, “नहीं, तुम कुलवंत हो। तुम्हारे लिए माँ महत्वपूर्ण है, बाप महत्वपूर्ण है, बेटी और बेटा महत्वपूर्ण है, पत्नी महत्वपूर्ण है।” अब दोनों बात कैसे साथ चलें? या तो सत्य को ले लो, या समाज को ले लो। समाज तो व्यक्तियों की ही बात करता है। समाज तो तुम्हें जो कुछ भी देगा, वो व्यक्तियों द्वारा ही रचित है। समाज तुम्हें मंदिर भी देगा, तो भी व्यक्तियों द्वारा बनाया हुआ है। समाज तुम्हें एक प्रकार की ऊँची धार्मिकता भी दे देगा, व्यक्तियों द्वारा बनाई हुई।

समाज तुम्हें ऐसा कुछ नहीं दे पाएगा जो आदमी के मन से नहीं निकला है। समाज में जो कुछ है, वो आदमी के मन की ही कृति है। और आध्यात्मिकता वो, जो मन के अतीत है। कैसे होगा दोनों का साथ?

वही कबीर कह रहे हैं, “कुल करनी के कारने, ठिग हो रहिगो राम, तब कुल का को लाज है, जब जम की धूम धाम।”

अब कहाँ गयी कुल की लज्जा, मर्यादा। और आत्यांतिक अर्थो में कहीं गयी नहीं है। उसी लज्जा, मर्यादा का नाम तो यमराज है, वही तो है, और कुछ अलग थोड़ी ही है, वही तो है। यमराज जीवन के अंत में नहीं पधारते, यमराज प्रतिक्षण हैं। प्रतिक्षण सामने खड़े हैं। उन्हीं के खौफ़ में तो हम जी रहे हैं। आदमी का प्रत्येक डर यमराज का ही तो डर है। और किसका डर है? इसलिए तो तुम बच्चे पैदा करते हो कि- मैं नहीं भी रहूँगा तो कोई और रहेगा, जो मेरा अंश है।

“मेरे बाद भी इस दुनिया में ज़िन्दा मेरा नाम रहेगा, जो भी तुझे देखेगा, तुझे मेरा लाल कहेगा।”

(सभी हँसते हैं)

-‘बोध-सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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