समलैंगिकता पर विशेष बातचीत

Acharya Prashant

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समलैंगिकता पर विशेष बातचीत
ये जो पूरा मुद्दा ही है, ये कोई बहुत ऊँचे तल का नहीं है। रिश्ता कैसा भी हो, समाज को स्वीकार हो, नैतिक हो, अनैतिक हो, पता नहीं कैसा है। सवाल ये है कि आप जिसकी ओर जा रहे हो, वो इंसान आपको क्या देने वाला है? ऊँचाई देने वाला है? यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, आपसे जुड़ने के बाद मजबूरियों की दुकान तो धीरे-धीरे बंद हो रही है। लेकिन एक टीस रहती है भीतर, कि क्यों नहीं बीस की उम्र में या बाईस की उम्र में कभी यूट्यूब पर अद्वैत वेदांत कभी सर्च किया और आपको जान पाया और आपसे जुड़ पाया।

आचार्य जी, मेरा प्रश्न भी इसी बिंदु से उठ रहा है। मेरा प्रश्न है, जो हमारे समाज में होमोसेक्सुअलिटी से रिलेटेड जो टैबू है, उससे एसोसिएटेड है। जब एक किशोर अपने होमोसेक्सुअल डिज़ायर्स को अपने परिवार में रखने का सोचता है, तो वो जो वातावरण होता है, वो इतना स्वस्थ नहीं होता। तो कई बार वो उस बात को रख भी नहीं सकता। और कभी अगर वो रखता भी है, तो वो उधर से जो बातचीत होती है, वो बहुत हेल्दी नहीं होती है। बहुत ही शेम और गिल्ट वाली होती है और कई बार हर्ष-हाश वाली होती है। इनबिशंस वाली होती है।

अब इसमें आचार्य जी दो कॉन्सिक्वेंसेस होते हैं। एक तो उस किशोर का कुंठित मन, वो फ्रस्ट्रेशन में जीता है। और इन लोगों को, जो मदद भी मिलती है, जो वॉइसेस हैं भी सपोर्ट के लिए, वो भी इनके लिए कुछ ख़ास फ़ेवर नहीं करते। वो भी इनका जो रेबेलियन है, वो बॉडीली कर देते हैं। तो जो वॉइसेस हैं, एक्टिविज़्म होता है, वो सारा इस पर बेस्ड है कि जो मेरे डिज़ायर्स हैं, मैं उसी पर ही रन करूँगा।

जैसे आप समझाते हैं, कि एक तरफ़ समाज के हिसाब से चलना और एक तरफ़ ईगो का ख़ुद के हिसाब से चलना। तो इन दोनों नतीजों में जो होता है, वो बुरा ही होता है। और कई बार ऐसे सिचुएशन में, कई घरों में ऐसा भी होता है कि इस वृत्ति के साथ वालों को ज़बरदस्ती शादी भी करा दी जाती है। और फिर जिनसे शादी होती है, उनका परिवार भी ख़राब होता है। और बहुत सारे ऐसे हमें न्यूज़ में भी चीज़ें सुनने को मिलती हैं।

तो आचार्य जी, मैं आपसे ये जानना चाहूँगा कि एक किशोर को, एक एडोलसेंट को आपकी तरफ़ से क्या संदेश होगा, जो ऐसी चीज़ों से जूझ रहा है और जानता है कि उसके आसपास परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हैं। और उन माँ-बाप के लिए क्या संदेश होगा, जिनके सामने बच्चे ऐसी बात रखते हैं। धन्यवाद आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: नहीं, ये जो पूरा मुद्दा ही है, ये कोई बहुत ऊँचे तल का नहीं है। रिश्ता कैसा भी हो, समाज को स्वीकार हो, नैतिक हो, अनैतिक हो, पता नहीं कैसा है। सवाल ये है कि आप जिसकी ओर जा रहे हो, वो इंसान आपको क्या देने वाला है? ऊँचाई देने वाला है?

अभी आप रूमी के साथ थे। रूमी के गुरु की जो हत्या कर दी थी, उन्हीं के घर के लोगों ने, रूमी के घर के लोगों ने। एक कारण ये भी था कि घर के लोग कहते थे, कि ये दोनों हमेशा साथ ही पाए जाते हैं, रूमी और शम्स तबरेज़ी तो ज़रूर, इन दोनों में कोई अनैतिक समलैंगिक संबंध है, क्योंकि दोनों इश्क़ की बातें कर रहे हैं। जैसे ये हैं, और साथ ही हैं, और दुनिया से बेख़बर हो गए हैं। तो दुनिया ने कहा, ये इनमें होमोसेक्सुअल मामला है। बड़ी इज़्ज़त ख़राब हो रही है, क्योंकि रूमी उससे पहले बड़े इज़्ज़तदार आदमी थे। वहाँ के उस वक़्त के आलिम थे, विद्वान स्कॉलर थे। तो समाज में बदनामी हो रही थी।

तो एक रात को, ये दोनों लोग थे। कोई रूमी के घर से आता है, खटखटाता है, शम्स को बाहर बुलाता है और बाहर ले जाकर के मार देता है। अब वो एक तल की बात है, वहाँ पर हम ये नहीं याद रखते हैं कि मामला होमोसेक्सुअल था या नहीं था। कोई प्रमाण नहीं है कि था, कोई प्रमाण नहीं है कि नहीं था। हो सकता है हो, हो सकता है नहीं हो।

पर वहाँ हम याद ये रखते हैं कि दोनों लोगों की ऊँचाइयाँ कितनी थीं। दोनों को ही संत कहा जाता है, और आप प्रमाणित भी कर दोगे कि वहाँ मामला समलैंगिक था, तो भी वो संत रहेंगे। बहुत लोग हैं जो कहते हैं कि हम मानते हैं कि आपस में उनमें समलैंगिक संबंध था, वो मानने के बावजूद कहते हैं कि कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। संत हैं, तो भी हैं।

तो बात इसकी नहीं है कि आप होमोसेक्सुअल हो, हेट्रोसेक्सुअल हो, आपके समाज में लोग मानते हैं या नहीं मानते हैं। बात ये है कि आप किसकी ओर जा रहे हो? वो व्यक्ति आपको दे क्या रहा है?

आप घटिया आदमी की ओर जा रहे हो और आप कह रहे हो, कि नहीं, देखो, हेट्रोसेक्सुअल है मामला, तो उससे क्या हो गया? समाज से आपको अनुमोदन मिल जाएगा; ठीक है, कोई दिक़्क़त नहीं है। और समाज कहेगा, हाँ, ठीक है, तुम पुरुष हो, वो स्त्री है, तुम दोनों संबंध बना लो, तुम्हारा ठीक है। उससे क्या हो जाएगा? ये पूरा जो विवाद ही है न, बड़ा व्यर्थ है।

आप किसी के शरीर को लेकर के बेताब हुए जा रहे हो। अब वो स्त्री का शरीर हो कि पुरुष का शरीर हो, ले-देकर आपकी लिप्सा तो देह के लिए ही है न। आपने कौन सा तीर मार लिया है? आप एक पुरुष हो, आप किसी स्त्री के शरीर में प्रवेश करने के लिए पगलाए जा रहे हो, तो ये बड़ी पवित्र बात हो गई? और आप किसी पुरुष की देह माँग रहे हो, तो ये भिन्न बात हो गई क्या? ले-देकर चाटना तो हाड़-माँस ही चाहते हो। तो ये कोई बड़ा मुद्दा नहीं है और न इसमें ऐसा है कि इसका समर्थन भी किया जा सके कि ये बड़ी अच्छी बात है, बड़ी बुरी बात है। छोटी बात है, बहुत-बहुत छोटी बात है।

पर जिनके लिए देह ही सब कुछ होता है, उनको यही बड़ी बात लगती है, कि देखना, जरा, होमोसेक्सुअल तो नहीं हो गया मामला। जो होमोसेक्सुअल है वो भी कीचड़ में है; जो हेट्रोसेक्सुअल है वो क्या कम कीचड़ में है? फिर कह रहा हूँ, चाट तो दोनों दे ही रहे हैं न। उसमें माँस और माँस में कितना भेद कर लें, कर लो; कुछ भेद होगा, बिल्कुल होगा, पर वो इतना बड़ा भेद नहीं है कि हम कहें कि आयाम ही बदल गया।

आयाम तब बदलता है जब आप सामने वाले का जिस्म नहीं देखते, उसकी चेतना देखते हो।

ये आप कह रहे हो, “एक लड़का है, वो घर में जाकर कैसे बता दे?” मैं क्या बताऊँ इस पर? वो लड़का भी पगलाया हुआ है, माँ-बाप भी पगले हैं। पागल पागल को ज्ञान कैसे दें, मैं ये कैसे समझाऊँ? पंद्रह, अठारह, बीस, पच्चीस साल का लड़का है। वो कह रहा है, “मैं होमोसेक्सुअल हूँ।” वो ये थोड़ी बोल रहा है, “मैं कॉन्शियसनेस हूँ।” वो बोल रहा है, “बाक़ी सब अभी लड़कियों के पीछे भाग रहे हैं, दुम हिलाते; मैं लड़कों के पीछे भागूँगा, दुम हिलाते।” तो इसने कौन सी बड़ी ऊँची बात कह दी? और जो लोग लड़कियों के पीछे भाग रहे हैं, उनकी तुलना में कोई नीची बात भी नहीं कह दी।

हाँ, बस इतना है कि एक बात समाज को स्वीकार होती है और दूसरी अस्वीकार होती है। भाई, प्रश्न ये होता है: कोई लड़का है और वो कह रहा है कि मुझे बाबूजी, आपके गल्ले पर नहीं बैठना। आप ये जो मच्छीबाज़ी का धंधा करते हो, मछलियाँ पकड़-पकड़कर मँगाते हो, फिर एक्सपोर्ट करते हो, मुझे इसमें नहीं बैठना, और वो ये बात घर वालों को नहीं बता पा रहा है, तो कैसे बताए? तो इसका कुछ जवाब भी दिया जाए। क्योंकि अब आयामगत अंतर है: माँ-बाप जिस धंधे में, जिस ढर्रे में लगे हुए हैं, और ये लड़का जो करना चाहता है, ये दोनों अलग तल की बातें हैं। वहाँ मैं कुछ बोलूँ भी। पर अभी जो ये लड़का कह रहा है, ये बिल्कुल उसी तल की बात है जिस तल पर पूरा समाज चल रहा है। बस एक ही तल पर ये विपरीत बातें हैं।

ये है एक तल (टेबल की सतह को इंगित करते हुए); इसमें एक बात यहाँ की (टेबल के एक किनारे को इंगित करते हुए), एक बात वहाँ की (टेबल के दूसरे किनारे को इंगित करते हुए), तो एक-दूसरे से बातें विपरीत हो गईं लेकिन हैं तो दोनों बातें एक ही तल की न। माँ-बाप का मच्छी मारने का धंधा है और एक ही लड़का है, और माँ-बाप ने बड़ी उम्मीदें टिका रखी हैं कि अब ये पुश्तैनी धंधा आगे बढ़ाएगा। वो लड़का कहता है, “मैं ये धंधा आगे नहीं बढ़ाऊँगा। लेखक, कवि, कुछ और, जो भी चाहे वो विज्ञान, मुझे उधर जाना है।”

तो मैं कहता कि देखो, ये नीचे की अपेक्षा ऊपर की बात है। और जो ऊपर होता है वो हमेशा श्रेष्ठ होता है। पर यहाँ तो बात इधर की है (टेबल के एक किनारे को इंगित करते हुए), इधर की है (टेबल के दूसरे किनारे को इंगित करते हुए)। माँ-बाप कह रहे हैं, “तू एक ऐसे मनुष्य को पकड़ जिसके शरीर में योनि होती है।” तुम कह रहे हो, “मैं ऐसे मनुष्य को पकड़ूँगा जिसके शरीर में लिंग होता है।” ये कौन सी क्रांति है? इसमें क्या बताया जाए कि बेचारे का बड़ा उत्पीड़न हो रहा है।

शरीर के द्वार हैं, एक द्वार से प्रवेश करने को कोई इच्छुक है, एक दूसरे द्वार से, पर घुस तो शरीर के ही अंदर रहे हो न। हाँ, एक द्वार को बना दिया गया है कि ये साहब, ये सम्माननीय तरीक़ा है। जैसे कहीं आप घुस रहे हो तो वहाँ दरवाज़े बनाए जाते हैं। तो जो भले मानुष होते हैं, वो दरवाज़ों से घुसते हैं। और पीछे कुछ चोर दरवाज़े होते हैं, कुछ वहाँ से घुसाते हैं। कुछ चोर-चकारी होते हैं। वो दीवारें फांध के घुस रहे हैं। घुसने के तरीक़ों में अंतर है, कुछ तरीक़े समाज को स्वीकार हैं, कुछ नहीं स्वीकार हैं। पर ले-देकर घुस तो सब के सब उसी जगह पर रहे हो न। किसी भी द्वार से प्रवेश करो, आ तो वहीं रहे हो या तुम्हारे इरादे बदल गए हैं?

इसमें क्या बोला जाए? कुछ नहीं है बोलने को। लोग कहते हैं, कि ये इंडिविजुअल फ्रीडम की बात है। ये फ्रीडम होती है, इसको फ्रीडम बोलते हैं? ये दोनों ही बातें एक ही तल की हैं। इनमें से किसी भी बात का ना समर्थन करा जा सकता है, ना विरोध करा जा सकता है। ये दोनों ही आपके सामने आए तो दोनों से एक ही बात कही जा सकती है, “भैया, इससे ऊपर उठो, यही करते रहोगे क्या?”

और बहुत तो ऐसे होते हैं जो कहते हैं, हमारा सेक्सुअल ओरिएंटेशन मिक्स्ड है। कुछ कहते हैं, हमारा फ्लक्चुएटिंग है। कहते हैं, कभी-कभी हम स्त्री की ओर आकर्षित होते हैं, कभी पुरुष की ओर। कुछ कहते हैं, हम दोनों की ओर होते हैं। कुछ कहते हैं, तीन-तीन साल हमारा चलता है, इधर फिर इधर।

अब ये बताओ, जो भी चलता है, वो चलता तो देह के प्रति ही है न। देह से कब आगे बढ़ोगे? यही करते रहोगे? कभी योनि, कभी लिंग, कभी योनि, कभी लिंग। अरे भाई, ये भी होता है (मष्तिस्क की ओर इंगित करते हुए), चेतना भी होती है उसकी कब बात होगी? या जो मकान की तलहटी है, बिल्कुल बेसमेंट, उसी की बात होती रहेगी। ज़िंदगी के तहखानों में ही घुसे रहोगे, मूलाधार चक्र, उससे ऊपर कभी नहीं उठना। सच्ची आशिक़ी हो गई है, तो मत बताओ माँ-बाप को नहीं सुन रहे तो। पर सच्ची है क्या? प्रश्न तो ये है। होमो या हेट्रो प्रश्न नहीं है। प्रश्न ये है कि…

श्रोता: सच्ची है क्या?

आचार्य प्रशांत: इसमें सच्चाई है क्या? और सच्चाई है, अगर कोई ना सुने तो भी कोई बात नहीं। और सच्चाई नहीं है, और सारा ज़माना आपके साथ है तो भी कोई बात नहीं।

बहुत सारे देश हैं जहाँ होमोसेक्सुअलिटी बड़ी सामान्य सी बात है। कोई समस्या नहीं है। वहाँ मंत्री भी बन जाते हैं, होमोसेक्सुअल और समाज खुलेआम सामने चलते हैं। कोई दिक़्क़त नहीं है उसमें। तो इससे क्या हो गया, वो देवता हो गए? क्या हो गया? स्त्री-पुरुष का संबंध बन जाए, इससे भी वो देवी-देवता नहीं हो जाते। और स्त्री-स्त्री संबंध बना ले, पुरुष-पुरुष बना ले, इससे भी वो नहीं हो जाते। तो ये तुम जानो, तुम्हें क्या करना है।

मैं तो ये जानता हूँ कि देह के तल पर रह कर के चाट तो माँस ही रहे हो। कुत्ते होते हैं, कभी उन्हें किसी चीज़ का माँस मिल गया, कभी किसी चीज़ का माँस मिल गया, चाट रहे हैं। उससे आगे उनकी कोई ख़बर ही नहीं होती। इश्क़ तो वो जानते ही नहीं हैं। और एक प्रकार के माँस को दूसरे प्रकार के माँस से श्रेष्ठ ठहराना कोई उचित बात नहीं है।

तो ये तो आपकी ज़िंदगी है, ये आप जानिए कि आपका सेक्सुअल ओरिएंटेशन क्या है, क्या नहीं है। ये सब तुच्चि बातें हैं, ये आप ख़ुद देख लीजिए। आप अध्यात्म के पास जाएँगे तो वो आपसे आपका सेक्सुअल ओरिएंटेशन नहीं पूछेगा। वो आपसे ये पूछेगा कि इसके आगे क्या है तुम्हारे पास? ये तो सभी के पास होता है। ये तो जानवरों के पास भी होता है। होता है न? और ये कोई अप्राकृतिक चीज़ भी नहीं होती।

जैसे बोला जाता है कि सिर्फ़ हेट्रोसेक्सुअलिटी प्राकृतिक है, होमोसेक्सुअलिटी प्राकृतिक नहीं है, ऐसा भी नहीं है। जानवरों में भी होमोसेक्सुअल ओरिएंटेशंस पाए जाते हैं। तो ये सब तो प्राकृतिक बातें हैं, यही सब है तुम्हारे पास या और कुछ भी है। कोई और भी बात करोगे ज़िंदगी में?

मेरे घर में सब मीठा खाते हैं, पर मुझे खट्टा पसंद है। मैं अपने घर वालों को कैसे मनाऊँ? मत मनाओ, खट्टा खाओ। घर वालों को थोड़ी खिला रहे हो। तुम्हारी ज़िंदगी, तुम जानो। तुम्हें खट्टा खाना है, तो पापा को थोड़ी खिला रहे हो। पापा को मीठा खाने दो, मम्मी मीठी है। तुम जानो। यतिन जी खुश हो गए। मैं सोच रहा था, आज हँसे नहीं।

अध्यात्म इन प्रश्नों पर मौन रहता है। वो कहेगा, ये छोटी बातें हैं ये तुम ख़ुद देख लो, बड़ी बात ये है कि यहाँ कब आना है (ऊँचाई पर)? या तुम्हारी कुल पहचान यही है, तुम्हारी पूरी आइडेंटिटी यही है कि तुम हेट्रोसेक्सुअल हो या होमोसेक्सुअल हो। यही आइडेंटिटी है? अगर ये आइडेंटिटी है, तो बॉडी आइडेंटिफिकेशन और किसको बोलते हैं? और देह भाव से बड़ा नरक दूसरा नहीं होता।

तो ये तुम्हारा मामला है, व्यक्तिगत मामला है। ये तुम जानो। ज्ञानियों को इससे कोई मतलब नहीं है। कौन सा साबुन पसंद है, किसी को मूली चाहिए, किसी को गाजर चाहिए, किसी को बैंगन अच्छा लगता है, धनिया, मेथी, ये तुम जानो न। इसमें कोई वो थोड़ी कहीं पढ़ा है, कि जो हल्दी ज्यादा खाएँगे, नरक में जाएँगे, और हींग वालों को पुण्य मिलता है। देह की बातें हैं। तुम जानो।

कोई तुम पर इस पर अंकुश लगाने नहीं आ रहा। अध्यात्म में कोई नहीं आ रहा, समाज लगाता है अंकुश तो समाज जाने। ये बात न सही है, न ग़लत है, ये बात तुच्चि है। अध्यात्म इस बारे में कुछ नहीं कहता। बल्कि ये बात जाकर किसी ऋषि से पूछोगे, तो तुम्हें ऐसे देखेगा ऊब के और कहेगा, “यही पूछते रहोगे या कुछ और भी है तुम्हारे पास ज़िंदगी में?” तुम ये जो कहानी सुना रहे हो, हमें इसमें कोई रुचि नहीं है। कुछ आगे की, ऊपर की, ऊँची बात हो तो बताओ।

“मुझे पराठे पसंद हैं” पर वो कहती है, “पूड़ी खाएगी” पराठा पूड़ी तुम्हारा, तुम जानो। लड़का होमोसेक्सुअल हो गया, उसके ऊपर शरीर हावी है। माँ-बाप पगलाए जा रहे हैं, “ये क्या हो गया घर में? ये क्या हो गया?” उनके ऊपर समाज और संस्कार हावी हैं। बताओ कौन सही? कौन ग़लत? बोलो न।

माँ-बाप तो तब भी विरोध करते हैं, लड़का कह दे कि दूसरी जात की लड़की पसंद आ गई है। अभी भी लड़के के ऊपर शरीर हावी है और माँ-बाप के ऊपर शरीर, संस्कार और स्मृति हावी है। बताओ कौन सही, कौन ग़लत? दोनों में से कोई सही नहीं है। सब एक ही तल पर पड़े हुए हैं। लड़के के हॉर्मोन छलके जा रहे हैं और माँ-बाप के ऊपर शताब्दियों के संस्कारों की ग़ुलामी है। कैसे कह दें कौन सही, कौन ग़लत? सब एक जैसे हैं।

कितना अजीब लगेगा न, आप किसी से मिलो और अपना परिचय ऐसे दे: “हेलो, आई एम हेट्रोसेक्सुअल।” अबे, तुम्हारी ज़िंदगी में यही पहचान है, तुम्हारी? यही पहचान है? ले-देके यही है अपने आप बारे में बताने को? तो वैसे ही कोई गे है, आप उससे मिलो और उसके दिमाग़ में हर समय यही चलता रहता हो, बोले, “हेलो, आई एम गे।” होओगे भाई, तुम्हारा मसला, तुम जानो। हमें रुचि नहीं है, कुछ और हो तो बताओ।

हम न अच्छा कह रहे इस बात को ना बुरा कह रहे, हम इस बात को बहुत छोटा कह रहे। ये लगभग वैसा ही है।

आज राघव ने कि वो एक पंडित जी बोल रहे हैं, “बकरी का माँस नहीं खाते, सिर्फ़ बकरे का खाते हैं।” वो डाला तो था या फिर सिर्फ़ मुझे ही भेजा था। कहाँ है राघव? पंडित जी के पास तो नहीं निकल गया। वो बाकायदा एक पंडित जी हैं। वो बोल रहे हैं, “हम ब्राह्मण हैं। हमारे यहाँ बकरी नहीं कटती, सिर्फ़ बकरा कटता है।” ये वैसी सी बात है। माँस है भाई, बकरी का हो कि बकरे का हो, स्त्री का हो कि पुरुष का हो, यहाँ कहाँ तुम भेद करने लग गए? भेद तब है जब तुम माँस खाओ ही ना, छुओ ही ना, त्यागो ही दो। बोलो, ये थोड़ी है। जीवन में बकरी भी हो सकती है, बकरा भी हो सकता है, मित्र की तरह हो सकता है। आध्यात्मिक वेगनिज़्म, हम माँस…

श्रोता: नहीं खाते।

आचार्य प्रशांत: आ रही है बात समझ में? अब जाकर बाबा जी से पूछना, “बाबा जी, बताओ, वेगनिज़्म और ब्रह्मचर्य में क्या संबंध है?” समझा ले तो आएगा मज़ा। या कि अभी पवित्र दिन चल रहे हैं इन दिनों में हम माँस नहीं खाते। या कि अल्लाह ने कुछ जानवरों को बताया है हलाल और कुछ को बताया है हराम। जो हलाल है, उनका माँस खाते हैं। जो हराम है, उनका माँस नहीं खाते। अरे भाई, “माँस-माँस सब एक है, मुरगी हिरनी गाय।” संतों ने ये बोला है। उन्होंने कहा है, “मांस-माँस सब एक है।”

तुमने ये क्या हलाल-हराम बना दिया कि कुछ खा सकते हैं, कुछ नहीं खा सकते। सब जीव हैं, सबको पीड़ा होती है। माँस और माँस में अंतर कैसे करने लग गए तुम।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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