वीडियो जानकारी: 05.10.2025 , ग्रेटर नोएडा Title: जब जीने की इच्छा ही न बचे — तो क्या करें? || आचार्य प्रशांत (2025) 📋 Chapters: 00:00 – Intro 01:08 – जीने की चाहत नहीं रही? 07:32 – अभी मर जाऊँ, ग़म नहीं 17:40 – कालातीत हो जाओ ना! 28:03 – गुंडई दिखाओ, कुछ कांड करो 39:14 – खूबसूरत फंदे चुनना सीखो 48:38 – एक चमत्कार बताता हूँ 56:10 – Testimonial विवरण: इस संवाद में आचार्य प्रशांत जी आत्मबोध और जीवन की सार्थकता पर दो मूल प्रश्नों—“मैं कौन हूँ?” और “जिएँ कैसे?”—पर ऐसी स्पष्टता और गहराई से बोलते हैं कि श्रोता अपनी हर जानी-पहचानी धारणा पर पुनः विचार करने को बाध्य हो जाता है। वे बताते हैं कि “पूर्ण हूँ” का अर्थ कोई दिव्य अनुभव नहीं, बल्कि यह गहरी समझ है कि “मैं अपूर्ण नहीं हूँ”; आत्मा को जानने का दावा करना अहंकार का नया रूप है, जबकि सच्चा ज्ञान केवल मौन में संभव है। आगे वे दिखाते हैं कि “जीने की चाहत” जीवन से जुड़ाव नहीं, बल्कि जीवन से पलायन है—क्योंकि जो सचमुच जी रहा है, उसे चाहने की फुर्सत ही नहीं होती। जीवन कोई भविष्य की योजना नहीं, बल्कि इस क्षण उपस्थित हर स्थिति के प्रति पूर्ण उत्तरदायित्व है।