वीडियो जानकारी: 11.09.25, संत सरिता, Title : जीवन की नासमझी ही माया है || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2025) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: इस वीडियो में आचार्य जी संत कबीर के भजन “माया तजूं तजि नहिं जाइ” की पंक्तियों “माया मारि करै ब्योहार, कबीर मेरे राम आधार” पर गहराई से चर्चा कर रहे हैं। आचार्य जी समझाते हैं कि माया कोई बाहरी शक्ति या संसार नहीं है, बल्कि जीवन को न समझ पाने की अवस्था है, जिसे हम भ्रम और अविवेक कहते हैं। अध्यात्म का अर्थ दुनिया छोड़ना या किसी परलोक की कल्पना करना नहीं है, बल्कि इसी जीवन में सही दृष्टि और विवेक के साथ जीना है। आचार्य जी बताते हैं कि माया को “मारना” का मतलब यह नहीं कि व्यवहार छोड़ दिया जाए, बल्कि यह कि व्यवहार भ्रम से मुक्त होकर किया जाए ताकि जीवन दुखद न रहे। जब जीवन का आधार भ्रम नहीं बल्कि बोध बन जाता है, तभी मनुष्य सच्चे अर्थों में मुक्त होकर इसी संसार में सही ढंग से जी पाता है।