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जहाँ सहारा ढूँढ रहे हो, क्या वह संभाल भी पाएगा? || आचार्य प्रशांत, कठ उपनिषद् पर (2025)
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Description

वीडियो जानकारी: 30.07.25, वेदांत संहिता, गोवा Title : जहाँ सहारा ढूँढ रहे हो, क्या वह संभाल भी पाएगा? || आचार्य प्रशांत, कठ उपनिषद् पर (2025) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: जानाम्यहर शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १०॥ हिन्दी अनुवाद: मैं जानता हूँ कि संपदा (साधन/धन) अनित्य है, क्योंकि अस्थायी (अनित्य) विषयों से उस स्थायी (नित्य) को निश्चित ही प्राप्त नहीं हुआ जा सकता। इसलिए, हे नचिकेता! मैंने अनित्य विषयों को अग्नि को अर्पित करके, उस नित्य को प्राप्त हुआ हूँ। ~ कठोपनिषद 1.2.10 इस वीडियो में आचार्य जी कठोपनिषद के श्लोक 1.2.10 पर चर्चा करते हुए नित्य, अनित्य को स्पष्ट कर रहे है। आचार्य जी अनित्यता और दुख के मूल कारण पर चर्चा कर रहे हैं। आचार्य जी समझाते हैं कि संसार, अनुभव, अहंकार—सब बदलने वाले हैं, इसलिए इनसे मिलने वाला सुख भी धोखा ही है। जो स्वयं अनित्य है, वह किसी भी साधन या विधि से नित्य को पा ही नहीं सकता। आचार्य जी बताते हैं कि समस्या साधनों में नहीं, हमारी गलत पहचान में है—हम वही नहीं हैं जो खुद को मान बैठे हैं। मुक्ति बाहर नहीं, अपने ही भीतर की परतें हटाने से मिलती है; दर्पण-विधि ही सच्चा मार्ग है। सत्य खोजने नहीं, बस झूठ को आग में डालने की ईमानदारी चाहिए।