वीडियो जानकारी: 25.10.23, बोध प्रत्यूषा, ग्रेटर नोएडा Title: सुंदरता की असली परिभाषा क्या है? || आचार्य प्रशांत, लाओत्सु पर (2023) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: इस वीडियो में आचार्य जी समझाते हैं कि हम जगत को जानने के लिए नहीं देखते, बल्कि केवल भोगने और अपने स्वार्थ के लिए देखते हैं। आचार्य जी बताते हैं कि अहंकार के पास इतनी चेतना नहीं होती कि वह सही–गलत या हित-अहित पहचान सके, इसलिए वह हर निर्णय केवल सुख–दुःख के अनुभव पर लेता है। आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि “सुंदर–असुंदर” और “अच्छा–बुरा” का भेद भी हमारी बेहोशी से पैदा होता है। जिस वस्तु या अनुभव से स्वार्थ पूरा हो जाए, उसे हम सुंदर कह देते हैं। लेकिन असली सौंदर्य बाहर नहीं मिलता, बल्कि भीतर अहंकार की अनुपस्थिति में ही होता है। आचार्य जी बताते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति जगत पर जल्दी-जल्दी ठप्पे नहीं लगाता। वह कहता है—रुको, परखो, समझो। जीवन भोगने के लिए नहीं, बल्कि जानने और सीखने (learning) के लिए है। जब भीतर स्पष्टता आती है, तब बाहर की हर चीज़ खुली किताब की तरह पढ़ने और समझने लायक हो जाती है। आचार्य जी समझाते हैं कि सुख में फँसना गुलामी है, लेकिन रुककर जिज्ञासा से पूछना—यही आज़ादी है। यही मुक्ति की शुरुआत है।