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भोग का परिणाम || आचार्य प्रशांत, कठ उपनिषद् पर (2024)
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Description

वीडियो जानकारी: 25.08.24 वेदांत संहिता, ग्रेटर नोएडा Title : भोग का परिणाम || आचार्य प्रशांत, कठ उपनिषद् पर (2024) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥ ~कठोपनिषद 1.1.28 अर्थ: हे यमराज! जो यह समझता है कि नष्ट होना और मरना तय है और अगर उसे ऐसे ज्ञानियों की संगत मिल रही हो जो बुढ़ापे और मृत्यु से अछूते हैं तो फिर वह स्त्रियों की कामना में लगे रहते हुए अधिक समय तक जीवित रहने में क्यों उत्सुक होगा? इस वीडियो में आचार्य प्रशांत कठोपनिषद् के श्लोक 1.1.28 पर चर्चा करते हुए बताते हैं कि जीवन की सबसे कठिन परीक्षा भोग और सत्य के बीच चुनाव है। यमराज द्वारा नचिकेता को अप्सराओं (भोग के विषय) और लंबी आयु (भोग की अवधि) का लालच दिए जाने पर, नचिकेता उन्हें ठुकराकर गुरु और आत्मविद्या को सर्वोच्च महत्व देते हैं। नचिकेता का अडिग उत्तर यह सिखाता है कि गुरु के सामने खड़े होकर गुरु के अलावा कुछ और चाहना अहंकार की भूल है। आचार्य जी समझाते हैं कि आध्यात्मिक मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट केवल सांसारिक सुख नहीं, बल्कि गुरु और धर्म के आसपास की माया है — वह माहौल, सुविधाएँ और मेलजोल, जो साधक को असली लक्ष्य से भटका देते हैं। सच्चा दृढ़ निश्चय यह है कि साधक को केवल सर्वोच्च सत्य ही चाहिए, और उसके अलावा कुछ नहीं — चाहे स्वयं सत्य ही कितनी भी आकर्षक चीज़ें क्यों न दे।