वीडियो जानकारी: 05.08.25, वेदांत संहिता, गोवा Title : तुम्हारी मान्यताएँ तुम्हारी जेल हैं || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2025) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम् । त्यागादानेविहायास्मादहमासेयथासुखम् ॥ १॥ ~अष्टावक्र गीता (13.1) हिन्दी अनुवाद: अकिञ्चनता (निर्ममता) जनित आंतरिक स्वास्थ्य तो लंगोटधारी (लोकधार्मिक वैरागी) होने पर भी दुर्लभ है। त्याग और ग्रहण, इस द्वैत से परे मैं आनंद में स्थित हूँ। इस वीडियो में आचार्य जी अष्टावक्र गीता के अध्याय 13, श्लोक 1 पर चर्चा कर रहे हैं। आचार्य जी समझाते हैं कि “अकिंचन” का अर्थ बाहरी त्याग नहीं, बल्कि भीतर जमी मान्यताओं और विषय-आसक्ति का पूर्ण विसर्जन है। आचार्य जी बताते हैं कि मुक्ति, आत्मस्थ होना और स्व में स्थित होना किसी प्रयास से नहीं मिलता, क्योंकि स्व से हटना संभव ही नहीं। आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि बँधन वस्तुओं में नहीं, बल्कि उन पर टिकी अहंकार-जनित आशा, अज्ञान और झूठे ज्ञान में है। आचार्य जी जोर देते हैं कि जब ईमानदारी से अज्ञान टूटता है, तब वास्तविक ज्ञान अपने आप प्रकट होता है। यह प्रवचन वेदान्त, अष्टावक्र गीता, अध्यात्मिक मुक्ति और विषय-त्याग की गहरी समझ प्रदान करता है।