वीडियो जानकारी: 13.09.25, वेदांत संहिता, ग्रेटर नोएडा Title : जो हम हैं और जो हम हो सकते हैं, उसी के बीच पुल है धर्म || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2025) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते । मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम् ॥ ~ अष्टावक्र गीता (13.2) हिन्दी अनुवाद: शरीर को कभी-कभी खेद होता है, जीभ को कभी-कभी खेद होता है, और मन को कभी-कभी खेद होता है; इन सबको त्यागते हुए मैं पुरुषार्थ और आनंद में स्थित हूँ। इस वीडियो में आचार्य जी अष्टावक्र गीता के अध्याय 13 के श्लोक 2 पर चर्चा कर रहे हैं। आचार्य जी बताते हैं कि हमारा धर्म उतना ही बिखरा हुआ है जितना हमारा जीवन। जैसे हमारा व्यवहार, भूमिकाएँ और जीवन के हिस्से एक–दूसरे से असंगत और खंडित हैं, वैसे ही धर्म भी टुकड़ों में बँट गया है। हम कर्मकांड, परंपरा, अनुष्ठान, व्रत, ज्योतिष, प्रतीक-पूजा और सामाजिक रीति-रिवाज, इन सबको एक ही साँस में “धर्म” कह देते हैं, जबकि इनमें से अधिकतर का आत्मबोध से कोई संबंध नहीं। आचार्य जी समझाते हैं कि शरीर, जीभ और मन को कभी-कभी दुख, खेद और असंतोष होता है — पर इनकी पीड़ा को “मैं” मान लेना ही असली दुख है। आचार्य जी बताते हैं कि शरीर और मन प्रकृति की गतियाँ हैं, वे कर्ता नहीं हैं; कर्तृत्व केवल अहंकार करता है और वही दुख का कारण बनता है। सच्चा पुरुषार्थ इन आग्रहों को पूरा करना नहीं, बल्कि उनसे असंग रहकर स्वयं को पहचानना है।