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सिर झुकाने से पहले सवाल उठाना सीखो—यही है असली अध्यात्म || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2025)
शास्त्रज्ञान
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5 months ago
Description

वीडियो जानकारी: 04.06.25, वेदांत संहिता, ग्रेटर नोएडा Title : सिर झुकाने से पहले सवाल उठाना सीखो—यही है असली अध्यात्म || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2025) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: अचिन्त्यं चिन्त्यमानोऽपिचिन्तारूपं भजत्यसौ । त्यक्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ ~ अष्टावक्र गीता (12.7) अनुवाद: जब कोई अचिंत्य का चिंतन करने का प्रयत्न करता है, तब भी वह मात्र चिंतन के रूप में ही प्रतीत होता है; इसलिए उस भावना को त्यागकर मैं इस प्रकार स्थित हूँ। इस वीडियो में आचार्य जी अष्टावक्र गीता श्लोक 12.7 पर चर्चा करते हुए बताते हैं कि सत्य अचिंत्य है—उसके बारे में कोई चिंतन, कल्पना या छवि संभव ही नहीं। जो भी रूप या भावना मन गढ़ता है, वह केवल हमारे स्वार्थ और संस्कारों का विस्तार है। इसलिए जब मनुष्य पूजा करता है, तो वास्तव में वह अपने ही स्वार्थ की छवि की पूजा कर रहा होता है। आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि नाम, रूप और विचार—अहंकार के ही विषय हैं। मुक्ति कभी भी अहंकार की परिधि में संभव नहीं। सच्चा साधक वही है जो कल्पना को रोककर पूछना सीखता है—“पूजो नहीं, पूछो।” आचार्य जी समझाते हैं कि जीवन का सार यही है कि मिट्टी से आसमान की सीढ़ी बनानी है। सार्थक संगति वही है, जिसमें पार की झलक मिल जाए। और यही सच्चा प्रेम है—वह प्रेम जो सर चढ़कर बोलता है और अहंकार को भंग कर देता है।