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योग और ब्रह्मचर्य का असली अर्थ || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2025)
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Description

वीडियो जानकारी: 05.07.25, गीता समागम,ग्रेटर नोएडा Title : योग क्या है? कौन है असली योगी? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2025) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ।13। प्रशान्तात्मा विगतभीब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ।14। ~ भगवद् गीता (6.13-6.14) हिन्दी अनुवाद: शरीर, सिर और गर्दन को सीधा, अचल और स्थिर रखते हुए, अपनी नाक के सिरे को एकटक देखते हुए तथा चारों दिशाओं में इधर-उधर न देखते हुए, प्रशांत-चित्त, भय से मुक्त, ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित, मन को संयमित करके, मुझमें परायण और मेरा चिंतन करते हुए, योगी मुझमें स्थित रहते हैं। काव्य: सत में रत आत्म में लीन वो भय नहीं स्वयं से एक जो पीठ सीधी दृष्टि एकाग्र रहे योगी वही भ्रम से जो हो परे इस वीडियो में आचार्य जी श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के श्लोक 13 और 14 पर चर्चा कर रहे हैं। इन श्लोकों के माध्यम से वे समझा रहे हैं कि योग शरीर का अभ्यास नहीं, बल्कि स्मरण की साधना है। जो सत्य है, वह इंद्रियों से दिखाई नहीं देता — इसलिए ज्ञानी शरीर, आसन और प्रतीकों का प्रयोग उस अदृश्य सत्य को याद करने के लिए करते हैं। आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि शरीर साधन है, साध्य नहीं। रीढ़ की स्थिरता, दृष्टि की एकाग्रता और मन का संयम — ये सब प्रतीक हैं उस आत्मिक अचलता और एकाग्रता के, जो योग का वास्तविक उद्देश्य है। वे यह भी बताते हैं कि ब्रह्मचर्य का अर्थ देह से दूर रहना नहीं, बल्कि ब्रह्म में स्थित रहना है — यानी चेतना का केंद्र आत्मा में टिक जाना। यह वीडियो उन दर्शकों के लिए है जो यह समझना चाहते हैं कि सच्चा योग शरीर या आसनों से नहीं, बल्कि आत्म-स्मरण, प्रेम और चेतना की स्थिरता से होता है — जहाँ व्यक्ति दृश्य से परे जाकर अदृश्य में लीन हो जाता है।