वीडियो जानकारी: 07.10.24, गीता समागम, ग्रेटर नोएडा Title : आत्मज्ञान बिना निष्कामता नहीं || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2024) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ।। ~ भगवद् गीता (5.4) हिन्दी अनुवाद: अज्ञानी व्यक्ति ही सांख्य और योग को अलग-अलग कहते हैं, ज्ञानीजन नहीं। इनमें से एक में भी सम्यक् रूप से स्थित होने पर दोनों का फल प्राप्त होता है। काव्य: प्रकृति से तो पृथक मैं ऐसा जिसमें विवेक है संयोगों से भिन्न हुआ आनंद से अब एक है इस वीडियो में आचार्य जी भगवद् गीता (अध्याय 5, श्लोक 4) के संदर्भ में निष्काम कर्म और आत्मज्ञान पर चर्चा कर रहे है। वे बताते हैं कि गति और कर्म तो प्रकृति अपने-आप कराती है; इसके लिए किसी कर्ता या अतिरिक्त चेष्टा की आवश्यकता नहीं। अहंकार, जो वास्तव में है ही नहीं, बस श्रेय लेता है—“सब गतियों का स्वामी मैं हूँ।” यही दावा निष्कामता का झूठा आवरण बन जाता है। आचार्य जी स्पष्ट करते है कि बिना आत्मज्ञान के निष्काम कर्म असंभव है; जो ज्ञान के बिना खुद को निष्कामी घोषित करता है, वह पाखंड से आत्मज्ञान से बचने की कोशिश कर रहा है। सांख्य (ज्ञान) और योग (निष्काम कर्म) को अलग देखना बाल-बुद्धि की निशानी है। आचार्य जी समझाते हैं कि निष्कामता कोई तकनीक नहीं, बल्कि जीवित आत्मावलोकन का स्वाभाविक परिणाम है।