वीडियो जानकारी: 19.10.24, गीता समागम, मुंबई Title : एकं पश्यति, स पश्यति — जिसने ‘एक’ देखा, वही देख पाया! || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2024) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ।।५।। ~ भगवद् गीता (5.5) हिन्दी अनुवाद: सांख्ययोगी जो स्थान प्राप्त करते हैं, निष्काम कर्म योगी भी उसी स्थान को पाते हैं। इसलिए जो सांख्य और निष्काम कर्म योग को एक देखते हैं, वही यथार्थरूप देखते हैं। काव्य: ज्ञान जब जीवन बने जीवन पाता सद्गति कर्म व ज्ञान एक हो एकं पश्यति स पश्यति इस वीडियो में आचार्य जी श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5, श्लोक 5 पर चर्चा करते हुए बताते हैं कि जीवन में सैकड़ों समस्याएँ दिखती हैं, परंतु वास्तव में केवल एक ही समस्या है—अहंकार। और समाधान भी केवल एक है—आत्मज्ञान। आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान और कर्म अलग-अलग मार्ग नहीं हैं। सच्चा ज्ञान कर्म में प्रकट होता है, और कर्म तभी सार्थक है जब वह ज्ञान से प्रकाशित हो। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि सांख्य (ज्ञान) और योग (कर्म) एक ही सत्य की अभिव्यक्तियाँ हैं। आचार्य जी समझाते हैं कि अध्यात्म का सार एक ही सत्य में है — “एकं पश्यति, स पश्यति” — जो एक को देख लेता है, वही सचमुच देखता है। आचार्य जी बताते हैं कि सच्चा ज्ञान और सच्चा कर्म अलग नहीं हैं; जो जानता है, वही सही तरीके से जीता है। जब व्यक्ति अपनी मान्यताओं, भय और व्यक्तिगत दुखों के पार देखने लगता है, तो जीवन में सहजता, करुणा और स्पष्टता आती है।